विचार
किसान आंदोलन ठंडा पड़ रहा है, मोदी सरकार को राजनीतिक निपुणता दिखानी चाहिए

पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आने वाले भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने 18 फरवरी को धमकी दी कि यदि तीनों कृषि कानूनों को वापस नहीं लिया गया तो इस मौसम में किसान अपनी फसलों को नष्ट कर सकते हैं। इसके कुछ दिनों बाद जब हरियाणा के जींद और उत्तर प्रदेश के कुछ गाँवों के किसान अपनी फसल उखाड़ने लगे तो टिकैट ने फटाक से जोड़ा कि किसानों को तब तक ऐसा नहीं करना चाहिए जब तक आंदोलन का बलपूर्वक दमन नहीं कर दिया जाता।

भारतीय किसान आंदोलन के इतिहास में संभवतः यह सबसे तेज़ वापसी है जो यह संकेत देती है कि विरोध प्रदर्शन अब अपनी ताप खो रहे हैं। इसी समय के आसपास जो रेल रोको आंदोलन किया गया, वह भी प्रभाव नहीं छोड़ पाया और कुछ लोगों ने इसे विफल भी घोषित कर दिया क्योंकि रेलवे सेवाओं पर न्यूनतम प्रभाव पड़ा। हालाँकि कुछ लोगों ने इसे आंशिक सफल भी कहा।

यहाँ तक कि लूट्यंस मीडिया की भी, जो कृषि के बारे में कम जानती है लेकिन केंद्र सरकार को कमतर दिखाने के लिए किसान आंदोलन को बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रही थी, इससे रुचि कम हो गई है। शहरी नागरिक भी कृषि समाचार से ऊब चुका है और ऐसे में इसपर ध्यान केंद्रित करना टीआरपी के लिए खतरा हो सकता है।

लेकिन एक बात समझें कि इसका तात्पर्य यह नहीं कि किसान आंदोलन समाप्त होने वाला है और यदि सरकार कोई गलती करती है तो यह बढ़ भी सकता है परंतु ध्यान देने वाली बात यह है कि आंदोलन बढ़ाने की धमकियाँ तब तक समर्थ होती हैं, जब तक सच में आंदोलन को बढ़ाया न जाए। यदि आंदोलन को बढ़ा दिया गया तो जैसा हमने गणतंत्र दिवस प्रदर्शन में देखा- प्रदर्शनकारी नैतिक और वैधानिक रूप से निचले स्तर पर आ जाते हैं।

आम नागरिक आंदोलन के प्रति सहानुभूति खो देते हैं यदि इससे ग्राहक के रूप में उनके हितों का लगातार हनन होता रहे। किसानों को फसल जलाने या उखाड़ने के लिए कहना ऐसा है जैसे वेतन वृद्धि की माँग करने वाला कर्मचारी अपना पैसा जला दे। इसका भावनात्मक या प्रतीकात्मक प्रभाव हो सकता है और वीडियो प्रोपगैंडा के लिए अच्छा भी है लेकिन बड़े स्तर पर यह करना उल्टा पड़ सकता है।

यदि पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के धनवान किसान सच में बड़ी मात्रा में अपनी फसल नष्ट कर देते हैं तो लाभ देश के शेष किसानों का होगा जिन्हें वर्तमान में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) नहीं मिल पाता। हरित क्रांति पूर्व तथा दक्षिण की ओर जा रही है और यही वह बात है जो धनवान किसानों व व्यापारियों के लाभ के लिए खतरा बन रही है एवं इसी कारण से वे इस विरोध प्रदर्शन का समर्थन कर रहे हैं।

2020ृ21 में एमएसपी पर चावल खरीद

ध्यान दें कि हाल में 19 फरवरी को राज्य के कृषि मंत्रियों के साथ नीति आयोग की हुई बैठक में किसी भी राज्य ने कृषि कानूनों को वापस लेने की बात नहीं कही। देश के अनाज भंडार राज्यों के अलावा कानूनों को वापस लेने की माँग अधिकांश किसानों को अधिकतमवादी लगती है लेकिन अहम् के कारण कोई समाधान नहीं निकल पा रहा, साथ ही निहित स्वार्थों से कुछ लोग नरेंद्र मोदी सरकार को नीचा दिखाने के लिए आंदोलन को खींच रहे हैं।

इसी बीच, कृषि कानूनों का अवलोकन करने वाली सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त समिति ने राज्य अधिकारियों, निजी मंडी स्वामियों और कई राज्यों के किसान संघों जिनमें से कई विरोध में भी हैं, के साथ कई बैठकें की हैं। विरोध प्रदर्शन के भागीदार 40 किसान संघों सगित कुल 160 संघों से बातचीत की योजना है जिसके बाद न्यायालय को रिपोर्ट सौंपी जाएगी।

यह स्पष्ट नहीं है कि अंततः समिति के क्या सुझाव होंगे लेकिन एक बात जो रिपोर्ट में स्पष्ट हो जाएगी वह यह है कि वर्तमान में चल रहे विरोध प्रदर्शन सभी किसानों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। रिपोर्ट के आने से इस मिथक को तोड़ा जा सकेगा। समिति इस कार्य के राजनीतिक पहलू को भी जानती है इसलिए हो सकता है कि वह कृषि कानूनों को वापस लेकर उनके स्थान पर बेहतर रूप में बनाए गए कानूनों को लाने का सुझाव दे।

