विचार
क्यों किसान एचटीबीटी कपास उगाना चाहते हैं और क्या हैं व्यवधान

आशुचित्र- देश भर में एचटीबीटी कपास जैसी जीएम फसलों को लेकर पिछले दिनों में कुछ घटनाएँ हुई हैं, ऐसे में सरकार और किसान संगठनों की क्या मुद्रा है।

महाराष्ट्र शेतकारी संगठन, किसान संगठनों का समूह और कुछ गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीओ) के नेतृत्व में कपास किसानों ने देश के कुछ भागों में एचटीबीटी (हर्बिसाइड टॉलरेंट बैसिलस) कपास उगाने वालों का विरोध किया है।

रिपोर्ट कहती हैं कि भारतीय किसान संघ, जतन और जीएम-मुक्त फसलों के लिए गठबंधन संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि नरेंद्र मोदी सरकार एचटीबीटी कपास जैसी अनुवांशिक रूप से संशोधित (जेनेटिकली मॉडिफाइड) फसलों की अवैध खेती को नहीं रोकेगी तो देश भर में विरोध प्रदर्शन होगा। हिंदू बिज़नेसलाइन ने रिपोर्ट किया है कि महाराष्ट्र के किसानों ने संकल्प लिया है कि वे अपने द्वारा उगाई गई एचटीबीटी कपास फसलों को नष्ट नहीं करने देंगे।

ये सारी घटनाएँ लोगों को उत्सुक करती हैं कि देश में जीएम फसलों के लिए क्या हो रहा है। स्वराज्य  को प्राप्त जानकारियाँ रोचक हैं। जीएम फसलों पर विवाद तब पनपा जब हरियाणा के फतेहाबाद में इस वर्ष के मई में एक किसान को बीटी बैंगन उगाते हुए पाया गया।

केंद्र ने 2010 में बीटी बैंगन के व्यवसाय पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से पड़ोसी देश बांग्लादेश में यह उगाया जा रहा है। तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है कि जेनेटिकली मोडिफाइड बैंगन भारत में प्रवेश कर गया।

एक किसान संगठन के नेता के अनुसार हरियाणा के इस किसान को पता ही नहीं था कि वह ट्रांसजेनिक फसल उगा रहा है। उसने ये बीज इसलिए खरीदे क्योंकि उसे कहा गया था कि इस प्रजाति में कीटाणुओं का खतरा नहीं होता है। बैंगन की फसल में कीटाणुओं का खतरा होता है जो कई बार 35-40 प्रतिशत फसल को नष्ट कर देते हैं और आर्थिक नुकसान पहुँचाते हैं।

फतेहाबाद ने अच्छी गुणवत्ता वाले बैंगन पाए जिसने कुछ एनजीओ का ध्यान आकर्षित किया। इसके बाद जब उन्होंने उस किसान से संपर्क किया तो उसने भोलेपन के साथ उन्हें वे बीज दिखा दिए। एनजीओ ने उसके खेत को वैश्विक स्थिति प्रणाली (जीपीएस) में चिह्नित कर दिया और सरकारी अधिकारियों से शिकायत की। उसके खेत की फसल को नष्ट किया गया।

हरियाणा के सिरसा में कपास उगाने वाले किसान के खेत पर और रोचक घटना हुई। अधिकारियों ने 5 एकड़ भूमि पर उगाए जा रहे एचटीबीटी कपास को पकड़ा और किसान से कहा कि यह उगाना अवैध है और उसे चेतावनी दी। अधिकारियों ने उसे अपनी ही फसल को अपने ही ट्रैक्टर से नष्ट करने के लिए प्रेरित किया।

जब पड़ोसी किसानों ने उससे प्रश्न किया तो उसने बताया कि अधिकारियों के निर्देश पर उसने ऐसी किया। गुस्साए किसान जिला कृषि विभाग पहुँचे और अधिकारियों से प्रश्न किया कि उसकी फसल नष्ट क्यों करवाई गई।

