विचार
भारतीय वामपंथी डेविड फ्रॉली से क्यों करते हैं नफरत?

प्रसंग
  • हिंदुत्व मंडलियों में फ्रॉली का सम्मान इसलिए नहीं किया जाता है कि इस आंदोलन में बुद्धिजीवियों की कमी है बल्कि इसलिए किया जाता है क्योंकि वह विद्वान हैं और हिन्दुत्व के मित्र हैं।

सुश्री कावेरी बामज़ई द्वारा पंडित वामदेव शास्त्री (डेविड फ्रॉली) पर हाल ही में लिखा गया लेख इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि मीडिया किस तरह से हिंदुत्व को बदनाम करती है। लेख पढ़कर कोई भी यह जान सकता है कि पत्रकारिता-सम्बंधी विषयनिष्ठता के रूप में पूर्वाग्रह और द्वेष का छलावरण कैसे गढ़ा जाता है। इस लेख का एक संपूर्ण अध्ययन मीडिया के दोमुहेपन की कला को समझने में एक सुखद और उपयोगी अभ्यास होगा।

अगर किसी को कीबोर्ड चलाने की (इंटरनेट इस्तेमाल करने की) ज़रा सी भी जानकारी है तो उसके लिए यह लेख चयनात्मक लिस्ट में पहले से ही ऑनलाइन उपलब्ध है। लेकिन जो लेखक छुपाता है उससे ज्यादा वह पंडित फ्रॉली के राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कथित पोस्टर ब्वॉय होने के बजाय औपनिवेशिक-मार्क्सवादी परिस्थितिकी तंत्र के लिए परेशान क्यों हैं, के बारे में बताता है।

क्या हिंदुत्व आंदोलन में बुद्धिजीवियों की कमी है?

सबसे पहले तो बामज़ई रूढ़ प्रारूप हिंदुत्व को पागल बुद्धिजीवियों का आंदोलन बताने की कोशिश करती हैं। हकीकत में, हिंदुत्व आंदोलन ने स्वतंत्र भारत के इतिहास में कुछ मूल विचारकों का निर्माण किया है। आइए हिंदुत्व के पक्ष में बुद्धिजीवियों की कमी के इस मिथक को देखें।

अगर कोई उन भारतीयों का पता लगाए जिन्होंने खुद डेविड फ्रॉली को प्रेरित किया, तो वह राम स्वरूप (1920-1998) और सीता राम गोयल (1921-2003) को पाएगा। राम स्वरूप के साम्यवादी आंदोलन की आलोचना किसी और ने नहीं बल्कि बर्ट्रेंड रसेल ने की थी। अगर कोई राम स्वरूप की कृतियों पर नजर डाले, तो वह पाएगा कि उन्होंने दशकों पहले अंदाजा लगा लिया था कि कुछ आधुनिक खोजी मस्तिष्क विज्ञानी समकालीन समय में धार्मिक ज्ञान रच रहे थे। गाँधीवादी अर्थशास्त्र पर उनके दस्तावेज़ ने लगभग यह भविष्यवाणी कर दी थी कि एल्विन टॉफ्लर एक दशक बाद क्या लिखेंगे।

हिंदुत्व के खिलाफ पक्षपात तब नज़र आता है जब सुश्री बामज़ई दीनदयाल उपाध्याय की पुस्तक ‘इंटीग्रल ह्यूमनिज्म़’ को ‘अनिर्धारित और निषिद्ध’ कहकर तथा हिन्दुत्व के बुद्धिजीवियों को आमतौर पर ‘महाराष्ट्र के गँवार ब्राह्मणों की एक श्रृंखला’ कहकर उपेक्षा करती हैं। अहंकारयुक्त यह अज्ञानता पत्रकारिता के रूप में बेची जा रही है।

आज, धर्मपाल (1922-2006) शुरुआती औपनिवेशिक भारत के इतिहासकार के रूप में मशहूर हैं जिन्होंने औपनिवेशिक समाजों और संस्कृतियों के उत्तर-उपनिवेशवाद अध्ययनों में नई खोजें की हैं। यह एक हिंदुत्ववादी सीता राम गोयल थे, जिन्होंने पहली बार धर्मपाल को प्रकाशित किया था जब उन्होंने प्रयोगसिद्ध डेटा को औपनिवेशिक-मार्क्सवादी इतिहासलेखन द्वारा बुने गए भारतीय अतीत के बारे में रूढ़िवादों को चुनौती दी थी। बाद में, साल 1993 में, मद्रास में सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज, जो कि हिंदुत्व का एक विचार मंच है, में 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में कारसेवा के परिणामों पर बोलते हुए उन्होंने औपनिवेशिक-मार्क्सवादी इतिहास लेखन, जिसे आज शिष्ट भाषा में नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता कहा जाता है, पर एक कठोर बौद्धिक हमला किया।

