विचार
इतिहास के कुछ पन्नों को पलटकर पाएँ उत्तर कि भारत कब से गुलाम रहा है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इतिहास में 1000 साल की गुलामी वाली बात पर प्रायः भौंहें चढ़ती हैं। विविध नेताओं एवं बुद्धिजीवियों ने इस से कई बार असहमति जताई है। एक बार असदुद्दीन ओवैसी और शाहनवाज खान में इस पर बहस हुई। कुछ पहले टीवी पर शशि थरूर और सदगुरु जग्गी वासुदेव में इस पर वाद-विवाद हुआ। अभी रोमिला थापर ने न्यूयॉर्क टाइम्स  में लेख लिखकर इसे मोदी सरकार द्वारा इतिहास को विकृत करने तथा घृणा फैलाने का उदाहरण बताया। विदेशी मीडिया में भी यह विशेष रूप से नोट होता रहा है।

सो, भारत 1000 साल साल गुलाम रहा अथवा 200 साल, यह महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। यहाँ सेक्यूलर-वामपंथी राजनीति तथा इतिहास लेखन का मूल प्रश्न यही है। बहुत पहले एक शीर्ष नीति-निर्धारक शैक्षिक संस्था ने इतिहास-लेखकों को निर्देश देकर कहा था कि मुस्लिम शासकों को विदेशी नहीं कहना चाहिए, ‘‘सिवा उन आरंभिक आक्रमणकारियों के जो यहाँ बस नहीं गए।’’ 

लेकिन सबसे आरंभिक मुस्लिम आक्रमणकारी अरब थे जिन्होंने आठवीं सदी के आरंभ में सिंध पर कब्जा किया। वे सिंध में बस गए और मुलतान तक शासन किया। उन के दूसरे आक्रामक दौर में तुर्कों ने 963 ई. में गजनी पर कब्जा किया। वहाँ से शुबुक्तिगीन और उस के बेटे महमूद गजनवी ने उत्तर-पश्चिम भारत के और हिस्से जीत लिये। फिर नागौर पर कब्जा किया और वहाँ भी बसे। 

उन आक्रमणकारियों का तीसरा दौर तुर्क मुहम्मद घूरी के नेतृत्व में था, जिस ने 1192-95 ई. में हरियाणा, अजमेर, अलीगढ़, बयाना तथा गहड़वाल पर कब्जा किया। उस के सेनापतियों ने बिहार, बंगाल तथा बुंदेलखंड के कुछ भाग जीत लिये। अंततः दिल्ली में 1210 ई. में शम्सी वंश का राज्य बना। फिर भारत के कई प्रांतों में विविध मुस्लिम राजवंश बने। 

परंतु थापर, ओवैसी, और थरूर के तर्क से यहाँ हमला करने, लेकिन जीत कर यहीं जम गए मुस्लिम शासकों को विदेशी नहीं कहना चाहिए। एक तो, उन के तर्कों में भारत का जो अर्थ किया गया उस में सिंध, अफगानिस्तान, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत और सतलज पार पंजाब को छोड़ दिया गया है। जबकि ये सभी तब निस्संदेह भारत का अंग थे। उसे अरब व तुर्क भी हिंद के ही रूप में जानते थे। 

दूसरे, अरब-तुर्क हमलावरों को यहाँ बस जाने से उन्हें देसी मान लेना विचित्र है। चाहे वह बसा हमलावर हर भारतीय चीज से घृणा और हर अरबी, तुर्की, फारसी चीज की सराहना करता रहे। चाहे वह लाखों-लाख भारतीयों का खात्मा और उनसे भी अधिक को बल-छल से धर्मांतरित कराता रहे। लाखों-लाख हिंदू पुरुषों-स्त्रियों को बाहर इस्लामी दुनिया में गुलाम और रखैलियों के रूप में बेचता रहे। भारतीय कला, विज्ञान, साहित्य की महान कृतियों को विशाल पैमाने पर नष्ट करता रहे। 

