विचार
भड़का हुआ मुसलमान- नकली नेताओं को नहीं, आरिफ मोहम्मद जैसों को सुनने का समय

आशुचित्र- मुसलमान पहले वोट बैंक बनाकर साठ साल तक इस्तेमाल किए गए। ऐसा करने वाले तब सत्ता में मजे ले रहे थे। अब उन्हें संख्या का पशुबल बनाकर सड़कों पर उतार दिया गया है। ऐसा करने वाले अब सत्ता से बेदखल हैं। मुसलमानों को अपनी इस हालत को लेकर भड़कना इन पर चाहिए। लेकिन वे अब भी उनके हाथों इस्तेमाल हो रहे हैं।

कुत्ता, कमीना, नालायक, सुअर, हरामखोर, गद्दार, बीजेपी का दलाल, आरएसएस का दलाल, दो कौड़ी का आदमी, अपनी औकात पर आ गया… और ऐसी अनगिनत अशोभनीय और आपत्तिजनक गालियाँ। कई ऐसी भी जिन्हें लिखा नहीं जा सकता, जिन्हें पढ़कर किसी भी सभ्य आदमी का सिर शर्म से झुक जाए।

ये गालियाँ किसी बदनाम गली के मवाली नहीं दे रहे हैं और न ही किसी सस्ते शराबखाने में बैठे शराबियों के मुँह से बह रहीं। ये अपशब्द किन्हीं दो पक्षों के झगड़े में एक दूसरे को भी पेश नहीं किए जा रहे। यह किसी जेल की बैरक में उलझ गए अपराधियों के बीच की बेहूदा बकबास भी नहीं है।

अपशब्दों का यह झरना इंडिया न्यूज चैनल पर रजत शर्मा के मशहूर शो आपकी अदालत में आए आरिफ मोहम्मद खान की शान में तब मोबाइल की स्क्रीन पर बहता देखा, जब वे अपनी बात कह रहे हैं। कुछ पढ़कर सुना रहे हैं। मसला नागरिकता संशोधन कानून का है।

रजत उनसे सवाल कर रहे हैं। आरिफ मोहम्मद खान हरेक सवाल के तर्कसंगत और तथ्यपूर्ण जवाब दे रहे हैं। तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। स्क्रीन पर सब पढ़ रहे हैं। एक किस्म की जंग छिड़ी हुई है। हिंदू, जैन, सिख या बौद्ध दर्शक आरिफ साहब के पक्ष में हैं और 99.99 फीसदी अपशब्द मुस्लिम दर्शकों की तरफ से आ रहे हैं।

यह हो क्या रहा है। ये मुस्लिम दर्शक किसी तंग गली में रहने वाले मेहनतकश मुसलमान नहीं हैं, जो पंचर जोड़ते हैं, जो कसाईघरों में काम करते हैं, गाड़ी-रिक्शे चलाते हैं, कपड़े सिलते हैं, कूड़ा-कबाड़ बेचते हैं, मदरसों में पढ़ने-पढ़ाने वाले गरीब तबके के भी नहीं हैं।

ये दर्शक स्मार्टफोन उपभोक्ता हैं। कॉलेज-यूनिवर्सिटी के विद्यार्थी हैं। नई-नई नौकरियों में आए जोशीले युवा हैं। वे हर पेशे में अच्छी कमाई करने वाले खाते-पीते मध्यमवर्गीय समाज से हैं, जो सोशल मीडिया के हरेक प्लेटफार्म पर भी बराबर चौकस हैं। वे टि्वटर पर हैं। फेसबुक पर हैं। इंस्टाग्राम पर हैं।

पूर्व केंद्रीय मंत्री, कई बार के सांसद और अभी केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के प्रति मुस्लिम समाज के पढ़े-लिखे तबके की यह राय काबिले-गौर है। जबकि आरिफ साहब देश के समकालीन मुस्लिम नेताओं में अकेले ऐसे हैं, जो घिसी-पिटी लीक से हटकर हैं। वे तर्कपूर्ण ढंग से बिना किसी लागलपेट के सच को सच और झूठ को झूठ कहने में गुरेज नहीं करते।

