विचार
फ्री अवर टेम्पल्सः जहाँ हम राम मंदिर पर फैसले की प्रतीक्षा में हैं, वहीं एक दूसरा भव्य मंदिर भी है जो तलाश रहा है अपना अस्तित्व

प्रसंग
  • अयोध्या की तरह ही मध्य प्रदेश में विदिशा भी भव्य विजय मंदिर के उद्धार के लिए जूझ रहा है। चूंकि यह कोई चुनावी मुद्दा नहीं है, तो क्या इस पर उतना ध्यान दिया जाएगा जितने का यह अधिकारी है?

राम जन्मभूमि की धरती पर कानूनी विवाद जल्द सुलझाए जाने की संभावना नहीं है। कम से कम सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही तो यही बताती है। केंद्र में सरकार न्यायपालिका का स्थान लेते हुए मंदिर के निर्माण के लिए मार्ग प्रशस्त करने के लिए संसद में एक अध्यादेश या बिल पारित करने के लिए प्रतिबद्ध नहीं हो रही है। यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले के इंतजार में है जो फैसले के लिए इसे तारीख पर तारीख दिये जा रहा है। रामलला को भविष्य में तब तक एक तिरपाल के नीचे रहना होगा।

आज भी भारत में अयोध्या जैसे अनेक स्थान हैं जहाँ इस्लामिक आक्रमणकारियों द्वारा बड़े-बड़े मंदिर ध्वस्त कर दिए गए और मस्जिदों में परिवर्तित कर दिए गए। ऐसा ही एक शहर विदिशा है। यह पारंपरिक रूप से विजय मंदिर था जो अब आधिकारिक तौर पर बीजा मंडल मस्जिद के रूप में जाना जाता है – जिसकी पहचान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा की गई है। मंदिर के किनारे प्रवेश द्वार पर लगे हुए लोहे के बोर्ड में भी यही लिखा हुआ है। हालांकि, मंदिर के बाहर, मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा स्थापित एक पत्थर के बोर्ड में भी इसका उल्लेख विजय मंदिर के रूप में किया है।

मंदिर के प्रवेश द्वार पर एएसआई बोर्ड

 

मंदिर के बाहर मध्य प्रदेश पर्यटन का बोर्ड

मंदिर कई बार ध्वस्त किया गया। इसे इल्तुतमिश द्वारा, अलाउद्दीन खिलजी के निर्देशानुसार मलिक कुफर द्वारा, मालवा के महमूद खिलजी द्वारा और गुजरात के बहादुरशाह द्वारा ध्वस्त किया गया लेकिन हर बार यह पुनर्निर्मित किया गया। अंत में 1682 में, औरंगजेब के शासनकाल में मंदिर के ऊपरी हिस्से को ढहाकर मंदिर के खंडहरों से खंभे, प्लास्टर और चौखटों का उपयोग करके चबूतरे पर एक मस्जिद का निर्माण किया गया था। मस्जिद 300 से अधिक वर्षों तक वहाँ कायम रही जब तक कि 1992 में भगवान इन्द्र का प्रकोप उस पर नहीं बरसा। उस वर्ष भारी बारिश हुई जिससे मस्जिद ढह गई और उसके नीचे प्राचीन मंदिर के खंडहरों का खुलासा हुआ- उसके कुछ ही महीनों बाद कारसेवकों ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस कर दिया था। एक छोटे से कमरे में कार्यरत मस्जिद अब भी मंदिर परिसर के एक कोने में स्थित है।

मंदिर परिसर के कोने में एक छोटा सा ईदगाह

अयोध्या की तरह, विदिशा शहर भी व्याकुलतापूर्वक अपना विजय मंदिर पुनः पाने का इंतजार कर रहा है। यह स्थल 1951 में एएसआई की देखरेख में आया था जब लोग मांग कर रहे थे कि इसे स्थानीय हिंदू समुदाय को लौटा दिया जाए। कई अवसरों पर इसे मुक्त कराने के लिए हिंदू कार्यकर्ताओं द्वारा दशकों तक चलने वाले संघर्ष और अदालतों की गिरफ्तारी के बावजूद भी कोई लाभ नहीं मिला। उन्हें छोटी-छोटी जीतें हासिल हुई हैं। स्थानीय लोग नागपंचमी पर हर साल इसके चबूतरे पर पूजा करते हैं। इस त्यौहार के दिन विजय मंदिर परिसर में एक मेले और दंगल का आयोजन किया जाता है। समुदाय को विशेष अनुमति लेनी होती है और लोहे के जाल के पीछे मुख्य स्थान के अंदर मूर्तियाँ बंद रहती हैं तथा समुदाय को केवल खुले में ही पूजा करने की अनुमति होती है।

