विचार
अभिव्यक्ति की आज़ादी – ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और कांग्रेस

आशुचित्र- आज जब अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रश्न उठते हैं, तो इतिहास को देखना उचित है।

व्यक्ति और सत्ता के मध्य संवाद के माध्यम समय के साथ बदलते रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद का समय देखें तो हमें स्पष्ट परिवर्तन के पड़ाव दिखते हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों पर लगा राजद्रोह का मामला देखें तो हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उठाए गए प्रश्न इसी परिप्रेक्ष्य में देखने चाहिए। सत्ता की चाबुक जब स्वतंत्र विचार की पीठ पर गिरती है तो समसामयिक माध्यमों पर ही प्रहार करती है। आज जब अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रश्न उठते हैं, तो इतिहास को देखना उचित है। हमारे आधुनिक वैयक्तिक स्वतंत्रता के प्रखर नायकों का अपना क्या इतिहास रहा है, देखना आवश्यक है।

आज़ादी के तुरंत बाद, सबसे पहला दौर था समाचार पत्रों और मुखपत्रों का। औपनिवेशिक काल में कठोर ब्रिटिश राजशाही में उचित ही था कि सरकार विरोधी वाणी परोक्ष हो, संस्थागत हो, व्यक्तिगत ना हो। समय-समय पर इन मुखपत्रों पर प्रतिबंध लगते थे, संपादक जेलों में डाले जाते थे। स्वतंत्रता के बाद लगा कि अब ऐसे कठोर नियमों की आवश्यकता न रहेगी। किंतु प्रारंभिक दिनों में ही इसकी क़लई खुल गई, जब नए रायबहादुर पुराने लाट साहबों के सिंहासन पर बैठ गए। संभवत: पंडित नेहरू का निर्वाचित ना होकर चयनित होना असुरक्षा का कारण हो सकता है, या एक अभिजात्य सोच होगी जिसमें नव-गठित राष्ट्र को निजी ज़मींदारी मान कर चला जा रहा हो। जिस प्रकार नेहरू पहले 14 वर्षों के निर्बाध शासन में राजदूत के नाते बहन विजयलक्ष्मी पंडित से लेकर फ़ौजी सौदों में घोटालों में उलझे, लंदन में इंदिरा के स्थानीय अभिभावक और मित्र रहे वीके मेनन को रक्षा मंत्री नियुक्त किया, उससे तो यही दिखता है। पंडित नेहरू को संविधान संरक्षक और लोकतंत्र के देवरूप में स्थापित करने का एक उद्योग-सा चल पड़ा है। शायद अपने प्रसिद्ध भाषण “ग्रामर ऑफ़ अनार्की” (अराजकता का व्याकरण) में डॉ अंबेडकर ने नेताओं के इसी दासत्व-पूर्ण महिमामंडन से सावधान करने का प्रयास किया था। अपने 14 वर्ष के शासन काल में नेहरू ने मनचाही नियुक्तियाँ की, उद्योग बाँटे, सरकारें गिराई, संविधान मे 17 संशोधन किए। आज संविधान की रक्षा के नाम पर बड़ा शोर होता है। नेहरू ने 1951 में संसद में कहा था, “यदि हम संविधान को पवित्र, अकाट्य और अपरिवर्तनीय बना देंगे तो यह उसकी हत्या के समरूप होगा।

व्यक्तिगत विचारधारा को अलग रखकर संविधान को जो लचीलापन डॉ. अंबेडकर ने दिया (अंबेडकर की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ शब्द नहीं था, जिसे बाद मे इंदिरा ने घुसाया था), उसी लचीलेपन को लेकर नेहरू ने ऐसे परिवर्तन किए जिसकी नींव पर बाद में इंदिरा ने एक तानाशाह सत्ता को खड़ा करने का प्रयास किया।