पहले अधिकारियों ने इस बात को नकारा कि उन्होंने उसपर दबाव बनाया लेकिन जब किसानों ने उसके खेत पर अधिकारियों के आने का साक्ष्य प्रस्तुत कियातो वे मान गए। अंततः कृषि विभाग के अधिकारियों ने कपास किसान को 5 लाख रुपये का मुआवज़ा दिया। हरियाणा में कपास उगाई जा रही भूमि में से 3-4 प्रतिशत पर एचटीबीटी कपास उगाई जा रही है।

महाराष्ट्र में शेतकारी संगठन के सदस्यों ने एक किसान की सहायता के लिए पैसा इकट्ठा किया जिसकी आधा एकड़ भूमि पर उगाई गई एचटीबीटी कपास को सरकारी अधिकारियों ने नष्ट कर दिया था। संगठन सदस्यों ने प्रभावित किसान को 50,000 रुपये दिए।

पिछले वर्ष एक आधिकारिक अध्ययन में कहा गया था कि महाराष्ट्र में उगाई जा रही कपास में से 15 प्रतिशत एचटीबीटी कपास है। इस वर्ष एचटीबीटी कपास की खेती बढ़कर कम से कम 25 प्रतिशत हो गई है।

इस वर्ष एचटीबीटी कपास के 30 लाख अनाधिकारिक पैकेट बेचे गए हैं, जबकि पिछले वर्ष 21 लाख और 2017 में 35 लाख पैकेट बेचे गए थे। दूसरी ओर बोलगार्ड 2 के 48 लाख पैकेट बेचे गए हैं, जबकि पिछले वर्ष 47 लाख और 2017 में 40 लाख पैकेट बेचे गए थे। इस वर्ष कपास का क्षेत्र बढ़ेगा क्योंकि पिछले वर्ष कम उत्पादन के कारण इसके दाम अधिक थे।

किसान अचंभित हैं कि उन्हें अवेध रूप से एचटीबीटी कपास उगाने से क्यों रोका जा रहा है जबकि इसके बीजों का उत्पादन खुले आम गुजरात में हो रहा है और महाराष्ट्र में खरीदे जा रहे हैं। तेलंगाना में भी एचटीबीटी कपास के बीजों का मुक्त रूप से व्यापार हो रहा है।

महाराष्ट्र में जब कृषि विभाग के अधिकारियों ने किसानों को कहा था कि जंगली घास को नष्ट करने के लिए उपयोग किए जा रहे ग्लाइफोसेट से कैंसर होता है तो किसानों ने साक्ष्य या डाटा की माँग की। एचटीबीटी कपास में ग्लाइफोसेट रोधक जीन होता है जो इसे ग्लाइफोसेट के छिड़काव से बचाकर रखता है। किसानों ने कहा कि पिछले 30 वर्षों से दुनिया भर में ग्लाइफोसेट का उपयोग हो रहा है और कहीं कोई स्वास्थ्य समस्या सामने नहीं आई है।

दूसरी तरफ किसान एचटीबीटी कपास के समर्थक हैं क्योंकि यह उनका कृषि खर्च बचाती है। एचटीबीटी कपास के बीजों के व्यावसायिक विक्रय पर सरकार ने रोक लगाई है और 450 ग्राम का पैकेट 1,500 रुपेय में बेचा जाता है। यह बोलगार्ड 2 के अधिकतम दाम 740 रुपये से दोगुना है लेकिन फिर भी किसान इसे खरीद रहे हैं।

एक कपास किसान सिंचाई के द्वारा एक एकड़ की खेती पर 23,500 रुपये और वर्षा द्वारा सींचित भूमि पर 15,400 रुपये खर्च करता है। इसमें से सिंचाई वाले खेत की 25 प्रतिशत राशि और वर्षा द्वारा सींचित खेत की 20 प्रतिशत राशि जंगली गास हटाने में खर्च होती है जो कपास फसल के साथ उगती है और इसके विकास को प्रभावित करती है।

ग्लाइफोसेट जैसे कीटनाशक का उपयोग जंगली घास को नष्ट करने के लिए होता है लेकिन यह फसल को बी नुकसान पहुँचा सकता है। इसलिए किसान मशीन या हाथों द्वारा जंगली घास को हटाते हैं। एचटीबीटी कपास अपनाने से उनकी यह लागत बच जाती है। साथ ही मशीन या हाथों से सफाई में कई बार कपास के पौधे भी उखड़ जाते हैं।

उदाहरण स्वरूप, महाराष्ट्र के चंद्रापुर जिले में 80 से 90 प्रतिशत जंगली घास को हटाना अव्यवहार्य होता है। इसलिए इस जिले के कई किसानों ने एचटीबीटी कपास की ओर रुख किया है। किसानों का यह बी कहना है कि इस फसल प्रकार को बंजर भूमि पर उगाना भी संभव है।

किसान यह भी कहते हैं कि उन्हें अपने खेत पर प्रतिदिन श्रम के लिए 300 रुपये देने होते हैं। इसके अलावा श्रमिकों को चाय और भोजन देने में भी खर्चा होता है। अब किसान इस व्यय को उठाने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं। यह उन्हें नैसर्गिक रूप से एचटीबीटी कपास की ओर ले जा रहा है।

पंजाब और हरियाणा में किसान माँग करने लगे हैं कि उन्हें बीटी बैंगन उगाने दी जाए क्योंकि यह कीट-रोधक है। इससे लाभ भी कथित रूप से अधिक होता है।

भारतीय बीज उद्योग संघ के महानिदेशक राम कौंडिन्य के अनुसार पारंपरिक रूप से किसान हाथों से ही जंगली घास निकालते हैं। लेकिन अब आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के किसान ग्लाइफोसेट को लाभकारी मान रहे हैं। जंगली घास से बचने के लिए वे एचटीबीटी कपास बीजों के लिए अधिक मूल्य देने को भी तैयार हैं।

“यह माँग और बेहतर तकनीक की आवश्यकता को दर्शाता है। बीज उत्पादक इससे लाभ कमा रहे हैं लेकिन उन्हें नियंत्रित करने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की गई है।”, कौडिन्य ने स्वराज्य को बताया। आंध्र प्रदेश में 13 बीज कंपनियों के विरुद्ध अनाधिकारिक बीज उपजाने के लिए मामला दर्ज हुआ था लेकिन इस कार्रवाई में कोई प्रगति नहीं हुई।

“यदि सरकार एचटीबीटी कपास या बीटी बैंगन की उपज को रोकना चाहती है तो इसे बीज उत्पादन छोर से काम शुरू करना होगा। यह करना आसान भी है क्योंकि इसके कुछ ही उत्पादक हैं।”, उन्होंने कहा।

एचटीबीटी कपास उगाने की माँग पर महाराष्ट्र के अकोला में किसानों का प्रदर्शन

जो किसान जीएम फसल उगाना चाहते हैं, उन्होंने मोदी सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों के समक्ष अपना पक्ष रखा है। एक वरिष्ठ मंत्री ने कहा है कि वे चाहते हैं कि किसानों तक बेहतर और आधुनिक तकनीक पहुँचे। लेकिन इसके हाथ सर्वोच्च न्यायालय के कारण बंधे हुए हैं।

किसानों का कहना है कि शीर्ष न्यायालय द्वारा नियुक्त तकनीकि समिति ने कहा था कि जीएम फसलों पर लगातार ट्रायल होने चाहिए लेकिन तकनीकि समिति के सुझावों को नहीं माना गया। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को लटका दिया है और सरकार को किसानों के हित में कार्य करना चाहिए।

वर्तमान में यह मुद्दा अधर में है और इसके समाधान हेतु सभी की निगाहें केंद्र पर टिकी हैं।

एमआर सुब्रमणि स्वराज्य के कार्यकारी संपादक हैं। वे @mrsubramani द्वारा ट्वीट करते हैं।