विचार
क्या बौद्ध धर्म के अनुयायी अशोक ने 2,300 साल बाद फिर शस्त्र उठा लिए हैं?

आशुचित्र- अगर यह सच है कि बौद्ध धर्म के मानने वालों ने दुनिया के किसी भी कोने में हथियार थाम लिए हैं तो यह दुनिया भर के लोगों के लिए हिलाने वाली सूचना है।

श्रीलंका के धमाकों की गूंज दुनिया भर में है। मैंने देश-विदेश के तमाम मीडिया कवरेज पर गौर किया है। बीबीसी में 290 लोगों के मरने की बहुत बड़ी खबर और ढेर सारी तस्वीरों के सबसे आखिर में जानकारी दी है कि बहुसंख्यक सिंहला बौद्ध मस्जिदों और मुसलमानों की संपत्ति को निशाना बनाते रहे हैं। इस वजह से मार्च 2018 में इमरजेंसी लगानी पड़ी थी। इस ज्ञानवर्द्धक जानकारी के अलावा कहीं इस बात का जिक्र नहीं है कि कल के हमलों में किसका हाथ था या शक की सुई किन पर है। ज्यादातर मीडिया में सरकारी अलर्ट के हवाले से नेशनल तौहीद जमात (एनटीजे) पर शक जाहिर किया गया है और एनटीजे के बारे में भी जानकारी दी गई है कि पिछले साल बुद्ध की प्रतिमा को उड़ाने के मामले में जमात का हाथ सामने आया था।

हम जमात काे संसार की सबसे शांतिप्रिय विचारधारा की वाहक मानकर छोड़ते हैं। हम मान लेते हैं कि एनटीजे कोई मानवतावादी स्वयंसेवी संगठन होगा, जो श्रीलंका में परमार्थ के काम में लगा होगा और बिना किसी भेदभाव के इंसानियत की सेवा कर रहा होगा (जैसा कि दुनिया के दूसरे देशों में दूसरे तमाम नामों से ऐसे संगठन सेवा कार्य में लगे हुए हैं। जैसे-जमात-उद-दावा, लश्कर, हिज्बुल, आईएम, आईएसआईएस, अल-कायदा वगैरह)। हम यह भी मान लेते हैं कि मीडिया के बड़े हिस्से में एनटीजे का जिक्र या उस पर शक करना वहाँ के सांप्रदायिक संगठनों की साजिश होगी या गोदी मीडिया की फैलाई अफवाहें, जैसा कि दूसरे देशों में भी हो रहा है और बिला वजह एक बेकसूर, देशभक्त और मेहनतकश समुदाय को निशाने पर ले लिया जाता है। हम इन्हें बिल्कुल बरी मान लेते हैं। हम यह भी मान लेते हैं कि दुनिया में आतंक का कोई मजहब नहीं होता। (भले ही दुनिया के कोने-कोने में इंसानियत का दिल दहला देने वाली ऐसी आतंकी घटनाओं में इनके ही बेकसूर संगठनों के नाम सामने आते रहे हों।)

बीबीसी ने श्रीलंका के सिंहला बौद्धों का उल्लेख कुछ सोचकर ही बेहद ज़रूरी समझा होगा और हम इसी से अपनी बात आगे बढ़ाते हैं। हम यह मान ही लेते हैं कि कोलंबो के धमाकों के पीछे किसी बौद्ध संगठन का ही दिमाग होगा और कोई बौद्ध भिक्षु ही इसका मास्टर माइंड होगा। यह मानने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए, क्योंकि हज़ार वारदातों में अगर ढेर सारे मुल्ला, मुफ्ती या हाफिज के जिहादी दिमाग काम कर सकते हैं तो कोई बौद्ध भिक्षु भी अपने मठ में बैठकर फिदायीन बौद्ध तैयार कर सकता है। (अब फिदायीन को पाली भाषा में क्या कहेंगे या जातक कथाओं में इसके समान कोई शब्द कहीं आया हो, मुझे नहीं मालूम। मेरी जानकारी में फिदायीन जैसा शब्द बौद्ध दर्शन में नहीं है)। म्यांमार में कुछ साल पहले हज़ारों शांतिप्रिय निर्दोष रोहिंग्याओं के साथ वहाँ के बौद्धों ने भी ऐसा ही कुछ किया था। अब कितनी बुरी बात है कि म्यांमार के बाद श्रीलंका में भी गौतम बुद्ध के अनुयायी बम-बंदूक उठाकर मस्जिदों और चर्चों को निशाना बना रहे हैं।

