विचार
ताज महल नहीं, काश अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप नालंदा या विजयनगर जाते

मैंने भारत की औसत आठ बार लगातार यात्राएँ की हैं। कुछ राज्यों में 10 या इससे अधिक बार जाना हुआ है। उत्तर प्रदेश ऐसा ही एक राज्य है, जहाँ कई बार गया हूँ। लगभग सारे बड़े शहरों में घूमा हूँ। दूर देहातों में भी गया हूँ। बेशक आगरा भी इनमें से एक है। मैं ताज महल के सामने से गुज़रा हूँ, लेकिन कभी नहीं लगा कि अंदर जाकर देखूँ।

यह सच है, लेकिन ऐसा किसी पूर्वाग्रह के कारण नहीं है। मैं इतिहास का जिज्ञासु हूँ और साल में कुछ दिन कहीं न कहीं प्राचीन खंडहरों में गुज़ारता हूँ। मंदिरों, महलों, किलों या मंदिरों के मलबे पर खड़ी मस्जिदों के पत्थरों से बात करता हूँ। स्थानीय लोगों की स्मृतियों और किताबों में उनका अतीत खंगालता हूँ। सच बात है कि ताज महल ने उस रूप में कभी आकर्षित नहीं किया। ताज को निकट से देखना अब तक लंबित ही है।

मेरी नज़र में भारतीयों के लिए ताज महल उसके भयावह गुलामी के घृणित अतीत के दौरान हद दरजे की अय्याशी का एक नमूना है। एक बादशाह हिंदुस्तान के दूर-दराज इलाकों पर कब्ज़े और लूट से इकट्‌ठा की हुई दौलत को अपने हरम की सैकड़ों बीवियों, रखैलों और कनीजों में से एक के मरने पर बनवा रहा है।

मुमताज उसके 14 बच्चों की माँ थी और ऐसा कहते हैं कि बुरहानपुर में उसके मरने के बाद आगरे में यमुना के किनारे इस इमारत को बनवाने में शाहजहाँ ने पूरा खज़ाना खाली कर दिया था, जिसमें 20 साल तक हज़ारों मजदूर गुलाम लगे थे। वह किसी दृष्टि से राधा-कृष्ण जैसे अलौकिक प्रेम या लैला-मजनूं की मोहब्बत की कहानी नहीं है, जैसा प्रचारित किया गया। लेकिन आज़ाद भारत में इतिहास की मनमाफिक व्याख्याएँ करके इरफान-थापर और रोमिला-हबीब जैसे इतिहासकारों ने भी कम बेड़ा गर्क नहीं किया।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को आगरा का ताज महल दिखाने की बजाय भारत में केवल दो ही ऐसी जगहें हैं, जो बहुत ध्यानपूर्वक दिखाई जा सकती थीं। पहली- बिहार में नालंदा और दूसरी- कर्नाटक में हम्पी के पास विजयनगर। दोनों में ही एक समानता है और वह यह कि ये दोनों ही भारत में शासन के नाम पर चले लंबे इस्लामिक आतंक के गहरे जख्म हैं।

नालंदा को 1193 में बख्तियार खिलजी ने जलाकर राख कर दिया था। खिलजी के हमले के समय वह 500 साल पुराना एक ऐसा आवासीय बौद्ध विश्वविद्यालय था, जहाँ 10,000 विद्यार्थी पढ़ते थे और लगभग 2,000 आचार्य पढ़ाते थे। वे सारे विद्यार्थी और आचार्य मार डाले गए। कोई नामलेवा नहीं बचा।

सदियों बाद ब्रिटिश हुकूमत के समय इसके खंडहर दुनिया के सामने आए और राख की परतों में दफन नालंदा ने आधुनिक दुनिया के सामने आँख खोली थी। तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने बिहार विधानसभा में एक बार नालंदा के ब्रांड को फिर से जिंदा करने का आइडिया सरकार को दिया था और तब 1,000 करोड़ से नालंदा विश्वविद्यालय की फिर से स्थापना की शुरुआत हुई, जो नालंदा से कुछ दूर राजगिर में बन रहा है।

ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अमेरिका और भारत की विशाल स्वागत सभाओं में खुलकर कट्‌टर इस्लामिक आंतकवाद के खिलाफ लड़ने की सौगंधें ली हैं। अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम में उमड़े जनसैलाब के सामने भी उन्होंने कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवाद को सबक सिखाने की बात कही।

दुनिया की सबसे बड़ी ताकतवर राजनीतिक हस्ती होने के नाते ट्रंप के दिमाग में आतंकवाद का चेहरा और उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि स्पष्ट है, लेकिन उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि भारत एक ऐसा अनूठा देश भी है, जो इस्लामी आतंक का दुनिया में सबसे ज्यादा और सबसे पुराना पीड़ित भी है लेकिन इसी भारत में आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता!

नालंंदा के खंडहरों पर जाकर ही वे जान सकते थे कि जब आधुनिक अमेरिका का अता-पता नहीं था, तब भारत के एक ही प्रांत बिहार में नालंदा और विक्रमशिला जैसे महान विश्वविद्यालयों में दूर-दूर से बच्चे पढ़ने आते थे। इन विश्वविद्यालयों की बरबादी का कारण भी उन्हें तब पता चलता।

मुमकिन है कि अपनी कड़ी सुरक्षा में बख्तियारपुर की सड़कों से गुज़रते हुए बख्तियार के नाम पर उनका ध्यान जाता और वे उसका परिचय भी प्राप्त करते। तब उनके चेहरे पर क्या भाव प्रकट होते, जब उन्हें यह ज्ञात होता कि बख्तियारपुर का यह बख्तियार वही है, जिसने नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों को बरबाद कर डाला था! मुमकिन है कि वे अपने प्रिय मित्र मोदी से पूछते कि डियर, आपके रहते यह कैसे मुमकिन है? एक शहर का नाम एक दुर्दांत आतंकवादी पर किसने और क्यों चिपकाए रखा है?

कर्नाटक में विजयनगर तो नालंदा से भी दर्दनाक अध्याय है। वह भारत का अंतिम वैभवशाली हिंदू साम्राज्य माना जाता है, जिसने भारत के समृद्ध स्वर्णिम अतीत के सबूत पेश किए। जब 12-13वीं सदी में दिल्ली पर कब्ज़ा जमाए हुए अलाउद्दीन खिलजी और मोहम्मद तुगलक ने दक्षिण भारत की बरबादी के कारनामे शुरू किए तब श्रृंगेरी के शंकराचार्य माधव विद्यारण्य ने अपने दो शिष्यों हरिहर और बुक्का राय को एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना के लिए प्रेरित किया था।

बेल्लारी जिले में तुंगभद्रा नदी के किनारे 25 वर्ग किलोमीटर के विशाल इलाके में आज वह शहर खंडहरों में फैला हुआ है, जिसे 1565 में पाँच बहमनी मुस्लिम सुलतानों की संयुक्त सेना ने वैसे ही लूटा और जलाकर राख किया, जैसे बख्तियार खिलजी ने बिहार और बंगाल में तबाही मचाई थी। लेकिन अपने हिस्से के सिर्फ सवा दो सौ सालों में विजयनगर ने वह कर दिखाया, जो किसी भी भारतीय काे गर्व से भरने के लिए काफी है।

काफिरों की यह मालामाल हुकूमत दक्षिण में कब्जे करने के बाद मुस्लिम सुलतानों की आँखों की किरकिरी बन गई। विजयनगर भारत की आहत आत्मा का एक जीता-जागता स्मारक है। महीनों तक 2,000 मंदिरों को लूटकर आग के हवाले किया गया था। हज़ारों औरतों और बच्चों को गुलाम बनाकर ले जाया गया। यह इस्लामी विजेताओं की पहले की ही कई फतहों के सिलसिले में एक और कहानी थी, जो दक्षिण में दोहराई गई। हम्पी के पास फैले खंडहर इतने हैं कि आप दो-चार दिन में देख भी नहीं सकते।

