विचार
कोविड-19 के विरुद्ध भारत अब ‘कर्म’ और सामूहिक रोग प्रतिरोधक क्षमता पर आश्रित

कोविड-19 के विरुद्ध लड़ाई को भारत ‘कर्म’ पर छोड़ने वाला है। वायरस से लड़ने के निश्चय के तीन महीने बाद सरकार और लोग दोनों थक चुके हैं।

एक दिन के समाचार शीर्षक पर ध्यान दें- कल (9 जून) को दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि कोविड-19 मामले ऐसे ही बढ़ते रहे तो जुलाई के अंत तक राज्य में संक्रमण 5.5 लाख मामले होंगे। यह वर्तमान में देश के कुल मामलों का लगभग दोगुना है।

दिल्ली में 80,000 बेड की आवश्यकता होगी जबकि 8,575 ही उपलब्ध हैं। अवश्य ही सांस्थानिक स्वास्थ्य सेवा की ज़रूरत पड़ने पर नए तरीके खोजे जाएँगे लेकिन यह वक्र को समतल करने या कोविड-19 के विरुद्ध लड़ाई जीतने के समान नहीं है।

कर्नाटक भी अब अच्छी स्थिति में नहीं रहा है। मामले निरंतर बढ़ते जा रहे हैं (9 जून तक 5,921) और राज्य के आखिरी कोविड-मुक्त जिले चामराजनगर में भी पहला मामला देखा गया है। राज्य अब मृत लोगों का परीक्षण नहीं करेगा कि उनमें कोविड-19 था अथवा नहीं।

स्वास्थ्य मंत्री बी श्रीरामुलु ने कहा है कि सांस्थानिक पृथकवास केवल निर्धनों के लिए है। अन्य अपनी लागत पर होटल में रह सकते हैं या गृह पृथकवास अपना सकते हैं। यह एक बड़ा परिवर्तन है क्योंकि लगभग 10 दिवस पूर्व ही राज्य उच्च-संक्रमण क्षेत्रों से आए व्यक्ति को सात दिनों के सांस्थानिक पृथकवास में रखना चाहता था।

यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि यह निर्णय तब लिया गया है जब लॉकडाउन में ढील के बाद राज्य आए लोगों में गृह पृथकवास का उल्लंघन करने के 13,000 मामले देखे गए हैं। निस्संदेह ही हर मामले पर नज़र रखना असंभव है।

कहा जा रहा है कि मुंबई कोविड-19 के विरुद्ध लड़ाई “जीत” रहा है। संक्रमण के दोगुने होने का समय 23 दिन हो गया है जो दो सप्ताह पूर्व 11 दिन था। इससे आश्वस्त न हों। इसका अर्थ यही हुआ कि राज्य अब भगवान भरोसे या लोगों के स्व-बचाव पर आश्रित हो गया है।

जब दिल्ली जुलाई के अंत तक 5.5 लाख मामले (वर्तमान में 31,309 मामले) अपेक्षित कर रहा है तो अधिक भीड़-भाड़ वाले मुंबई में जहाँ मामले अभी ही 50,000 को पार कर चुके हैं, इससे बेहतर प्रदर्शन की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। अन्य था ‘कर्म चक्र’ इसके पक्ष में चला जाए।

सर्वोच्च न्यायालय ने सभी प्रवासियों को 15 दिनों के भीतर घर भेजने की बात कहकर सरकारों का बोझ और बढ़ा दिया है तथा वह भी तब जब लॉकडाउन खुलने के बाद कई निर्माण कार्य और सेवाओं में श्रमिकों की माँग कई राज्यों में बढ़ी है। घर लौटने वाले प्रवासी अवश्य ही संक्रमण को फैलाएँगे और वर्तमान में कम संक्रण वाले राज्य कोविड-19 के नए केंद्र बन सकते हैं।

आज के समाचार-पत्रों से ये कुछ शीर्षक थे और अगर आप अधिक खोजेंगे तो कई और संकेत मिलेंगे जो चिकित्सा इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर करने के संघर्ष के साथ दर्शाते हैं कि भारत जीविका को जीवन से ऊपर रख रहा है।

आप सरकार में हों, व्यापारी हों या उन लाखों लोगों में से एक हों जिसे आम आदमी कहा जाता है, आप कोविड से थक चुके हैं। भारत को इसके साथ जीने के लिए तैयार होना होगा जैसे हम ट्यूबरकुलोसिस, डायबिटिस, हृदय रोग और अन्य रोगों के साथ जीना सीख चुके हैं।

