विचार
इब्न तयमिय्या- आतंकवादियों का आदिगुरु

आशुचित्र- 13वीं शताब्दी के इस्लामी चिंतक-व्याख्याकार इब्न तयमिय्या के साहित्य से प्रेरणा लेकर ही इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों ने हिंसक जिहाद का रास्ता अख्तियार किया है।

इस्लामी आतंकवाद को ज़्यादातर आधुनिक युग की देन माना जाता है मगर उसका मुख्य प्रेरणास्रोत मध्य युग का एक दार्शनिक है।कुख्यात आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) की ऑनलाइन पत्रिका दबिक़  में सबसे ज़्यादा उसी चिंतक और विचारक का हवाला दिया जाता है। अल-कायदा के संस्थापक ओसामा बिन लादेन और अल-कायदा के वर्तमान सुप्रीमो आयमान अल जवाहिरी ने अरब देशों के खिलाफ उसके फतवों का बार-बार उदाहरण दिया कि अरब सरकारों के असली मालिक पश्चिमी देश हैं इसलिए उनके खिलाफ जिहाद की ज़रूरत है। बोको हराम का संस्थापक मोहम्मद युसूफ तो उनका अनुयायी था। जब उसने अपने संगठन का मुख्यालय बनाया तो 2002 में उसके नाम पर एक मस्जिद बनाई। आज के तमाम आतंकी संगठनो का प्रेरणा स्रोत होने के कारण कई लोग उसे आतंकवादियों का आदिगुरू कहते हैं। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि आईएसआईएस का वैचारिक संस्थापक वही है। इस चिंतक का नाम था इब्न तयमिय्या।

अब मध्य-पूर्व के देश भी इब्न तयमिय्या की इस्लामी आतंकवाद को प्रेरित करने में अहम भूमिका के बारे में जानने लगे हैं तो उनकी किताबों पर पाबंदी लगाई जाने लगी है। इस्लामी शिक्षा के सबसे बड़े केंद्र अल-अज़हर विश्वविद्यालय (काहिरा) से इस्लामी शिक्षा के महान् विद्वान इब्न तयमिय्या की किताबों को हटाया जाने लगा है। मिस्र के अन्य सभी पुस्तकालयों से भी इब्न तयमिय्या की किताबों को हटाने का सिलसिला जारी है। जॉर्डन में भी उनकी किताबों पर पाबंदी लगाने की सरकारी प्रक्रिया शुरू हो गई। मिस्र और जॉर्डन की हुकूमतों के मजहबी सलाहकारों का आरोप है कि 13वीं शताब्दी के इस्लामी चिंतक-व्याख्याकार इब्न तयमिय्या के साहित्य से प्रेरणा लेकर ही इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों ने हिंसक जिहाद का रास्ता अख्तियार किया है। हालाँकि उलेमा का एक बड़ा तबका इन आरोपों को बेबुनियाद बताता है।

13वीं शताब्दी में जब 500 साल तक फैलने के बाद इस्लामी साम्राज्य ढहने लगा, तब मंगोल सारे एशिया को जीतने के बाद बगदाद पहुँचे।तब चंगेज़ खान का पोता हलाकू सीरिया और लेबनान जीतने को चल पड़ा था। उस समय कई मुस्लिम विद्वान मंगोलों का समर्थन करने के लिए कतारबद्ध थे। तब एक इमाम ने बहुत ताकतवर तरीके से हमलावरों को चुनौती दी। दमिश्क के इस्लामी विद्वान इब्ने तैमिय्या ने मंगोलों के खिलाफ कई फतवे जारी किए। अल कायदा और इस्लामिक स्टेट आज भी उनके फतवों को उद्घृत करते हैं। हलाकू के बाद कई हमलावर मंगोल नेताओं ने नाममात्र के लिए इस्लाम कबूल कर लिया। मगर तयमिय्या ने उन्हें धर्मद्रोही ही माना। उन्होंने दलील दी कि किसी मुस्लिम के लिए युद्ध में दूसरे मुस्लिम को मारना जायज़ है यदि वह मंगोलों के साथ लड़ रहा है। इब्न तयमिय्या आज के जिहादियों का बौद्धिक पूर्वज है जिसके मंगोल विरोधी और शिया और अलपसंख्यक मुस्लिमों के बारे में फतवे वे आज भी उद्घृत किए जाते हैं। उसके जरिये वे नागरिकों, मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा और तफकीर की अवधारणा का इस्तेमाल उन्हें धर्मद्रोही घोषित करने के लिए करते हैं।

