राजनीति / विचार
थोड़ा असंतुलित होने के बावजूद पटाखों के प्रतिबंध पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय प्रशंसनीय

आशुचित्र-

• सर्वोच्च न्यायालय ने दीपावली के कारण प्रदूषण की मात्रा को सही तरह समझकर सही कदम उठाया है
• विनियमित हो और कम हो, लेकिन पूर्णतः प्रतिबंधित न हो


सर्वोच्च न्यायालय की दो न्यायाधीशों की बेंच- ए.के.सिकरी और अशोक भूषण ने दिवाली पर पटाखों के प्रतिबंध पर एक समझदार निर्णय लिया है। पूर्ण प्रतिबंध को हटा दिया गया है और इसकी जगह प्रतिबंध के कुछ नियम आ गए हैं।
आज (23 अक्टूबर) को निर्णय में कहा गया कि पटाखों का क्रय-विक्रय और दिवाली व अन्य दिनों में ‘ग्रीन’ पटाखों का उपयोग रात्रि 8 से 10 के बीच किया जा सकता है। क्रिसमस और नव वर्ष के लिए समय-सीमा रात्रि 11:45 से 12:15 रखी गई है। ऑनलाइन माध्यमों व अनाधिकृत विक्रेताओं से बिक्री प्रतिबंधित कर दी गई है जिससे अंधाधुंध बिक्री न हो पाए।
यह निर्णय, जो हालाँकि पुलिस के लिए कठिन साबित होगा, लेकिन कम-से-कम समुदायों में समानता तो लेकर आया है। यह निर्णय थोड़ा असंतुलित भी है क्योंकि हिंदू त्यौहारों में पारंपरिक रूप से पटाखे जलाए जाते हैं जबकि यह बात क्रिसमस पर लागू नहीं होती है। दिवाली प्रकाश का पर्व है पर क्रिसमस में ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है कि पटाखे जलाए जाने चाहिए। लेकिन न्यायालय को दिवाली पर पटाखों के प्रतिबंध हटाने को उचित सिद्ध करने के लिए क्रिसमस को बीच में लाने की आवश्यकता महसूस हुई।

यह बात गौर करने योग्य है कि बेंच ने केवल हिंदू त्यौहारों पर प्रतिबंध के नियम न लगाकर अपने फैसले में इस बात का पूरा ध्यान रखा कि कोई विवाद न हो और यह बात प्रशंसा योग्य है। कम-से-कम इस निर्णय में निष्पक्षता का प्रयास तो है। यही तर्क इसके पिछले सबरीमाला निर्णय में लागू होता है जिसकी अनेक भक्तों की याचिका के बाद समीक्षा होने वाली है।

क्योंकि पटाखों के प्रतिबंध के नियम पुलिस के लिए आसान नहीं हैं, यह सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह अपना दायित्त्व निभाए और पटाखों के प्रकारों को संयमित करे।

सरकार को तीन चीज़ें करनी चाहिए-

पहली, इसे कम प्रदूषण करने वाले रसायनों को खोजना चाहिए जिससे दिवाली पर कम-से-तम प्रदूषण हो।

दूसरी, इसे पटाखों के उत्पादन और वितरण पर नज़र रखनी चाहिए जिससे नियमों का उल्लंघन न हो।

तीसरी, इस बात को सुनिश्चित करना चाहिए कि पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फसल जलाने और दिल्ली व अन्य महानगरों में वाहन प्रदूषण को भी शिक्षा, विनियमन और निजी वाहनों पर भारी करों के माध्यम से कम किया जाए। इससे सार्वजनिक परिवहन की महत्ता भी बढ़ेगी।

दिवाली के पटाखों पर प्रतिबंध विवाद को आमंत्रित तो करेगा ही जब इससे बड़े प्रदूषण के कारणों पर कोई कार्रवाई न होकर केवल त्यौहारों के उत्साह का हनन किया जाएगा। अब नगरीय प्रदूषण के विरुद्ध जंग छेड़ी जानी चाहिए, खासकर कि दिल्ली में।
सर्वोच्च न्यायालय ने दीपावली के कारण प्रदूषण की मात्रा को सही तरह समझकर सही कदम उठाया है। इसे विनियमित और कम किया है, लेकिन पूर्णतः प्रतिबंधित नहीं किया।

हिंदुओं को इस वास्तविकता को स्वीकार करना चाहिए और समुदाय में पटाखों का प्रयोग करते हुए ज़िम्मेदार रहना चाहिए जिससे अधिक से अधिक लोग कम प्रदूषण कर त्यौहार को पूरे उत्साह से मना सकें।