ट्रंप को विट्ठल मंदिर या हजार रामा मंदिर या विरुपाक्ष मंदिर के प्रांगण में ले जाया जाना चाहिए था और उन्हें विजयनगर की आपबीती बहुत विस्तार से सुनाई जानी चाहिए थी। अमेरिका में न्यूयार्क में 9/11 के घाव तो बहुत बाद के हैं। ओसामा को मारकर अमेरिका ने अपने अपमान को बदला तो चुका दिया था लेकिन भारत के हिस्से में आए जख्मों के सारे बकाया हिसाब एकतरफा ही हैं।

बहरहाल, जिस भारत के प्रति अमेरिकियों के अपार स्नेह को लेकर वे यहाँ आए, यह उनके संज्ञान में होना चाहिए था कि इस्लामिक आतंकवाद के कड़वे घूँट भारत कब से पीए बैठा है। नालंदा और विजयनगर तो वे घाव हैं, जो 500-1000 साल पुराने हैं जबकि दिल्ली से 800 साल के कब्ज़े में मुस्लिम सुलतानों और बादशाहों ने देश के चप्पे-चप्पे में भारत की प्राचीन संस्कृति को जो अतुलनीय क्षति पहुँचाई है, वह अवर्णनीय है। भारत ने किस हद तक खोया है, 1947 का मजहब के आधार हुआ बटवारा उसी की आखिरी मिसाल है।

नालंदा और विजयनगर से बेहतर कोई जगह नहीं थी, जहाँ भारत की सदियों लंबी पीड़ा को समझा जा सकता है। वह भयावह दौर सिर्फ भारत के अतीत की बात है, ऐसा जो सोचते हैं, वे किसी मुगालते में होंगे। भारत और अमेरिका सहित पूरी दुनिया आज आतंक के उसी संक्रमण की चपेट में है। जो जहाँ भी है, वह अगले धमाके तक ही महफूज है, जब तक बचा रह जाए और अगला धमाका कौन कहाँ करे, अल्लाह ही जानता है।

मुझे पता नहीं ट्रंप ने खुद आगरा जाने की ख्वाहिश की या व्हाइट हाऊस के बनाए प्रोग्राम के अनुसार वे वहाँ गए, लेकिन अहमदाबाद में उनके भाषण की हर पंक्ति, अल्प और पूर्ण विराम से यह स्पष्ट है कि यह मेगा शो बहुत बारीकी से बुना गया। वे कहाँ आएँगे, क्या कहेंगे, किस-किस विषय को कितना छुएँगे, सब कुछ बहुत सलीके से बुना हुआ था।

मैं इसके शानदार आयोजन के लिए किसे दाद दूूँ, यह सोच ही रहा था कि टेलीविज़न स्क्रीन पर पल भर के लिए भीड़ में दो चेहरे एक साथ दिखाई दिए- अजित डोभाल और एस जयशंकर। हो सकता है कि भारत सरकार की तरफ से वाराणसी में गंगा तट और विश्वनाथ मंदिर ले जाने का कार्यक्रम रखा गया हो और ट्रंप ने ही आगरा में ताज देखने की ख्वाहिश कर दी हो।

जो भी हो! ताज महल कितना भी खूबसूरत और बेमिसाल हो, वह भारत की सच्ची कहानी बयां नहीं करता। वह एक भ्रम खड़ा करता है। भ्रम यह कि भारत में जो कुछ भी कमाल था, वह महान मुगलों के ही समय में था।

भारत के ज्यादातर मुसलमान और सेक्युलर इसी घातक भ्रम में खुद भी हैं और देश को भी बनाए रहे हैं। जो लोग नालंदा या विजयनगर नहीं गए हैं, वे इस ऐतिहासिक भूल में रहकर भारत के दुर्दांत अपराधियों-आतंकियों में अपने नायक ढूंढ सकते हैं।

उत्तर और दक्षिण भारत के ये दो स्थान ही ऐसे हैं, जो भारत की सच्ची कहानी बहुत विस्तार से बयान करते हैं। काश ट्रंप नालंदा या विजयनगर जाते! इस्लामिक आतंक को मुंह तोड़ जवाब देने की उनकी हुंकार नालंदा या विजयनगर से ही ज्यादा ठीक से समझी जा सकती थी!