दरअसल, वहाबी इस्लाम के संस्थापक अल वहाब इस्लाम सबसे कट्टरपंथी माने जानेवाले हनबली स्कूल के समर्थक इब्न तयमिय्या से खासा प्रभावित थे। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि तयमिय्या आतंकवादियों के आदिगुरू हैं। इब्न तयमिय्या ने जिहाद की नई परिभाषा दी। उनका कहना था कि जिहाद इस्लाम के रास्ते में आने वाली दुश्वारियों के खिलाफ एक सतत संघर्ष है। जिहाद इस्लाम को नहीं मानने वालों या इसके खिलाफ जाने वालों के खिलाफ एक जंग है। इब्न तयमिय्या का मानना था कि इंसान के तौर पर जिहाद सबसे बेहतरीन काम है। सच्चे मुसलमान के लिए जिहाद से बेहतर कुछ नहीं है। इन आतंकवादी संगठनों को तफकीरी आतंकवादी भी कहा जाता है। पहले जिहाद होता था काफिरों के खिलाफ। अब मुस्लिमों को काफिर घोषित कर उनके खिलाफ जिहाद किया जा रहा है।काफिर उन मुस्लिमों को कहा जाता है जो मुस्लिम होने के बावजूद इस्लाम के रास्ते से भटक गए हैं। इतिहास गवाह है कि इब्न तयमिय्या ने 13वीं शताब्दी में कहा था कि इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मन ईसाई नहीं हैं, न ही वे हैं जो इस्लाम के रास्ते से भटक गए, न ही वे जो इस्लाम को मानते हैं, लेकिन इस्लामी तौर-तरीकों को पूरी तरह अपनी जिंदगी में नहीं उतार पाए। असली दुश्मन वे हैं जो खुद को इस्लाम का बताते हैं लेकिन हकीकत में इस्लाम को खारिज करते हैं। तयमिय्या के अनुसार पहले तीन पर तो थोड़ी-बहुत दया दिखाई जा सकती है लेकिन इस चौथे किस्म के शख्स पर किसी भी हालत में किसी तरह की दया नहीं की जा सकती।

आज जो इस्लाम का सबसे अहिष्णु विचार है- वहाबीवाद या सलाफीवाद, वह पैदा ही आज से 750 वर्ष पूर्व अरब में जन्मे इब्न तयमिय्या नामक इस्लामी आलिम के साथ हुआ। मंगोल हमलावर अरब तक पहुँचे और उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया लेकिन अपनी कुछ पुरानी मंगोल परंपराओं को भी बनाए रखा। तयमिय्या ने इसे इस्लाम में हो रही मिलावट कहकर इसके खिलाफ आक्रामक एवं हिंसक रुख अपनाया। उसने ऐसे मुसलमानों के विरुद्ध हिंसक जिहाद का फतवा या तकफीर जारी करना शुरू किया। तयमिय्या की विचारधारा को 18वीं सदी में मुहम्मद इब्न-अब्द-अल-वहाब (1703-1792) ने अपनाया और उसका अरब में प्रचार किया। उसी के नाम पर यह तथाकथित ‘शुद्ध इस्लाम’ का आक्रामक प्रचार करने वाली विचारधारा वहाबी कहलाई। मोहम्मद वहाब का सऊदी राज्य के संस्थापक मोहम्मद बिन सऊद के साथ समझौता हुआ जिसमें ये तय हुआ कि वे दोनों मिल कर अरब प्रायद्वीप के लोगों को ‘वास्तविक इस्लाम’ की ओर लाएँगे।

वहाबी विचार की मारक क्षमता को समझने के लिए एक छोटी सी मिसाल। पैगंबर मोहम्मद के निधन के बाद कुरान की आयतों को संकलित करने का काम शुरू हुआ जो तीसरे खलीफा तक चलता रहा। 12वीं सदी में तयमिय्या ने इसकी अपने तरीके से व्याख्या करते हुए कहा कि कुरान आसमान से उतरी किताब है। ये हमेशा से थी। इसे मानव निर्मित कहना कुफ्र है। इब्न तयमिय्या ने घोषणा की कि कुरान को मानव निर्मित कहने वाला या तो माफी माँगे अथवा मौत के घाट उतार दिया जाएगा। तयमिय्या के चेले वहाबी उसके शब्दों पर कायम हैं।

तक़ीयुद्दीन अबुल अब्बास अहमद बिन तयमिय्या का जीवन, उतार-चढ़ाव से भरा हुआ था। इब्न तयमिय्या उन गिने चुने लोगों में से एक हैं जिन्होंने युद्ध और लड़ाई में अपना जीवन बिताया। इसी कारण वे हमेशा क़ैद में रहे या उन्होंने निर्वासन का दंड सहन किया। लेकिन इस प्रकार का जीवन उस समय महत्त्वपूर्ण है, जब यह लोगों में एकता उत्पन्न करने या धर्म के सिद्धांतों की सुरक्षा के लिए हो।

सतीश पेडनेकर ‘आईएसआईएस और इस्लाम में सिविल वॉर’ पुस्तक के लेखक हैं।