संघ के बुद्धिजीवियों ने जिस तरह की बौद्धिक कठोरता और ईमानदारी दिखाई वह आज किसी भी औपनिवेशिक-मार्क्सवादी या नेहरूवादी बुद्धिजीवियों से मेल नहीं खा सकती है।

मार्च 1988 में, आरएसएस के दीनदयाल शोध संस्थान (डीआरआई) ने तथाकथित ‘अक्टूबर क्रांति’ के सत्तर सालों पर एक संस्करण लाने का फैसला किया। यह डीआरआई द्वारा आयोजित एक संगोष्ठी के बाद हुआ था जिसमें मार्क्सवाद के हू-इज़-हू के लगभग सभी लोगों ने भाग लिया था। सीपीआई ने अपनी दो प्रतिष्ठित हस्तियों ए. बी. बर्धन और सुब्रता बनर्जी को भेजा था। जेएनयू से प्रोफेसर सोंधी और प्रोफेसर इम्तियाज़ अहमद आए थे। इसके लिए, ई. एम. एस. नंबूदिरीपाद उपस्थित न हो पाए थे तो उन्होंने एक दस्तावेज़ का योगदान दिया था जिसका शीर्षक था ‘दि अक्टूबर रिवॉल्यूशन एंड इंडियन कम्यूनिटीज’। के. आर. मलकनी (1921-2003), जो डीआरआई की पत्रिका मंथन के संपादक थे, के पास भी एक दस्तावेज़ था जिसका शीर्षक था ‘द रसियन रिवॉल्यूशनः एन इंडियन ओवरव्यू’।

जब सभी दस्तावेज़ों को प्रतिभागियों के बीच प्रसारित किया गया, ईएमएस जो वास्तव में भाग न ले सके थे, मलकनी का दस्तावेज़ पढ़कर बहुत परेशान हुए कि उन्होंने एक अनुपूरक दस्तावेज़ लिखा – ‘रिब्यूटिंग मलकनी’। इसको डीआरआई द्वारा स्वीकार कर लिया गया। इसलिए जब मंथन के संस्करण को प्रस्तुत किया गया, तब इसमें ईएमएस के दो दस्तावेज़ों को शामिल किया गया था। तो कुछ इस तरह से हिंदुत्व और संघ, संघ की अपनी ही पत्रिका में अपने वैचारिक विरोधियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मान्यता देता रहा है। नेहरूवादियों और मार्क्सवादियों के साथ ऐसी बौद्धिक ईमानदारी देखना मुश्किल है। और वास्तव में यह बौद्धिक ईमानदारी एक मजबूत बौद्धिक स्थिति से ही आती है।

खैर, के. आर. मलकनी एक सिंधी थे न कि ‘महाराष्ट्र के एक गँवार ब्राह्मण’।

हिंदुत्व के बुद्धिजीवी बिना किसी संस्थागत समर्थन के और करदाताओं के धन से संस्थानों पर कोई दबाव डाले बिना ही जमीन से उठकर सामने आए थे, यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि औपनिवेशिक-मार्क्सवादियों को किस-किस तरह के समर्थन मिले थे, अमेरिका में पहले सोवियत संघ से और फिर ‘दक्षिण एशियाई’ विभागों से उन्हें समर्थन प्राप्त था। उस समय कुछ सर्वश्रेष्ठ बुद्धिजीवियों के पास वातानुकूलिक कमरों में बैठकर अपने दृष्टिकोण के विरोधाभासी लेखों पर प्रतिक्रिया देने की सुविधा नहीं थी। इसके बजाय वे देश में दलितों के लिए काम करने में खुद को शामिल करना पसंद करते थे और बिना किसी विदेशी सहायता के उन्होंने भारत के सबसे बड़े शैक्षणिक और चिकित्सा नेटवर्कों में से एक का निर्माण किया।

