विचार
एलजीबीटीक्यू आन्दोलन क्यों लड़ रहा है एक काल्पनिक युद्ध?

प्रसंग
  • समलैंगिक आन्दोलन को जनता का बड़ा समर्थन मिल सकता है यदि यह अपने मूल उद्देश्य पर टिका रहता है और इस पर राजनीति नहीं होने देता।

अति प्राचीन काल से राजनीतिक वामपंथ, दुनिया भर के संस्थागत सोच के स्वामी, ने राजनीतिक लाभ लेने और नागरिक अधिकारों की ओट में अपने वैचारिक विरोधियों पर बेतुके हमले करने में महारथ हासिल कर ली है। पिछले सात दशकों के विभिन्न अधिकार आंदोलनों का अमेरिकी इतिहास अमेरिकी वामपंथ द्वारा अपने विरोधियों को दबाने के लिए इन कारणों की लोकप्रिय सहानुभूति का इस्तेमाल करने के उदाहरणों से भरा पड़ा है। दिल्ली की प्राइड परेड, जो संभवतः एलजीबीटीक्यू कार्यकर्ताओं का एक जुलूस है, में भारतीय वामपंथ ने अपने पश्चिमी समकक्षों के नक्शेकदम पर चलने की कोशिश की। इस मुद्दे पर राजनीतिक लाभ के अलावा, मंदिरों की निंदा करने वाले बैनर लहराता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के लाखों कार्यकर्ताओं को गुंडे बताता हुआ एक अधिकार आन्दोलन के जुलूस का निहितार्थ भारत के समलैंगिक लोगों के लिए चिंताजनक है। शायद यही वह समय है जब एलजीबीटीक्यू की जनता इसमें होने वाली राजनीति का विरोध करे। भारतीय जनता पार्टी-आरएसएस के प्रभाव वाले दक्षिणपंथ के खिलाफ एक मोर्चा खोलना अनावश्यक विकर्षण मात्र है और इसका सबसे बुरा प्रभाव यह है कि गन्दी सोच वाली इस रणनीति के कारण आन्दोलन को इस अमूल्य जन समर्थन से हाथ धोना पड़ सकता है।

संघी गुंडे समलैंगिक प्रेम में अवरोध पैदा कर रहे हैं या मंदिर समलैंगिक गर्व के दुश्मन हैं, इस बारे में अनाप-शनाप बातों पर यकीन करने के लिए आपको अपने आपको ब्रेनवाश होने के स्तर तक यकीन दिलाना पड़ेगा। जैसा कि मैंने कहीं और तर्क दिया था कि, भारतीय दक्षिणपंथ को व्यापक समलैंगिक आन्दोलन का विरोध करने में दिलचस्पी इसलिए नहीं है क्योंकि कुछ मतवादी धर्मों के विपरीत, हिन्दू धर्म में एक किताब या आदेशों का संग्रह और हर किसी के अनुसरण हेतु ‘क्या करें, क्या न करें’ जैसी कोई अवधारणा नहीं है। यहाँ तक की अनुचित धारा 377 को हटाने की मांगों की प्रतिक्रियाओं ने हिन्दू समाज की व्यापक समाविष्टि को प्रतिबिंबित किया।

सरसंघचालक श्री मोहन भागवत ने कहा था कि समलैंगिक लोग भारतीय समाज का हिस्सा थे। पिछले साल गोवा में इंडिया फाउंडेशन के इंडिया आईडिया कॉन्क्लेव में एक ट्रांसजेंडर कार्यकर्ता लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी को स्वराज्य द्वारा प्रतिष्ठित श्री नारायण गुरु पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। सरकार के स्तर पर भी, राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक गठबंधन ने धारा 377 के उन्मूलन में अपनी भूमिका अदा की, जिसमें सरकार ने एक शपथ पत्र जमा किया जिसमें कहा गया था कि अदालत द्वारा धारा 377 पर निर्णय के लिए केंद्र को कोई आपत्ति नहीं है। इसलिए इस बात का कोई औचित्य नहीं बनता कि आरएसएस या भारतीय दक्षिणपंथ भारत में समलैंगिक अधिकारों के सबसे बड़े दुश्मन हैं।

दूसरी ओर, अपोस्टोलिक चर्च एलायंस और अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे संगठनों ने धारा 377 के उन्मूलन के खिलाफ अपील दायर की थी। दुनिया भर में यह चर्च समलैंगिक अधिकारों के सबसे मुखर विरोधियों में से एक रहा है और कुछ इस्लामिक देशों में अभी भी समलैंगिक लोगों के लिए मृत्युदंड की सजा का प्रावधान है। यहाँ तक कि एक निष्पक्ष पर्यवेक्षक भी ये पूछना चाहेगा कि ऐसे मामलों में चर्च या इस्लामी सिद्धांत का विरोध करने वाले बैनर क्यों नहीं दिखाई देते।

