विचार
असम तक आईएलपी का विस्तार बुरा विचार क्योंकि भारत में ही वीज़ा नहीं होना चाहिए

पिछली सदी में बांग्लादेशियों के अनियंत्रित प्रवासन से असम में उत्पन्न संवेदनशीलताओं को देखते हुए कहीं भारत गलत निर्णय न ले ले।

संजातीय असमी समूहों द्वारा नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरोध प्रदर्शन को देखते हुए केंद्र उनकी शंकाओं के समाधान के लिए असम को इनर लाइन परमिट (आईएलपी) प्रणाली के अधीन लाने पर विचार कर रहा है।

आईएलपी की शुरुआत अंग्रेज़ों ने 19वीं सदी में की थी जब वे जनजातीय समुदायों को जनसांख्यिकी में पीछे होने और गैर-जनजातीय अधिवासियों द्वारा शोषित होने से बचाना चाहते थे।

आईएलपी पहले नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मिज़ोरम के जनजातीय क्षेत्रों के लिए ही था लेकिन अब इसका विस्तार मणिपुर तक कर दिया गया है। अब मांग उठ रही है कि मेघालय तक इसका विस्तार किया जाए, यहाँ तक कि असम तक भी।

हालाँकि पूर्वोत्तर के जनजातीय क्षेत्रों को सीएए से छूट दी गई है लेकिन असम समझौते के खंड 6, जो असमी पहचान को बचाने के लिए है, पर हाल में चल रही चर्चा से कई असमी समूहों ने मांग की है कि आईएलपी का विस्तार पूरे असम पर हो।

आईएलपी के अनुसार भारत के अन्य क्षेत्रों के नागरिक जनजातीय क्षेत्रों में बिना अनुमति के न आ सकते हैं, न रह सकते हैं। हालाँकि राज्य सरकारें लंबी अवधियों के लिए भी आईएलपी जारी कर सकतीं हैं लेकिन यह एक तरह का वीज़ा हुआ जो अन्य राज्यों के भारतीयों को किसी दूसरे राज्य में जाने के लिए लेना होगा।

अधिक से अधिक राज्यों में आईएलपी के विस्तार का संकट प्रत्यक्ष है। अगर कल मुंबई ने मांग की कि गैर-महाराष्ट्रियों को शहर प्रवेश के लिए अनुमति की आवश्यकता है या बेंगलुरु कहे कि गैर-कन्नडिगों को प्रवेश के लिए अनुमति चाहिए तो यह उस भारत का अंत होगा जिसे हम जानते हैं।

यह क्षेत्रीय दुराग्रह होगा। कई राज्यों में स्थानीयों के लिए नौकरी आरक्षण की बात छिड़ चुकी है और हम इसी दिशा में जा रहे हैं। अब हम नहीं चाहते कि आईएलपी इस आग में घी डाले।

असमियों को आश्वासन देने के लिए विधान सभा में उनका अधिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सकता है जो राज्य में उनकी जनसंख्या के अनुपात से संबंधित नहीं होगा। इससे राज्य में उनकी जनसंख्या कम पड़ने के बावजूद राजनीतिक शक्ति उनके पास होगी। (दक्षिण को लोकसभा में उतने ही सांसदों का प्रतिनिधित्व आज भी मिलता है जितना स्वतंत्रता के समय मिला था, जबकि राष्ट्रीय जनसंख्या में उनका हिस्सा पहले अधिक था।)

दूसरा आश्वासन यह दिया जा सकता है कि बांग्लादेश से आने वाले गैर-असमियों को दूसरे राज्यों में बसने पर कुछ लाभ दिए जा सकेंगे जिससे जनसंख्या वितरण हो और पूरा भार अकेले असम पर न आए।

आईएलपी एक भारत के विचार का विरोधी है। बड़े राज्यों से जनसंख्या में पीछे हो जाने के भय से यह छोटी जनजातियों और संजातीय समूहों में सच्ची राष्ट्रवादी भावनाओं को उभरने से रोकता है, भले ही ये स्वाभाविक हों। उनकी पहचान को सभी भारतीय नागरिकों के देशभर में आने-जाने के अधिकार को अवरुद्ध किए बिना भी बचाया जा सकता है।

आईएलपी का एक और आयाम है जिसपर कम ही चर्चा होती है। पूर्वोत्तर के कई राज्य ईसाई-बहुल हैं जैसे नागालैंड और मिज़ोरम या मेघालय और अरुणाचल प्रदेश की तरह ईसाई-बहुल होने की राह पर हैं, ऐसे में आईएलपी अन्य धार्मिक समूहों को बढ़ने का अवसर नहीं देता। इस प्रकार आईएलपी गैर-बहुल धर्मों के प्रसार में एक बाधा है।

अधिक से अधिक राज्यों में आईएलपी का विस्तार करके भारत भारत नहीं रह सकता। इस गलती को असम के द्वार पर रोकना होगा और धीरे-धीरे पूरे पूर्वोत्तर से भी इसे हटाया जाना चाहिए।

आर जगन्नाथन स्वराज्य के संपदकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi से ट्वीट करते हैं।