विचार
हिंदी कुछ नहीं छिपाती और यह जातिवादी नहीं है- एक प्रतिवाद

मैं न केवल एक हिंदी-मातृभाषी हूँ अपितु एक हिंदी-प्रेमी और हिंदी साहित्यकार भी हूँ- मैंने हिंदी में दो पुस्तकें और अनेक लेख लिखें है। कुछ दिनों पूर्व किसी ने सागर के 4,000 शब्दों के विचित्र लेख “Biting My Tongue: What Hindi keeps hidden” की ओर मेरा ध्यान खींचा। लेख अंग्रेज़ी में है, यह एक विडंबना है। लेख में विभिन्न समस्याओं को हिंदी के सिर मढ़ा गया है और हिंदी के विषय में अनेक निराधार सामान्यीकरण और भारी-भरकम आरोप प्रस्तुत किए गए हैं- किसी प्रमाण के आधार पर नहीं, पर निजी अनुभवों, कहासुनी, सीमित ज्ञान, और अप्रासंगिक पठन के आधार पर।

सागर लिखते हैं, हिंदी ने उनकी सामाजिक न्याय की समझ को विलंबित किया; यह कोई संयोग नहीं था अपितु इसका संबंध हिंदी का निर्माण, विकास, और प्रचार-प्रसार करने वालों से है; और हिंदी अपने-आप में जातिवादी, वंशवादी (नस्लवादी), और प्रभुत्ववादी है। इस प्रतिवाद में दिखाया जाएगा कैसे ये सारे आरोप तर्कहीन हैं। यह लेख हिंदी और अंग्रेज़ी में लिखा गया है, जो हिंदी नहीं समझते वह इसका अंग्रेज़ी संस्करण पढ़ सकते हैं।

निजी अनुभव सर्वव्यापी नहीं होते 

लेख के आरंभ में और अनेक स्थानों पर सागर अपने निजी अनुभव साझा करते हैं और इनके आधार पर एक कथानक बनाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है सागर की समझ में उनके निजी अनुभव ही सर्वव्यापी सत्य हैं। तथ्य यह है किनिजी अनुभव वैश्विक सत्यों से बहुत दूर होते हैं, और प्रत्येक आपबीती के लिए अनगिनत दूसरी आपबीतियाँ होती हैं जो बहुत अलग होती हैं।

सागर ने कुछ ऐसे निजी अनुभव साझा किए हैं जिनका हिंदी से और हिंदी के विषय में प्रस्तुत उनके कथानक से दूर-दूर का लेना-देना नहीं है। मैं सोचता हूँ, ऐसे अनुभवों का उनके द्वारा हिंदी पर प्रतिपादित विचारों से क्या संबंध है? कुछ विषयों की सागर को पर्याप्त जानकारी नहीं है ऐसा भी मैं मानता हूँ।

उदाहरणार्थ, सागर लिखते हैं वर्ष 2016 में रोहित वेमुला की आत्महत्या के पश्चात् उन्हें भीमराव अंबेडकर की अंग्रेज़ी पुस्तक “Annihilation of Caste” भुवनेश्वर में नहीं मिली और उनके एक मित्र को हैदराबाद से पुस्तक भेजनी पड़ी। यह बड़े आश्चर्य की बात है, नवयान प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक का एक संस्करण मार्च 2014 से अमेज़न इण्डिया पर उपलब्ध है जहाँ प्रमाणित क्रेताओं द्वारा 2016 और 2015 में पुस्तक की समीक्षाएँ भी उपलब्ध हैं। सागर सीधा अमेज़न से पुस्तक ले सकते थे, इसके लिए कोई विशेष प्रयास की आवश्यकता नहीं थी।

निजी अनुभवों के आधार पर हिंदी को लेकर सागर द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों का खंडन दूसरे निजी अनुभवों द्वारा किया जा सकता हैं। सागर के अनुसार हिंदी में उनका जन्म और लालन-पालन हुआ, वे बिहार के एक छोटे नगर की दलित बस्ती में बड़े हुए, और उन्हें दो ब्राह्मण पुरुषों द्वारा उच्च विद्यालय में हिंदी पढ़ाई गई जिनमें से एक के अनुसार वैदिक काल के ब्राह्मणों ने त्रिकोणमिति (trigonometry) का आविष्कार किया था।