अगर यह सच है कि बौद्ध धर्म के मानने वालों ने दुनिया के किसी भी कोने में हथियार थाम लिए हैं तो यह दुनिया भर के लोगों के लिए हिलाने वाली सूचना है। 2,500 साल बाद एक महान विचार खुद को कठघरे में खड़ा कर रहा है। एक ऐसा विचार, जिसकी जड़ों में ही शांति और प्रेम है, कत्लोगारत और लूटमार नहीं, अपनी सोच जबरन किसी पर लादने की गुंडागर्दी और फसाद नहीं, तोप-तलवार नहीं। 2,500 साल पहले सिद्धार्थ नाम के कपिलवस्तु के एक क्षत्रिय युवराज ने तीस साल की उम्र में महलों से बाहर का रास्ता चुना था। वह किसी पैगंबरी की तलाश में नहीं निकला था। वह अपनी खोज में निकला था। जिंदगी और मौत के सच को जानने की धुन उसे जंगलों में लेकर गई थी। करीब 12 बरस के तकलीफदेह तजुर्बों ने एक दिन बोधगया में उसे रोशनी का अनुभव हुआ था और सबसे पहले बनारस के पास सारनाथ में आकर उसने अपना पहला बयान दिया था। हिंदुस्तान के इतिहास में यह घटना एक निर्णायक मोड़ साबित हुई थी। खूनी जंगाें और आपसी टकरावों से भरी राजनीतिक लड़ाइयों में मानवता के असीमित नुकसान का आकलन करके यह देश बुद्ध के रास्ते पर चल निकला था।

बुद्ध के करीब 250 साल बाद आज के बिहार की राजधानी पटना, जो उस समय पाटलिपुत्र थी, महान मौर्य सम्राट अशोक हुए। वे बिंदुसार के बेटे थे और चंद्रगुप्त मौर्य के पोते। अशाेक ने अगर आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य को नहीं देखा होगा तो उनके किस्से अपने पिता से जरूर ही सुने होंगे। चाणक्य किंग मेकर थे, किंग नहीं। उन्होंने अपने बूते पर नंद वंश की सत्ता को चुनौती दी थी और चंद्रगुप्त को शासक बनाया था। वह हिंसक युद्धों में हासिल की जाने वाली जीत-हार का दौर था। अशोक की जिंदगी में कलिंग की लड़ाई एक निर्णायक मोड़ की तरह आती है। यह जगह आज ओडिशा में है। जगन्नाथ पुरी और भुवनेश्वर के पास का पहाड़ी मैदान, जहाँ अशोक की फतह हुई थी और उसके सामने एक लाख लाशें पड़ी थीं। अशोक जैसा सम्राट भी उस दृश्य को देखकर इसलिए काँप गया था, क्योंकि तब तक बुद्ध का विचार जनमानस में अपनी जगह बना चुका था। अशोक ने उसी वक्त हमेशा के लिए हथियार छोड़ दिए। पाटलिपुत्र लौटकर वह दूसरा ही इंसान बन गया और तब बौद्ध धर्म भी दुनिया में शांति और प्रेम के शानदार संदेश के साथ प्रसारित होना शुरू हुआ। अफगानिस्तान से लेकर श्रीलंका तक बौद्ध धर्म ने अपनी जड़ें जमाईं और हर तरह की हिंसा की जड़ मानसिकता से बाहर आने की प्रेरणा बन गया। अशोक ने अपने बेटे महेंद्र और बेटी संघमित्रा को अपने राजपाट का उत्तराधिकारी बनाने की बजाए श्रीलंका भेजा था, जो बोधि वृक्ष के अंश लेकर वहाँ गए थे।