नाटक रचते समय, भारतीय वामपंथ ने अक्सर मौलिकता की कमी का प्रदर्शन किया है और अक्सर पश्चिमी वाक्यांशों के लिए भारतीय विकल्प खोजने का सहारा भर लिया है। इन समाजों के बीच मौलिक भिन्नताओं के कारण इस तरह के विकल्पों के प्रयास से अक्सर उपमा और उपमान के परिणाम सामने आए हैं जिनका कोई तर्कसंगत आधार नहीं होता है। ट्विटर के सह संस्थापक जैक डोरसे के वामपंथी कार्यकर्ताओं के साथ कुत्सित प्रयास की हालिया घटना ने ‘ब्रह्मणिक पित्रसत्ता’ को गोरों के वर्चस्व के साथ प्रतिस्थापित करने की कोशिश की बेहूदगी का प्रदर्शन किया। अब, जैसा कि दिल्ली प्राइड परेड ने दिखाया है, भारतीय दक्षिणपंथ को अमेरिकी दक्षिणपंथ के साथ प्रतिस्थापित करने का यह प्रयास इन दोनों की संरचनाओं में मौलिक भिन्नताओं के कारण एक और भी बड़ी मुसीबत बन सकती है।

कई विचारकों ने भारतीय विचार-विमर्श के सन्दर्भ में ‘दक्षिण’ और ‘वाम’ शब्दों के सीमित प्रयोग को अक्सर इंगित किया है। इन दोनों शब्दों का इस्तेमाल करने की मूर्खता और कहीं भी इतनी स्पष्ट नहीं है जितनी यह समलैंगिक अधिकारों के मामलों में है। अमरीकी दक्षिणपंथ, जिसमें मुख्यतः रुढ़िवादी ईसाई शामिल हैं, समलैंगिक संबंधो पर ईसाइयत के रुख के कारण समलैंगिक अधिकारों का पारंपरिक विरोधी रहा है। मतदाताओं की बड़ी तादाद के कारण, बहुत लम्बे समय से राजनेताओं ने समलैंगिक अधिकारों का स्पष्ट समर्थन करने में नज़रें चुराई हैं। यहाँ तक कि भूतपूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा जैसे उदारवादी व्यक्ति ने भी अपने 2008 के अभियान के दौरान कहा था कि उनका मानना है कि विवाह एक पुरुष और एक महिला का मिलन है।

अब बात करते हैं भारतीय दक्षिणपंथ की, इसमें मुख्य रूप से हिन्दू हैं, जो सक्रिय रूप से समलैंगिक अधिकारों का विरोध नहीं करते हैं क्योंकि उनके धर्म में एक किताब-नियमों का एक संग्रह वाली कोई प्रकृति नहीं है। और जैसा कि व्यापक समर्थक आधार सक्रिय रूप से समलैंगिक अधिकारों का विरोधी नहीं है, तो यह मुद्दा वास्तव में अधिकांश राजनेताओं के लिए पगडंडी नहीं है। दूसरी ओर, चूंकि ईसाई संगठन-वित्त पोषित धर्मान्तरण के प्रयास भारतीय हिंदुओं की एक बड़ी चिंता हैं, इसलिए उनमें से एक व्यापक जनसँख्या स्वयं को रूढ़िवादी अमेरिकी दक्षिणपंथ के विपरीत पाती है। भारत में ईसाई धर्म प्रचारक संगठन भारतीय दक्षिणपंथ और उनकी प्रमुख पार्टी अर्थात भाजपा के विरोध में समान रूप से मुखर रहे हैं। इसलिए अमेरिका से भारत का साधारण प्रतिस्थापन कामयाब नहीं होगा, क्योंकि वैचारिक रूप से ये दोनों अलग हैं।

चाहे जो भी हो, यह हमला आंदोलन से एलजीबीटीक्यू समर्थक गैर-समलैंगिक लोगों को बाहर ले जा सकता है अगर इन लोगों को लगता है कि समलैंगिक अधिकारों के ढोंग के तहत एक वामपंथी राजनीतिक-चुनावी एजेंडा का प्रचार किया जा रहा है। जैसा कि अशोक राव कवि ने इसे अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा, मुंबई आयोजन समिति प्राइड मार्च के लिए राजनीतिक नारेबाजी का समर्थन नहीं करती क्योंकि यह एक प्राइड परेड के बजाय एक चिल्लाने की प्रतिस्पर्धा में बदल सकती है।