इसकी तुलना में मेरा अनुभव देखें। मेरा जन्म और लालन-पालन भी हिंदी में हुआ, मैं गुजरात के एक छोटे नगर की मध्यमवर्गीय बस्ती में बड़ा हुआ, और मेरे उच्च विद्यालय (एक केन्द्रीय विद्यालय) में हिंदी और संस्कृत दोनों के शिक्षक दलित समुदाय से थे। हिंदी अध्यापक के प्रबल अंबेडकरवादी और दलितवादी विचार थे। वे इन विचारों को स्पष्ट रूप से व्यक्त भी करते थे। वे आर्य सभ्यता की निंदा करते हुए कहते थे, आर्य सभ्यता कोई ‘सभ्यता’ ही नहीं थी। वे हिंदू ग्रंथों और देवी-देवताओं की भी निंदा करते थे और एक बार उन्होंने कृष्ण को ‘कपटी’ और महाभारत के युद्ध का कारण तक कह डाला था।

इसके ठीक विपरीत मेरे संस्कृत के अध्यापक कक्षा में ऐसी कोई बात नहीं कहते थे और रा.शै.अ.प्र.प. (एन.सी.ई.आर.टी.) की पुस्तकों से पाठ्यक्रम पढ़ाने पर ही ध्यान देते थे। एक उच्च विद्यालय के शिक्षक द्वारा विद्यार्थियों को अपनी विचारधारा के अनुरूप ढालने का प्रयास करना न तो हिंदी अध्यापकों तक सीमित है और न ही ब्राह्मण अध्यापकों तक। ऐसे अनुभव साझा करने से कोई सर्वव्यापक कथानक सिद्ध नहीं होता।

सागर के अनुभव में हिंदी ने न केवल उनकी अंबेडकर की खोज में विलम्ब डाला पर उन्हें न्याय और समानता के सिद्धांतों से भी दूर रखा। फिर कहूँगा, उनका अनुभव सर्वव्यापी नहीं है और मेरा अनुभव इससे बहुत भिन्न है। मेरे उच्च विद्यालय में मैंने सामाजिक अध्ययन (भूगोल, इतिहास, नागरिक शास्त्र, अर्थशास्त्र) हिंदी में पढ़ा था। सामाजिक अध्ययन की हिंदी पाठ्यपुस्तकों में न्याय और समानता पर विद्यालय के स्तर के लिए पर्याप्त सामग्री थी- फ़्रांस की क्रांति, समाजवाद, साम्यवाद, भारतीय संविधान, अधिकार और कर्तव्य, अस्पृश्यता, और अंबेडकर के योगदान पर भी।

अंबेडकर संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे ऐसा मेरी पाठ्यपुस्तकों में ठीक बताया गया था। “अंबेडकर ने संविधान लिखा” ऐसा भ्रामक बयान मेरे हिंदी के शिक्षक बहुधा देते थे, और यही भ्रामक वाक्य सागर अपने लेख में भी दो बार लिखते हैं। सर्वविदित सत्य यह है- भारत का संविधान एक सामूहिक कृति है। सात सदस्यों वाली प्रारूप समिति ने शब्दों में वह लिखा जिसपर संविधान सभा के सदस्यों की सहमति बनी।

आज मैं अपनी विद्यालय की शिक्षा के विषय में यह मानता हूँ कि विद्यालय में मैंने हिंदी में जो पुस्तकें पढ़ीं उनमें न तो ब्राह्मणवादी पूर्वाग्रह था और न अंबेडकरवादी। उन पुस्तकों में समाजवादी और मार्क्सवादी पूर्वाग्रह था। उच्च विद्यालय की एक कक्षा की हिंदी पाठ्यपुस्तक में कार्ल मार्क्स और उनके विचारों का गुणगान करने वाला “सबकी संपत्ति, सबका सुख” नामक एक अध्याय था। विडंबना देखिए- यह अध्याय हमने सोवियत संघ के विघटन और दोनों जर्मनी की एकीकरण के पश्चात् तब पढ़ा था जब जॉर्ज हर्बर्ट वॉकर बुश के अनुसार साम्यवाद मर चुका था

पुस्तक प्रकाशन उद्योग पैसे का खेल है

सागर सुलतान सिंह गौतम के विचार रखते हैं जो अंबेडकर के लेखों और भाषणों के हिंदी अनुवाद के सरलता से न मिलने को अनिच्छुक प्रकाशकों और जहाँ किसी को न मिलें ऐसे स्थानों पर पुस्तकों को रखने वाले ‘दुष्ट’ विक्रेताओं और पुस्तकालय-कर्मियों (‘दुष्ट’ शब्द मेरा है) से जोड़ते हैं। प्रकाशकों, विक्रेताओं, और पुस्तकालय-कर्मियों ने जान-बूझकर ऐसे काम किए जिससे अंबेडकर की कृतियों के हिंदी अनुवाद को छापने में अड़चनें आईं, उपलब्ध प्रतियाँ हटा ली गईं, और अधिक प्रतियों को पुनः नहीं मँगाया गया- बिना किसी प्रमाण के यह सब कहना एक ‘षड्यंत्र सिद्धांत’ (conspiracy theory) मात्र है।

