विचार
कानून रूपी प्रहरी पर भरोसा करके बैठने से बेहतर अपराधों के सामान्यीकरण से संघर्ष

प्रसंग- हाथरस घटना कानून व्यवस्था से अधिक नैतिकता पर करती है प्रश्न।

उत्तर प्रदेश में एक बच्ची की जान चली गई। मामले के स्पष्ट तथ्य मीडिया के शोर से हटकर सामने आ ही जाएँगे। चिंता ऐसे अपराधों के सामान्यीकरण की है। एक राजनीतिक दल पूरे पाँच वर्ष सरकार अपराधी को कैबिनेट में रखने के बाद महिलाओं के विरोध में हुए अपराधों को तभी समझता है जब वह सत्ता से हट जाता है।

एक और मामला इसके पहले भँवरी देवी का राजस्थान से उठा था, और उसमें जो अपराधी थे आज उनके परिवारजन दिव्या मदेरणा और महेंद्र बिश्नोई कांग्रेस के चुने हुए विधायक हैं। इसमें आरोप सिर्फ कांग्रेस पर नहीं है, आरोप आम जनता पर भी है, जो ऐसे अपराधों को भूल जाती है।

मेरा यह भी कहना है कि भारत में न्याय व्यवस्था की स्थिति ऐसी है। निर्भया के आंदोलन के पश्चात कानून सख़्त हुए परंतु कानून वह जो अपना कार्य कर सकें। यहीं एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश का कहना है कि भारत में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों का कारण उनकी बेरोज़गारी है। इससे दिखता है कि जहाँ नैतिकता हार जाती है, न्याय सफल नहीं हो सकता है।

प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक सॉमरसेट मॉम लिखते हैं कि अपनी इच्छाओं का पड़ोस के पुलिसकर्मी का ध्यान रखते हुए पीछा करना। इसमें एक बड़ी बात है कि हर चौक पर कांस्टेबल नहीं हो सकता है। सामाजिक नैतिकता के हर ढलाव पर कानून का प्रहरी नहीं हो सकता है।

ऐसा नहीं है कि इसमें न्याय व्यवस्था की कोई भूमिका नहीं है। परंतु उत्तर नियमों की बहुतायत में नहीं है, उत्तर नियमों के प्रवर्तन में है, उसके प्रभावी कार्यान्वयन में है। निर्भया का न्याय होते-होते वर्षों लग गए। उसमें भी वयस्कों के अपराध करने वाला एक अपराधी अवयस्क मानकर छोड़ दिया गया है। सरकार ने पैसे रखे महिला सुरक्षा योजनाओं के लिए परंतु उस पैसे का कोई उपयोग नहीं हो पाया।

जिस समाज को ऐसे राजनेता स्वीकार्य हैं जो तथाकथित रूप से महिलाओं को अश्लील संदेश भेजते हैं, क्योंकि वे एक जातिवादी राजनीति का प्रतिनिधित्व करते हैं, उस समाज को भी अपने भीतर की नैतिकता को ढूंढना पड़ेगा। हमें भी सोचना होगा कि हम क्यों इस पर उत्तेजित नहीं होते जब दिशा साल्यान की मृत्यु को जब मीडिया दुर्घटना बता कर किनारे कर देता है? क्यों हम बलात्कार जैसे घृणित अपराध  राज्य के कलंक से आगे विस्तृत रूप से सामाजिक कोढ़ मानकर ठीक करने के लिए लगना होगा। समाज के नैतिक मानदंड उठाना और कानून को सख्ती से और समय से पालन करना, दोनों ही आवश्यक हैं।

दबाव योगी सरकार पर बन रहा है और बनना भी चाहिए। परंतु यही दबाव हर राज्य पर बनना चाहिए। इसमें जाति-धर्म का परिप्रेक्ष्य नहीं होना चाहिए। सोनभद्र में कुछ ही दिन पहले एक लड़की हत्या हुई थी, एक लड़की की एक टिकटॉक वाले ने हत्या की थी। सरकारी मदद की भी योजनाबद्ध नीति होनी चाहिए और जन आक्रोश के अनुपात में सरकारी मदद नहीं होनी चाहिए।