अभिव्यक्ति की आज़ादी पर देखें तो संविधान बनने के डेढ़ वर्ष के भीतर ही पहला संशोधन लाया गया, जिसने अभिव्यक्ति की निर्बाध स्वतंत्रता को नियमबद्ध किया। पहले संशोधन में नेहरू 31बी लाए, जिसमें नवाँ शेड्यूल गूँथा था। प्रावधान यह था कि नवें शेड्यूल के अंदर प्रस्तावित होने वाले कानून न्यायिक समीक्षा और संविधान की पकड़ के बाहर रखे गए। नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा लाए गए भूमि अधिग्रहण बिल का विरोध करने वाले राहुल गांधी के प्रपितामह आदरणीय नेहरू जी इसी के अंदर भूमि अधिग्रहण का शासकीय अधिकार लेकर आए जिसके अनुसार मूलभूत अधिकारों के विरोध में भी होने वाले शासकीय भू अधिग्रहण पर भी न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता। प्रथम संशोधन को न्यायपालिका एवं संविधान से ऊपर रखने की इस कांग्रेसी कवायद का रुचिकर पहलू यह भी था कि जिस सांसद ने मूलभूत अधिकारों पर इस संशोधन का चाबुक चलाया वे स्वयं एक अंतरिम सांसद थीं एवं स्वतंत्र भारत के संविधानों के मूलभूत अधिकारों में ऐसा दखल अपने आप में विवादास्पद था।

और भी रोचक यह था कि इस संशोधन के पीछे सामाजिक अव्ययवस्था, अशांति और हिंसा का भय नहीं था, वरन नेहरू जी का श्यामा प्रसाद मुखर्जी के अखंड भारत के विचार के प्रति खिन्नता और असहिष्णुता थी। एक अभिजात्य शासक की भाँति उन्होंने सरदार पटेल को डॉ मुखर्जी को चुप कराने का आदेश दिया और गृह मंत्री सरदार पटेल ने संविधान के मूलभूत सिद्धांतों और निहित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वास्ता देते हुए ऐसा करने में असमर्थता प्रकट की। नेहरू ने इसका उत्तर संविधान के प्रथम संशोधन में ढूंढा। नेहरू का तर्क था कि भारत में किसी विदेशी नेता पर कही बात से युद्ध की संभावना हो सकती थी और भारत की संप्रभुता खतरे में जा सकती थी। ऐसे विचित्र तर्कों के माध्यम से स्वतंत्र राष्ट्र ने अपने राष्ट्र के नागरिकों से अंतर्राष्ट्रीय मसलों पर बोलने का अधिकार छीन लिया। भला हुआ कि जब राहुल गांधी दोकलाम और फ्रांस-भारत संबंधों पर कुतर्क और तथ्यहीन प्रश्न उठाते हैं, उनके सामने प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नेहरू न हुए।

न्यायपालिका से इस संशोधन के अंतर्गत छीने गए विवेचना के अधिकार पर पत्रकारों द्वारा संवैधानिक नैतिकता के नायक बनाए गए नेहरू का कहना था कि चूँकि निवर्तमान न्यायपालिका ब्रिटिश सरकार की देन थी, वह इस योग्य ही नहीं थी कि राष्ट्रनेता के विचारों पर प्रश्न उठा सके। इंदिरा गांधी के दबाव में बंदी प्रत्यक्षीकरण के मूलभूत नियम को जब जस्टिस एचआर खन्ना के विचार को खारिज करके नकारा गया था, उसके बीज इसी काल में पड़ गए थे। इसका सबसे प्रखर विरोध कम्युनिस्ट नेता सोमनाथ लाहिरी और डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी से मिला।

डॉ मुखर्जी के पाकिस्तान विरोध के अलावा इस संशोधन के पीछे उन दिनों नेहरू सरकार के विरोधी विचारों को सेंसर करने के प्रयासों की न्यायलय में विफलता थी। इसमें प्रमुख मामले रोमेश थापर के प्रकाशन कम्युनिस्ट मुखपत्र क्रॉसरोड्स  और संघ के मुखपत्र ऑर्गेनाइज़र  को बंद कराने में नेहरू सरकार की विफलता थी।

