विचार
फैब और फैबलेस के संघर्ष के बीच भारतीय सेमीकन्डक्टर उद्योग की राह

भारत में सेमीकन्डक्टर व्यवसायी और उत्साही भारत सरकार द्वारा स्पेक्स और अन्य प्रोत्साहन-आधारित प्रयासों के तहत लिये गए निर्णयों की नीति, टिप्पणी और परिणामों पर निरंतर दृष्टि रखे हुए हैं।

हर हितधारक- सरकार, निवेशक, उद्यमी और अभियंता- चाहता है कि सेमीकन्डक्टर पारिस्थितिकी तंत्र में उत्पादन और मूल्यवर्धन के सभी आयामों के एक उत्कृष्ट स्थल के रूप में भारत उभरे। अपने अनुभव और जानकारी के आधार पर वे अनूठी अंतर्दृष्टियाँ भी रखते हैं।

इस प्रकार के वातावरण में स्वाभाविक है कि कुछ असहमतियाँ भी होंगी जिन्हें सुलझाने के लिए एक ध्यान देने वाली मध्यस्थता और समझदारी की आवश्यकता है। इस लेख में एक ऐसी ही असहमति पर बात की जाएगी जो भारत के फैबलेस स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र की ओर से आई है।

वे घरेलू सेमीकन्डक्टर फैब्रिकेशन इकाइयों को सरकार का जो समर्थन मिल रहा है, उसका विरोध कर रहे हैं। एक फैबलेस सेमीकन्डक्टर कंपनी वह होती है जो उपभोक्ता या किसी मानक छोर से आने वाली अमूर्त प्रणाली आवश्यकताओं को बड़ी संख्या (अरबों) के सर्किटों में परिवर्तित करे।

इन सर्किटों को परिष्कृत सॉफ्टवेयर टूल्स के माध्यम से फैब्रिकेशन कंपनी की सहायता से चयनित प्रक्रिया पर आवश्यक प्रदर्शन के लिए सत्यापित किया जाता है। इसके बाद तय डिज़ाइन को एक चित्र के रूप में फैब्रिकेशन कंपनी को भेजा जाता है जहाँ चित्र को सिलिकॉन सतह पर उभारा जाता है।

इसके बाद तैयार सिलिकॉन को चिप कहा जाता है जिसे फैबलेस सेमीकन्डक्टर कंपनी में चरित्रण और व्यवसायीकरण के लिए वापस भेज दिया जाता है। पिछले दो दशकों में सेमीकन्डक्टर डिज़ाइन गतिविधि में भारत में घातीय वृद्धि देखने को मिली है लेकिन सेमीकन्डक्टर फैब्रिकेशन का क्षेत्र शून्य पर है।

भारत में फैब स्थापित करने के दो असफल प्रयास हो चुके हैं। भारत सरकार द्वारा घरेलू सेमीकन्डक्टर विनिर्माण को बढ़ावा देने के प्रयासों को इसी व्यापक वास्तविकता और संदर्भ में समझकर हम उसकी सराहना कर पाएँगे। इस महत्त्वपूर्ण क्षेत्र में पीछे रहने के स्पष्ट रणनीतिक और सुरक्षा निहितार्थ होंगे।

पिछले दशक से मुख्यधारा मीडिया अधिकांश रूप से ई-कॉमर्स और शैक्षिक तकनीकी (एडुटेक) स्टार्ट-अपों पर ही केंद्रित है। इसी अवधि में फैबलेस सेमीकन्डक्टर स्टार्ट-अप क्षेत्र में भी कुछ उत्साहवर्धक गतिविधियाँ देखने को मिलीं हैं।

कॉस्मिक सर्किट्स (कैडेन्स द्वारा अधिग्रहित), सांख्य लैब्स, ऑरा सेमीकन्डक्टर, स्टरेडियन सेमीकन्डक्टर और ऐसी ही अनेक कंपनियों ने डिज़ाइन सेवा प्रदाता और उच्च-मूल्य के आईपी निर्माता के रूप में सफल स्टार्ट-अपों का दर्जा प्राप्त कर लिया है और कुछ हद तक वे पूरा सेमीकन्डक्टर उत्पाद भी बनाते हैं।

सांख्य लैब्स के सीईओ पराग नाइक की कुछ टिप्पणियों ने कई पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है। केन से बातचीत में उन्होंने कहा, “जो चिप हम डिज़ाइन करते हैं, उसे छोटी फाउन्ड्री में नहीं बनाया जा सकता है। पारिस्थितिकी तंत्र के अभाव के कारण हमारे कई विक्रेता हमें अच्छा मूल्य नहीं देते हैं।”

उन्होंने बताया कि बिना डिज़ाइन के उनके कोरियाई साझेदार ने 50 प्रतिशत मूल्य कम निर्धारित किया था। इसपर केन ने कहा, “यदि भारत रूस के तेल कुओं पर स्वामित्व रख सकता है, तो वह ताइवान या कोरिया में वेफर्स का स्वामी हो सकता है। सिर्फ भारत में फाउंड्री होने से उत्पादन विकास लागत कम नहीं होगी।”

इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में उन्होंने कहा, “यदि मेरे पास पेटेन्ट व उत्पाद है, मैं उसे कहीं भी बना सकता हूँ। फैक्ट्री स्थापित करना दिमाग का काम नहीं है। सरकार और नौकरशाह सिर्फ भूमि और बिजली के विषय में जानते हैं। सैमसंग, एरिक्सन, नोकिया जैसी कंपनियाँ बंजारी हैं, वे एक से दूसरे स्थान पर बसती रहती हैं।”