2019 की एनसीआरबी रिपोर्ट यह बताती है कि यह अपराध एक राज्य में सीमित नहीं है। संख्या के रूप से देखें राजस्थान से 5,997 बलात्कार के मामले आए हैं, उत्तर प्रदेश से 3,065 और मध्य प्रदेश से 2,485 मामले आए हैं। इस संख्या में राज्य की जनसंख्या को भी देखें। अनुपातिक रूप से भी राजस्थान इस दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य में आगे है- 15.9 प्रति लाख के साथ, केरल में 11.1 प्रति लाख और हरियाणा में 10.9 प्रति लाख मामले आए हैं।

दलित महिलाओं के विरुद्ध बलात्कार के प्रति लाख व्यक्तियों के सर्वाधिक बलात्कार केरल (4.6 प्रति लाख) में हुए। हालाँकि यदि इसे भी देखें तो आप यह देखेंगे ऐसे अपराध जाति पर आधारित नहीं हैं। अपराधों में दो ही जातियाँ होती हैं- शक्तिशाली एवं प्रताड़ित। महिला अपराधों का इसके अतिरिक्त कोई वर्गीकरण न होता है, न होना चाहिए।

दलित का अर्थ ही दबाया हुआ एवं पीड़ित है। जब एक महिला के निजी क्षेत्र का बलपूर्वक अतिक्रमण होता है तो वह महिला दलित ही होती है भले ही वह किसी भी धर्म या जाति की हो। राजनीति होती ही लोगों को बाँट कर है और आज दुखों को भी जाति, धर्म और राज्य में बाँटकर राजनीति हो रही है। जब एक शक्तिशाली प्रसिद्ध व्यक्तित्व तरुण तेजपाल से अनुराग कश्यप तक संत माना जाता क्योंकि पीड़िता की उसके सामने हैसियत नहीं होती तो बड़ी दुर्घटनाओं की ज़मीन तैयार होती है।

कुछ ऐसे लोग हैं जो इसे सांप्रदायिक रूप देने का भी प्रयास करते हैं, और कुछ ने मनुस्मृति पर भी कटाक्ष करने प्रारंभ कर दिए, मानों देश की न्याय व्यवस्था और कानून दोनों मनुस्मृति के अनुसार कार्य करते हों। भारत की धर्म एवं संस्कृति एक व्यक्ति के कथन और एक पुस्तक के शब्दों पर आधारित नहीं है।

भारत उस विचारधारा से निकला है जिसमें स्त्रियों का पुरुषों के सामान अधिकार रहा है। ऋग्वेद में मनुपुत्री देवहुति के लिखे श्लोक संग्रहीत हैं, देवताओं का ही नहीं, देवियों का आह्वान होता है, उस राष्ट्र में उसके महिमामयी इतिहास को कलंकित करने के स्थान पर उस राष्ट्र की स्वर्णिम संस्कृति का स्मरण करने की आवश्यकता है।

पाश्चात्य प्रगतिशीलता के नाम पर पतनशीलता के सामान्यीकरण की प्रथा से संघर्ष की आवश्यकता है। पुरुष के मन के पशु को सिर्फ पुलिस प्रशासन से नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। हमें इस पाशविक व्यवस्था के विरुद्ध बौद्धिक संघर्ष करना होगा, व्यक्ति और समाज के रूप में जिसने स्त्री को वस्तु समझ लिया और यहाँ तक कि गुलाम तक रखने के योग्य मान लिया। न्याय अपने आप में एक प्रतिक्रियावादी व्यवस्था है और अपराध होने के बाद ही प्रभाव में आती है। समाज का नैतिक सत्य ही न्याय के कठोरतम दंड के साथ मिल कर ऐसे अपराधों को होने से रोक सकता है।

यह इतिहास वर्तमान में तब तक झाँकता रहेगा जब तक हम सत्य को प्रपंच से राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण ढाँपते रहेंगे। हमारी संस्कृति ही भारत और सीरिया की व्यवस्था के मध्य एकमात्र सुरक्षा रेखा है। नैतिक संस्कार, त्वरित न्याय एवं राजनीति से मुक्त संघर्ष से ही स्थिति सुधरेगी।

साकेत लेखक व ब्लॉगर हैं जो @saket71 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।