यह षड्यंत्र सिद्धांत पुस्तक प्रकाशन उद्योग की कार्य-प्रणाली के अज्ञान से ग्रस्त है। प्रकाशक, वितरक, विक्रेता, और पुस्तकालय-कर्मी ये सब पुस्तक प्रकाशन उद्योग की उस आपूर्ति-शृंखला (supply chain) के भाग हैं जो बहुत अंश तक विचारधारा अथवा सिद्धांतों पर नहीं अपितु पैसे पर चलती है।

अधिकतर व्यावसायिक प्रकाशक तब तक एक पुस्तक को छापने के लिए इच्छुक नहीं होते जब तक उन्हें पर्याप्त प्रतियाँ बिकेंगी ऐसा नहीं लगता। पुस्तकों के वितरक पुस्तक मूल्य की 50-55 प्रतिशत राशि आढ़त (commission) के रूप में लेते हैं, इन्हें ऐसी पुस्तकों में ही विशेष रुचि रहती है जिनमें आकारिक मितव्ययिता (economy of scale) का लाभ उठाया जा सके।

विशिष्ट पुस्तकों के विक्रेताओं को छोड़ दें तो अधिकांश विक्रेता उन्हीं पुस्तकों पर अधिक ध्यान देते हैं जिनकी बिक्री से अधिक लाभ हो। रही बात पुस्तकालय-कर्मियों की, तो वे अंबेडकर की पुस्तकों को ऐसे स्थानों पर रखेंगे जहाँ उन्हें ढूँढा न जा सके- ऐसी बात पर बिना प्रमाण के विश्वास करना असंभव है।

यदि एक विक्रेता अथवा पुस्तकालय-कर्मी एक पुस्तक को हटाता है, लौटाता है, अथवा उसका नया संस्करण नहीं मँगाता तो एक उचित प्रश्न यह है- क्या पुस्तक की पर्याप्त माँग थी, क्या उसकी पर्याप्त बिक्री हुई थी, अथवा क्या अनेक लोगों ने उसे पढ़ा था? मेरे निजी पुस्तकालय में संस्कृत में अनेक ऐसी पुस्तकें हैं (कुछ अब प्रकाशित नहीं होतीं) जो मैंने विभिन्न स्थानों से प्राप्त की हैं- वाराणसी के पुस्तक-विक्रेताओं से, सीधा प्रकाशकों से, और पुस्तकों के प्राचीन विक्रेताओं से।

ये पुस्तकें मुझे मुंबई और दिल्ली के किसी साधारण पुस्तक-विक्रेता से नहीं मिल सकतीं और अमेज़न अथवा एक्ज़ॉटिक इंडिया पर भी नहीं मिल सकतीं। इसका सीधा कारण है इन पुस्तकों की पर्याप्त माँग नहीं है। यदि सागर ने कुछ आँकड़े प्रस्तुत किए होते- कितने संस्करण और कितनी प्रतियाँ प्रकाशित हुए, प्रत्येक प्रति का मूल्य क्या था, पुस्तक विक्रेताओं के लिए लाभ की छूट कितनी थी, कितनी प्रतियाँ बिकीं और कितनी लौटाईं गईं- तो विक्रेताओं अथवा पुस्तकालयों ने पुस्तकें क्यों लौटाईं और नए संस्करण क्यों नहीं मँगवाए इसके कारण का कुछ पता लग पाता। सारे प्रकाशन उद्योग के लोगों पर आम्बेडकर की पुस्तकों के विरुद्ध षड्यन्त्र करने का आरोप लगाना निरर्थक है।

एक व्यावसायिक प्रकाशक द्वारा कोई भी पुस्तक बड़े स्तर पर तब तक प्रकाशित नहीं होती जब तक प्रकाशक को वास्तविक भावी माँग की अनुभूति नहीं होती। राजकमल प्रकाशन आज की तिथि में एक जाना-माना हिंदी प्रकाशन है। यह प्रकाशन ‘दलित साहित्य’ और ‘आदिवासी साहित्य’ की श्रेणियों में 25-25 शीर्षक अपने जालकेंद्र पर बेचता है। अपने मुख्यपृष्ठ पर राजकमल प्रकाशन ‘आत्मकथा’ और ‘संकलित कृतियाँ’ के अतिरिक्त ‘आदिवासी साहित्य’ को तीसरी श्रेणि के रूप में मुखरता से प्रस्तुत करता है। हिंदी में दलित और आदिवासी साहित्य की माँग भी है और आपूर्ति भी इसका यह स्पष्ट प्रमाण है। हिंदी प्रकाशन के जगत् में ऐसा कोई षड्यंत्र नहीं है जैसा सागर के लेख में कहा गया है।