उस इतिहास के बारे में खुद मुसलमान इतिहासकारों के विवरण अधिक सच हैं। उन्होंने इस्लाम की जीत, मंदिरों के विध्वंस, बेशुमार लूट, लोगों को गुलाम बना कर बेचने के पूरे वर्णन दिए हैं। फिर, किसी बड़े मुस्लिम शासक ने कोई भारतीय भाषा सीखना-बोलना स्वीकार न किया। अरबी, फारसी, तुर्की को हमेशा ऊँचा स्थान रहा, जैसे ब्रिटिश राज में अंग्रेज़ी का था।

सत्ता के सारे पद अरब, तुर्क, आदि विदेशी मुस्लिमों के लिए सुरक्षित थे, जैसे ब्रिटिश राज में गोरे ब्रिटिशों या यूरोपियनों के लिए। मुस्लिम शासकों का पहनावा, खान-पान, शौक, सुंदर लड़के लड़कियों का मोल लगाना, आदि पूरी जीवन-शैली में भारतीयता वैसी ही शून्य थी, जैसी बाद के ब्रिटिश शासकों में।  

वस्तुतः, कई मामलों में ब्रिटिश बहुत उदार थे। सभी मुस्लिम शासकों ने हिंदुओं का बलात् धर्मांतरण कराया, मंदिर तोड़े, तथा हर हिंदू भावना व संस्था को अपमानित कर चोट पहुँचाई। सभी मुल्लों, सूफियों ने हिंदू धर्म संस्कृति की खिल्ली उड़ा घृणा प्रकट की। पर इस्लाम के दावों पर किसी हिंदू को संदेह तक करने की इजाजत नहीं थी। इस के विपरीत, ब्रिटिश शासकों ने न कभी हिंदू मंदिर अपवित्र किए, न हिंदू धर्म-संस्कृति को अपमानित किया। मिशनरियों को भी बलात् धर्मांतरण कराने की कभी अनुमति न दी। हिंदू लोग ईसाइयत पर खुलेआम प्रश्न उठा सकते थे, जिस पर ब्रिटिश प्रशासक ध्यान भी नहीं देते थे। 

फिर, जो इमारतें, मकबरे, आदि दिखाकर तुर्कों, मुगलों को भारतीय बताया जाता है; उस से तो कई गुना बढ़-चढ़कर ब्रिटिशों ने यहाँ शानदार भवन, चैपल, चर्च, पर्वतीय स्थल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, तथा नई दिल्ली समेत अनेक बड़े-छोटे नगर बनाए। औद्योगिक, व्यापारिक, संचार परियोजनाएँ खड़ी की। आज भी ब्रिटेन में असंख्य लोग भारत से अपने पुराने संबंधों को सप्रेम याद करते हैं। 

ओवैसी की दलील है कि मुगलों ने हिन्दू स्त्रियों से विवाह किया। इसलिए उन के बेटे भारतीय हुए। वे छिपाते हैं कि मुस्लिम शासक अपने हरम में मनमानी हिंदू स्त्रियाँ जबरन उठा लाना अपना अधिकार समझते थे। पर कोई हिंदू किसी मुस्लिम लड़की से प्रेम तक नहीं कर सकता था, चाहे वह हिंदू परिवार से धर्मांतरित हुई मुस्लिम लड़की क्यों न हो। उस की सजा हिंदू के लिए मौत थी। ऐसा कुछ भी ब्रिटिश राज में न था। 

वस्तुतः, रोमिला थापर जैसे लोगों ने ही राजनीतिक उद्देश्यों से इतिहास विकृत किया है। सारी भयावह सच्चाइयों को छिपा कर झूठ पढ़ाया है। उनके अनुसार मध्यकालीन भारत में हिंदू मुसलमान एक जैसी दशा में थे। जबकि मुस्लिम इतिहासकारों से लेकर सैयद अहमद, हाली, इकबाल, मुहम्मद हबीब तक आधुनिक मुस्लिम विद्वानों ने भी उसे बेशक मुस्लिम राज कहा है। आज भी कुर्तुल-एन-हैदर जैसी साहित्य अकादमी पुरस्कृत उदार लेखिका ने इंडो-मुगल कला की बात की है। यह संज्ञा साफ-साफ भारत को मुगलों से अलग करती है।  