1.38 करोड़ की जनसंख्या वाले देश, जिसमें अधिकांश युवा और सीमित आय से बेचैन हैं, के लिए लोगों को बंद करके रखना सदैव कठिन था।

साथ ही बचाव के अधिकांश उपाय भी मध्यम वर्ग और उससे ऊपर के लिए हैं। इसका अर्थ हुआ कि 100 करोड़ से अधिक लोग सार्वजनिक रूप से हमेशा मास्क नहीं लगा सकते, बार-बार हाथ नहीं धो सकते, न शहरों में सामाजिक दूरी का पालन कर सकते हैं।

तनिक सोचिए मध्यम वर्ग और धनी घरों के बाहर कितने लोग हैं जो जल के अभाव में बार-बार हाथ धोएँगे? काम करते हुए क्या वे मास्क लगाएँगे? मास्क लगाकर दीर्घ समय तक श्रम करना लगभग असंभव है। इसी प्रकार सामाजिक दूरी भी उपहास बनकर रह जाती है।

भीड़-भाड़ वाली मुंबई में मध्यम-वर्गीय भी अपने घरों में सामाजिक दूरी का पालन नहीं कर सकते हैं। और हम करोड़ों लोगों से महीनों तक इस अनुशासन का पालन करने की अपेक्षा कर रहे हैं।

सर्वश्रेष्ठ होगा कि इस चुनौती का सामना लोग ही करें। तीन चीज़ें की जा सकती हैं।

पहला, प्रधानमंत्री और सभी मुख्यमंत्रियों को कोविड-19 को अब कम महत्त्व देना चाहिए। उन्हें लोगों और व्यवसायों से कह देना चाहिए कि नियमों के अनुपालन का दायित्व उनका है। समुदायों को अपना बचाव स्वयं करना होगा। ज़्यादा से ज़्यादा यह हो सकता है कि सहायता माँगे जाने पर राज्य कुछ करे।

दूसरा, जब संक्रमण की संख्या लाखों में चली गई है तो हमें चिकित्सा संसाधनों का उपयोग उन्हीं के लिए करना चाहिए जो सर्वाधिक ज़रूरतमंद हों। शीघ्र ही हमें कठिन विकल्पों में से भी चुनना होगा कि युवाओं को बेड दिए जाएँ या पर्याप्त जीवन जी चुके वृद्धों को। अन्य बीमारियों वाले वृद्ध की बजाय युवा का उपचार करना भी सरल होगा। जब अस्पताल ऐसी दुविधा में फँसे तो उसके निवारण के लिए हमारे पास स्पष्ट नियम होने चाहिए।

तीसरा, अधिकांश कोविड रोगियों का उपचार स्थाई अस्पतालों में करना होगा (जैसे स्टेडियम या खाली फ्लैट) इसलिए सभी राज्यों को एक सुदृढ़ चल-चिकित्सा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना चाहिए ताकि डॉक्टर, नर्सों और अन्य सहायक स्वास्थ्य कर्मचारियों की कम संख्या से भी दूर से ही वीडियो या टेली-मेडिसिन ऐप के माध्यम से रोगियों की देखभाल की जा सके।

कोविड के विरुद्ध भारत की लड़ाई अब इसपर निर्भर करती है कि लोग कितने ज़िम्मेदार बनते हैं और सरकारें सीमित संसाधनों से ज़रूरतमंदों तक सांस्थानिक स्वास्थ्य सेवा कैसे पहुँचा पाएँगी।

कुल मिलाकर कोविड-19 से हमें ईश्वर और हमारे ‘कर्म’ बचा सकते हैं। नास्तिक और ईश्वर के अस्तित्व को न मानने वाले सामूहिक रोग प्रतिरोधक क्षमता के शीघ्र विकसित होने की आशा कर सकते हैं। हालाँकि इस वर्ष ऐसा होने की संभावना कम है।

जो हम कर सकते हैं वो सब कर देने के बाद स्थिति को ‘कर्म’ के भरोसे छोड़ना कोई बुरी बात नहीं है। कम से कम यह हमें जीवन पर ध्यान केंद्रत करने की शक्ति देता है। कई लोग दीर्घ जीवन से अधिक गुणवत्ता युक्त जीवन पर विश्वास करते हैं। ऐसे में लॉकडाउन और कड़े उपया कोई हल नहीं देते हैं।