हिंदी में आधुनिक नारीवादी और दलितवादी पत्रिकाएँ

अनेक अन्य भाषाओं की भाँति हिंदी में भी लुगदी साहित्य (pulp fiction) और पत्र-पत्रिकाओं की माँग कथेतर साहित्य (non-fiction) की माँग से अधिक है यह तथ्य छुपा नहीं है। हिंदी साहित्य में बीते कुछ समय में सर्वाधिक बिकने वाली पुस्तक ‘वर्दी वाला गुंडा’ थी, जो लुगदी साहित्य की कृति थी। हिंदी में केवल सवर्ण पुरुषों की चलती है ऐसा कहने से पहले सागर को स्त्रियों और दलितों की पत्रिकाओं के कुछ आँकड़े देखने चाहिए।

वर्ष 2019 के भारतीय पाठक सर्वेक्षण के अनुसार स्त्रियों के लिए प्रकाशित तीन हिंदी पत्रिकाएँ- ‘मेरी सहेली’ (~47 लाख पाठक), ‘सरिता’ (~30 लाख), और ‘गृहशोभा’ (~28 लाख) भारत की 20 सर्वाधिक पठित पत्रिकाओं में आती हैं। पाक्षिक ‘सरिता’ पत्रिका के कईं लेख हिंदू-विरोधी होते हैं। कुछ दिनों पहले इसके एक अंक में एक लेख छपा था जिसमें भारत में होने वाले बलात्कारों का दोष हिंदू शास्त्रों के सिर मढ़ा गया था।

अनेक वर्षों पहले मैंने दलितवादी पत्रिका ‘अंबेडकर टुडे’ के विषय में सुना था। वर्ष 2010 में छपा इसका एक अंक बहुत विवादास्पद था जिसमें एक हिंदू देवता के लिए एक अत्यंत आपत्तिजनक शब्द ‘बेटी**द’ का प्रयोग किया गया था। आधुनिक समय में ‘दलित दस्तक’ पत्रिका की वर्ष 2016 में 26,000 प्रतियाँ मँगाई जाती थीं। यह संख्या उपरिलिखित स्त्रियों की पत्रिकाओं की संख्याओं की तुलना में बहुत छोटी है ऐसा कहा जा सकता है, पर ‘दलित दस्तक’ एक बहुत नई पत्रिका भी तो है। ‘दलित दस्तक’ के यूट्यूब चैनल पर 5,00,000 अभिदाता (subscribers) हैं; यह संख्या ‘मेरी सहेली; के यूट्यूब चैनल के अभिदाताओं से 15 गुना अधिक है। ‘दलित दस्तक’ और इसके सदृश अन्य प्रकाशकों के हिंदी प्रकाशन और चलचित्रों की पर्याप्त माँग है यह इन संख्याओं से प्रमाणित होता है।

हिंदी पर सवर्ण पुरुषों का एकाधिकार नहीं है 

सागर कहते हैं, हिंदी साहित्य के सारे पुरोधा सवर्ण पुरुष थे और सवर्ण जातियों ने संस्कृतनिष्ठ हिंदी को समाज पर अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए एक माध्यम के रूप में देखा। शेल्डन पॉलक की देखा-देखी आगे सागर लिखते हैं- निश्चित ही संस्कृत का भी पहले यही उपयोग था। ऐसा कहकर सागर संस्कृत और हिंदी की साहित्यिक परंपरा और कृतियों दोनों से अनभिज्ञ हैं यही दिखाते हैं।

संस्कृत अश्वघोष और अमरसिंह जैसे बौद्धों और मल्लिनाथ सूरी और हेमचंद्र सूरी जैसे जैनों की भी उतनी ही थी जितनी ब्राह्मणों की। इसी प्रकार हिंदी भी उतनी ही महिलाओं, मार्क्सवादियों, पिछड़ी जातियों, दलितों, और आदिवासियों की है जितनी सवर्ण पुरुषों की। 20वीं शताब्दी में हिंदी साहित्य के दो सबसे बड़े नामों में महादेवी वर्मा और सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मिलित हैं, ये दोनों महिलाएँ थीं।