यह भी हो सकता है कि वह एक कृषि कानून को वापस लेने और दो में संशोधन करने का सुझाव दे। एक बात जो यह समिति नहीं करेगी, वह यह कि राज्य को एमएसपी पर सारा कृषि उत्पाद खरीदने की गारंटी देने को कहे। यह न सिर्फ राज्य को दिवालिया करेगा बल्कि किसी सर्वोच्च न्यायालय के पास यह अधिकार नहीं है कि वह एक निर्वाचित सरकार को बताए कि वह किस क्षेत्र में क्या खर्च करे। यह संविधान का उल्लंघन होगा।

वर्तमान में जो गतिरोध बन गया है और विरोध प्रदर्शन से धीरे-धीरे जैसे लोगों की रुचि कम हो रही है, ऐसे में सरकार को दिल्ली की सीमाओं से किसानों को खेतों पर वापस भेजने के लिए प्रतिक्रियात्मक की बजाय एक सक्रिय रणनीति बनानी चाहिए। निम्न चार बिंदु सहायता कर सकते हैं-

पहला, लोगों के अहम् की तुष्टि करे ताकि टिकैत जैसे नेता मुँह छुपाने की बजाय विजय का दावा कर सकें। यह तब हो सकता है जब न्यायालय की समिति कम से कम एक कृषि कानून को वापस लेने के लिए कहे लेकिन स्वयं भी केंद्र वार्ता को पुनः शुरू करके कह सकती है कि कानूनों को फिर से लिखा जाएगा।

किसान संघों के साथ प्रारंभिक वार्ता में यह प्रस्ताव दिय गया था लेकिन इसे दोहराया जा सकता है। एक और बात यह हो सकती है कि यदि प्रदर्शनकारी अधिकतमवादी माँगों को छोड़ दें तो प्रधानमंत्री किसान नेताओं से अपने घर पर भेंट करें ताकि यह प्रदर्शनकारियों की हार का पर्यायी न बने।

दूसरा, सरकार को विश्वसनीय टिप्पणीकारों की आवश्यकता है और दो राजनेताओं- पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से यह सहायता माँग सकती है। एक किसान कानूनों के विरोध में हैं और एक ने इस विषय पर अधिक कुछ नहीं कहा है।

कृषि कानूनों का विरोध करते हुए सिंह

इनमें से किसी एक या दोनों से व्यक्तिगत स्तर पर प्रदर्शनकारी संघों से बात करके मध्यस्थता करने को कहा जा सकता है जिसमें कानूनों को वापस लेने की नहीं लेकिन महत्त्वपूर्ण परिवर्तन करने की बात हो। हो सकता है सिंह इसके लिए तैयार न हों लेकिन फिर भी समाधान तक पहुँचने के लिए उनका परामर्श लिया जा सकता है।

तीसरा, महत्त्वपूर्ण राज्यों में राज्य-प्रायोजित कृषि बाज़ार मंडल की स्थापना की घोषणा के लिए यह सही समय हो सकता है जिसमें पंजाब और हरियाणा के किसानों को चावल जैसी अधिक पानी की माँग करने वाली फसलों से दूसरी फसलों की ओर ले जाने के लिए विशेष कोष हो जिससे परिवर्तन काल में उन्हें अस्थाई आय समर्थन दिया जाए।

अनाज और सब्ज़ियों के उत्पादन से आय बढ़ाने के लिए किसानों को अमूल जैसी खाद्य-प्रसंस्करक और मार्केटिंग संस्था की आवश्यकता है। एमएसपी दीर्घ अवधि का समाधान नहीं है। केंद्र पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए प्रारंभिक स्टार्ट-अप और मार्केटिंग खर्च उठाने का प्रस्ताव दे सकती है और बाद में इसका विस्तार अन्य राज्यों तक किया जा सकता है।

चौथा, राज्य के मंत्रियों के साथ नीति आयोग की बैठक के बाद केंद्र खाद्य खरीद का 80 प्रतिशत कोष किसानों को बाँटने का प्रस्ताव दे ताकि वे अपने राज्य में कृषि आय सुधार सकें या अन्य राज्यों से अनाज खरीदकर अपने राज्य के लोगों का पेट भर सकें। राज्यों को उनके किसानों के लिए महत्त्वपूर्ण फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने और द्विपक्षीय समझौते के तहत दूसरे राज्यों से फसल खरीदने की स्वतंत्रता दी जाए।

वास्तविक युद्ध केंद्र और पंजाब एवं हरियाणा के किसानों के बीच नहीं है बल्कि युद्ध पंजाब-हरियाणा के किसानों और शेष किसानों के बीच है। हरित क्रांति पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ तक फैल गई है तथा गेहूँ व चावल के उत्पादन का भविष्य इन राज्यों में निहित है।

यही विचार पारंपरिक रूप से देश का अनाज भंडार रहे राज्यों को सता रहा है। वे एक प्रतिस्पर्धा के बीच हैं और शीर्ष पर रहने वाला प्रतिस्पर्धा पसंद नहीं करता। समय आ गया है कि नरेंद्र मोदी निपुण राजनीति का परिचय देते हुए प्रदर्शनकारियों को वापस भेजें लेकिन उन्हें मुँह की न खानी पड़े और उनका आत्म-सम्मान बना रहे, इसका भी ध्यान रखें।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं।