भारती / विचार
हिंदुत्व अब्राह्मिक साम्राज्यवादी मतों के विरुद्ध हिंदू धर्म का हथियार

“हिंदुत्व” विचारधारा के चढ़ाव से भारत के “सेक्युलर उदारवादियों” को समस्या होने लगी है। उन्हें इससे भयभीत होने का अधिकार है क्योंकि यह उनके वैचारिक आधिपत्य को चुनौती देता है लेकिन वे इस विचार के विरोध में जो तर्क देते हैं, वे तर्कसंगत नहीं हैं।

हिंदू राष्ट्र शृंखला (पहले तीन भाग यहाँ, यहाँ और यहाँ पढ़ें) के इस भाग में हम उनके तर्कों पर चर्चा करेंगे, विशेषकर वह तर्क कि हिंदुत्व हिंदूवाद (हिंदू धर्म) नहीं है।

साथ ही हम हिंदू धर्म को ऐसे भी परिभाषित करने का प्रयास करेंगे जो न्यूनकारी न हो, जैसा इसके आलोचक चाहते हैं। वे लोग चाहते हैं कि यह शब्द सिर्फ भीड़ हिंसा और घृणा बोल से जुड़ा रहे।

तीसरे पहलू पर हम बात करेंगे हिंदुत्व परियोजना की आवश्यकता व इसके सकारात्मक एवं संभावित नकारात्मक पहलुओं की। कुल मिलाकर मैं बताना चाहूँगा कि विविध और विभाजित हिंदू धर्म जिसकी जाति से आगे कोई सुसंगत संरचना नहीं है, उससे अधिक लाभदायक क्यों है हिंदुत्व।

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने हिंदू धर्म पर दो पुस्तकें लिखी हैं- वाई आई एम अ हिंदू और द हिंदू वे। वे उन “उदारवादियों” में से एक हैं जो चाहते हैं कि हिंदू धर्म और हिंदुत्व एक-दूसरे के शत्रु बनें।

मैंने उनकी पुस्तक बड़ी रुचि से पढ़ी यह जानने के लिए कि थरूर के अपने हिंदू होने पर क्या विचार हैं लेकिन पुस्तक के मध्य तक ही आप जान जाएँगे कि वे भगवा की लीपापोती करके हिंदुत्व को एक खलनायक दिखाना चाहते हैं। पूरी पुस्तक का मुद्दा यही है कि हिंदू धर्म क्या नहीं है। वे हिंदुत्व को हिंदू धर्म पर एक प्रहार मानते हैं।

इसे खंडित करने का एक सरल तरीका है- जब हिंदू धर्म में कोई एक पुस्तक, कोई एक विश्वास, एक पैगंबर, एक ईश्वर-पुत्र, एक मूल्य संहिता नहीं है तो ऐसा मान लेना कि हिंदुत्व को मानने वाला हिंदू धर्म का अनुयायी नहीं है, तर्कहीन बात है। दो विचार विरोधी तब ही हो सकते हैं जब दोनों परिभाषित हों और ये परिभाषाएँ मनमानी और न्यूनकारी नहीं हो सकती हैं।

हाल ही में स्वामिनाथन अंकलेसरिया अय्यर भी इसी जाल में फँसे और द टाइम्स ऑफ इंडिया के अपने एक स्तंभ में हिंदू धर्म और हिंदुत्व में अंतर करते दिखाई दिए।

ट्विटर पर उन्होंने लिखा था कि अयोध्या राम मंदिर हिंदुओं या हिंदू धर्म के लिए लाभदायक नहीं है जिसपर उन्हें आलोचनात्मक प्रतिक्रियाएँ मिली थीं। संभवतः अपने इसी बिंदू को समझाने के लिए उन्होंने एक लेख में लिखा, “मीडिया ने राम मंदिर के भूमि पूजन को सभी हिंदुओं के लिए एक बड़ी घटना बता दिया है लेकिन क्षमा करें, यह हिंदुत्व के लिए एक घटना है, हिंदू धर्म के लिए।”

अपने तर्क के समर्थन के लिए वे अपनी माँ के विश्वासों को सामने रखते हैं। कथित रूप से उनकी माँ ने अपने जीवन के आखिरी दो दशक संन्यासीन के रूप में ऋषिकेश के शिवानंद आश्रम में व्यतीत किए हैं इसलिए वे एक “धर्मनिष्ठ हिंदू” बन गईं। अय्यर बताते हैं कि उनकी माँ बाबरी मस्जिद के विध्वंस को “ठगों” का काम कहती हैं और इस घटना को “हिंदू धर्म की अच्छी और महान् बातों पर कलंक” मानती हैं।

पहले तो हम उस व्यक्ति के पाखंड को अनदेखा कर देते हैं जो स्वयं को नास्तिक बताकर अपने द्वारा त्यागे गए धर्म की कुछ बातों को “अच्छी और महान्” कहते हैं। यह ऐसा है जैसे एक शेर शाकाहार पर निशाना साधने के लिए वेगनवाद (दुग्ध उत्पाद रहित शाकाहार) की प्रशंसा कर रहा हो।

इसके आगे वे विनायक सावरकर के हिंदुत्व की बात करते हैं और उसका संबंध धर्म से नहीं है, ऐसा बताते हुए कहते हैं, “सावरकर पारंपरिक हिंदू विश्वासों का कड़ा विरोध करते थे और हिंदुत्व को धार्मिक की जगह राजनीतिक-सांस्कृतिक परियोजना मानते थे। वे मुस्लिमों से घृणा करते थे।

कुछ भाषणों में स्वयं को नास्तिक कहते हैं लेकिन वास्तव में वे प्राचीन सनातन धर्म को नकारकर हिंदू धर्म का आधुनिकीकरण करना चाहते थे। उन्होंने कहा था कि गायों में पवित्रता जैसी कोई बात नहीं है और हिंदुओं को शाकाहार त्याग देना चाहिए।

सावरकर की जीवनी लिखने वाले धनंजय कीर रेखांकित करते हैं कि जब उनती पत्नी की मृत्यु हुई थी तो अनुयायियों की विनती के बावजूद उन्होंने हिंदू रीति-रिवाज़ करने से मना कर दिया था। मैं कामना करता हूँ कि हिंदुत्व ट्रॉल्स इसका उल्लेख करें।”

यहाँ पर हम पुनः अय्यर की इस बात को अनदेखा कर देते हैं कि वे अपने आलोचकों को हिंदुत्व “ट्रॉल” कहते हैं और ध्यान देते हैं उनके कुतर्कों पर। वे स्वयं को और सावरकर को नास्तिक मानते हैं एवं हिंदुत्व को “धार्मिक की जगह राजनीतिक-सांस्कृतिक परियोजना” कहते हैं लेकिन वे ऐसी धारणा क्यों बना लेते हैं कि धार्मिक और राजनीतिक-सांस्कृतिक परियोजना में कोई समानता नहीं हो सकती?

क्या एक मंदिर जाने वाला हिंदू हिंदुत्व परियाजना में भी विश्वास नहीं रख सकता? यदि वे मानते हैं कि एक हिंदू सेक्युलर हो सकता है तो उन्हें यह मानने में क्या समस्या है कि एक राजनीतिक पहचान के लिए कोई हिंदू हिंदुत्व का समर्थन करेगा?

यदि हिंदू धर्म हर प्रकार के विश्वासों और विचारधाराओं को अपनाने में सक्षम है तो यह हिंदुत्व-विरोधी कैसे हो सकता है? अवश्य ही हर हिंदू इसपर विश्वास नहीं करता होगा लेकिन क्या इससे यह विचार गैर-हिंदू बन जाता है?

हिंदुत्व हिंदू धर्म नहीं है, यह कहना उतना ही तर्कहीन है जितना यह कहना कि आधुनिक ईसाइयत का जीसस से संबंध नहीं है। ऐसा मानने के कारण भी हैं क्योंकि कैथोलिक चर्च का सृजन सेंट पॉल ने किया, न कि जीसस ने।

ईसाइयत के बाद वाले संस्करण, सैक्सॉन प्रोटेस्टेन्टवादी से लैटिन अमरीकी धर्मगुरु अपने ईसाई होने का दावा कैसे करते हैं जब जीसस ने इस बात को स्पष्ट नहीं किया था कि कौन उनके अनुयायी हो सकते हैं।

ऐसा ही इस्लाम, सिख या बौद्ध धर्म के लिए कहा जा सकता है। पैगंबर ने नहीं सोचा होगा कि उनकी राजनीतिक-धार्मिक विचारधारा को उनके अनुयायी हादिस या सुन्नाह से समझाएँगे एवं शिया, बहाई और अहमदिया जैसी बिल्कुल पृथक विचारधाराएँ भी इस्लाम से जुड़ी देखी जाएँगी।

गुरु गोबिंद सिंह का सिख धर्म गुरुनानक देव के सिख धर्म से भिन्न है, भगवान बुद्ध ने तो नए धर्म की स्थापना का विचार भी नहीं किया था, वे तो बस संसार में रहने का तरीका सिखा रहे थे। लेकिन अब जीसस और हिंदू देवी-देवताओं के बाद बुद्ध की मूर्ति सर्वाधिक बनती है।

प्रश्न उठता है कि हिंदुत्व को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करना आवश्यक क्यों हो गया है? क्यों हिंदुत्व से “सेक्युलर उदारवादी” भयभीत हो जाते हैं? उत्तर है ओरिएन्टलिज़्म (पूर्वदेशीय)। यह दर्शन पृथ्वी और इसके लोगों को टुकड़ों में देखता है, पूर्णता में नहीं।

ओरिएन्टलिज़्म के लेखक एडवार्ड इस शब्द का उपयोग पूर्वी वस्तुओं, विशेषकर इस्लाम को देखने के लिए तिरस्कारपूर्ण पश्चिमी दृष्टि के लिए करते हैं। यह दृष्टि अब पश्चिमी इंडोलॉजी में भी प्रमुखता से पाई जाती है और भारतीय “वामपंथी-उदारवादियों” से भी इसे समर्थन मिलता है।

इससे ईसाइयत और इस्लाम जैसे साम्राज्यवादी और विस्तारवादी मतों को हिंदू धर्म में पैठ बनाने में सहायता मिलती है तथा हिंदुत्व से इसमें बाधा आ जाएगी।

वर्तमान में हिंदुत्व की वैधता को नकारने वाले प्रयास नए नहीं है, पहले यह कहने के भी प्रयास हो चुके हैं औपनिवेशिक विद्वानों से पहले हिंदू धर्म जैसी भी वस्तु नहीं थी और उन्होंने भारतीय मतों को बाहरी दृष्टि से देखकर हिंदू धर्म की श्रेणी बनाई।

ओरिएन्टलिस्ट विचार के अनुसार भारत राजनीतिक और सामाजिक वास्तविकता तब बन पाया जब मुस्लिम आक्रांताओं और फिर ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने उसपर कब्ज़ा किया।

निस्संदेह यह झूठ है लेकिन उन्हें भय था कि भारत के इतिहास का पूरा सच लिखने से हिंदू ओर हिंदू राष्ट्रवाद सशक्त होगा इसलिए उन्होंने ऐसा किया। आज भी थरूर और अय्यर जैसे “सेक्युलर उदारवादियों” तथा पश्चिमी इंडोलॉजिस्ट एवं विद्वानों को यह भय सता रहा है।

इंडिया- अ सेक्रेड ज्योग्राफी लिखने वाले हारवर्ड के तुलनात्मक रिलीजन और भारतीय अध्ययन की प्राध्यापिका डायना एक्क का उदाहरण लें। लेखिका भारत को ऐसी भूमि कहकर परिभाषित करती हैं “जो राजाओं की सत्ता और सरकारों से जुड़ी हुई नहीं है बल्कि तीर्थस्थलों के पदचिह्नों से जुड़ी है।”

यह बात स्वर्गीय राधा कुमुद मुकर्जी द्वारा लिखित द फन्डामेन्टल यूनिटी ऑफ इंडिया और नेशनलिज़्म इन हिंदू कल्चर  में लिखी बातों से मेल खाती है। मुकर्जी का मानना है कि पृथक राजनीतिक व्यवस्थाओं के बावजूद तीर्थस्थलों की संस्था ने भारत को अदृश्य सूत्र में बंधा हुआ है।

इन सबके बावजूद एक्क अपनी पुस्तक के प्रथम अध्याय में झल्लाहट व्यक्त करती हैं कि क्या सांस्कृतिक एकता हिंदू राष्ट्रवाद का ईंधन बनेगी। वे लिखती हैं-

यह पुस्तक भारत के बारे में है, भारत के तीर्थस्थलों के बारे में। एक समय ऐसा था जब मैं इसे लिखने से हतोत्साहित हो गई थी यह सोचकर कि देवताओं के निवास वाले पवित्र भूभाग और तीर्थस्थलों के माध्यम से उनके आपस में जुड़ाव की छवि से एक नए अनन्य हिंदू राष्ट्रवाद को जोश मिलेगा।

यह त्रस्त करने वाली बात है कि सीधे कहानी बताने की जगह किसी विद्वान को यह चिंता है कि सत्य उसकी सहायता कर देगा जिसे वे नापसंद करती हैं। यह पश्चिमी लोगों का प्रयास है कि हिंदू स्वयं को वैसे ही देखें जैसा वे चाहते हैं और वे ही बताएँ कि हिंदुओं को अपनी विरासत व एकता संरक्षित करने के लिए क्या करना चाहिए।

आज के “सेक्युलर उदारवादी” वही भूमिका निभा रहे हैं जो पश्चिमी साम्राज्यवाद के सिपाहियों- इंडोलॉडिस्ट और विद्वान लेखकों- ने निभाई थी। वे सीमाएँ बांधना चाहते हैं कि हिंदुओं के लिए हिंदुत्व का क्या अर्थ होना चाहिए।

यहाँ पर हम एक आधारभूत प्रश्न पर आ जाते हैं- हिंदुत्व आखिर है क्या? यह हिंदू शब्द से कैसे अलग है या कैसे अलग नहीं है?

हिंदुत्व को हिंदू शब्द से सिर्फ एक आधार पर पृथक किया जा सकता है कि यह धार्मिक कर्म-कांडों या रीति-रिवाजों की बात नहीं करता है, न ही हिंदुओं के विश्वासों और परंपराओं पर कुछ कहता है। आप मंदिर जा सकते हैं, पूजा कर सकते हैं, भजन गा सकते हैं या सात्विक भोजन कर सकते हैं यानी आपकी जो परंपरा है उसे मान सकते हैं लेकिन साथ ही हिंदुत्व पर विश्वास भी कर सकते हैं।

आप तब भी हिंदुत्ववादी हो सकते हैं जब आप इनमें से कुछ न करते हों- जैसा सावरकर के साथ था और आज के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ है। आरएसएस गुरु पूर्णिमा और राष्ट्र भक्ति में विश्वास करता है लेकिन होली या दीपावली जैसे लोकप्रिय हिंदू त्यौहारों में कम ही सम्मिलित होता है। कई स्वयंसेवक अपनी हिंदू पहचान को दर्शाने के लिए मंदिर जाने को आवश्यक भी नहीं मानते।

यहाँ से हम समझते हैं कि हिंदुत्व में कई वस्तुएँ हो सकती हैं लेकिन इसका मूल है सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से एक एकत्रित पहचान स्थापित करना, उन सभी लोगों के लिए जो स्वयं को हिंदू कहते हैं। यह एक प्रयास है जातिवादी रूढ़ियों को तोड़ने का जिसके कारण हिंदू धर्म पर दूसरे मतों और आत्म-ग्लानि का दबाव रहा है।

स्वयं को “बौद्धिक क्षत्रिय” कहने वाले राजीव मल्होत्रा हिंदू धर्म पर पूर्वदेशियों (ओरिएन्टिलिस्ट), पश्चिमी इंडलॉजिस्ट और भारत में उनके समर्थकों के आधिपत्य के विरुद्ध लड़ते रहे हैं। वे हिंदुत्व को “राजनीतिक हिंदूवाद” मानते हैं।

अंग्रेज़ी भाषा का भ्रमजाल के लेखक संक्रांत सानु शोधकर्ता, उद्यमी और पुस्तक प्रकाशक हैं जो सिएटल और गुड़गाँव में काम करते हैं। हिंदुत्व की उनकी परिभाषा है ऐसा हिंदूवाद जो प्रतिरोध करता हो।

आरएसएस पर दो पुस्तक (हाल में आई श्रीधर दामले के साथ ह-लिखित द आरएसएस- ए व्यू टू दि इनसाइड) लिखने वाले वॉल्टर एंडर्सन हिंदुत्व पर दुविधा को समझाते हैं, “हिंदुत्व का मूल मूल्य है हिंदुओं की एकता। लेकिन हिंदुओं का जातिवाद इसमें बाधा है।”

यहाँ एंडर्सन एक बात कहने से चूक जाते हैं, संभवतः इसलिए क्योंकि शायद वे भी हिंदू धर्म और हिंदुत्व को विरोधी मानते हैं, वह यह है कि हिंदुत्व से ही जातिवाद से लड़ा जा सकता है।

इस प्रकार हिंदुत्व एक प्रयास है हिंदू समूहों में सांस्कृतिक एकरूपता लाने का ताकि जातिवाद विविधता का स्व-विध्वंसकारी रूप न बने और हिंदू धर्म अपने शत्रुओं एवं विरोधियों से लड़ने में अक्षम न हो जाए।

इस चरण में हमें एकेश्वरवाद पर चर्चा करनी चाहिए और कैसे साम्राज्यवाद के प्रसार एवं पश्चिमी सार्वभौमिकता को इसने संस्थागत रूप से बल दिया। यह चर्चा आवश्यक इसलिए है क्योंकि एकेश्वरवादी विचार साम्राज्यवाद के धार्मिक और लौकिक रूप के लिए आवश्यक रहा है तथा साम्राज्यवाद का विरोध राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक एकता से ही किया जा सकता है एवं हिंदुत्व परियोजना इसी की बात करती है।

एकेश्वरवाद और साम्राज्यवाद में संबंध को पहली बार उजागर किया था पश्चिमी मनोविश्लेषण के जनक सिगमंड फ्रुड ने अपनी पुस्तक मोज़स एंड मनोथीज़्म में। इस विषय पर मैं पहले डीएनए में लिख चुका हूँ-

सभी आदिवासी समाज बहु-ईश्वरवादी थे। 1375 ईसापूर्व में पहली बार एकेश्वरवाद का सिद्धांत लाया गया जब मिस्र के अमेनहोटेप चतुर्थ ने अटॉन को वास्तविक सूर्य देव और एकमेव सच्चा ईश्वर घोषित कर दिया था। अमेनहोटेप  के एकेश्वरवाद में सिर्फ धर्म का विचार नहीं था। मिस्र साम्राज्य बढ़ रहा था जिसके अधीन विभिन्न ईश्वरों को मानने वाले लोग थे। उनपर शासन करने के लिए उसे एक ईश्वर की आवश्यकता थी।

