विचार
लोकतंत्र में असहमति व्यक्त करने का सही माध्यम क्या होना चाहिए
केशव राव - 15th December 2020

लोकतंत्र की परिकल्पना सार्वभौमिक जन-चेतना से उत्पन्न होती है। भारत जैसे वृहद् राष्ट्र में प्रत्येक निर्णय के लिए मत-संग्रहण संभव नहीं है। इसके समाधान हेतु इसी जन-चेतना ने एक व्यवस्था निर्धारित की है जिसमें हर वयस्क स्त्री-पुरुष, परिमित समयकाल के लिए अपने जन-प्रतिनिधि चुनते हैं ताकि वे सर्वहित के लिए विशेषकर भौतिक संपदा से वंचित समूहों के परिवर्धन हेतु नीतियाँ बनाएँ एवं क्रियान्वित करें।

विश्व में जनतंत्र का कोई रूप क्यों ना हो, उसके मूल में यही अवधारणा वास करती है तथा इसी परिकल्पना को साकार करने के लिए देश का प्रत्येक नागरिक अपनी अलिखित सहमति देता है। परंतु यदिए इसी लोकतांत्रिक अंग का एक अल्पभाग इन नीति(यों) से असंतुष्ट हो तो उसका निराकरण कैसे हो?

स्वतंत्र भारत में जहाँ जनता को अपने क्षेत्र के सांसद से वाद-प्रतिवाद करने से लेकर, उनसे लिखित असहमति व्यक्त करने की, समाचार-पत्रों में अपने विचार उन्मुख रूप से प्रकट करने की व्यवस्था सुरेखित है। अन्यथा न्यायालय के मार्ग भी हर देशवासी के लिए अनिभृत है, तत्पश्चात यदि कोई संतुष्ट नहीं है तो एक नियत समयावलि पर सत्ता-परिवर्तन का ब्रह्मास्त्र भी सर्वथा उपलब्ध है।

ऐसे में क्या लोकतांत्रिक राष्ट्र में औपनिवेशिक समय जैसा विरोध, “चक्का-जाम”, अराजकता, और हिंसक प्रवृत्ति वैध प्रदर्शन है?

औपनिवेशिक काल में अंग्रेज़ों के विरुद्ध इन प्रदर्शनों को आप वैध कह सकते थे क्योंकि उन्होंने छल-बल से राज करने और प्राकृतिक संपदा के दोहन के स्वार्थपरक उद्देश्य से ही नीतियाँ बनाईं, लेकिन स्वतंत्र भारत में लोकतांत्रिक पद्धति से चुनी हुई सत्ता के विरुद्ध भी वैसा प्रदर्शन करना कहाँ तक उचित है?

कुछ व्यक्ति समूहों के मत सरकार से कितने ही भिन्न हों, और स्व-उचित प्रतीत होते हों, क्या उन्हें अन्य सभी वासियों के आवागमन मार्ग में अवरोध उत्पन्न कर, अथवा सरकारी संपदा की हानि कर प्रदर्शन करना न्यायोचित है?

पिछले वर्ष शाहीनबाग में नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरुद्ध प्रदर्शन, तत्पश्चात दिल्ली की हिंसक एवं रक्त-रंजित घटनाएँ हों अथवा वर्तमान में किसानों की दिल्ली-जयपुर मार्ग बाधित करने की घटनाएँ, यह लोकतंत्र की उस मूल अवधारणा को धता बताती है जिसके अंतर्गत देश के हर नागरिक ने लोकतंत्र में रहने की नियमावली को मौन स्वीकृति दी है।

यद्यपि, वर्तमान घटना में किसी की सहानुभूति और वैचारिक सम्मति इन असम्मत किसानों के साथ हो भी, तो उन शेष जन (शेष किंतु बहुतर पक्ष) के मत का क्या जो यद्यपि सड़कों पर नहीं उतरता तथापि समीक्षा कर सकता है, किसानों के हितों की रक्षा हेतु छद्म रण को तत्पर इन राजनीतिक स्वार्थी पिपासुओं की सही मंशा समझ सकता है, किंतु वह मौन रहता है।

उसके मौन का अर्थ भय अथवा शिथिलता कदापि नहीं है। उसने लोकतांत्रिक मूल्यों के अभिज्ञान का सही उदाहरण उद्धृत किया है, वह जानता है कि नीतियों के वाद-विवाद के भ्रमजाल के पश्चात भी यदि उसका क्रियान्वयन उपयुक्त रीति से नहीं हुआ तो वर्तमान सत्ताकारों को केवल इतिहास के पृष्ठों में पढ़ाया जाएगा।।

लोकतंत्र में यदि नीतियों से मतभिन्नता कृत्रिम एवं स्वार्थपरक न भी हो, तो भी निर्वाचित शासन की नीतियों के विरुद्ध अपनी असहमति व्यक्त करने की और कौन-सी विधि हो सकती है?

कदाचित इसका सही उत्तर हमें तब प्राप्त होगा जब हम भारतीय लोकतांत्रिक स्तंभों (व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं पत्रकारिता) के हर उस निर्णय, कार्यों और आलेखन पर उन व्यक्ति-समूहों की परिकाल्पनिक विचारधारा जिनका मूल भारतीय ऐतिहासिक और सांस्कृतिक मूल्य से परे है, के संदेह के बीजारोपण को प्रकाश-वायु से स्फुटित होने ना दें।

भारतीय लोकतंत्र की जड़ों के सुदृढ़ एवं विस्तारण हेतु हमें अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों के भूगर्भ में जाने की आवश्यकता है, ना कि उनका निर्मूलन कर उसे दूसरी भूमि में प्रतिरोपित करने की।

भारत की उचित दिशा और दशा हेतु लोकतंत्र के सभी अंगों को इस अलोकतांत्रिक प्रदर्शनों के प्रत्येक प्रयत्न को निरुत्साहित करना चाहिए। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि प्रदर्शनों (शांतिपूर्ण) को अवैध मानकर उनपर हिंसक कार्यवाही की जाए, यद्यपि अतिक्रमणकारियों या उनके प्रतिनिधियों पर अर्थ दंड लगाकर उन्हें इस औपनिवेशिक काल के प्रदर्शन विधि को हतोत्साहित किया जाए, उनके प्रदर्शन और असहमति हेतु एक नीयत स्थान एवं अवधि का निर्धारण किया जाए।

अंततोगत्वा, भारत के सभी नागरिक को उनके अधिकारों के साथ ही उनके कर्तव्यों का महत्त्व ज्ञात होने से ही नए भारत का निर्माण एक सुदृढ़, सशक्त और संपन्न राष्ट्र के रूप में हो सकता है।