विचार
“वैश्विक हिंदुत्व का विघटन” सम्मेलन पर मौन का नुकसान भारतीय छात्रों को झेलना होगा

आलोचकों द्वारा काफी सराही गई फिल्म “फ्रीडम राइटर्स” 2007 में आई थी। इसका मुद्दा किशोरों की शिक्षा है, ऊपर से यह सत्य घटनाओं पर आधारित एक पुस्तर से बनी है, इसलिए भी इसे कई लोगों ने देख रखा होगा। फिल्म कई समस्याओं को स्पर्श करती है। इन समस्याओं में से एक भेदभाव भी है।

फिल्म की कहानी में जो स्कूल और वहाँ के किशोर-किशोरियाँ दिखाए गए हैं, उनमें से कई शरणार्थियों के रूप में आए हुए भी हैं। फिल्म के एक दृश्य में कुछ बदमाश किस्म के किशोर, अपने ही साथ पढ़ने वाले एक दूसरे किशोरों का कार्टून बनाकर मज़ाक उड़ा रहे होते हैं।

कक्षाओं में ऐसा होना कोई बड़ी अनोखी बात नहीं। शिक्षिका जब ऐसा होते देखती हैं, तो वे भविष्य में इसके परिणामों के प्रति बच्चों को सचेत करना चाहती हैं। वे नाज़ियों के शासन काल में यहूदियों के शोषण पर बच्चों का ध्यान लाती हैं। उस काल में यहूदियों के ऐसे कार्टून बनाए जाने से ही यहूदियों के प्रति नफरत की शुरुआत हुई थी।

शिक्षिका बच्चों को बताती है कि कैसे नफरत के बीज ऐसे ही बोए जाते हैं। फिर जब एक बार इस विष की फसल काटी जाने लगती है तो लाखों मनुष्यों को अपने सरों से उसकी कीमत चुकानी पड़ती है। हिंदुओं के प्रति भी ऐसी ही घृणा एक लंबे समय से फैलाई जाती रही है।

पहले इसे दूसरे नामों से ढककर फैलाया जाता था, लेकिन अब तो यह खुलकर सामने आने लगी है। मुग़ल काल की कथाओं में सवा मन जनेऊ सर काटकर उतारने और जलाने की बातें सुनाई देती थीं। तथाकथित संत फ्रांसिस ज़ेवियर के दौर में तो यह और भी बढ़ गया।

गोवा के इन्क्विज़िशन के दौर में हिंदुओं को ऐसे अनगिनत अत्याचार झेलने पड़े। जो तथाकथित संत फ्रांसिस ज़ेवियर इन हत्याओं, बलात्कारों और पैशाचिक यातनाओं को अपने रिलिजन के नाम पर उचित बताते थे, उनके नाम पर आज भारत के हर शहर-कस्बे में स्कूल-कॉलेज भी दिख जाते हैं।

विचित्र बात यह है कि इन नफरत के सौदागरों की पहचान करके अपनी संस्कृति और सभ्यता को बचाए रखने के लिए संस्थागत रूप से भारत के संस्कृति मंत्रालय तक की ओर से कोई प्रयास होते दिखाई नहीं देते। ऐसा तब है जब “फोर्थ जनरेशन वारफेयर” में सूचना-तकनीक के प्रयोग से भी कई लोग अच्छी तरह परिचित हैं।

ऐसे ही हमलों की शृंखला में जुड़ी हुई एक और कड़ी है ऑड्रे ट्रुश्के और उनके साथी भूरे साहिबों द्वारा आयोजित “डिसमैन्टलिंग ग्लोबल हिंदुत्व” सम्मेलन जो कुछ सप्ताह में आयोजित होने वाला है। इस आयोजन को कथित रूप से कई विश्वविद्यालय प्रायोजित कर रहे हैं।

आश्चर्य और खेद की बात है कि भारत के विदेश मंत्रालय और संस्कृति मंत्रालय ने इस विषय में कुछ भी नहीं करके, अब तक मौन रहना उचित समझा है। अगर ये मंत्रालय जानकारी न होने का दावा करते हैं तो फिर तो और भी आश्चर्य का विषय है क्योंकि उनका काम है भारत की छवि और भारत की संस्कृति को अच्छे रूप में बढ़ावा देना था।

जिस देश को हिंदू बहुल कहा जाता हो, अगर वह हिंदुत्व की छवि खराब होने से, देश की बहुसंख्यक आबादी को बुरे बताए जाने के कारण पड़ने वाले प्रभावों के प्रति चिंतित और जागरूक नहीं है, तो कहीं न कहीं यह उनपर एक बड़ा-सा प्रश्नवाचक चिह्न लगा देता है।