मंदिर की समतल भूमि जहाँ भक्त प्रार्थना करते हैं। मुख्य द्वार बंद रहता है।

जाहिर है कि बात यहीं ख़त्म नहीं हो गई। पिछले साल नागपंचमी त्योहार के बाद विजय मंदिर को मुक्त करने के आंदोलन ने गति प्राप्त की जब विदिशा से विधानसभा सदस्य, कल्याणसिंह डांगी ने आश्वासन दिया कि वह अपने कार्यकाल में ताले खुलवाने की कोशिश करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस बार, विदिशा से विधायकी का टिकट मुकेश टंडन को दिया गया है। वह विजय मंदिर मुक्ति और पुनर्निर्माण समिति (मंदिर को मुक्त कराने और पुनर्निर्माण के लिए एक समिति) के अध्यक्ष हैं और पिछले साल उन्होंने बताया था कि वह जल्द ही ताले खुलवाने की कोशिश करेंगे। टंडन ने एएसआई से इसकी भी मांग की थी कि इसका नाम आधिकारिक रिकार्ड में बीजा मंडल मस्जिद से बदलकर विजय मंदिर कर दिया जाए।

मंदिर में एक छोटा सा पत्थर का चबूतरा

इस साल की शुरुआत में, 15 जनवरी के दिन सैकड़ों विदिशा निवासी किला अंदर क्षेत्र में एकत्र हुए जहां विजय मंदिर स्थित है। वे कुछ पुजारियों और हिंदुत्व कार्यकर्ताओं के साथ मंदिर परिसर के अंदर पहुंचे और ताले तोड़ने और प्रार्थना करने का निश्चय किया। एक दिन पहले, वे मुख्य परिसर को खोलने के लिए एएसआई के अधिकारी और जिला न्यायाधीश से उन्हें राजी करने के प्रयास में मिले थे। एएसआई के अधिकारी ने स्पष्ट किया था कि ऐसा नहीं किया जा सकता क्योंकि यह ऐसा मंदिर था जिसका वजूद खत्म हो गया है। राज्य सरकार, जो इस बात से अवगत थी कि उस समय आवेश जोरों पर था, ने भवन-समूह को एक किले में बदल दिया। उस समय जल्द ही दंगा होने की स्थिति बन रही थी। लेकिन भक्तों ने अस्सी वर्षीय नन्दकिशोर शास्त्री की बात पर अपने कदम पीछे खींच लिए थे। कॉलेज के ये पूर्व प्रधानाचार्य बताते हैं, “पुलिस अधिकारियों ने मुझे धन्यवाद दिया। मैंने उनसे कहा कि मैं कोई उनका समर्थन नहीं कर रहा था बल्कि केवल अपने बच्चों का जीवन बचा रहा था।”

तब से यह मामला शांतिपूर्ण प्रतीत होता है।

विजय मंदिर के एक माली-सह-सफाईकर्मी कहते हैं, “इस मंदिर के खुलने से किसी को क्या मिलेगा? क्या इसके अलावा पर्याप्त मंदिर नहीं हैं? एक और मंदिर की क्या आवश्यकता है? जितने ज्यादा भक्त आएंगे यह उतना ही ज्यादा गंदा हो जाएगा?” हालांकि अधिकांश लोगों का ऐसा विचार नहीं हैं, लेकिन मंदिरों के प्रति इस तरह का एक दृष्टिकोण उत्तर भारतीय हिंदुओं के बीच काफी व्यापक है। शायद, इस तरह की अज्ञानता इस तथ्य से उत्पन्न होती है कि लोकप्रिय कल्पनाशक्ति में एक हिंदू मंदिर पारिस्थितिक तंत्र की उपयोगिता की कोई स्मृति अतीत में दबा दी गई हो।

मंदिर के चबूतरे तक पहुँचाने वाली सीढ़ियाँ

मुसलमान चाहते हैं कि स्थिति ऐसी ही बनी रहे। हिंदू चाहते हैं कि स्मारक पूजा के लिए खोला जाए। मोहम्मद सईद, जो कि किला अंदर क्षेत्र में एक फेरीवाले हैं, कहते हैं, “यह एएसआई द्वारा सुरक्षित है। कोई परेशानी की बात नहीं है। इसे पूजा के लिए खोले जाने की कोई व्यापक मांग नहीं है। केवल कुछ लोग हर साल आवाज उठाते हैं।” उनके पड़ोसी राजकुमार मोरे उनसे असहमत हैं। वह सवाल करते हैं, “यह तो सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि यहां पर एक भव्य मंदिर था। क्या हर कोई इसे देख नहीं सकता? यहां तक कि खंडहर भी बहुत विशाल हैं। सरकार को अब भी मंदिर के आस-पास के इलाके में यदा-कदा कुछ मूर्ति या पत्थर मिलते रहते हैं। इसे पुनर्निर्मित क्यों नहीं किया जाना चाहिए?”

कहा जाता है कि मूल विजय मंदिर का विस्तार बहुत दूर तक है, इसका परिसर लगभग 800 मीटर लम्बा है और लगभग 300 मीटर ऊंचाई पर स्थापित कलश दूर से दिखाई देता था। अगर यह सत्य है तो यह मंदिर भोजपुर के भोजेश्वर मंदिर से भी विशाल होगा जो विदिशा से दो घंटे की दूरी पर है और यह विजय मंदिर के समय में बना हुआ है जिसे परमार वंशीय राजाओं के शासनकाल के दौरान ग्यारहवीं शताब्दी में बनवाया गया था। अभी भी एक स्तंभ खड़ा है जिस पर नरवर्मन का शिलालेख है जिन्होंने 1094 से 1133 ईस्वी तक मालवा पर शासन किया था।

नरवर्मन के शिलालेख के साथ विजय मंदिर में स्तंभ (इमेज स्रोत: विकिपीडिया)

विजय मंदिर के परिसर में, एक सुन्दर बावली (सीढ़ियों वाला कुआँ) है जो एक बड़े गोलाकार कुएं की ओर जाती है जहां हमेशा पानी उपलब्ध रहता है। बावड़ी के सामने दो खंभों पर कृष्ण लीला के दृश्यों की नक्काशी है। ये आठवीं शताब्दी में बनवाए गए थे।

कृष्ण लीला के दृश्यों के साथ बावली के स्तंभ। एक गोलाकार कुएं की ओर जाती हुईं सीढियाँ

परिसर के एक कोने में, एएसआई ने एक छोटा सा भंडारकक्ष बनाया है लेकिन अधिकांश मूर्तियाँ मुख्य मंदिर मंच के आस-पास बाहर लेकिन अच्छी तरह से रखी गई हैं। कुछ का “रचनात्मक रूप से” फूल के गमलों के रूप में उपयोग किया गया है। उत्खनन में पाई गई कीर्तिमुख इस तरह की एक प्रतिमा है। कीर्तिमुख, एक तेजस्वी चेहरा जो स्वयं को खा रहा है, आमतौर पर शिव मंदिरों में पाई जाने वाली एक विशेषता है।

कीर्तिमुख

मंदिर में राजा नरवर्मन का शिलालेख देवी चर्चिका के सम्मान के लिए समर्पित है। मंदिर स्वयं सूर्य देवता, भिल्लास्वामिन को समर्पित था। इसी कारण से, विदिशा को भिलसा के नाम से भी जाना जाने लगा। यह केवल तभी यथोचित होगा जब इस शहर के लोगों को अपना मंदिर और भगवान वापस मिल जाएं। लेकिन क्या यह समृद्ध विरासत समुदाय को सौंप दी जाएगी। क्या इसे फिर से एक जीते जागते मंदिर में बदलने की अनुमति मिलेगी?

संजय पुरोहित, विदिशा के प्रसिद्ध चरण तीर्थ मंदिर के एक पुजारी और मध्य प्रदेश क्रांति पुजारी महासभा के प्रमुख, ने स्वराज्य को बताया कि अब मामला ठंडे बस्ते में है। उन्होंने कहा, “अब विजय मंदिर मुक्ति समिति के अध्यक्ष मुकेश टंडन स्वयं विदिशा से विधानसभा चुनाव के उम्मीदवार हैं। यहां तक कि कई कांग्रेस नेता मंदिर का समर्थन करते हैं, हालांकि वह स्वयं को कांग्रेसी नहीं बल्कि एक धर्मनिष्ठ हिंदू मानकर ऐसा कर सकते हैं। देखते हैं कि अगले वर्ष कुछ होता है या नहीं। वर्तमान में कोई भी इसके बारे में बात नहीं कर रहा है और यह कोई चुनावी मुद्दा नहीं है।”

प्लेटफॉर्म

विदिशा के एक स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ता ने स्वराज्य को बताया, “भाजपा नेता ऐसा चाहते हैं लेकिन वे इस पर अधिक जोर नहीं देंगे क्योंकि यह एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ उन्हें मुस्लिम वोट का एक बड़ा हिस्सा प्राप्त होता है। विदिशा में हाल के वर्षों में जीत का अंतर कम ही रहा है। पार्टी एक ऐसे मुद्दे पर मुस्लिमों का विरोध नहीं करना चाहती है, जिस मुद्दे का मतदाताओं के बीच ज्यादा प्रभाव नहीं है।”

प्रोफेसर नंदकिशोर ने सवाल उठाया, “इससे पहले भाजपाई कहते थे कि जब उनकी सरकार आएगी तो हम इसे बनवाएंगे। जब राज्य में उनकी सरकार बनी तो उन्होंने कहना शुरू किया कि केंद्र में तो कांग्रेस की सरकार है। वे सहमत नहीं हैं। 2014 में केन्द्र में भाजपा की सरकार बनी। तब उन्होंने कहा, कांग्रेस नगर पालिका पर शासन कर रही है। यहां भी भाजपा जीती। अब क्या बहाना है? क्या यह तब किया जाएगा जब भाजपा पूरी दुनिया पर शासन करना शुरू कर देगी?” उन्होंने आगे कहा, “मेरी उम्र 83 वर्ष है। हमने आंदोलन किए और दशकों से संघर्ष कर रहे हैं। अब भगवान से एकमात्र प्रार्थना है कि मेरे मरने से पहले मंदिर हिंदुओं को वापस मिल जाए।”

अरिहन्त स्वराज्य के डिजिटल कंटेंट मैनेजर हैं।