विचार
डाटा निजता या घृणा भाषण के विषय में तकनीकी मंच अपने नियम नहीं लागू कर सकते

आशुचित्र- भारत के कड़े डाटा निजता कानून के बिना तकनीकी मंचों पर लगाम नहीं कसी जा सकती।

सितंबर की बात है कि पेटीएम के सीईओ विजय शेखर शर्मा ने एक बड़ा विवाद खड़ा किया जब गूगल ने अस्थाई रूप से पेटीएम ऐप को प्ले स्टोर से हटा दिया था, यह कहकर कि वह इसके जुआ-विरोधी नियमों का उल्लंघन कर रहा है।

इकोनॉमिक टाइम्स  के साथ एक साक्षात्कार (21 सितंबर) में उन्होंने कहा था कि वे तब तक गूगल को कड़ी चुनौती देंगे जब तक कोई तर्कसंगत निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जाता क्योंकि पेटीएम के प्रतिस्पर्धी गूगल पे पर भी स्क्रैच कार्ड और कैशबैक जैसे फीचर्स हैं।

शर्मा ने कहा, “यह देश के हर नियामक और सरकार के लिए चिंता का विषय होना चाहिए क्योंकि हमारी ऐप कोई जुआ ऐप नहीं है। मैं इससे इतना उत्तेजित हुआ हूँ कि मुझे नहीं लगता कि यह आज या कल रुकेगा, यह लड़ाई लंबी चलेगी।”

इससे पहले एक राजनीतिक विवाद भी इस बात पर खड़ा हुआ था कि क्या फेसबुक इंडिया भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राजनेताओं की “घृणा भाषण” वाली पोस्ट न हटाकर पार्टी के प्रति भेदभाव कर रहा है। इसपर फेसबुक ने कहा था कि इसके पास एक स्वतंत्र इकाई है जो अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य की रक्षा करने के साथ-साथ घृणा भाषण को रोकने पर भी काम करती है।

लेकिन वह इकाई अपना काम कैसे करेगी जब घृणा भाषण को ठीक तरह से न भारतीय परिप्रेक्ष्य में, न वैश्विक संदर्भ में परिभाषित किया गया है। इस प्रकार घृणा भाषण को वैश्विक तकनीकी कंपनियाँ अपने अनुसार परिभाषित करेंगी और अपने मंच पर आने वाली सामग्री की जाँच करेंगी।

और ऐसी घटनाएँ हमने देखी भी हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप के ट्वीट पर ट्विटर द्वारा दिस क्लेम इज़ डिस्प्युटेड (यह दावा विवादित है) का लेबल लगाया गया था। भारत में चल रहे किसान आंदोलन के भी भाजपा के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय के एक ट्वीट पर मैनिप्युलेटेड (तोड़ा मरोढड़ा हुआ) मीडिया का लेबल लगाया गया था।

फेसबुक ने किसी भी प्रकार के राजनीतिक भेदभाव की बात को नकार दिया है लेकिन वास्तविक समस्या कुछ और है। प्रश्न उठता है कि क्या फेसबुक जिस देश में ह, वहाँ का कानून मान रहा है या अपने स्वयं के कानून संबंधित देश पर लागू कर रहा है?

यही प्रश्न गूगल और उसके जुआ-विरोझी नियमों के लिए भी पूछा जाना चाहिए जो लगता है कि उसने पेटीएम को चिह्नित करके उसपर लागू किया था। ऐसे ही प्रश्न ट्विटर, इंस्टाग्राम, वॉट्सैप जैसे सोशल मीडिया मंचों व ईमेल कंपनियों से भी होने चाहिए जिसमें से गूगल भी एक है।

स्वराज्य से संबंधित वी अनंत नागेश्वरन के साथ एक घटना हुई जब वे टाइम्स ऑफ इंडिया के एक स्तंभकार के लेख की लिंक वाले ग्रुप मेल का उत्तर देना चाह रहे थे लेकिन वे ऐसा तब तक नहीं कर पाए जब तक स्तंभकार ने स्वयं इसकी अनुमति नहीं दी।

इस प्रकार मेल में भी हम सेंसरशिप नियमों का सामना करते हैं जिन्हें विश्व की एक प्रमुख तकनीकी कंपनी ने निर्धारित किया है। ध्यान दें कि जीमेल आपके सभी मेलों को पढ़ता है और यहाँ तक कि उनपर बेहतर प्रतिक्रिया देने के लिए कुछ सुझाव भी प्रस्तावित करता है।

कुछ समय पहले की बात है जब वैश्विक तकनीकी कंपनियों (गूगल, फेसबुक, आदि) ने एक हंगामा खड़ा किया था जब रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने यह निर्णय लिया था कि उपभोक्ता डाटा को भारत में ही रखा जाएगा (डाटा स्थानीयकरण नीति के तहत)।

लेखक का भी यही मानना है कि डाटा संप्रभुता का अधिकार उसी देश का होता है, जहाँ वह डाटा संग्रहित किया गया है और उस डाटा का उपयोग उन क्षेत्रों में नहीं किया जा सकता है जहाँ तक भारतीय विधान की पहुँच न हो, या यूँ कहें कि प्रभावी पहुँच न हो।