मैंने अपने विद्यालय में कृष्णा सोबती को पढ़ा है जिन्हें 1960 के दशक में पारंपरिक विषयों से हटकर नए विषयों पर लिखने के लिए जाना जाता था। राहुल सांकृत्यायन और नामवर सिंह हिंदी साहित्य में बड़े नाम हैं- दोनों मार्क्सवादी थे और जाति में उनका विश्वास नहीं था। हिंदी के सर्वाधिक जाने-माने संपादकों में अग्रगण्य और हिंदी साहित्य में ‘नयी कहानी’ युग के पुरोधा राजेंद्र यादव पिछड़ी जाति से थे।

हिंदी में प्रभावशाली दलित और दलितवादी लेखक भी हुए हैं, वे इतने जाने नहीं जाते यह बात दूसरी है। 20वीं शताब्दी से दो नाम स्मरण आते हैं, स्वामी अछूतानंद और चंद्रिका प्रसाद ‘जिज्ञासु’। स्वामी अछूतानंद दलित परिवार में जन्मे थे। जहाँ एक ओर सागर कहते हैं उनकी जागृति 21वीं शताब्दी में भी हिंदी में नहीं हो पाई, वहीं दूसरी ओर स्वामी अछूतानंद की जागृति 19वीं और 20वीं शताब्दी में कबीर और रैदास की मध्यकालीन हिंदी के माध्यम से हुई थी।

ध्यातव्य है, अछूतानंद कुछ समय तक आर्य समाज से जुड़े रहे थे, वही आर्य समाज जिसके संस्थापक दयानंद सरस्वती और जिसकी परवर्ती लेखकों ने जन्म से जाति न माननेवाली विचारधारा के साथ संस्कृतनिष्ठ हिंदी के प्रचार-प्रसार में बड़ी भूमिका निभाई थी। आधुनिक लेखक अछूतानंद और चंद्रिका प्रसाद ‘जिज्ञासु’ दोनों को हिंदी साहित्य में दलित स्वर के प्रारंभिक पुरोधा मानते हैं।

अंग्रेज़ी पुस्तक ‘Dalit Politics in Contemporary India’ में सम्बैय्या गुंडीमेडा लिखते हैं, जिज्ञासु ने उत्तर प्रदेश में दलित चेतना की वृद्धि में बहुत योगदान दिया। आधुनिक समय में ओम् प्रकाश वाल्मीकि जाने-माने दलित लेखक हैं जिनकी आठ पुस्तकें राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हैं और बेची जाती हैं

गरियाने के लिए हिंदी का प्रयोग

सागर हिंदी में उपलब्ध जातिवादी गालियों के विषय में लिखते हैं। अन्य प्रमुख भारतीय भाषाओं की भाँति हिंदी में जातिवादी और वंशवादी (नस्लवादी) गालियाँ हैं यह सत्य है। पर इससे हिंदी अपने-आप में जातिवादी भाषा नहीं बन जाती, ठीक उसी प्रकार जैसे अंग्रेज़ी में वंशवादी शब्द उपलब्ध होने से अंग्रेज़ी वंशवादी भाषा नहीं बनती।

इसके अतिरिक्त, गरियाने के लिए हिंदी का उपयोग एक ही ओर से होता है ऐसा नहीं है। हिंदी का प्रयोग सवर्णों को गरियाने के लिए भी होता है और होता आया है। अपनी पुस्तक ‘रामराज्य और मार्क्सवाद’ (1959, पीपल्ज़ पब्लिशिंग हाउज़, पृष्ठ 56) में राहुल सांकृत्यायन ने पिछड़ी जातियों के एक वर्ग द्वारा 1950 में लगाए गए एक उद्घोष का उल्लेख किया है- “ब्राह्मण छत्री लाला, तीनों का मुँह काला, तीनों को देशनिकाला।

और आगे जाएँ तो उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में एक हिंदी उद्घोष था— “तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार।” ‘तिलक’ अर्थात् ब्राह्मण, ‘तराजू’ अर्थात् बनिया, और ‘तलवार’ अर्थात् ठाकुर यह सर्वविदित है ही। और अभी दो वर्ष पूर्व देवरिया से बसपा के एक नेता ने फ़ेसबुक पर हिंदी में ही यह तक लिख डाला था ‘ब्राह्मण’ शब्द का अर्थ है “सुअरों का झुंड”।

पंत कवि थे, क्रांतिकारी नेता नहीं

सागर अपने लेख में सुमित्रानंदन पंत पर शाहनवाज़ आलम का मत रखते हैं और पन्तपंत को एक ऐसा ब्राह्मण जिसने कभी दलित का जीवन नहीं जिया कहकर टरका देते हैं। सागर कहना चाहते हैं, पंत दलितों की भावनाएँ समझने और व्यक्त करने में असमर्थ थे। ऐसा लगता है सागर न केवल कवि क्या होता है यह नहीं जानते, अपितु उन्होंने पंत को भी स्वयं पढ़ा नहीं है।

