विचार
भारत-नेपाल संबंधों की पुनर्स्थापना के लिए विश्वास और लोगों का साथ, दोनों आवश्यक

पिछला महीना यानी अगस्त भारत-नेपाल के संबंधों में आए हालिया गतिरोध को तोड़ने वाला रहा। भारत के स्वतंत्रता दिवस पर जहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने समकक्ष केपी ओली से बात की, वहीं ठीक दो दिनों बाद द्विपक्षीय वार्ता भी हुई। हाल में खड़े हुए सीमा विवाद ने दोनों देशों के बीच एक गतिरोध पैदा किया है, जिसे दूर करने के कूटनीतिक प्रयासों के तहत ये दो काम हुए।

भारत-नेपाल संबंध ऐतिहासिक रहे हैं। साझी सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक संबंध एक ऐसा कारक रहा है जो सैकड़ों साल से इन दोनों देशों को एक साथ बांधे हुए है। ऐसे में अगर इस ऐतिहासिक रिश्ते को कायम रखना है और इसके लिए साझे प्रयास करने हैं तो हमारा प्रस्थान बिंदु ‘बिल्डिंग ट्रस्ट, कनेक्टिंग पीपल’ ही हो सकता है। यानी आपसी विश्वास और लोगों का साथ ही इन दोनों देशों के ऐतिहासिक रिश्ते को न केवल बचाएगा बल्कि उन्हें एक नई ऊँचाई पर लेकर जाएगा।

एक नज़र में हालिया सीमा विवाद

हालाँकि दोनों देशों ने अपने संबंधों में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं लेकिन हाल ही में उत्पन्न हुए सीमा विवाद से संबंधों में थोड़ी ज्यादा कड़वाहट आ गई है। तभी से यह विवाद सरकारों, बुद्धिजीवियों और मीडिया के बीच बहस का विषय बन गया है। 8 मई 2020 को भारत के लिपुलेख दर्रे पर चीन से लगी सीमा से जुड़कर हिमालय में नई 80 किलोमीटर लंबी सड़क का उद्घाटन इस विवाद की असल जड़ मानी जा रही है।

नेपाली सरकार का दावा है कि नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच 1816 के सुगौली संधि के अनुसार यह क्षेत्र नेपाल में आता है, जो काली नदी को सीमा के रूप में सीमांकित करता है। 1827 और 1856 में भारत के ब्रिटिश सर्वेयर जनरल द्वारा जारी किए गए नक्शों का हवाला देते हुए नेपाल ने कहा कि काली नदी का उद्गम स्थल लिंपियाधुरा में है। 

तनाव तब बढ़ गया जब नेपाल ने एक नए राजनीतिक मानचित्र को जारी किया जिसमें भारत के उत्तराखंड राज्य के कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख क्षेत्र को नेपाल का हिस्सा बताया। मामला और गर्म हो गया जब नेपाल ने लगभग 400 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर औपचारिक रूप से दावा करते हुए एक संवैधानिक संशोधन पेश किया।

परंतु भारत ने इस दावे को “अंजस्टीफाइड कार्टोग्रैफिक एज़रसन” (अनुचित) और “आर्टिफिशियल एनलार्जमेंट ऑफ टेरिटोरियल क्लेम्स” के रूप में खारिज कर दिया। इस संदर्भ में, भारत ने कर रिकॉर्ड, प्रशासनिक और ऐतिहासिक दस्तावेज पेश करते हुए अपने दावे को सही ठहराया। 

चीनी हस्तक्षेप ने और बिगाड़ा काम

खासकर पिछले कुछ सालों से भारत-नेपाल संबंधों में चीन हमेशा एक बड़ा कारक रहा है। उदाहरण के लिए, जब 2015 में भारत-नेपाल संबंधों में थोड़ी खटास आई तब चीन ने नेपाल के साथ नज़दीकी बढ़ाने का पुरजोर प्रयास किया। नेपाल में भारत की उपस्थिति के बदले में चीन बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के माध्यम से नेपाल के साथ संबंध स्थापित करने का प्रयास कर रहा है।

यह भी तर्क दिया जा रहा है कि दोनों देशों के बीच सीमा पर हालिया विवाद का एक प्रमुख कारण चीन का नेपाल के ऊपर बढ़ता व्यापक प्रभाव है। परंतु यह बात दरकिनार नहीं की जा सकती कि चीन की तुलना में नेपाल पर भारत अतिरिक्त लाभ की स्थिति में है। जहाँ नेपाल में चीन की उपस्थिति ज्यादातर रणनीतिक और सुरक्षा हितों से प्रेरित है, वहीं ठीक इसके विपरीत, भारत और नेपाल के बीच सुरक्षा संबंधों के अलावा साझा सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत, भौगोलिक, धार्मिक, ऐतिहासिक निकटता भी काफी महत्वपूर्ण हैं। लोगों से लोगों का संबंध दोनों देशों बीच विश्वास को मजबूत करते हैं और यकीनन ये वर्तमान स्थिति को सकारात्मक बनाने में सफल विकल्प साबित होंगे। 

क्या होना चाहिए रोडमैप? 