मैं समलैंगिक अधिकारों के सबसे मुखर समर्थकों में से एक रहा हूँ, लेकिन क्या मैं वामपंथ को इस आंदोलन के माध्यम से उनके कंधे पर बंदूक रखकर मेरे जैसे लोगों पर गोली चलाने देना चाहूँगा? बिल्कुल नहीं।

जैसा कि पत्रकार अभिजीत अय्यर मित्रा ने इस पर अर्थपूर्ण व्याख्या की यहाँ देखें– “समलैंगिक अधिकार आंदोलन, जिसमें व्यापक अंतरानुभागीयता की व्याकुलता है, उन मुद्दों में शामिल हो जाता है जहाँ समाज बहुत अधिक ध्रुवीकृत है। कल्पित दुश्मन के खिलाफ लड़ाई में कल्पित सहयोगियों की तलाश में, उन्होंने उन लोगों के साथ कदम से कदम मिलाकर, जो लोग समलैंगिक लोगों को छतों से फेंकने या क्रेन से लटकाने को उचित ठहराते हैं, सीधे-सीधे विपक्ष को उकसाया है और यह उन लोगों की समलैंगिक लोगों के साथ कोई सहानुभूति नहीं बल्कि शासन के खिलाफ एक षडयंत्र है।

जैसा कि अभिजीत कहते हैं, तो फिर यह आंदोलन उन लोगों के साथ काम क्यों करता है जो दुनिया में कहीं पर भी समलैंगिकों को ठुकराने की अनुमति देते हैं? जबकि अंतरानुभागीयता इसका एक हिस्सा हो सकती है, वहीं मुझे लगता है कि इसका हिस्सा वर्ग विच्छेद के द्वारा ही समझाया जा सकता है जो एलजीबीटीक्यू आंदोलन में ही मौजूद है।

लोग समलैंगिक अधिकार कार्यकर्ताओं को अक्सर बड़े समलैंगिक समुदायों के साथ जोड़ते हैं, जैसा कि लोकप्रिय संस्कृति के प्रभाव में, वे समलैंगिक लोगों को चटकीला, सामाजिक और शोमैन के रूप में भी देखते हैं। नेतृत्व या आंदोलन के चेहरे को पूरी तरह से इसके घटकों का प्रतिनिधि मान लेना एक आम गलती है। जैसे कि किसी निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनेता की रूचि और उसके मतदाताओं की रूचि लगभग कभी भी मेल नहीं खाती है, मुझे इस बात का डर है कि यह यहाँ भी लागू होता है। समाज द्वारा स्वीकार किये जाने और स्वयं मुक्ति के सन्दर्भ में, ये कार्यकर्ता आंदोलन की शीर्ष जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। अक्सर उनके हितों को चल रही सामाजिक या कानूनी लड़ाई के प्रकाश में साधा जाएगा। क्या यही बात उस सामान्य समलैंगिक महिला या पुरूष के बारे में भी कही जा सकती है जो अपनी साधारण दैनिक जिंदगी बिताता हो और समाज से अपने अभिविन्यास की व्यापक स्वीकृति की उम्मीद रखता हो?

शायद इसी वजह से मैं यह सोचता हूँ कि एलजीबीटीक्यू आंदोलन के लोगों के लिए यह आवाज बुलंद करने का समय है। उन्हें आगे आकर अपने इस मुद्दे में उन अन्य मुद्दों को शामिल होने से रोकना चाहिए जिन मुद्दों पर समाज पहले से ही बँटा हुआ है। और अगर इस मंच के साथ वे लोग इस आंदोलन को नुकसान पहुँचा रहे हैं, खासकर चुनावी राजनीति से जुड़े लोग, तो मैं मानता हूँ कि जनता को सार्वजनिक रूप से इस तरह के लोगों से खुद को बहुत दूर कर लेना चाहिए, जिस तरह से मैंने हिंदुओं के भीतर समलैंगिक अधिकारों के बेवकूफ विरोधियों से सांस्कृतिक अधिकार को दूर करने की बात की थी। समलैंगिक अधिकार आंदोलन को भारत में अभी एक लंबा सफर तय करना है और उनको अपनी संख्या या पहुँच बढ़ाने पर ध्यान केन्द्रित करने तथा एक सामान्य न्यूनतम एजेंडे पर काम करने की ज़रूरत है। आन्दोलन को जनता का बड़ा समर्थन मिल सकता है यदि यह अपने मूल उद्देश्य पर टिका रहता है और इस पर राजनीति नहीं होने देता।

लेखक एक निवेश सेवा पेशेवर और उपन्यासकार हैं। इनके नवीनतम उपन्यास दि डार्क रोड को जगरनॉट पब्लिकेशन्स द्वारा प्रकाशित किया गया था।