विचार
आज़ादी की गाथा- दीवारों पर लटके कैलेंडर

स्वाधीनता दिवस पर मैं बरसों से एक ही शुभकामना संदेश देता आया हूँ- “जैसी भी है आज़ादी तो है, मुबारक हो। अंग्रेज़ों का शुक्रिया। अगर वे न आए होते तो हमारी दीवारों पर हिजरी का कैलेंडर लटका होता।” यह एक व्यंग्य है लेकिन यह एक हकीकत भी है। मान लीजिए अंग्रेज़ कारोबार करने यहाँ न आए होते या आए होते तो कारोबार ही कर रहे होते और यहाँ की सियासी तीन-तिकड़म में न पड़ते तो क्या होता?

तब 1757 का प्लासी का फैसला ही नहीं होता। तब बंगाल में नवाबों की जर्जर हुकूमत उसी तरह बनी रहती जिस तरह दिल्ली में खस्ताहाल मुगल देश पर लदे हुए थे। सब कुछ बदस्तूर जारी रहता। फिर ईरान या अफगानिस्तान से नादिर शाह या अहमद शाह अब्दाली के खानदानों का कोई जंगी लड़ाका यहाँ 10,000-20,000 की फौज लेकर आता और मुगल बादशाह का वही हाल करता, जो 1528 में बाबर ने इब्राहिम लोदी का किया।

लोदियों का खात्मा और मुगलों का कब्जा। या जैसा लोदियों के पहले होता आया। तुगलक खिलजी के बाद काबिज हुए। खिलजी गुलामों के खात्मे के बाद आए। गुलामों ने पृथ्वीराज चौहान के सिंहासन पर कब्जे किए। फिर यही कहानी बाकी हिंदुस्तान में दोहराई जाती रही। हर जगह नए कब्ज़ेदारों के नाम अलग होते गए। कहानी वही रही। किरदार बदलते गए।

फर्ज़ कीजिए अंग्रेज़ न आए होते और आ ही गए थे तो ईस्ट इंडिया कंपनी के जरिए सिर्फ अपनी दुकान चला रहे होते तो दिल्ली समेत तमाम मुस्लिम नवाबी और निजामी रियासतों पर सब वैसा ही चलता रहता, जैसा चल रहा था। औरंगज़ेब के कब्र में जाते ही मुगल फटेहाल होते चले गए थे और फिर कोई नई इस्लामी लहर इस देश पर एक नया राजवंश लादने आ जाती। उस हाल में भारत में बदलता कुछ नहीं। वह काफिरों का ही एक बदकिस्मत मुल्क बना रहता, जहाँ सदियों से दबे-कुचले काफिर अपनी जान बचाए रहते, जब तक रहते।

हो सकता है कि फिर कोई जज़िया लाद देता। जिम्मी कहकर दुत्कारने के काबिल कौम ठहरा देता। मजहबी कायदे से सबको अपने रंग में रंगने की जिद कर बैठता। बुतखानों को कोई जगह नहीं होती और सारे पुराने फरमान जला दिए जाते। शरिया अदालतें फैसले कर रही होतीं। देश का दम धीरे-धीरे घुट ही जाता। फिर जब कभी आजादी की लड़ाई होती तो कौन किससे आज़ाद होता? बचे-खुचे हिंदू कहीं जंगल-पहाड़ों में अपने देवी-देवताओं और पोथियों को लिए सिकुड़े-सिमटे रह रहे होते।

1857 में ही अंग्रेज़ भाग खड़े हुए होते तो बहादुर शाह ज़फर की ही तो ताजपोशी हो रही होती। बाकी उनके समर्थक हिंदू राजे-रजवाड़े अपने हिस्से की रियासतों में खास रियायतों के साथ अपने राजकाज चला रहे होते। क्या बदल जाता? लेकिन पहली क्रांति नाकाम होकर भी कुछ बीज भारत की जमीन पर बिखरा गई, जो अगले 90 सालों में एक वटवृक्ष बन गए। आज़ादी की लड़ाई का एक शानदार अध्याय।

फिर कांग्रेस का वजूद में आना। उसमें भी एक के बाद एक नेतृत्व की गजब की शृंखला। फिर 15 अगस्त 1947 को आई आज़ादी की एक्सप्रेस। हमने देखा है कि जब कोई समय से काफी विलंब से चल रही ट्रेन प्लेटफार्म पर आती है तो उतरने वाले हड़बड़ी में भागते हैं।

तो जब आज़ादी की एक्सप्रेस आई तो जिन्हें उतरकर कहीं जाने की जल्दी थी, वे तेज़ी से भागे और लाल किले पर जा पहुँचे। उन्हें शपथ की जल्दी थी। इसलिए बटवारे के खूनखच्चर और कश्मीर के जख्मों पर माथापच्ची करने की बजाए शेरवानी में ताजे गुलाब की महक ज्यादा लुभावनी लगी। नियति का निर्णय हो चुका था।