डाटा सुरक्षा का प्रतीकात्मक चित्र (साभार- फोर्ब्स इंडिया)

कई तकनीकी टिप्पणीकारों ने इस विचार का विरोध किया और कहा कि इंटरनेट का संबंध ही जानकारी के स्वतंत्र प्रवाह से है व डाटा स्थानीयकरण को अनिवार्य करने से न सिर्फ इस स्वतंत्रता में हस्तक्षेप होगा बल्कि कंपनी की लागत भी बढ़ेगी क्योंकि कई स्थानों पर डाटा रखने की सुविधा बनानी पड़ेगी।

हाल का एक मामला देखें- मैक्सिमिलियन श्रीम्स बनाम फेसबुक आयरलैंड। इसमें यूरोपीय न्याय अदालत ने यूएस-ईयू प्राइवेसी शील्ड को दरकिनार कर दिया क्योंकि अमेरिकी कानून न ईयू नागरिकों की निजता की रक्षा करता था, न वहाँ के कानूनों की।

न्यायालय ने कहा कि ईयू से बाहर गया डाटा भी मानक अनुबंधीय उपनियमों (एसएससी) के अधीन आएगा और यदि देश के बाहर एसएससी प्रभावी रूप से लागू नहीं हो सकते हैं तो डाटा को भी पुनः ईयू लौटना होगा।

मिंट में स्तंभ लिखने वाले राहुल मत्थन डाटा स्थानीयकरण का विरोध करने और सीमाओं के पार सूचना के अनियंत्रित प्रवाह की बात करने वालों को “थोड़ा मूर्ख” कहते हैं क्योंकि “(अब) एक ऐसा कानून जो माँग करता है कि सभी डाटा सीमाओं के भीतर प्रसंस्कृत हों और वह कानून जो कहता है कि शर्तों को पूरा करने के बाद ही डाटा हस्तांतरित हो में अधिक अंतर नहीं रह गया है।”

अब भारत को तीन बातें सुनिश्चित करने पर काम करना होगा।

पहला, बिना किसी हिचक के भारत में डाटा स्थानीयकरण कानून लागू कर देना चाहिए। जो देश अपने नागरिकों के डाटा पर अपने कानून न चला सके, वह पूर्णतः संप्रभु नहीं है। इसपर पुनर्विचार तब किया जा सकता है जब प्रभावी और लोकतांत्रिक वैश्विक शासन नियम आ जाएँ लेकिन अभी वे दृष्टिगोचर नहीं हैं इसलिए भारत को डाटा स्थानीयकरण पर अमल करना चाहिए।

डाटा स्थानीयकरण का प्रतीकात्मक चित्र

दूसरा, घृणा भाषण और सेंसरशिप पर वर्तमान में जो नियम हैं, वे तकनीकी कंपनियों, विशेषकर सोशल मीडिया मंचों, द्वारा दी गई मनमानी परिभाषाओं और नियमों से शासित होते हैं लेकिन उन्हें राष्ट्रीय कानूनों पर आधारित होना चाहिए। जो अल्गोरिदम यह तय करते हैं कि किस प्रकार की सामग्री की अनुमति है या क्या प्रतिबंधित हैं, वे पारदर्शी होने चाहिए जिसपर जनता परिवर्तन की आवाज़ उठा सके।

तीसरा, तकनीकी मंचों को कड़े नियामकों के अधीन होने की आवश्यकता है क्योंकि वे अपने ही उपभोक्ताओं के साथ प्रतिस्पर्धा में होते हैं जिससे निहित स्वार्थों के कारण हस्तक्षेप हो सकता है। इसी कारण से शर्मा को प्ले स्टोर की कार्रवाई में खतरे का निशान दिखा क्योंकि गूगल और पेटीएम प्रतिस्पर्धी हैं।

तकनीकी मंचों को हमें उन्हीं के उपभोक्ताओं से प्रतिस्पर्धा करने से नहीं रोकना चाहिए क्योंकि वह उपभोक्ता-विरोधी प्रयास हो जाएगा लेकिन नियामक ऐसे होने चाहिए जो गलत माध्यमों से अपने प्रतिस्पर्धी को उन्हें दबाने न दें।

चौथा, उपरोक्त कोई भी सुझाव तब तक काम नहीं करेगा जब तक भारत अपने निजता कानूनों को कड़ा नहीं करेगा। निजी डाटा को निजी ही रहना चाहिए जब तक न्यायालय या सेवानिवृत्त न्यायाधीशों व उपभोक्ता अधिवक्ताओं से बना कोई स्वतंत्र पैनल उसके उजागर होने की अनुमति न दे।

किसी संयुक्त सचिव या सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी को इस बात का निर्णय लेने नहीं दिया जा सकता कि बड़े आपराधिक मामलों में किसी व्यक्ति का निजी डाटा कानून लागू करने वाले अधिकारियों से साझा किया जाए या नहीं।

आर जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं।