विचार
हिंदुत्व और हिंदुइज़्म, आधुनिक भारत और राम मंदिर

विगत दिनों अयोध्या राम मंदिर पर सुनवाई समाप्त हो गई। महाराष्ट्र सरकार ने स्वतंत्रता सेनानी और हिंदुत्व के प्रवर्तक विनायक दामोदर सावरकर को अपने चुनाव संकल्प पत्र में भारत रत्न के लिए अनुमोदित किया है। राम मंदिर पर सर्वोच्च न्यायलय ने अभी निर्णय सुरक्षित रखा है, परंतु इससे हताश होते हुए, भिन्न न्यूज़ चैनलों ने अपनी अपनी दिशा तय करके कार्यक्रम प्रारंभ कर दिए हैं।

सावरकर पर देवेंद्र फडणवीस सरकार के निर्णय को एक सैनिक हिंदुवाद के आगमन के रूप में देखा जा रहा है। 22 अक्टूबर को राम प्रसाद बिस्मिल के परम मित्र एवं महान स्वतंत्रता सेनानी अशफ़ाक़ उल्लाह खान का जन्मदिवस है, जिसे संभवतः ओवैसी में उलझा मुस्लमान समाज और राजनीति में उलझा हिंदू समाज पुनः भूलेगा।

भारत की राजनीति अंतर्राष्ट्रीय इस्लामिक भाईचारे के समर्थक मौलाना आज़ाद और दुर्घटनावश हिंदू हुए जवाहरलाल नेहरू की दोस्ती की गाथाएँ लिखने में इतनी व्यस्त रही है कि बिस्मिलअशफ़ाक़ की सच्ची भारतीय मित्रता को हाशिये पर धकेल चुकी है। 

इन सब के बीच बार-बार प्रश्न आता है कि हिंदुत्व क्या है और हिंदुइज़्म क्या? ऐसा प्रबुद्ध वर्ग का मानना है कि हिंदुत्व उग्र है, और हिंदुइज़्म एक धर्मनिरपेक्ष भाव है। हिटलर के मिथ्याप्रचार अथवा प्रोपगैंडा के जनक गोएबेल्स के अनुसार यदि आप एक ही असत्य को बार-बार दोहराते रहें तो चौकोर आकार को गोल सिद्ध करना संभव है।

इसी प्रकार दो पर्यायवाची शब्दों में भेद उत्पन्न किया गया है। सत्य देखे तो यह धर्म का अभिजात्यीकरण मात्र है। यह अंग्रेज़ी-भाषी हिंदुओं को अन्य हिंदुओं से भिन्न स्थापित करने का ही प्रयास नहीं है, इस सोच में कहीं यह भी निहित है कि सर्वहारा वर्ग का हिंदू जो अपनी धार्मिक आस्था के प्रति अधिक समर्पित है वह धर्म की गलत एवं असभ्य व्याख्या रखता है।

हिंदी में जो हिंदुत्व है, वही अंग्रेज़ी में हिंदुइज़्म है। ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोष के अनुसार हिंदू होने की अवस्था हिंदुत्व है। मेरा मानना यह है कि हिंदुवाद और हिंदुत्व में भाषायी अंतर के सिवा कोई और अंतर नहीं है। आम परिभाषा को भी माने तो भी हिंदुत्व कोई उग्र, सैनिक, आतंकी विचार नहीं है। हिंदुत्व सिर्फ वह हिंदू विचारधारा है जो धर्मनिरपेक्षता की बलिवेदी पर आत्महत्या नहीं करना चाहती है। एक महाद्वीप से सिमट कर एक बँटे हुए राष्ट्र में वह सनातन रहना चाहती है।  

उसके पास साधन बहुत नहीं है। उसका संख्या बाहुल्य सदैव राजनैतिक शक्ति में परिलक्षित नहीं होता है। जिस हिंदू को हिंदू बाहुल्य भारत में, जिसका विभाजन ही बहुसंख्यक धार्मिक सत्ता का भय दिखाकर किया गया था, अपनी आस्था के तीन प्रमुख तीर्थों अयोध्या, काशी और मथुरा के लिए अल्पसंख्यकों से कानूनी युद्ध सदियों तक लड़ना पड़ता है; उसे हिंदुइज़्म के तरफ रखा जाए या हिंदुत्व की ओर, यह अपने आप में एक महती प्रश्न हो जाता है। 

हिंदू धर्म या सनातन एक संतुलित सामाजिक एवं व्यक्तिगत अस्तित्व की बौद्धिक एवं दार्शनिक परिभाषा है। एक दार्शनिक सोच होने के कारण यह स्वाभाविक रूप से किसी अन्य विचार से संघर्ष में है ही नहीं। यही इसके निरंतर संकुचित होते हुए प्रभावक्षेत्र का कारण भी रहा है। 