रिश्ते में उतार-चढ़ाव के बावजूद, भारत-नेपाल संबंध एक कुटुंब (परिवार) के रूप में स्थापित हैं, और यही चीज़ इस संबंध को मजबूती प्रदान करती है। रिश्ते को पटरी पर लाने के लिए कुछ ऐसे पहलू हैं जिनपर काम किया जा सकता है। 

पॉलिटिकल इंजीनियरिंग 

बुनियादी ढाँचे के उन्नयन, रेल और सड़क संपर्क के निर्माण में आर्थिक सहायता, नेपाली वस्तुओं की आवाजाही, पेट्रोलियम उत्पादों के लिए नई सीमा-पार पाइपलाइन इत्यादि, भारत और नेपाल के साझा संबंध की विशिष्ट उपलब्धियों को दर्शाते हैं।

मौजूदा उपलब्धियों के निर्माण के लिए दोनों देशों को पॉलिटिकल इंजीनियरिंग पर अधिक ध्यान केंद्रित करने और बातचीत के लिए सकारात्मक माहौल बनाने की आवश्यकता है। इस संबंध में 17 अगस्त 2020 को सार्थक संवाद स्थापित करने की दिशा में विकास और आर्थिक परियोजनाओं जैसे सीमा इंफ्रास्ट्रक्चर और क्रॉस-बॉर्डर पाइपलाइन की प्रगति इत्यादि की समीक्षा करने के लिए हुई बैठक, पॉलिटिकल इंजीनियरिंग की तरफ पहला कदम है। रिश्तों को पटरी पर लाने तथा और मजबूत करने के लिए इस तरह के सकारात्मक पहल की आवश्यकता है।

पी-2-पी कनेक्ट

भारत-नेपाल संबंधों का सबसे महबूत पक्ष लोगों से लोगों का संपर्क है। दोनों के बीच इस तरह के सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंध, रामायण और महाभारत से जुड़े कई धार्मिक और पवित्र संबंधों और बौद्ध धर्म जैसे अन्य धर्मों से जुड़ाव पर आधारित हैं। जैसे कि जनकपुर देवी सीता माँ की जन्मभूमि थी और लुंबिनी भगवान बुद्ध की है। इतना ही नहीं, बल्कि काठमांडू के पास स्थित पशुपतिनाथ मंदिर हिंदू धर्म और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। इसी तरह, दोनों देशों के संबंधों को मजबूत करने में  हिंदी, नेपाली, मैथिली, भोजपुरी और देवनागरी लिपि आधारित भाषाई जुड़ाव भी एक मजबूत आधार प्रस्तुत करती है। 

भारत और नेपाल को रणनीतिक और राजनीतिक संबंधों को फिर से संगठित करने के लिए सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक संबंधों पर निर्मित पक्ष का लाभ उठाना चाहिए। दोनों राष्ट्रों को नीचे से ऊपर जाने का तरीका अपनाना चाहिए, जिसका सबसे मजबूत सिरा पी-2-पी है, जो संबंधों को स्थिर करने के लिए महत्वपूर्ण विकल्प साबित हो सकता है। 

पी-2-पी को मजबूती प्रदान करने, विश्वास स्तर को बढ़ाने और लोगों को जोड़ने के लिए, दोनों देशों के नागरिक समाज संगठनों (सिविल सोसाइटी ऑर्गनाइज़ेशन) को आगे आने की आवश्यकता है। साथ ही साथ सरकार को इन्हें सही मंच प्रदान करने में मदद करनी चाहिए, ताकि वे इन मुद्दों पर चर्चा कर उसके निपटारे में सही विकल्प प्रस्तुत कर सकें। यह प्रयास इन दोनों राष्ट्रों के मध्य संबंधों को न केवल मजबूत करने बल्कि एक सकारात्मक दृष्टिकोण को विकसित करने में मददगार साबित होगा।

डॉ. मुकेश कुमार श्रीवास्तव भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) में सलाहकार हैं। वे @Srivastava_1987 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।