विचार
‘फेक्ट चेकर’ कैसे उन लोगों से अलग हुए जो पूर्वाग्रहों के आधार पर गलत खबर फैलाते हैं?
Harshil Mehta - 17th June 2021

इस सप्ताह की शुरुआत में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसके अनुसार एक मुस्लिम बुज़ुर्ग को दाढ़ी पकड़कर पीटा जा रहा था और ‘जय श्री राम’ बोलने पर मज़बूर किया जा रहा था। बताया जा रहा था कि यह वीडियो उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद का है जहाँ जल्द ही चुनाव होने वाले हैं।

जैसे ही यह वीडियो वायरल हुआ, वैसे ही कुछ पत्रकारों और तथाकथित फेक्ट चेकरों- जैसे अरफ़ा खानुम शेरवानी, राणा अय्यूब व मोहम्मद ज़ुबैर- ने तथ्यों की जाँच पड़ताल किए बिना उसे परिवर्धित किया। लेकिन पुलिस के अनुसार, मामले में मुख्य आरोपी प्रवेश गुज्जर के साथ आरिफ, कल्लू, पोली, मुशाहिद, और आदिल को गिरफ्तार कर लिया गया।

गाज़ियाबाद पुलिस को घटना का प्रारंभिक विश्लेषण अपने ट्विटर पर रखना पड़ा पर तब तक नुकसान हो चुका था। कई विदेशी पत्रकारों व एक्टिविस्टों, जिन्हें भारत पर पहले से ही घृणा है, ने उस वीडियो का उपयोग कर भारत को अल्पसंख्यकों के लिए असुरक्षित देश बता दिया।

पुलिस ने बाद में इस घटना को सांप्रदायिक रंग देने वाले लोगों के विरुद्ध प्रारंभिक शिकायत दर्ज की। इस घटना में अनोखी बात यह है कि अपने आप को ‘फेक्ट चेकर’ बोलने वाले लोगों ने ही गलत खबरों को हवा दी है।

ऐसा पहली बार नहीं है कि मोहम्मद ज़ुबैर, जो ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक हैं और राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग द्वारा की गई शिकायत के आरोपी हैं, ने ऐसा किया है। सितंबर 2020 तक 25 बार उन्होंने गलत खबरों को साझा किया था। उनके साथी प्रतीक सिन्हा के ऊपर भी गलत खबरें फ़ैलाने के आरोप बार-बार लगते हैं।

इस प्रकार का ट्रेंड सच में हानिकारक है। पहला, कथित ‘फेक्ट चेकर’ भी गलत खबरों के सामने उतने ही भेद्य हैं, जितनी की सामान्य प्रजा। लेकिन ये लोग मनोविज्ञान में जिसे ‘मसीहा कॉम्प्लेक्स’ कहते हैं, उसके शिकार हैं। इन्हें लगता है कि वे दुनिया को बचाने का महान् कृत्य कर रहें हैं, जबकि ऐसा नहीं है।

प्रतीक सिन्हा अपनी टेडएक्स टॉक में बतातें हैं कि, लोग सोचते नहीं परंतु कन्फर्मेशन बायस के कारण किसी भी खबर को साझा कर देतें हैं। एक ख़ास पार्टी या विचारधारा या व्यक्ति के विरुद्ध गलत खबरें फैलाने वाले सिन्हा या ज़ुबैर कैसे उन लोगों से अलग हुए? इसलिए क्योंकि सिन्हा अपने आप को खुल्लेआम वैचारिक वामपंथी बतातें हैं तो सब कुछ ठीक है?

दूसरा, यदि उनसे विपरीत विचारधारा के व्यक्ति द्वारा पुलिस की माहिती के अलावा कुछ लिखा जाता है तो वे तुरंत ही उनका चरित्रहनन करने में लग जातें हैं। पुलिस को टैग करने से लेकर उन्हें जेल में डालने के ट्वीट्स आ जाते हैं। वो व्यक्ति सीधा ही दंगे भड़काने का आरोपी बन जाता है।

परंतु समान विचारधारा के व्यक्ति द्वारा ऐसा कुछ हो तो एक अजीब-सी चुप्पी साधी जाती है। यह चुप्पी ‘जय श्री राम’ के नारे लगाकर हस्तमैथुन करवाने वाले मनगढंत प्रसंग से लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा मदरसा में बलात्कार जैसी फ़र्ज़ी खबरों तक बरक़रार रहती है।

क्या वे एक ख़ास प्रकार के तथ्यों के ठेकेदार हैं? क्यों उनके स्टैंडर्ड्स विचारधारा के अनुरूप बदलते रहते हैं? क्या उन्हें एक प्रमाणित व्यक्ति संस्था माना जा सकता है?

तीसरा, जब आप अपने आप को एक ज़िम्मेदार व्यक्ति बतातें हैं, लोगों से अलग होने का दावा करते हैं, मुख्यधारा की मीडिया का दिन में 10 बार मज़ाक उड़ातें हैं, लोगों को सार्वजनिक मंच पर सांप्रदायिक बोलतें हैं, तो आपसे अपेक्षा का धोरण थोड़ा बढ़ जाता है। विशेषकर तब जब वे ऐसी सोशल मीडिया कंपनी के साथ टेबल शेयर करते हैं जो खुद ‘छेड़-छाड़ वाली मीडिया’ के टैग्स उनके अहवालों पर देती हो।

क्या बात-बात पर सरकार को फेक न्यूज़ पर एक्शन न लेने के लिए ताना देने वाले लोग इस पर विक्टिम कार्ड खेलेंगे? वह तो समय ही बताएगा।