हिंदी में कहावत है “जहाँ न पहुँचे रवि, वहा पहुँचे कवि।” इसका तात्पर्य है- ऐसा कुछ नहीं है जो एक कवि सोच या समझ नहीं सकता, विशेषतः मानवीय भावनाओं और अनुभूतियों (रसों) के विषय में। यह सत्य हिंदी तक ही सीमित नहीं है, यह भारतीय साहित्य परंपरा में अन्य सभी भाषाओं पर लागू है।

संस्कृत में एक कवि अथवा लेखक को ‘रसज्ञ’ कहते हैं, जिसका अर्थ है “रस को जाननेवाला”। एक अच्छे कवि को ‘सहृदय’ भी कहते हैं, जिसका अर्थ है “(बड़े) हृदय वाला”, जो परोक्ष रूप से भी दूसरों की भावनाओं और अनुभूतियों का अनुभव और अभिव्यक्ति कर सकता है।

‘वीर रस’ से परिपूर्ण काव्य की रचना करने के लिए एक कवि अथवा कवयित्री को स्वयं युद्ध लड़ने की आवश्यकता नहीं है। शिवाजी के कवि भूषण और सुभद्रा कुमारी चौहान योद्धा नहीं थे, पर उन्होंने जिस प्रकार वीर रस की अभिव्यक्ति की है वैसा उनके समय के अधिकांश योद्धाओं से भी न करते बनती। इसी प्रकार दलितों की भावनाओं को समझने और व्यक्त करने में सक्षम होने के लिए पन्त जैसे महान् कवि को एक दलित का जीवन जीने की आवश्यकता नहीं है।

तथ्य यह है- पंत ने अपने लेखन में जहाँ-तहाँ अपनी ही शैली में जातिवाद से मुक्ति को छुआ है। अपने संकलन ‘ग्राम्या’ की पहली कविता ‘स्वप्न-पट’ में पंत लिखते हैं—

“जाति वर्ण की, श्रेणि वर्ग की, तोड़ भित्तियाँ दुर्धर,

युग-युग के बन्दीगृह से मानवता लिखती बाहर”

पंत की कृतियों से अन्य उदाहरणों पर विचार हो सकता है, पर केवल ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के कारण पंत दलितों के प्रति संवेदनशील नहीं थे ऐसा कहकर पंत को टरकाया नहीं जा सकता। कोई भी ऐसा निष्कर्ष पंत को बिना पढ़े नहीं लिया जा सकता।

प्रेमचंद को न समझना

सागर ने अपने लेख में प्रेमचंद को भी नहीं छोड़ा है। सागर के अनुसार “ठाकुर का कुआँ” में व्यवस्थाबद्ध उत्पीड़न का कोई कारण नहीं बताया गया है और पीड़ितों को लड़ने के लिए प्रेरित नहीं किया गया है। यह निंदा पूर्णतः भ्रांत है। “ठाकुर का कुआँ” एक बहुत छोटी कहानी है जिसमें केवल 1,100 के लगभग शब्द हैं (तुलना करें, सॅमुएल मूर कृत ‘कम्युनिस्ट मेनिफ़ेस्टो’ के अंग्रेज़ी अनुवाद में 13,000 से अधिक शब्द हैं)।

प्रेमचंद एक 1,100 शब्दों की लघुकथा में व्यवस्थाबद्ध उत्पीड़न के कारण समझाएँगे और और पीड़ितों को लड़ने के लिए प्रेरित करेंगे ऐसी अपेक्षा करना ही असंगत है। प्रेमचंद ‘करुण रस’ के माध्यम से इस लघुकथा में सफलतापूर्वक समाज को एक दर्पण दिखाते हैं। गंगी के विचारों और कुएँ पर पानी भरने आई दो महिलाओं के संवाद के माध्यम से प्रेमचंद पंडित (ब्राह्मण), ठाकुर, और साहू (बनिया) पात्रों की और पुरुष सामान्य पात्रों की कड़ी निंदा प्रस्तुत करते हैं।

ठाकुर द्वारा भेड़ चुराने, पंडित द्वारा बारहों मास जुआ खेलने, और साहू द्वारा घी में तेल मिलाकर बेचने से लेकर इन लोगों द्वारा गंगी को “रस-भरी आँख से देखने” तक- प्रेमचंद अपनी अनोखी मितभाषिता से इस सबका वर्णन करते हैं। कथा में जातिवाद के कारणों अथवा संघर्ष के उपायों पर भले ही प्रकाश न डाला गया हो, पर “ठाकुर का कुआँ” कृति निश्चित रूप से जातिवाद के विरुद्ध है।

सागर कहते हैं प्रेमचंद “कफ़न” में दलितों को पियक्कड़, अयोग्य, आलसी, और लालची दिखाकर दलितों के प्रति सवर्णों की सोच का प्रचार करते हैं। ऐसा विचार “कफ़न” का उल्टा और मनमाना अर्थ निकालने पर ही संभव है। पहली बात “कफ़न” में केवल कर्तव्यबोध से शून्य घीसू और माधव दलित पात्र नहीं है। प्रेमचंद एक और दलित बुधिया (माधव की पत्नी) का एक कर्तव्यपरायण स्त्री के रूप में चित्रण करते हैं, वे कहते हैं बुधिया ने ही इन “बेगैरतों” (घीसू और माधव) के परिवार में “व्यवस्था की नींव” डाली थी।

दूसरी बात, “कफ़न” में अगड़ी जातियों और उच्च वर्ग को भी नहीं छोड़ा गया है। कहानी के अंत में घीसू कहता है, “वह (बुधिया) न बैकुंठ जाएगी तो क्या ये मोटे-मोटे लोग जाएँगे, जो गरीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, और अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मंदिरों में जल चढ़ाते हैं।” प्रेमचंद ने “कफ़न” में दलितों के प्रति सवर्णों की सोच का प्रचार नहीं किया, ठीक उसी प्रकार जैसे उन्होंने “ठाकुर का कुआँ” में सवर्णों के प्रति दलितों की सोच का प्रचार नहीं किया, अपितु उन्होंने एक ऐसे समाज का भद्दा और हृदय-विदारक चित्र प्रस्तुत किया है जिसमें उन्हें सभी जातियों में सामाजिक कुरीतियाँ (जातिभेद, कर्तव्य से पलायन, असमय मदिरापान, आदि) दिखीं थीं।

अंत में, स्वयं भ्रांत होकर पाठक को भटकाते हुए सागर लिखते हैं, प्रेमचंद ने “यह तो इनकी प्रकृति थी” घीसू और माधव द्वारा क्रियाकर्म के पैसों से मदिरा-पान करने का वर्णन करते हुए लिखा है (जो कथा के अन्त में होता है)। प्रेमचंद का यह वाक्य कथा के प्रारंभ में एक पूर्णतः भिन्न संदर्भ में आता है, जहाँ प्रेमचंद लिखते हैं, “अगर दोनों साधु होते, तो उन्हें सन्तोष और धैर्य के लिए, संयम और नियम की बिलकुल ज़रूरत न होती, यह तो इनकी प्रकृति थी।” प्रेमचंद का यह वाक्य व्याजनिंदा (स्तुति के बहाने निंदा) है जिसका तात्पर्य है घीसू और माधव प्रकृति से (अर्थात् कुछ अधिक ही) संतोष और धैर्य से संपन्न थे जिस कारण से उन्हें अपने लिए परिश्रम अथवा कोई कार्य करना आवश्यकता नहीं लगता था।

काला चोरपर राई का पहाड़ 

सागर शैलेश कुमार दिवाकर का मत प्रस्तुत करते हैं। दिवाकर कहते हैं हिंदी स्वयं में जातिवादी, वंशवादी, और प्रभुत्ववादी है। इसका उदाहरण एक बालगीत से देते हैं, “नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए, बाकी जो बचा था काले चोर ले गए”। अपने अंग्रेज़ी अनुवाद में सागर “काले चोर” को “काले रंग के चोर” (black thieves) लिखते हैं।

दिवाकर कहते हैं, “काले चोर” में ‘काला’ शब्द वंशवादी है, चोर को काला ही होना था। यह सब बचकानी बातें हैं। हिंदी में ‘काला चोर’ एक मुहावरा है और किसी मुहावरे का हिंदी में (अन्य भाषाओं की भाँति) शाब्दिक अर्थ नहीं लिया जाता। ‘काला चोर’ में ‘काला’ शब्द शरीर के रंग का नहीं, अपितु छुपे होने (प्रकट न होने) का बोध कराता है। यह अनेक कोशों से समर्थित है।

श्यामसुंदर दास के ‘हिंदी शब्दसागर’ कोश के अनुसार ‘काला चोर’ के अर्थ हैं (1) “बड़ा चोर, बहुत भारी चोर, वह चोर जो जल्दी पकड़ा न जा सके” (2) “बुरे से बुरा आदमी, तुच्छ मनुष्य”। उर्दू, मानक हिंदी और अंग्रेज़ी के प्लैट्स के कोश के अनुसार ‘काला चोर’ के अर्थ हैं (1) “एक बड़ा चोर” (2) “एक अनजाना व्यक्ति” (3) “छुपा रुस्तम” (“a dark horse”)।

हरदेव बाहरी के हिंदी-अंग्रेज़ी कोश के अनुसार ‘काला चोर’ का अर्थ है बड़ा अथवा भयावह चोर (“terrible thief”)। अंततः, महेंद्र चतुर्वेदी के हिंदी-अंग्रेज़ी कोश के अनुसार ‘काला चोर’ का अर्थ है “अज्ञात व्यक्ति अथवा न पकड़े जाने वाला व्यक्ति” (“unknown/untraced person”)।

प्रेमचंद की लघुकथा “दुनिया का सबसे अनमोल रतन” में ‘काला चोर’ एक पात्र है, और प्रेमचंद उसके रंग का वर्णन एक बार भी नहीं करते। हिंदीभाषी दिवाकर और सागर द्वारा एक प्रसिद्ध मुहावरे ‘काला चोर’ (=“बड़ा अथवा कठिनाई से पकड़ा जाने वाला चोर”, “अज्ञात व्यक्ति”, अथवा “तुच्छ व्यक्ति”) में भी वंशवाद (नस्लवाद) देखना एक आश्चर्य ही है।

यदि ये दोनों महानुभाव मुहावरे का शाब्दिक अर्थ लेने पर उतारू भी हों तो ऐसे अनेक गीत हैं जिनमें “काले रंग” के अर्थ में ‘काला’ शब्द सकारात्मक ढंग से प्रयुक्त हुआ है। हिंदू देवता कृष्ण को प्रेम से अनेक हिंदी भजनों में ‘काला’ कहा जाता है। अनूप जलोटा के एक भजन के बोल हैं, “वो काला एक बाँसुरीवाला सुध बिसरा गया मोरी रे, माखनचोर जो नंदकिशोर जो कर गयो मन की चोरी रे।” इस भजन में ‘चोर’ शब्द का भी प्रयोग है।

अंततः, “आई मिलन की रात” में एक पंजाबी लोकगीत से प्रेरित एक हिंदी गीत था “काला शाह काला” जिसमें एक महिला गोरे रंग के पुरुषों की तुलना में काले रंग के पुरुष के प्रति अपनी रुचि व्यक्त करती है और गोरे पुरुषों को “मन के काले” तक कहती है।

हिंदी का कुरुक्षेत्र?

वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार भारत की 53.6% जनसंख्या पहली, दूसरी, अथवा तीसरी भाषा के रूप में हिंदी बोलती थी (इसके अतिरिक्त 5.74% जनसंख्या पहली, दूसरी, अथवा तीसरी भाषा के रूप में उर्दू बोलती थी)। वर्ष 2011 की जनगणना में यह आँकड़ा क्या था यह मुझे ज्ञात नहीं है पर पिछले 18 वर्षों में हिंदी बोलनेवालों का अनुपात भारत में बढ़ा ही है। आज यह संख्या 55-60% (अथवा इससे भी अधिक) हो सकती है। हिंदी बढ़-चढ़कर भारतीयों में एकता स्थापित कर रही है, और संभवतः इसी कारण से कुछ लोगों को हिंदी खटक रही है। देश की आधी से अधिक जनसंख्या द्वारा बोली जाने वाली हिंदी जातिवादी अथवा वंशवादी है यह कहना हास्यास्पद है।

एक लंबे समय तक संस्कृत को बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने दमनकारी भाषा कहा है। संस्कृत के विरुद्ध यह मिथ्या-प्रचार अधिकांशतः अंग्रेज़ी में हुआ है और आज भी हो रहा है। यह मिथ्या-प्रचार भारत के एक वर्ग को दूसरे वर्ग के विरुद्ध भड़काने में बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है।

हिंदी को “जातिवादी, वंशवादी, और प्रभुत्ववादी” कहने वाला सागर का लेख भारत की वामपंथी-उदारवादी टोली से आने वाले अनेक भावी हिंदी-विरोधी लेखों और कृतियों का पूर्वसूचक सिद्ध हो सकता है। हिंदू धर्म एवं संस्कृत के पश्चात् अब हिंदी को दमनकारी और जातिवादी घोषित करने हेतु ऐसे किसी भी लेख अथवा पुस्तक को पश्चिमी जगत् में मीडिया और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग द्वारा सहर्ष स्वीकार किया जाएगा। ऐसे हिंदी-विरोधी मिथ्या-प्रचार का एक ही उपयोग होगा- भारतीयों को भारतीयों से ही लड़वाना। इसका प्रतिवाद आवश्यक है- हिंदी में भी और अन्य भाषाओं में भी।