अपनी पुस्तक में फ्रुड लिखते हैं, “साम्राज्यवाद को धर्म में सार्वभौमिकता और एकेश्वरवाद के रूप में देखा गया।” आगे वे कहते हैं, “धार्मिक असहिष्णुता जिससे लोग इसके पहले परिचित नहीं थे, उसका जन्म एक ईश्वर के विचार से हुआ।” मैं पुनः डीएनए के लेख का उद्धरण देना चाहूँगा-

इतिहास हमें कई उदाहरण देता है जिससे एकेश्वरवाद, साम्राज्यवाद और असहिष्णुता के बीच संबंध की पुष्टि की जा सकती है। 325 ईस्वी में कॉन्सटेन्टाइन ने सत्ता को संगठित करने के लिए बाइबल के वैकल्पिक संस्करणों को दबा दिया था।

इस्लाम के पैगंबर ने भी इसी कारणवश एकेश्वरवाद का सहारा लिया। यदि लोग सभी प्रकार के देवों को पूजते तो वे एक साथ काम नहीं करते। एक बार विरोधी ईश्वरों का खात्मा किया, फिर इस्लाम को रोकने वाला कोई नहीं था।

जब अकबर ने दीन-ए-इलाही धर्म की स्थापना की बात की तो उनका भी यही विचार था। उन्होंने एक महज़र जारी कर कहा था कि यदि धार्मिक नियमों और अर्थों पर प्रश्न उछते हैं तो उनके निर्णय के लिए वे ही अंतिम अधिकारी रहेंगे। कई वरिष्ठ उलेमाओं से उन्होंने इसपर हस्ताक्षर करवाए थे।

हिटलर का नारा था आइने फ़ोक, आइने राइक, आइने फुग़ा। यहाँ बस एक वस्तु की कमी थी- आइने गॉट यानी एक ईश्वर या एकेश्वरवाद की। अधिनायकवाद और असहिष्णुता चाहते हैं कि आप एक और एक ही विचार में विश्वास करें।

अब्राह्मिक एकेश्वरवाद मानता है कि उनका ईश्वर ही वास्तविक है और उसी की बात विश्व के हर कोने में चलनी चाहिए। सार्वभौमिकता की शक्ल में ये विचार साम्राज्यवादी हैं।

हिंदुओं के सामने दुविधा यह है कि किसी सार्वभौमिक, साम्राज्यवादी और विस्तारवादी विचार के सामने वे विभाजित और अनेक कैसे रह सकते हैं, जब उनकी स्वतंत्रता को बल देने के लिए एकता नहीं है। इसका अर्थ हुआ कि हिंदू धर्म में निहित कुछ बहुरूपों और कुछ विभाजनों को त्यागना होगा।

हिंदुत्व एक प्रयास है हमारे बहुरूपों को “हिंदू” पहचान के एक छत्र के नीचे संरक्षित करके रखने का। इस पहचान के अधीन आप जो चाहते हैं, वह बनकर रह सकते हैं। यह बहु-ईश्वरवाद और एकेश्वरवाद के बीच का एक समझौता है, हिंदू के जीवंत रहने के लिए एक आवश्यकता।

एक स्वतंत्र किराना दुकान वॉलमार्ट या अमेज़ॉन से नहीं लड़ सकती। यह किसी व्यापार पारिस्थितिकी-तंत्र से जुड़कर उनके नियमों के अनुसार कुछ काम करके टिकी रह सकती है, अपनी शर्तों पर नहीं।

हिंदुत्व ही वह शस्त्र है जिससे हिंदू जाति-आधारित विभाजनों से लड़ सकते हैं। हिंदुत्व एकता से बढ़कर अनेकता में विश्वास नहीं रखता। जब तक विस्तारवादी और साम्राज्यवादी मत हिंदू धर्म पर निशाना साधते रहेंगे, हिंदुत्व हमारा शस्त्र बना रहेगा।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।