जहाँ कहीं भी प्राकृतिक आपदाएँ या मानव निर्मित घटनाएँ घटीं वहाँ वे बिना किसी भेदभाव के लोगों की ज़िंदगियाँ बचाने के लिए सबसे पहले पहुँचे। वे हिंदू परंपरा के अधिकतर रूढ़िवादियों को एक मंच पर एक साथ लाए और उन्हें इस बात का प्रतीक बनाया कि हिन्दू समाज में अस्पृश्यता के लिए कोई स्थान नहीं था। हाँ, वे जमीनी स्तर पर जीवन को बदलने और और लोगों की सेवा करने में इतने व्यस्त रहे कि आठ दशकों तक उन्हें महसूस ही नहीं हुआ कि उनकी वर्दी पुरानी और हास्यास्पद हो गई है। फिर भी, यह तथ्य उल्लेखनीय है कि उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय, दत्तोपन्त ठेंगड़ी, रमेश पतंगे, नानाजी देशमुख, देवेन्द्र स्वरूप और के. आर. मलकनी जैसे कई बुद्धिजीवी दिए, जिनके विचार विदेशी विचारधाराओं से नहीं आए थे, बल्कि लोगों के साथ काम करके और अपनी संस्कृति को महत्त्व देकर आए थे।

यह सच है कि किसी पत्रकार द्वारा एक बचकाने तरीके से इतनी आसानी से इस तरीके की एक बौद्धिक प्रवृत्ति को खारिज कर देना निश्चित रूप से असमर्थता के पक्ष में एक टिप्पणी है, लेकिन हिंदुत्व आंदोलन के लिए नहीं है।

आइए अब डेविड फ्रॉली के बारे में बात करते हैं।

क्या पंडित वामदेव सिर्फ एक ‘दक्षिणपंथी’ हिप्पी (युवा आंदोलन, जो संयुक्त राज्य अमेरिका में शुरू हुआ था, के सदस्य) हैं जिनकी खोज आरएसएस ने कुछ पाश्चात्य स्वीकृति पाने के लिए की है जैसा कि सुश्री बामज़ई ने अपने लेख में कई बार संकेत किया है? निश्चित रूप से इसका जवाब है-‘नहीं’। वास्तव में, डेविड फ्रॉली हिंदू पवित्र साहित्य के अध्ययन के एक विशिष्ट विद्यालय से संबंधित हैं जो कभी मूल रूप से हिंदू रहा है और जिसे पाश्चात्य शैक्षणिक समुदायों में भी धर्म के कुछ महान विद्वानों द्वारा मान्यता प्राप्त हुई है। इसके लिए एक उदाहरण पर्याप्त होगा।

डॉ. जॉर्ज फ्यूअर्स्टेन (1947-2012), जो पाश्चात्य शैक्षणिक समुदाय में योग ग्रंथों के एक वक्ता हैं, ने अपनी प्रारंभिक किताबों में से एक तांत्रिक योगा एंड दि विजडम गॉडेसेज (1994 : 2003) लिखी। भारतीय दार्शनिकों ने गौर किया कि कैसे डेविड फ्राली ने पश्चिम की नई पीढ़ी द्वारा योग के दुरूपयोग को रोकने के लिए उचित, पारंपरिक और संशोधित विकल्प तथा समझ प्रदान की। यहाँ पर हमारे पास एक विद्वान का उदाहरण है जिसने फ्राली के कार्य का समर्थन और मूल्यांकन करते हुए हिंदू योग प्रणाली का अध्ययन करने में अपना जीवन बिताया था। फ्रॉली के बारे में डा. फ्यूअर्स्टेन ने लिखा-

“पंडित वामदेव का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह तथाकथित ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ के वैश्विक संदर्भ में हिंदुत्व को उचित स्थान पर रखते हैं। यदि हिंदुत्व के लिए यह न्यायोचित दृष्टिकोण लोकप्रिय हो जाता है (और फ्राली और फ्यूअर्स्टेन ने इस प्रसिद्धि कारक को बखूबी पहचाना) तो हिंदुत्व पर दक्षिणपंथ का लेबल लगाना और वार करने के लिए पश्चिम के नक्शेकदम पर चलने वाले वामपंथ के शब्दाडम्बर का सहारा लेना मुश्किल हो जाता है। अपनी पुस्तक ‘हिंदुइज्म एंड द क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन्स’ (2003) में फ्राली प्रदर्शित करते हैं कि किस तरह सभ्यताओं का वैश्विक संघर्ष हो रहा है।”

वह यह भी स्पष्ट करते हैं कि भारतीय वामपंथ इस संघर्ष में कहाँ पर है जो पाश्चात्य सांस्कृतिक वर्चस्व के एक अन्य रूप के पक्ष में तेजी से उनकी ही पारंपरिक संस्कृति को खोखला करने का काम कर रहे हैं, हालाँकि, प्रायः उनका पाश्चात्य-विरोध अथवा अमेरिका-विरोध सामने आता रहा है।

इसके अलावा, इस पुस्तक की प्रस्तावना लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के राजनीति शास्त्री ऐडन रैंकिन द्वारा लिखी गई थी, जो अब जैन-दार्शनिक हैं। ऐडन ने वामदेव शास्त्री को ‘सच्चे साधक’ के रूप में माना, जो अपनी पुस्तक के माध्यम से नेहरू की असफल समाजवादी योजना – और प्रभावी कोका कोला पूंजीवाद, जिसकी अनैतिकता दिन प्रतिदिन स्पष्ट होती जाती है – के लिए एक मानवीय विकल्प प्रदान करते हैं।

जब सुश्री बामज़ई को प्रोफेसर सुभाष काक जैसे विद्वानों का उल्लेख करना होता है तो वह मध्यम राजनीतिज्ञों के समर्थन का दृष्टिकोण अपनाती हैं। इसलिए सुभाष काक ‘उनके कम्प्यूटर वैज्ञानिक मित्र और कभी कभी सह-लेखक’ बन जाते हैं। इसे इस तरह भी फिर से लिख सकते हैं कि ‘सुभाष काक, जो प्रसिद्ध काक-न्यूरल नेटवर्क और साथ ही साथ विज्ञान के इतिहास में अपने दस्तावेजों के लिए लोकप्रिय हैं, ने डेविड फ्राली के साथ एक पुस्तक भी लिखी है।’ देखिए यह कैसा लगता है और यह वैसा ही है जिससे हमारे संस्थागत पत्रकार बचना चाहते हैं। पारिभाषिक रूप से ‘कंप्यूटर वैज्ञानिक’ शब्द केवल तकनीक विशेषज्ञ होने की कल्पना को दर्शाता है। एमएस बामज़ई यही चाहती हैं। यह वास्तव में एक अन्य औपनिवेशिक-मार्क्सवादी कहानी में फिट बैठता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रवासी भारतीय सामाजिक-विज्ञान से अपरिचित सॉफ़्टवेयर तकनीक विशेषज्ञ किसी तरह के अलगाव के कारण अपनी पुरानी विरासत पर चर्चा करते रहते हैं। इसलिए संयुक्त राज्य अमेरिका में हिंदुओं की सूचना देने के लिए उपस्थित हिंदू केवल एक मनोविकारी घटना का प्रदर्शन करते हैं।

पंडित फ्रॉली के बारे में सभी मिथ्या विश्लेषण करने में कावेरी बामज़ई एक तथ्य से चूक गईं। 2003 की शुरुआत में, फ्रॉली ने अपनी पुस्तक ‘क्लैश ऑफ वर्ल्ड सिविलाइजेशन’ में सौर ऊर्जा और गायत्री मंत्र पर एक अलग अध्याय लिखा था। अपने विलक्षण तरीके से उन्होंने चेतना के आंतरिक सूर्य और उन वैदिक भजनों का वर्णन किया था जिनमें आंतरिक सूर्य के वैभव तथा ऊर्जा और इसके साथ व्यक्तिगत साधना के संबंध की स्तुति की गई है। साथ ही उन्होंने ऊर्जा संकट के संदर्भ में बाहरी सूर्य के बारे में भी लिखा-

“बढ़ती आबादी और एशिया, अफ्रीका और संभवतः अमेरिका के विकासशील देशों की बढ़ती संपन्नता के साथ हमारी ऊर्जा आवश्यकताओं में दिन प्रतिदिन वृद्धि हो रही है जिसकी मांग वही सुविधा प्राप्त करने की है जिसका फायदा पाश्चात्य दुनिया दशकों से उठा रही है। ऊर्जा संकट का अंतिम उपाय सौर ऊर्जा है क्योंकि यह ऊर्जा का एक साफ-सुथरा स्रोत है जो असीमित है। हालांकि इसके लिए तकनीक को पूरी तरह से विकसित करने में कुछ दशक लग सकते हैं। हमें ऊर्जा अनुसंधान में सौर ऊर्जा को प्राथमिकता देनी चाहिए। पृथ्वी की रक्षा करने के लिए हमें सूर्य पर ध्यान केंद्रित करना होगा।”

‘हिंदुइज्म एंड दि क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन्स’ , 2003) पेज 223

डेविड फ्रॉली द्वारा यह बातें लिखे जाने के 12 वर्षों बाद, 30 नवंबर 2015 को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राज्य अमेरिका को चौंकाते हुए अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन का गठन किया। क्या तब भी कोई आश्चर्य की बात है कि पंडित फ्राली को हिंदुत्व में सम्मान क्यों दिया जाता है? ऐसा इसलिए नहीं कि हिंदुत्व में बुद्धिजीवियों की कमी है, बल्कि इसलिए कि डेविड फ्रॉली एक दूरदर्शी और भारत के सच्चे मित्र हैं।

अरविंदन स्वराज्य के एक सहायक संपादक हैं।