“जब आप उन्हें छूट देंगे तो वे यहाँ आएँगे। कल कोई और उन्हें छूट देगा तो वे यहाँ से चले जाएँगे। हम खाली हाथ रह जाएँगे।”, उन्होंने आगे कहा। यहाँ हम एक ही व्यक्ति को लक्ष्य नहीं कर रहे हैं, बल्कि उनके बयानों को लिखने का उद्देश्य है कि हम उनके विचारों और पूर्वधारणाओं को समझें।

सेमीकन्डक्टर उत्पादन की तुलना कच्चे तेल जैसे खनिज से करना ही गलत है। जिस जगह तेल नहीं है, वहाँ आप कितना भी प्रयास कर लें, तेल नहीं निकाल सकेंगे। सेमीकन्डक्टर फैब जापान, चीन, ताइवान, कोरिया, यूरोप और यूएसए में हैं। वे ताइवान जैसे भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में भी हैं और एरिज़ोना जैसे सूखे क्षेत्र में भी।

कच्चे तेल और सेमीकन्क्टर में व्यापार असंतुलन, ऊर्जा और राष्ट्रीय सुरक्षा की ही समानताएँ हैं। भौगोलिक रूप से बिना घरेलू सेमीकन्डक्टर उत्पादन के रहना भारत के लिए संभव नहीं है। हम समझते हैं कि फैब द्वारा अपेक्षित और अधिमान्य व्यवहार के कारण फैबलेस सेमीकन्डक्टर कंपनियाँ कुंठित हैं।

लेकिन यह अपेक्षा करना कि ऐप्पल, एनवीडिया, क्वालकॉम, इंटेल, सैमसंग और ब्रॉडकॉम जैसी वैश्विक सेमीकन्डक्टर एवं उपकरण निर्माता कंपनियों से सरकार भारत के फैबलेस स्टार्ट-अपों को अधिमान्यता दिलाने के लिए लड़ेगी, अतर्कसंगत है।

पिछले एक वर्ष से हर प्रमुख डिज़ाइन अधिष्ठान, उपकरण व ऑटो निर्माता चिप अभाव का शिकार है। यदि भारत सरकार से कोई अपेक्षा की जा सकती है तो वह यह कि जब भी फैब भारतीय भूमि पर स्थापित हों तो सरकार उनका लाभ उठाए।

भारतीय फैबलेस कंपनियों के लिए वेफर मूल्य पर सरकार सब्सिडी दे, यह एक रोचक विचार है। इसके लाभ और सरकार के रणनीतिक लक्ष्यों के आधार पर इसका परीक्षण होना चाहिए। लेकिन सरकार को घरेलू सेमीकन्डक्टर फैब को प्रोत्साहन देने से रोकने के बदले इस विचार का उपयोग सही नहीं है।

ताइवान में मीडियाटेक जैसी उभरती कंपनियों और शिंचु जैसे डिज़ाइन केंद्रो में फैब और फैबलेस उद्योगों के बीच सामंजस्य देखा जा सकता है। कोरिया में फैबलेस कंपनियाँ कैसे बेहतर स्थिति में हैं, यह जब नाइक बताते हैं तो यह रेखांकित होता है कि आपसी सामंजस्य कैसे बेहतर है जो भारत में फैब की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।

उद्योग में टीएसएमसी जैसे फैब भी देखे गए हैं जो अपने ग्राहकों को आईपी और डिज़ाइन सेवाएँ देकर डिज़ाइन में भागीदारी का भी भक्षण कर रहे हैं। हम यह भी देख सकते हैं कि सेमीकन्डक्टर जहाँ डिज़ाइन हो रहा है (यूएस, ईयू और भारत) व जहाँ सेमीकन्डक्टर उत्पादन हो रहा है (ताइवान और कोरिया), उसमें कितना भौगोलिक बिखराव है।

हम जानते हैं कि भारतीय सेमीकन्डक्टर स्टार्ट-अपों के पास जोखिम लेने के लिए पूँजी का अभाव है, विशेषकर जब उनकी तुलना ई-कॉमर्स स्टार्ट-अपों से की जाए तो। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक उत्साहवर्धक ट्रेंड देखने को मिला है जहाँ उद्यम पूँजीपति और पीई कोष सेमीकन्डक्टर जैसे गहरे तकनीकी क्षेत्रों में रुचि ले रहे हैं।

उदाहरण स्वरूप, ईन्डिया के पोर्टफोलियो में यहाँ आपको दो सेमीकन्डक्टर कंपनियाँ दिखेंगी। पिछले कुछ महीनों ने दिखा दिया है कि भारतीय खिलाड़ी आपूर्ति शृंखला में ऊपर चढ़ रहे हैं और 5जी, दूरसंचार उपकरण, इलेक्ट्रिक वाहन, हरित ऊर्जा आपूर्ति शृंखला, आदि क्षेत्रों में रुचि ले रहे हैं।

हमें अपेक्षा है कि ई-कॉमर्स कंपनियों के आईपीओ निकलने से भारत में फैबलेस उद्यमों के लिए अधिक जोखिम लेने योग्य पूँजी उपलब्ध होगी। हालाँकि, फैबलेस कंपनी की तुलना में सेमीकन्डक्टर फैब शुरू करने में अधिक पूँजी और जोखिम लगता है इसलिए सरकार को अपने प्रयासों को तेज़ करना होगा।

लेखक के पास वैश्विक सेमीकन्क्टर प्रमुखों में दशक भर से अधिक का अनुभव है। वे अनामित रहना चाहते हैं।