अगर शाहबानो केस में सरकार गलत कदम उठा रही है तो वे इस्तीफा जेब में रखकर चलने वाले हिम्मतवर नेता हैं। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को उलटने की कोशिश में उन्हें अपनी ही सरकार की कोई समझदारी नज़र आना तो दूर, वे उसे एक खतरनाक कदम मानकर गुस्सा करने का साहस दिखाने वाले नेता हैं। उनकी दूरदृष्टि उस फैसले में मुसलमानों का कोई हित नहीं देखती।

किसी इलाके से जीतकर संसद में पहुँचने के बाद हम उन्हें एक मुस्लिम नेता के रूप में स्थापित होता नहीं देखते। वे कहते हैं कि उन्हें वोट देने वालों में हिंदू भी हैं, जैन भी, बौद्ध भी। वे कैसे दिल्ली आकर खुद को मुसलमानों का नेता कह सकते हैं। क्या यह उन वोटरों के साथ धोखा नहीं होगा, जो मुसलमान नहीं हैं और जिन्होंने उन्हें वोट दिए?

कितने नेता ऐसा सोचते हैं? वे वोट सबके लेते हैं और मखमली टोपी और शेरवानी पहनकर मूूँछ कटी दाढ़ी वाली नेतागिरी के स्तर पर उतारू होने में ज़रा भी शर्म नहीं करते। वे बेशर्मी से मुसलमानों के नेता बन जाते हैं। वे ज़हर उगलते हैं। भड़काऊ बयान देते हैं। क्या मज़ाक है कि आम मुसलमान उनमें अपना रहनुमा देखने लगते हैं।

हर पार्टी की दुकान के शोकेस में, हर राज्य में ऐसे नकली नेता सजे हैं, जो सेक्युलर कलेवर में अपनी ही कौम को एक भ्रम में बनाए रखने में खुद कामयाब रहे हैं। लेकिन कौम कहाँ पड़ी है, यह सबके सामने हैं। कौम इन नेताओं पर कभी नहीं भड़कती। वे रामपुर में हों या हैदराबाद में या श्रीनगर में। सबकी सियासत 70 सालों से चमकती रही है। कई आए। कई गए। मुसलमान इन पर शायद ही कहीं और शायद ही कभी भड़के हों। वे जोश-खरोश से इनके पीछे हैं। जैसे ये नेता नहीं फरिश्ते हों। इस्लाम के असली रहनुमा।

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को आज भी मुसलमानों की बदहाली के एक प्रामाणिक दस्तावेज की शक्ल में पेश किया जाता है। अशिक्षा, बेरोजगारी, सेहत, पिछड़ेपन, बाल मजदूरी और दोयम दरजे के रहन-सहन पर न आम मुसलमान कभी भड़कते और न ही खास पढ़े-लिखे, अच्छी-खासी कमाई में लगे युवा मुसलमानों को कभी गुस्सा आता।

लेकिन आरिफ मोहम्मद खान जैसे सुलझे हुए सच कहने वाले नेता के लिए उनके पास गालियों की कमी नहीं है। वे केके मोहम्मद जैसे विषय विशेषज्ञ को भी लतियाने से नहीं चूकते, जिन्होंने एक पुरातत्वशास्त्री के रूप में अयोध्या की जमीन के भीतर दफन सच को सच की तरह सामने रखा। तारेक फतह जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि के पढ़े-लिखे और किसी भी भारतीय मुसलमान से ज्यादा इस्लाम की पैनी समझ रखने वाले दानिशमंद तो उन्हें फूटी आँखों नहीं सुहा रहे।

कमाल तो यह है कि मुसलमान मर्दों से ज्यादा औरतें इन दिनों भड़की हुई हैं। शाहीनबाग से लेकर हर कहीं परदानशीं फ्रंट पर हैं। नागरिकता संशोधन कानून पर बौखलाहट से भरे बयान यह बता रहे हैं कि उनकी अशिक्षा और अज्ञानता का स्तर कहाँ है? तीन तलाक के नर्क से छुटकारा देने वाले अब उनके दुश्मन नंबर एक हैं। वे उन्हें तीन तलाक कानून का रिटर्न गिफ्ट दे रही हैं।

कल तक बुरकापोश औरतें इस बात का शुक्रिया अदा कर रही थीं कि तीन तलाक से उन्हें आज़ादी मिली है। अब वही खवातीन हज़ारों की तादाद में अपनी बहन-बेटियों के साथ दिन-रात उसी सरकार को कोस रही हैं। परदे के पीछे से उनको अक्ल देने वालों ने सीएए को कुछ ऐसा समझा दिया है जैसे यह तीन तलाक से दस गुना घातक कानून है, जो उन्हें उनके घरों से कल ही खदेड़ देगा। वे दिल्ली में गा रही हैं। लखनऊ में रो रही हैं। हैदराबाद में चीख रही हैं। सामूहिक बेअक्ली की ऐसी मिसालें शायद ही दुनिया में कहीं दर्शनीय हों।

यह 70 सालों की पड़ी हुई बुरी आदतें हैं, जो दोनों तरफ बराबर गहरी हैं। सेक्युलर सफेदपोशों को उन्हें इस्तेमाल करने की आदत है, इन्हें इस्तेमाल होते रहने की आदत है। वे जानबूझकर अपने उल्लू सीधे करते रहे हैं। ये अपने तात्कालिक लालच के फेर में इस्तेमाल होते रहे हैं।

सच्चर कमेटी ने 60 साल बाद इनकी मेडिकल रिपोर्ट देश को दिखा दी। वह रिपोर्ट आज़ादी के बाद से अब तक की सेक्युलर सरकारों की हकीकत ज्यादा है, मुसलमानों की बदहाली का बयान कम है। लेकिन इस रिपोर्ट ने भी मुसलमानों को अपने उन नकली नेताओं के प्रति ज़रा भी नहीं भड़काया, जो उन्हें वोट बैंक बनाकर खुद मालिक बनकर बैठे थे और एक कौम किस गर्त में पड़ी रही।

किसी जुमे को किसी इबादत में यह सवाल भी उठें कि किस बात पर किसको किस पर कब भड़कना चाहिए? इस पर देवबंद से कोई फ़तवा ही ले कि कब, क्यों और कितना भड़कना वाजिब है? ईमान के पक्के मुसलमान कभी इस बात पर नहीं भड़के कि उन्हें अल्पसंख्यक कहकर बाकी समाज से अलग-थलग न किया जाए। वे भी बराबर के हिंदुस्तानी हैं।

वे कभी नहीं भड़के कि अल्लाह के दरवाजे की जियारत हम किसी सब्सिडी की खैरात पर नहीं करेंगे, हमें समझ क्या रखा है। उन्होंने कभी नहीं टोका कि उन्हें अपने कब्रस्तानों की रखवाली करना आता है, किसी सरकार का टुकड़ा नहीं चाहिए। वे अपने इमामों और मुअज्जिनों का पेट भरने के लिए काफी हैं, किसी सरकार का रहम नहीं चाहिए। आप हमें अच्छे स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और काम दीजिए। बाकी हम खुद अपनी कौम की फिक्र करेंगे।

मुसलमान कभी अपनी उस हालत पर नहीं भड़के, जहाँ वे डाल दिए गए। वे कभी उनपर नहीं भड़के, जिन्होंने इस गर्त में उन्हें डालकर रखा। हर सूबे में अल्पसंख्यक नेतृत्व के नाम पर चंद चेहरों की चमक बदस्तूर बनी रही। आज़ादी के बाद से सभी पार्टियों में ऐसे टुकड़खोर मुस्लिम नेता पलते रहे, जिन्होंने अपनी ही कौम को एक वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल होने दिया।

आज वह मेहनतकश काैम कहाँ है? किस हाल में है? कितना पढ़-लिख पाई? कितने उद्योगपति, कारोबारी, शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, पर्यावरणविद् और सम्मानित समाजसेवी पैदा कर पाई? उसकी इस दुर्दशा के लिए ज़िम्मेदार कौन है? वे किस पर भड़के हुए हैं? उन्हें किस पर उबलना चाहिए?

नागरिकता संशोधन कानून उन्हें आँखें खोलकर अपनी ही कौम की हकीकत को देखने का एक सुनहरा अवसर है, जिसे हाथों से गँवाया जा रहा है। भड़कना बिलकुल बुरा नहीं है। वे भड़कें। ज़रूर भड़कें। जमकर भड़कें। कभी तो वे जैश, सिमी, हिज़बुल और लश्कर पर आग उगलें, जो धमाकों से इस्लाम का परिचय दुनिया को कराते रहे हैं। उन मौलवियों पर भड़कें, जो इस्लाम के नाम पर उन्हें उल्टी पट्‌टी पढ़ाते रहे हैं और एक डर फैलाते रहे हैं कि मजहब खतरे में है।

मुसलमान खतरे में है। उन्हें योग से खतरा है। वंदे मातरम् से खतरा है। बुतपरस्ती से खतरा है। कश्मीर में खतरा है। अयोध्या में खतरा है। मंदिर से खतरा है। जनसंख्या नियंत्रण से खतरा है। कॉमन सिविल कोड से खतरा है। और अब सीएए से खतरा है। क्या इस्लाम इतना कमज़ोर है कि इन काल्पनिक खतरों से खतरे में आ जाएगा? जहालत की इंतहा है। जलालत की हद है।

आरिफ मोहम्मद खान और केके मोहम्मद जैसी आवाज़ों को सुनने का यह बेहतरीन समय है, जो कह रही हैं कि भारत में कभी कोई खतरे में नहीं है। वे दुनिया में सबसे ज्यादा महफूज हैं। यह तारेक फतेह को ठंडे दिमाग से सुनने का वक्त है, जो पाकिस्तान समेत दुनिया भर में हो रही मुसलमानों की फजीहत के असली कारणों की सच्ची पड़ताल कर रहे हैं।

दिल्ली के किसी कोने में कहीं अपनी जान बचाकर बैठी डरी-सहमी तसलीमा नसरीन को बहुत तेज़ आवाज़ में सुनने की यही घड़ी है, जो यह बताएँगी कि बांग्लादेश के क्या हाल हैं और हिंदुस्तान के प्रति हमारा सुलूक कैसा होना चाहिए। 70 साल तक सबको ठगने का मौका दिया। खूब ठगे गए। क्या मिला? अब थोड़ा इन भले इंसानों को सुनिए तो सही।

मुसलमानों को भड़कने का इतना ही शौक है तो वे उन सेलिब्रिटी शायरों पर ज़रूर भड़कें, जो कागज़ी शेर परोसकर वामपंथियों के साए में उनके दामन की आग को भड़का रहे हैं। जबकि उन्हें सिर्फ लाइमलाइट चाहिए। सेक्युलर वेशधारी मुस्लिम नेताओं को सत्ता की हिस्सेदारी में अपने और अपने बच्चों के लिए टुकड़े चाहिए।

दोनों ही शातिर दिमागों को 18-20 करोड़ आम मुसलमानों के असली मुद्दों से कोई मतलब नहीं है। बदकिस्मती यह है कि पढ़े-लिखे नौजवान भी गालियाँ आरिफ मोहम्मद खान को ही दे रहे हैं! शिरडी के साई पता नहीं क्या सोचकर कहते थे-अल्लाह मालिक! वाकई अल्लाह ही मालिक है!!

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com