प्रथम संशोधन से पहले नेहरू जी ने 1947 में कम्युनिस्ट पार्टी पर प्रतिबंध लगाया और 29 वर्ष के शायर मज़रूह सुल्तानपुरी को दो वर्ष के लिए जेल भेजा। लोकतांत्रिक मूल्यों के बहु-प्रचारित देव, कांग्रेस के पंडित नेहरू अभिव्यक्ति की आज़ादी पर रोक लगाने आए तो उनके सामने भारतीय जन संघ के संस्थापक डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी थे। उन्होंने 19 मई 1951 को नेहरू से पूछा कि क्या नेहरू समझते हैं कि भारतीय जनता इतनी अपरिपक्व है कि उस पर वैचारिक स्वतंत्रता के लिए विश्वास नहीं किया जा सकता है। डॉ मुखर्जी का मानना था कि अभिव्यक्ति स्वतंत्र राष्ट्र के नागरिकों का अनिर्बंधित अधिकार है। बिल 14 मतों के विरोध के साथ पास हुआ। इस संशोधन के साथ अभिव्यक्ति की आज़ादी के साथ-साथ संपत्ति के अधिकार पर भी प्रतिबंध लग गया।

प्रश्न यह नहीं है कि अभिव्यक्ति के अधिकार पर “उचित” प्रतिबंध होने चाहिए या नहीं, यक्ष प्रश्न यह है कि क्या एक राष्ट्र के नागरिकों का अपने नायकों को यथार्थ के प्रकाश में देखने का अधिकार है? क्या यह उचित है कि राजनीतिक प्रतिबद्धता बुद्धिजीवियों को मिथ्याभाषी बनाए और राहुल गांधी जैसे अल्प-ज्ञानी नेताओं को मिथ्या-भाषण का अधिकार दे। हमें अपने इतिहास को उसकी सुंदरता और कुटिलता के साथ जानना चाहिए। व्यक्ति को देवत्व देकर कैसे प्रश्नों से मुक्त रखा गया है, विचार का विषय है। जब सत्ता-सरकार का संवाद सड़क पर उतरा तो आपातकाल लगा, जब शासन लोगों के घरों में झाँकने को उतरा तो राजीव गांधी के नेतृत्व में वही दल पोस्टल बिल लेकर आया, जो शासन को लोगों के पत्र पढ़ने का तानाशाही अधिकार देता था, और सोनिया गांधी के नेतृत्व में वही दल 66ए लेकर आया जब सार्वजानिक बहस सोशल मीडिया के पटल पर उतरी और बुद्धिजीवी ज़मींदारी का लोकतांत्रीकरण होने लगा। समय-समय पर जो लोग स्वस्थ और उन्मुक्त संवाद पर रोक लगाते रहे हों, उनके अतीत को ढँक देना खुद के साथ वैचारिक बेईमानी है और यह राष्ट्र को बेहतर होने से रोकती है। सब कुछ बदला नहीं जा सकता किंतु यदि स्पष्टता से सत्य का सामना न किया जाए तो कुछ भी बदला नहीं जा सकता। चापलूस चुप्पी एक विचारधारा को पीढ़ी दर पीढ़ी लोकतंत्र के पंख काटने का साहस देती रही है और सच से मुँह मोड़ कर हम अपने भविष्य से मुँह मोड़ेंगे।

अभिव्यक्ति की आज़ादी कठिन विषय है। एक समाज और एक स्वशासित, स्वतंत्र और लोकतांत्रिक राष्ट्र के विनाश का प्रयास अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य नहीं है। हालाँकि एक विश्वविद्यालय के प्रौढ़प्राय सीमित छात्रों की बकवास से बड़े अपराधी नेता एवं बुद्धिजीवी वर्ग है जो अपनी ज़मींदारी की रक्षा के प्रयास में उन्हें नैतिक और बौद्धिक स्वीकार्यता प्रदान करता है। जिस राष्ट्र में उचित शंकाओं और मतभेदों के समाधान के लिए समुचित व्यवस्थाएँ उपलब्ध हैं, वहाँ बंदूक से आज़ादी पाने की वकालत हर उस आदमी के लिए भय का कारण है जिसके पास न अस्त्र हैं न वाणिज्यिक औक़ात और न ही राजनीतिक शक्ति। लोकतंत्र में सत्ता का उत्तरदायित्व पंक्ति के अंत में खड़े उसी व्यक्ति की रक्षा करना है।