विचार
टीका रणनीति की समीक्षा- कुछ कमियों के बावजूद नई नीति व्यवहार्य और समझदारीपूर्ण

समस्या तब भी है जब आप करें और तब भी जब आप नहीं करें। जैसी अपेक्षा थी, वैसा ही हुआ। केंद्र की टीका रणनीति की सार्वजनिक आलोचना करने के बाद अब विपक्ष सरकार की संशोधित टीका नीति का भी विरोध कर रहा है।

पहले विपक्ष ने कहा कि टीका असुरक्षित हो सकता है। फिर ज्ञात हुआ कि ऐसा नहीं है, भले ही कुछ मामलों में प्रतिकूल प्रतिक्रिया देखने को मिली। फिर, कोविड की दूसरी लहर से निपटने में स्वयं को असमर्थ पाते हुए विपक्ष ने टीका-अभाव का रोना शुरू किया।

यह भी आरोप लगाया गया कि गैर-भाजपा शासित राज्यों को टीका देने में भेद-भाव किया जा रहा है। इसके बाद राज्यों ने माँग की कि उन्हें किसी भी आयुवर्ग के व्यक्ति के टीकाकरण की अनुमति दी जाए। अब जब सरकार ने इसकी घोषणा कर दी है तो वे एक राष्ट्र-एक टीका मूल्य की माँग करने लगे हैं।

कुल मिलाकर, राज्य चाहते हैं कि उन्हें आवंटित होने वाले धन का तो वे आनंद उठाएँ ही लेकिन केंद्र के हिस्से वाली राशि में भी अपना मुँह मारें। हम कल्पना कर सकते हैं कि यदि केंद्र इस बात को भी मान जाता है तो विपक्षी राज्य क्या कहते।

संभवतः वे कहते कि पूरी टीका रणनीति फार्मा कंपनियों को लाभ पहुँचाने के लिए है और करदाता एवं निर्धनों के पैसों पर टीका विनिर्माण उद्योग फल-फूल रहा है। इन सबको देखते हुए हम यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि 19 अप्रैल को घोषित टीका रणनीति की कोई आलोचना नहीं होगी।

लेकिन यह कह सकते हैं कि लगभग सही समय पर यह लगभग सही रणनीति है क्योंकि अब महामारी में काफी वृद्धि देखने को मिल रही है। इस रणनीति की कमियों को समझने से पूर्व पहले इसके मुख्य बिंदु समझ लेते हैं।

नई रणनीति के तहत सरकार उत्पादित टीका का आधा भाग उसी मूल्य पर खरीद सकती है, जिसपर अभी तक खरीदती आ रही थी और इसका उपयोग वह 45 से अधिक आयु वाले लोगों के सरकारी अस्पतालों व क्लिनिक पर टीकाकरण हेतु करेगी।

राज्य सरकारें विनिर्माताओं से सीधे टीका खरीद सकेगी और मूल्य पर आपसी समझौता किया जा सकता है लेकिन उसकी घोषणा पहले से करनी होगी। निजी अस्पताल और कंपनियाँ 1 मई से बाज़ार मूल्य पर टीका खरीद सकती हैं और उन्हें भी पहले से इसकी घोषणा करनी होगी।

साथ ही, आपूर्ति को बढ़ाने के लिए केंद्र ने 4,500 करोड़ रुपये की सहायता राशि (3,000 करोड़ रुपये कोविशील्ड बनाने वाली सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया और 1,500 करोड़ रुपये कोवैक्सीन बनाने वाली भारत बायोटेक को) दी है।

यदि सब सही रहा तो मई के अंत या जून के प्रारंभ में 18 वर्ष से अधिक आयु के विस्तृत दायरे से टीका की बढ़ी माँग को भी पूरा किया जा सकेगा। लेकिन दो समस्याएँ अभी भी बनी हुई हैं- कैसे हम धनवान राज्यों को बोली लगाकर टीका मूल्य बढ़ाने से रोकें ताकि निर्धन राज्य पैसे न दे पाने के कारण टीका-अभाव से ग्रसित न हों?

दूसरा, इस उतार-चढ़ाव वाले बाज़ार में कैसे मूल्य निर्धारित होगा जहाँ कई विनियामक शक्तियों के साथ केंद्र का एकाधिकार है तथा कुछ विनियामक शक्तियों के साथ और शक्तिशाली क्रेता हैं एवं निजी खिलाड़ियों को अधिक मूल्य देकर टीका खरीदना होगा जिनका उपयोग पहले दो क्रेताओं को सब्सिडी देने में होगा?

क्या एक ही उत्पाद के लिए तीन मूल्य होंगे? या उससे भी अधिक क्योंकि हर निजी खिलाड़ी अपने अनुसार मूल्य समझौता करेगा? यह सब दुविधापूर्ण है लेकिन सुनिश्चित करता है कि जो मूल्य हम देंगे उसका उपयोग जन साधारण के मुफ्त टीकाकरण हेतु होगा।

जब केंद्र विवरणात्मक दिशानिर्देश जारी करेगा तब और स्पष्टता हमें मिलेगी। लेकिन कुछ सुझाव निम्नलिखित हैं-

पहला, राज्य प्रतिनिधियों के साथ केंद्र एक मूल्य समझौता दल का गठन करे या राज्य स्वयं ऐसा कर सकते हैं जिससे टीका विनिर्माताओं को घाटा भी न सहना पड़े और सही मूल्य पर अधिकांश लोगों को टीका मिल जाए। सही मूल्य वह होगा जिसपर राज्य टीका खरीद सकें और विनिर्माता भी थोड़ा लाभ कमा सकें।

दूसरा, वस्तु एवं सेवा कर में राज्यों के हिस्से पर उप-कर लगाने की अनुमति होनी चाहिए- छह महीनों के लिए ताकि 18-45 आयुवर्ग वाले लोगों के लिए टीका सब्सिडी की लागत की भरपाई वे कर सकें। 45 से ऊपर वालों के लिए वैसे ही केंद्र सरकार की मुफ्त टीकाकरण नीति है।

तीसरा, मुक्त बाज़ार को सच में स्वतंत्रता देनी होगी जिसमेंनिजी अस्पताल, क्लिनिक और कंपनियाँ अपने कर्मियों के लिए टीका खरीदेंगे। इस प्रकार तीन स्तर के मूल्य होंगे- प्रति डोज़ 150 रुपये से राज्यों के लिए इसका दोगुना या तीन गुना और निजी संस्थानों के लिए 1,000 रुपये तक।

कुछ इसी प्रकार की घोषणा सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया ने कल (21 अप्रैल) को की थी जिसमें वह 400 रुपये प्रति जोड़ के मूल्य पर केंद्र व राज्य सरकारों को टीका देगी जबकि निजी क्षेत्र के लिए 600 रुपये का मूल्य तय किया गया है।

निजी क्षेत्रों की लागत अधिक नहीं होगी बल्कि यह उनके लिए एक बीमा की तरह काम करेगा जो कर्मचारियों के बीमार पड़ने से होने वाले नुकसान से उन्हें बचाएगा। यह रणनीति भले ही त्रुटिहीन न हो लेकिन व्यवहार्य है और समझदारीपूर्ण भी।