यहाँ अनगिनत मुस्लिम शासकों, लेखकों, सूफियों, आदि ने बारं-बार गर्व किया है कि उन सदियों में लाखों लाख घृणित काफिर दोजख भेजे गएमूर्तिपूजा के हजारों स्थल खात्म हुए; हजारों ब्राह्मण-भिक्षु मार डाले गये और अन्य को गो-मांस खिलाया गया; बेशुमार बहुमूल्य चीजें लूटी गईं जिसे प्रोफेट वाले नियम से मुसलमानों में बाँट लिया गया; लाखों-लाख स्त्रियों पुरुषों बच्चों को बाहर इस्लामी देशों में गुलामों व रखैलों के रूप में बेचा गया; यहाँ बड़ी आबादी दासता में रखी गई; और तलवार बल पर इस्लाम का दबदबा रहा।  

मुस्लिम शासकों ने अपने लिए विलासिता पूर्ण महल बनवाए। असंख्य मस्जिदें, मदरसे बनवाए, और मुल्लों को संरक्षण दिया। अपने और अपनी चुनी हुई बीवियों के लिए बगीचों से घिरी, रत्नजड़ित आलीशान कब्रें बनवाई। अनेक खानकाह और दरगाहें बनवाईँ, उन्हें धन दिया जहाँ रहकर सूफी इस्लाम का प्रचार करते थे।

उन तमाम भवनों में कारीगरी, पोशाक, हस्तलेख, सजी पांडुलिपियाँ, फारसी गद्य-पद्य, कुरान व हदीस पर व्याख्याएँ, दरबारी नृत्य-संगीत, सूफियों के संवाद, आदि को देख कर यही लगेगा कि मध्यकालीन भारत एक उन्नत काल था। मगर केवल मुसलमानों के लिए! हिंदुओं के लिए वह अंधकार का लंबा युग था जो तभी खत्म हुआ जब 18वीं सदी में मराठों, जाटों, और सिखों ने इस्लामी साम्राज्यवाद की कमर तोड़ दी। 

सदियों की उस भयानक हिंसा के इतिहास के कारण ही नोबल पुरस्कृत लेखक वीएस नायपॉल ने भारत को एक घायल सभ्यता की संज्ञा दी थी। उसी इतिहास पर पाकिस्तानी घमंड करते हैं, जिसे यहाँ थापर जैसे राजनीतिक प्रचारक जान-बूझ कर झूठा बताते हैं। इसलिए, हमें तथ्यों का सामना करना चाहिए। भारत में इस्लामी शासन उतना ही भयावह था जितना बाद में आया ईसाई शासन। ईसाइयों ने यहाँ भारी गरीबी पैदा की जो सब से धनी देश था। मुसलमानों ने यहाँ एक आतंककारी सभ्यता बनाई, जो देश विश्व इतिहास में सब से अधिक रचनात्मक संस्कृति रहा था।

सो, 1000 साल की गुलामी कहना निराधार नहीं है। आठवीं से 18वीं सदी के बीच भारत के विविध हिस्सों में हिंदू बार-बार संहार, उत्पीड़न और अपमान झेलते रहे। अधिकांश मुस्लिम शासकों के सामने वे उतने ही विवश और असहाय थे, जैसे बाद में अंग्रेज़ों के सामने हुए। वस्तुतः मुसलमान भी इस्लाम के पहले शिकार ही थे। अतः उस इतिहास और आज के हमारे कर्तव्य पर संजीदगी से विचार-विमर्श होना चाहिए।