बुद्ध के विचार वृत्त में आकर अशोक ने सब तरह की हिंसा और जड़ता से मुक्ति पा ली थी और जीवन के महान उद्देश्यों की तरफ खुद को मोड़ दिया था। अशोक के बाद एक हज़ार साल तक बौद्ध धर्म फलता-फूलता रहा। सातवीं सदी में सिंध के पार से अंधड़ आने शुरू हुए। एक वहशी विचार मजहबी जुनून पर सवार होकर इस तरफ आया और यह अहिंसक देश एक आसान शिकार बना दिया गया। भारत की लंबी गुलामी के लिए एक बड़ा वर्ग बौद्ध दर्शन को भी कोसता रहा है, जिसने शांति स्थापना की कोशिशों में एक राष्ट्र की आत्मरक्षा की नैसर्गिक वृत्ति को भी विलीन कर दिया था और हर कहीं हत्यारे, हमलावर, लुटेरे, कातिल वहशियों के जत्थे के जत्थे सदी दर सदी भारत में भरते रहे और अंतहीन लूटमार, मारकाट, कत्लेआम, बलात्कार और तलवार के बल पर लगातार धर्मांतर का कहर बरपाते रहे। यहाँ तक कि बौद्ध खुद ही खत्म हो गए या सिमट गए मगर उन्होंने कभी पलटकर हथियार नहीं उठाए। मुकाबले में कभी सामने नहीं आए। वे अपनी ही जमीन से मिटते चले गए। किसी धर्म और उसके स्मारकों के ऐसे सफाए की दूसरी मिसाल कहीं नहीं है।

अशोक के 600 साल बाद भारत आए फाहयान नाम के चीनी यात्री ने मथुरा में 3,000 भिक्षुओं की चहलपहल से आबाद 20 बौद्ध मठों को देखा था, जिनके स्तूपों की ऊपरी विशालकाय गोलाकार संरचनाएँ सोने से मढ़ी थीं। मठ और मंदिर की अनगिनत मूर्तियाँ सोने और चांदी से गढ़ी और मढ़ी थीं। 1017 में महमूद गजनवी ने मथुरा पर हमले में आधा टन सोना लूटा था और इतिहास में दर्ज है कि कीमती धातु की विशाल एक-एक वजनदार मूर्ति को ले जाने के लिए एक-एक ऊँट लगाने पड़े थे। 1834 में भारत आए अलेक्झेंडर कनिंघम ने सांची, भरहूत, सारनाथ और मथुरा बौद्ध स्तूपों पर रिसर्च की। उसने लिखा कि 17 वीं सदी से पहले की कोई इमारत मथुरा में नहीं बची। सारे मठ, मंदिर और स्तूप हमलावरों ने लूटकर मिट्‌टी में मिला दिए। केवल फाहयान जैसे यात्रियों ने दस्तावेजों में ही अपने समय के लाइव विवरण लिख छोड़े हैं। जमीन पर सब गायब है और कमजोर इतिहासबोध वाले बदकिस्मत भारतीयों की याददाश्त से भी पुंछा हुआ है।

हम फिर कोलंबो लौटते हैं, जहाँ की जमीन पर खून के दाग अभी धुले नहीं होंगे, जहाँ की हवाओं में बारूद की महक अभी गई नहीं होगी और धमाकों की आवाजें अभी भी कानों को सुन्न कर रही होंगी। अस्पतालों में चीख-पुकार मची ही होगी। चर्च और होटलें वीरान खंडहरों की शक्ल में सामने होंगे। वे खंडहर, जो मथुरा जैसे हिंदुस्तान के हजारों शहरों में मिट्टी की कई परतों में दफन हैं। हम यह मान लेते हैं कि यह कम्बख्त बौद्धों की ही करामात होगी। अगर ऐसा है तो 2,300 साल बाद कलिंग के अशोक ने एक बार फिर अस्त्र उठा लिए हैं! यह आज की अमनपसंद दुनिया के लिए नींद हराम करने वाली खबर है।

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छः पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com