ऐसे आयोजनों के होने पर कुछ मासूम लोग यह भी प्रश्न उठा सकते हैं कि यह चर्चा ही तो है! आखिर एक चर्चा से अंतर क्या पड़ता है? ऐसे में ध्यान रखिए कि इन 40 विश्वविद्यालयों में भारत से गए कई छात्र-छात्राएँ भी पढ़ते हैं जिनमें से अधिकांश हिंदू हैं।

ऐसे आयोजनों के प्रभाव से कल को उनके साथ भेदभाव नहीं होगा इसकी गारंटी कौन ले सकता है? हाल ही में हमने ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में ऐसी ही एक घटना देखी है जहाँ छात्र संघ की पहली भारतीय महिला प्रमुख को त्याग-पत्र देने के लिए विवश किया गया था।

जाँच में यह सिद्ध हुआ था कि इस मामले में उडुपी (कर्नाटक) की छात्रा रश्मि सामंत को बुल्लीइंग (डराना-धमकाना) और विलिफिकेशन (तिरस्कृत करना) का शिकार होना पड़ा था। जो आज ऑक्सफ़ोर्ड में होता दिखा क्या कल वही इन 40 विश्वविद्यालयों में नहीं होगा?

इसके अलावा हमें यह भी याद रखना होगा कि अमेरिका में बंदूकों से संबंधित नियम वैसे नहीं हैं, जैसे दुनिया के कई दूसरे देशों में होते हैं। हाल के दौर में कोविड-19 वैश्विक महामारी के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों के प्रति नफरत और हिंसा का दौर हम देख चुके हैं।

इस आयोजन का होना वैसा ही है जैसा अंग्रेज़ी में कहा जाता है कि पीठ पर “बुल्स आइ” बनाकर टांग दिया जाए। सामंत के पास यह सुविधा थी कि उनका मुद्दा भारतीय और भारतीय मूल के लोगों की दृष्टि में आ गया। उसे वकीलों की और कानूनी सलाह उपलब्ध हो पाई।

इतने के बाद जब मुक़दमे की आँच और विश्वविद्यालय की जाँच के दौरान जो उनका फरवरी से समय नष्ट हुआ, उसकी भरपाई कौन करेगा? फिर प्रश्न यह भी है कि रश्मि सामंत तो एक थीं, उन्हें कानूनी सहायता मिल गई, क्या बाकी सभी को कानूनी मदद मिल पाएगी?

यहाँ यह भी याद किया जाना चाहिए कि हर बार गांधी की एक गाल पर थप्पड़ पड़ने पर दूसरा गाल आगे करने की नीति नहीं चलती। आपका सामना हिटलर जैसी नफरत की विचारधारा से हो तो आप उन्हें गुलाब भेजकर “गेट वेल सून” के संदेश देने से काम नहीं चला सकते।

फिर प्रश्न यह भी है कि अगर सहिष्णुता दिखानी ही है, सहना ही है, तो हर चीज़ को सहना करना हमारा ही दायित्व क्यों हो? कभी सीधे विदेशी हमलावरों के रूप में, कभी उपनिवेशवाद और कभी सांस्कृतिक मार्क्सवाद के नाम पर कब तक हमलों के निशाने पर हम ही बने रहें?

हमें यह भी समझना होगा कि विरोध न करने को कायरता मान लिया जाना भी कोई नई बात नहीं है। हमलावर यह भी सोच सकता है कि वह सही कर रहा होगा, तभी तो किसी ने उसका विरोध करने का नैतिक बल नहीं दिखाया। अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए हमें ऐसे हमलों से सुरक्षा तो सुनिश्चित करनी पड़ेगी।

ऐसा नहीं है कि केवल आम लोग ही इसका विरोध कर रहे हैं। कई लेखकों के अलावा हिंदुओं की ओर से इतिहास जैसे विषयों पर पक्ष रखने वाले लोग भी विरोध में सामने आ रहे हैं। इस प्रकरण में अनैतिक तरीकों का प्रयोग करके बिना अनुमति ही विश्वविद्यालयों का नाम इस्तेमाल किए जाने की घटनाएँ भी प्रकाश में आईं।

हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन और विदेशों में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों के संगठन भी इस कार्यक्रम के आयोजन के विरोध में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे हैं। जहाँ एक ओर भारत से विदेशों में अपने बच्चों को पढ़ने भेजने वाले विचार कर रहे हैं, वहीं ऐसे आयोजन को अपना नाम देने वाले विश्वविद्यालयों को भी एक बार विचार करना चाहिए कि ऐसे मुद्दों को उन्हें जगह देनी है या नहीं।