विचार
कैसे मोदी सरकार घृणित अभियानों के बीच महिला सशक्तिकरण को दे रही है बढ़ावा

प्रसंग
  • 15 अगस्त 2014 को अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधान मंत्री मोदी ने महिला सशक्तिकरण के बारे में बात की।
  • पिछले चार वर्षों में उनके नेतृत्व में बार-बार यह साबित हुआ है कि नफरत का जवाब कार्यों के साथ ही दिया जा सकता है और सरकार मर्मभेदी तरीके से लगातार ऐसा कर रही है।

सोशल मीडिया पर वर्तमान धुन है हैशटैग #TalkToAMuslim, जो लोगों के ऐसे वर्ग द्वारा शुरू किया गया जिन्हें ‘लोकतान्त्रिक’ और ‘धर्मनिरपेक्ष मूल्यों’ का समर्थक माना जाता है। शायद स्वतंत्र भारत के इतिहास में इससे अधिक शर्मनाक अध्याय कभी नहीं रहा है जिसने अपनी आबादी को इतने खुले तौर पर अलग किया है। सोशल मीडिया पर तथाकथित उदारवादी ‘कार्यकर्ताओं’, जो इस देश के रक्षक होने के भ्रम में रहते हैं, ने एक खतरनाक प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है जहां इसने धर्म पर आधारित 180 मिलियन मुसलमानों की पूरी आबादी को अलग-थलग कर दिया है और ऐसी स्थिति में पहुंचाया है जहां उनके असल वजूद पर संदेह किया गया है।

एक ऐसे देश में जहां इसके संविधान के साथ-साथ परम्पराएँ भी समानता तथा जीवन और स्वतन्त्रता का अधिकार सुनिश्चित करती हैं वहाँ इस तरह का एक अभियान उन सभी के उद्देश्यों को निष्फल करता है जिन्हें राष्ट्र ने अपने प्रत्येक नागरिक की प्रतिष्ठा सुनिश्चित करने के लिए अब तक सहा है। यहाँ विडंबनापूर्ण यह है कि स्व-घोषित उदारवादियों द्वारा दिये गए कारण के समर्थन में जो आवाजें उठाई गईं थीं उनमें से किसी को भी लोगों की असली दुर्दशा, जिसके लिए लोग लड़ रहे थे, के बारे में बात करते हुए नहीं सुना गया।

यह मानते हुए कि यह महिलाओं की भागीदारी के समर्थन में एक अभियान था, यह ध्यान देना निराशाजनक था कि भारतीय मुस्लिम महिलाओं की स्थिति कोलाहल में खो गयी थी। 2010 में नेशनल काउंसिल फॉर एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में यह पाया गया कि भारत में लगभग एक तिहाई मुस्लिम 550 रुपये प्रति माह से भी कम पर जीवनयापन करते हैं। आंकड़े चौकाने वाले हैं और उन हजारों महिलाओं की दुर्गति का प्रतिनिधित्व करते हैं जो अपने कंधों पर अपने कम आय वाले परिवार की जिम्मेदारियों को उठाती हैं।

एक और उदाहरण, जहां बहरा कर देने वाली खामोशी थी, यह था जब एक व्यक्ति ने अपनी बहू को निकाह हलाला के नाम पर उससे शादी करने के लिए मजबूर किया। निकाह हलाला वह घिनौना रिवाज़ है जहां एक महिला तीन तलाक के बाद अपने पूर्व पति के पास तब तक वापस नहीं जा सकती जब तक वह किसी अन्य व्यक्ति के साथ निकाह करके यौन संबंध न बना ले। यदि कभी एकजुटता दिखाने और महिलाओं के अधिकारों के लिए खड़े होने का पल था, तो यही था। फिर भी वे लोग जो देश में मुस्लिमों के लिए एक दोस्ताना हाथ बढ़ाने के बारे में अति मनोभावपूर्वक बात करते हैं उन्हें उस 28 वर्षीय महिला के अधिकारों के लिए खड़े होने और उसकी मदद करने में भलाई नज़र नहीं आई। शायद वे सभी राष्ट्र को एक अहम सबक सिखाने में तल्लीन थे कि सदमा और हमदर्दी चुनिन्दा हो सकती है। अपने हाथों में ताकतवर मोबाइल फोनों के साथ वास्तविक महिलाओं के संघर्ष पर एक फोकस उन्हें पर्याप्त सोशल मीडिया लाइक नहीं दिलाता और वे रातोंरात सनसनी नहीं बन पाते।

इन सब हथकंडों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार लगातार उम्मीद छोड़ चुकी मुस्लिम महिलाओं के जीवन को उज्ज्वल करने के लिए कड़े प्रयास करती रही है। तीन तलाक पर विधेयक लाकर सरकार ने सूक्ष्मता से संदेश दे दिया कि सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त मेहनत करेगी कि इस देश में हर एक महिला प्रतिष्ठा के साथ जिये। अपनी पूर्ववर्ती सरकार के विपरीत, जहां हर निर्णय में वोट-बैंक की राजनीति का प्रभाव था, मोदी सरकार ने बाहरी दबावों के अधीन हुए बिना महिलाओं को वह स्थान दिया जिसकी वे हकदार हैं।

1986 में, जब राजीव गांधी की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार ने शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले को देश की आबादी के एक छोटे से हिस्से को खुश करने के लिए उलट दिया था, तो यह स्पष्ट था कि महिलाओं को भारतीय समाज में बहुत निम्न दर्जा दिया गया था। इसने सभी धर्मों कि महिलाओं को उनका सही स्थान दिलाने के लिए साहसिक कदम उठाने वाला और दृष्टिकोण रखने वाला एक नेता चुना।

गांवों को खुले में शौच से मुक्त कराने का विचार (ओपेन डिफेकेशन फ्री – ओडीएफ़) भी भारतीय महिलाओं को उनकी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस दिलाने के विचार से ही उपजा। स्वच्छ भारत योजना के तहत 2.5 मिलियन गांवों को ओडीएफ़ घोषित किया जा चुका है जिसका मतलब है कि अब अच्छी खासी संख्या में महिलाओं को अपनी सुरक्षा और आत्मसम्मान से समझौता करने की ज़रूरत नहीं है। मोदी सरकार के स्वच्छ विद्यालय कार्यक्रम के तहत कई स्कूलों ने लड़कियों के लिए अलग शौचालयों का निर्माण होते हुए, और अधिक अभिभावकों को अपनी बच्चियों को विद्यालय भेजने के लिए प्रेरित होते हुए और विद्यालय छोड़ देने वाली लड़कियों की संख्याओं में कमी होते हुए देखा है। मोदी सरकार महिलाओं से छुप कर रहने के लिए नहीं कह रही है बल्कि यह सुनिश्चित कर रही है कि सभी धार्मिक समूहों, वर्गों और पहचानों से संबन्धित महिलाएं अपनी इष्टतम क्षमता का उपयोग करके अपना जीवन जी सकें। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि देश भर में मुद्रा योजना के सबसे बड़े लाभार्थी महिलाएं और धार्मिक अल्पसंख्यक हैं।

दोहरे मानदंड उजागर

कांग्रेस पार्टी, जो भारत में वंचित लोगों के अधिकारों का मसीहा होने का दावा करती है, गरीब लोगों की इस स्थिति के लिए पूरी तरह उत्तरदायी है। और जैसा कि किसी भी राजनीतिक रूप से प्रेरित नीति निर्णय के साथ, यह महिलाएं ही हैं जो निहित हितों के सक्रिय होने पर सहने वाले छोर पर रही हैं। यह याद रखना चाहिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के तत्कालीन डिप्टी गवर्नर हरुन आर खान द्वारा एक मुख्य भाषण में, वित्तीय समावेशन का महत्व और अर्थव्यवस्था पर इसके संभावित गुणक प्रभाव को इंगित किया था। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि भारत कनेक्टिविटी की बाधाओं के कारण एक अंडरबैंक देश बना हुआ है और उन्होंने अभिनव प्रौद्योगिकी प्लेटफार्मों का लाभ उठाने की आवश्यकता के बारे में भी बात की। फिर भी, महान अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह, जो तत्कालीन प्रधानमंत्री थे, ने निष्कर्षों को अनदेखा करना चुना और पूरी तरह से भारत की गरीबी को कम करने के लिए सरकार द्वारा दी गई रियायतों पर भरोसा किया।