जिन्हें न ट्रेन में चढ़ने की जल्दी थी, न सफर का चस्का, न उतरने की हड़बड़ी, वे दूसरे स्टेशनों पर गली-मोहल्लों में और गाँवों में कुछ बेहतर काम करते रहे। जैसे- मदनमोहन मालवीय मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति के यज्ञ में लगे तो वाराणसी में एक विश्वविद्यालय की स्थापना उन्हें राष्ट्र के निर्माण में एक ठोस योगदान जैसी लगी।

वे दिल्ली स्टेशन पर उतरकर लालकिले पर शपथ की जल्दी में नहीं थे। जब तक जीवन रहा, वे कुछ निर्माण और कुछ भूल सुधार में लगे  रहे। वल्लभ भाई पटेल सत्ता में आए लेकिन सोमनाथ में एक और भूल सुधार उन्हें आजादी जितना ही ज़रूरी लगा और वे अपनी आखिरी साँस के पहले इतिहास का एक अध्याय चमकाकर गए। ऐसे अनगिनत किरदार हैं, जिन्होंने यह देश बनाने में अपनी आहुतियाँ दीं और जिनके हम नाम तक नहीं जानते।

अगर आज हमारी दीवारों पर हिजरी के कैलेंडर नहीं लटके हैं तो बेशक अंग्रेज़ों को इसका श्रेय दिया जा सकता है। लेकिन उससे भी हमारा क्या भला हुआ? वे अपना कैलेंडर लटकाकर चले गए। या वे तो चले गए लेकिन हमारे दिमागों में वे ही बैठे हुए थे इसलिए दीवारों पर कैलेंडर भी उनका ही टंगा रहा। इस नज़रिए से देखें तो आज़ादी पूरी कहाँ आई? क्या आज़ादी जल्दबाज़ी में ली गई थी? क्या किसी को हड़बड़ी थी? तो कुछ ज़रूरी मसले छोड़ दिए गए, जो बाद में घावों से रिसते रहे।

फिर जो शपथ ले चुके थे, उनके मातहत बुद्धिजीवियों की एक नई पौध पनपी। उन्हें जो जैसा सुविधाजनक लगा, वैसी परिभाषाएँ गढ़ी गईं। वैसा इतिहास लिखा गया। वैसे संस्थान खड़े किए गए। यह लगभग 70 वर्षों तक चलता रहा।

इस बीच दिल्ली से लेकर श्रीनगर, लखनऊ, पटना और चेन्नई नए सियासी परिवार पुरानी रियासतों की तरह खड़े होते गए। सबने अपने हिस्से की लूट का माल अपने झंडे, अपने बैनर, अपनी पार्टी और अपने परिवार तक सीमित रखा। उनके लिए आज़ादी के मायने यही थे।

वे आज़ादी की लड़ाई में अपने याेगदान को भुनाते रहे, जैसे यह उनको मिला पुश्तैनी अधिकार हो। आम लोगों को मिली आज़ादी उनके सामने फैंके गए आरक्षण और लोक कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर मुफ्त के टुकड़ों तक सिमट गई।

इस देश ने पिछले 1,000 साल में कई जख्म खाए हैं। वह जमकर रौंदा गया है। उसकी मूल पहचान को नष्ट करने की भरपूर कोशिशें हर हुक्मरान ने की हैं। उसकी आत्मा को भी घायल करके छोड़ा है। दुख की बात यह है कि आज़ादी के बाद भी देश की आत्मा को समझने की कोशिशें न के बराबर हुईं।

एक ऐसी पीढ़ी खड़ी कर दी गई, जो अपने ही अतीत की हर महानता को सबसे तेज़ आवाज़ में नकारने लगी। उसे अपने ही पुरखों के अपमान में आनंद आने लगा। उसकी नज़र में भारत अतीत का एक दिवालिया मुल्क था, जिसकी झोली में विदेशी हमलावरों ने ही मुँह मांगे वरदान डाले। ऐसा एक नकारात्मक दृष्टिकोण बनाया गया। यह हमारी अपनी आपराधिक भूल थी।

अगर हम आज़ादी के मौके पर भारत के इस मर्म को समझें और कम से कम एक संकल्प लेकर कुछ नया करने के मन से आगे बढ़ें तो यह हमारा बड़ा योगदान होगा। हम इतिहास को मृत जानकारियों की तरह देखना बंद करें और जीवंत हकीकत की तरह उसे समझें तो भारत का वह बड़ा हिस्सा भी हम जान पाएँगे, जो हमारी निगाहों से अछूता है। अनजाना है। वह प्रतीक्षा कर रहा है कि हम उसे जानें। उसे समझें।

भारत के बारे में अब तक जितना भी समझा गया गया, जाना गया है, भारत उससे ज़्यादा है। समय के विस्तार में काफी पीछे तक उसकी स्मृतियाँ बिखरी हुईं। आइए, हम भारत के इतिहास को एक हकीकत की तरह समझें। संकल्प लें कि अपनी परंपराओं के प्रति कभी गैर-गंभीर नहीं होंगे। कभी मज़ाकिया ढंग से नहीं लेंगे। हम पढ़ेंगे। हम समझेंगे। हम गर्व करेंगे।

असल मायने तभी हमारी दीवारों पर हमारे कैलेंडर होंगे और तब समय भी हमारा होगा।

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com