वोल्टायर जिन हिंदुओं कोशांतिप्रिय एवं निर्दोष जन मानते हैं जो किसी अन्य को हानि तो दूर आत्मरक्षा के लिए भी असमर्थ है‘, जिसने अपने पैरों के नीचे की धरती को इंडोनेशिया, वियतनाम, बर्मा, बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान से सैनिक धर्मों के आतंक के सामने संकुचित होते देखा है, उसके हिंदुत्व को एक उग्र, आतंकी स्वरुप देना एक कुटिल राजनैतिक चाल ही है।

कांग्रेस के अभिजात्य नेतृत्व के अंग्रेज़ी हिंदुइज़्म को आम हिंदुत्व से भिन्न करने का राजनैतिक प्रयास है। यही विचार आज सावरकर के विरोध में षड्यंत्र कर रहा है। इन परिभाषाओं के खेल से मुक्त होने में भारतीय जनता पार्टी को भी समय लगा है और इस बुद्धिजीवी कूटनीति ने जिस लज्जा का भाव आधुनिक भारतीयों में हिंदुत्व के नाम पर भरा है, वह आज भी दिखता है जब पूर्व कांग्रेस नेता प्रणव मुख़र्जी सावरकर से पहले भारत रत्न प्राप्त करते हैं। 

इस मिथ्या परिभाषा का लाभ लेकर भारतीय इतिहास का वही ध्रुवीकरण कांग्रेस ने किया जिसकी परिकल्पना कभी लॉर्ड मैकॉले ने की थी। जैसे यह तो बताया जाता है कि भगत सिंह नास्तिक थे परंतु इसपर चर्चा नहीं होती है कि एक समय हिंदुत्व को कलंक या राष्ट्रीय विचार के विरोध में नहीं देखा जाता था। 

लाला लाजपत राय से तिलक से डॉ राजेंद्र प्रसाद से पंत से महामना मालवीय तक कांग्रेस हिंदुत्व को कलंक नहीं मानती थी। जब तक कांग्रेस पारिवारिक सत्ता नहीं बनी, कन्हैया लाल मुंशी जैसे सोमनाथ के उद्धारक सोच भी नहीं सकते की विदेशी मूल के व्यक्ति के नेतृत्व की कांग्रेस के नेता राजीव धवन कभी श्री राम जन्मभूमि के पुनरुद्धार का विरोध करेंगे।

राजनीति को बढ़ाने के लिए कांग्रेस ने यह आवश्यक माना की उस हिंदुत्व को आम हिंदुत्व से अलग किया जाए ताकि आम हिंदू उस स्वीकार्यता का लाभ ले पाएँ जिसके संदर्भ में 1966 में सर्वोच्च न्यायालय में जस्टिस गजेंद्रगड़कर ने कहा था-

 “संसार के अन्य धर्मों से भिन्न हिंदुत्व एक पैगंबर को नहीं मानता, एक ईश्वर की उपासना नहीं करता, एक नियत हठधर्मिता को स्वीकार नहीं करता, एक दर्शन को सर्वोपरि नहीं रखता, और इस प्रकार एक संकुचित धर्म की परिभाषा में नहीं बांधता।

इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश 1996 में कहते हैं, “यह कानूनी त्रुटि है यदि हिंदुत्व के संदर्भ में दिए गए सम्भाषण को एक धर्म की सीमित परिभाषा में संकुचित रख कर अन्य धर्मों का विरोधी माना जाए। हिंदुत्व या हिंदुइज़्म भारतीय समाज की जीवन पद्धति है।ऐसे में शस्त्र पूजा जैसे भारतीय हिंदू परंपरा का विरोध एक कट्टर दुराग्रह और भारतीय सांस्कृतिक इतिहास के प्रति द्वेषभाव ही दर्शाता है।

सर्वोच्च न्यायालय के विचार उस गैर राजनैतिक शाब्दिक परिभाषा के निकट है जो मेर्रियमवेबस्टर डिक्शनरी ऑफ़ वर्ल्ड रिलिजन में हिंदुत्व को भारत की सांस्कृतिक, राष्ट्रीय एवं धार्मिक पहचान के रूप में परिभाषित करता है। हिंदुत्व को भारत से भिन्न स्थापित करने का प्रयास ही इसे भारत के इतिहास से पृथक करने का प्रयास कार्य है जो सावरकर को इस शब्द का जनक बताता है। 

निरपेक्ष विद्वान् जैसे सर कन्निंघम अपनी पुस्तकअन्सिएंट जियोग्राफी ऑफ़ इंडियामें चीनी यात्रियों के लेखन में हिंदू शब्द की उत्पत्ति दूसरी सदी ईसा पूर्व बताते हैं। हिंदू शब्द का उपयोग सिंधु के पूर्व देश के निवासियों के लिए ईरान के डारियस महान के शिलालेख (500  पू) में भी है।