2014 में रंगराजन पैनल ने 2011 में तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट द्वारा की गई मूर्खता को उलट दिया| समिति की मूर्खता, जिसके लिए इसकी आलोचना हुई, यह थी कि इसने निष्कर्ष निकाला कि शहरों में 33 रूपए से अधिक खर्च करने वाले परिवार और ग्रामीण इलाकों में 27 रुपये से अधिक खर्च करने वाले परिवार को गरीब नहीं माना जाएगा। रंगराजन पैनल की रिपोर्ट के नतीजों से यह बताया गया कि सही मायने में, भारत में गरीबों की संख्या 2009-10 में 45.4 करोड़ थी और 2011-12 में घटकर 36.3 करोड़ हो गयी थी। आंकड़ों ने सरकार के दृष्टिकोण पर तत्काल पुनर्विचार करने की मांग की और देश की वित्तीय प्रणाली का सम्पूर्ण कायापलट करने की मांग की। लेकिन कांग्रेस सरकार रिपोर्ट पर ढुलमुल रवैया अपनाती रही और समावेशी राजनीति का राग अलापना जारी रखा।

2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद ही स्थिति में बदलाव आया। सरकार ने जन धन योजना के माध्यम से लगभग 32 करोड़ बैंक खाते खुलवाए और ऐसे सामाजिक प्रयोग का प्रयास पहले कभी भी नहीं हुआ था। अंततः वित्तीय समावेशन एक वास्तविकता बन गया और पहली बार गरीब सही अर्थों में राष्ट्र निर्माण का हिस्सा बन गया। आधार आधारित प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) के अगले चरण ने अमीरों से गरीबों की ओर धन प्रवाह के सिद्धांत को समाप्त किया और हकदार हाथों में अधिकार दिए।

ऐसे लोग जिनको इससे सबसे ज्यादा लाभ मिला है वे मुस्लिम महिलाएं हैं, जिन्हें वित्तीय आजादी और खुद की पहचान मिली है।यह सब उज्ज्वला योजना की बजह से हुआ हैइस योजना के अन्तर्गत चार वर्षों में 715 जिलों में47,327,314 एलपीजी कनेक्शन दिए गएजबकि पिछले छह दशकों में कुल 13 करोड़ कनेक्शन हुए। इस कदम ने महिलाओं को अपनी रसोई की सीमाओं से मुक्त कर दिया औरउन्हें एक नए भारत के विकास में योगदान करने के लिए नए सपने और आकांक्षाएं दीं।

  • यह भारतीय महिलाओं की यह नई ताकत है जो देश की प्रगति को देखेगी और अधिक ऊंचाई प्राप्त करेगी। मोदी की सरकार में छह महिला कैबिनेट मंत्री भी हैं, जोशायद अब तक के कैबिनेटों में महिलाओं की सबसे ज्यादा संख्या है। लोकसभा में महिला सांसदों में लगभग आधी महिलाएं भारतीय जनता पार्टी की हैं। सुरक्षा मंत्रिमंडल समिति में भी दो महिलाएं हैं। हमें याद रखना चाहिए कि 2015 में नारी शक्ति गणतंत्र दिवस का विषय था और प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त 2014 को स्वतंत्रता दिवस भाषण के दौरान लाल किले से महिला सशक्तिकरण के बारे में बात की थी। पिछले चार वर्षों में उनके नेतृत्व में बार-बार यह साबित हुआ है कि नफरत का जवाब कार्यों के साथ ही दिया जा सकता है और सरकार मर्मभेदी तरीके से लगातार ऐसा कर रही है। पिछले चार वर्षों में उनके नेतृत्व में बार-बार यह साबित हुआ है कि नफरत का जवाब कार्यों के साथ ही दिया जा सकता है और सरकार मर्मभेदी तरीके से लगातार ऐसा कर रही है।