हिंदू धर्म के भारत भूमि से ऐतिहासिक संबंध को नकारा नहीं जा सकता है जैसे जेरुसलम से ईसाई धर्म का और अरब से इस्लाम का, भले ही इससे आकस्मिक हिंदुओं की धर्मनिरपेक्षता को आघात पहुँचता हो। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिंदुओं को ऐसी हीनता के भाव से भरा गया है, जिसने संभवतः वर्षों के मुस्लिम साम्राज्य से अधिक भारत को हानि पहुँचाई है।

आवश्यक है कि हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझकर उसकी पूर्ण प्रतिबद्धता के साथ रक्षा कर सकें। सांस्कृतिक सुरक्षा राजनीति से इतर और बढ़कर है। आवश्यक है कि धर्मनिरपेक्ष दिखने की प्रतियोगी स्पर्धा में जिस विभाजित भारत ने हिंदू संस्कृति के नागरिकों को पीछे धकेलकर विदेशी विचार दर्शन को प्राथमिकता दी, कम से कम सच्चे अर्थों में धर्मनिरपेक्ष ही हो जाए और भारत के हिंदू सांस्कृतिक इतिहास और दर्शन की रक्षा करें।

राम जन्मस्थान पर न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा है, साक्ष्यों के आधार पर निर्णय की प्रतीक्षा सबको है, परंतु क्या अच्छा नहीं होता कि बिना बहस मुबाहिसे के अयोध्या, काशी और मथुरा हिन्दुओं की आस्था का सम्मान करते हुए दे दी जाती। यह सर्वविदित है कि अयोध्या में मीर बक़ी द्वारा बाबर के सम्मान में दूसरी सदी ईसा पूर्व विक्रमादित्य द्वारा बनाए मंदिर को तोड़कर बनाई मस्जिद का इस्लाम में कोई धार्मिक महत्त्व नहीं है।

आस्था का उत्तर एक जिद से देना कहाँ तक मैत्री भाव और सहिष्णु व्यवहार का सूचक है। विभाजन के बाद मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान में हिंदु मंदिरों की स्थिति तो सर्वविदित ही है। यह सत्य है की भारतीय मुस्लमान पाकिस्तानी मुसलमानों के लिए उत्तरदायी तो नहीं हैं परंतु एक संख्यात्मक रूप से बहुतायत में उपस्थित धर्म के धैर्य का संज्ञान तो ले सकते हैं, और यह तो मान ही सकते हैं कि ऐसे हिंदुओं के मध्य इस्लाम कभी खतरे में नहीं आ सकता है।

उन्हें मानना होगा कि जो धर्म पैगंबर के करीबियों जैसे उनकी पुत्री फ़ातिमा की कब्र, चाचा हमज़ा के घर की स्मृतियों के टूटने से खतरे में नहीं आता वह एक मंदिर के ऊपर बनी वीरान मस्जिद के टूटने से अगर खतरे में आता है, तो यह राजनैतिक ज़िद ही है जिसका दोहन कर के भारत में सरकारें बनती और गिरती रही हैं। अपने अस्तित्व और आस्था के लिए हिंदू विश्वास को लज्जित करने का प्रयास समाप्त होना चाहिए।

एक झूठ की सीमित आयु होती है और बाबरी के असत्य की भी आयु हो चुकी है। समय है कि न केवल हिंदू वरन भारत के समस्त नागरिक हिंदुत्व और भारतीयता के सदियों पुराने जुड़ाव से आँखें मूंदना बंद करें। पड़ोस में देखें तो पाकिस्तान का दुर्भाग्य ही उसका धर्मांधता में डूब के, इतिहास से काटकर, जड़ विहीन हो जाना है। इस संदर्भ में हिंदू कौन है, इसे विष्णु पुराण से अधिक निकटता से कोई नहीं परिभाषित करता जब विष्णु पुराण कहता है- 

“उत्तरम यत्समुद्रस्य, हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम।
वर्ष तद भारतनम भारती यत्र संतति।।”    (विष्णु पुराण 700 ईसा पूर्व)

“जो समुद्र के उत्तर में है एवं जो हिमालय के दक्षिण में, वही राष्ट्र भारत है, जहाँ भरत की संतान रहती है।”

इस परिभाषा को सावरकर भी अपनी पुस्तक “हिंदुत्व क्या है” में स्वीकार करते हैं। आशा है भारत ऐसा समय नहीं देखेगा और भारत के सांस्कृतिक इतिहास में आज का समय एक रेनेसाँ का स्वरूप लेगा।