विचार
अपहरण, धर्मान्तरण और फिर शादी के बाद दलित नाबालिग बेटी को वापस पाने के लिए संघर्ष करता एक पिता
एक दलित नाबालिग लड़की की अपहरण, धर्मान्तरण और फिर शादी की कहानी

प्रसंग
  • जब नाबालिग लड़की के पिता ने आरोपी को बुलाकर उससे बेटी को वापस करने का अनुरोध किया तो आरोपी निडरता से बोलाः लड़की मैंने ले ली है, तुझसे वापस ली जाए तो ले ले

पिछले हफ्ते, स्वराज्य ने दिल्ली के एक मामले के बारे में लिखा था, जहाँ इस मामले के सांप्रदायिक हो जाने के डर से पुलिस ने उन्हें एक नाबालिग दलित हिन्दू लड़की के अपहरण के आरोपी, एक मुस्लिम, के खिलाफ कार्यवाई करने से रोक दिया था। लड़की करीब एक महीने तक गायब रही। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं की बदौलत यह मामला राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग तक पहुँचा जिनसे इसको गंभीरता से लिया, इसके बाद जाकर कहीं पुलिस हरकत में आई और चार राज्यों में तलाशी अभियान चलाकर आखिरकार लड़की को बरामद कर लिया।

एफआईआर में सद्दाम अंसारी के नाम का जिक्र करने से इंकार करने के अलावा पुलिस ने अनिवार्य पॉस्को (यौन अपराधों से बच्चों को संरक्षण) और SC/ST अधिनियम को भी मूल एफआईआर में नहीं लगाया था।

उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले से भी इसी तरह का एक मामला सामने आया है, जहाँ पुलिस की ढीलासाजी के चलते नाबालिग दलित हिन्दू लड़की ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर जाली दस्तावेजों के आधार पर अपहरणकर्ता के साथ शादी कर ली है। लड़की के पिता अपनी इकलौती लड़की को पाने की उम्मीद में उसकी स्कूल की मार्कशीट लिए अदालत के चक्कर लगा रहे हैं। यह मार्कशीट लड़की को नाबालिग दर्शाती है।

मानव तस्करी

पूरा मामला कुछ इस तरह हैः

  1. लड़की गुम, दो महीने बाद मिला अपहरणकर्ता

स्वराज्य ने लापता लड़की के पिता दयानंद (44) से बात की। दयानंद उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के नगीना तहसील के गांव धर्मपुरा के रहने वाले हैं। जाटव जाति के दयानंद सिंह ने 4 मई 2018 को लड़की के गुम होने वाले दिन ही स्थानीय पुलिस से संपर्क किया था। एफआईआर (जिसकी एक प्रति स्वराज्य के पास है) में उन्होंने अपने बयान में बताया कि उनकी 17 साल की बेटी को स्कूल जाते समय बस कंडक्टर जय प्रकाश गुप्ता ने अगवा कर लिया था।

आईपीसी की धाराओं 363 (अपहरण) और 366 (किसी महिला को उसकी मर्जी के खिलाफ शादी करने के लिए मजबूर करना) के तहत इस मामले को पंजीकृत कर लिया गया है। गौरतलब है कि, सिंह द्वारा याचना करने के बावजूद भी पुलिस ने एससी/एसटी अधिनियम नहीं लगाया था।

दो महीनों तक लड़की का कुछ पता न चल सका। लड़की के गुम होने से दो महीने बाद पुलिस को लड़की की कॉल डिटेल प्राप्त हुई जिससे यह बात सामने आई कि लड़की को भगाकर ले जाने वाला जय प्रकाश गुप्ता नहीं बल्कि दानिश हुसैन था।

दयानंद सिंह ने स्वराज्य को बताया कि “4 मई को भी मेरी बेटी हर दिन की तरह सुबह 9:30 बजे स्कूल के लिए निकली लेकिन शाम को 6 बजे तक वापस नहीं आई और उसका फोन भी बंद था। मैं उसका पता लगाने के लिए नगीना बस अड्डे तक गया। कुछ लोगों ने बताया कि वह उसी बस में सवार हो गई थी जिसमें जय प्रकाश गुप्ता कंडक्टर था। ऐसा हुआ था कि कुछ दिन पहले मेरी बेटी ने बताया कि गुप्ता ने उसके सामने शादी करने का प्रस्ताव रखा था। मैंने उसे बताया था कि हम शादी के प्रस्ताव पर विचार कर सकते हैं लेकिन पहले उसको अपनी पढ़ाई पूरी कर लेनी चाहिए। मेरा पहला शक गुप्ता पर ही हुआ। मैं पुलिस स्टेशन गया और आरोपी के रूप में उसका ही नाम लिखवा दिया।”

सिंह ने बताया कि वह कई बार पुलिस स्टेशन गए लेकिन इससे कोई फायदा नहीं हुआ। सिंह ने कहा, “लड़की की कॉल डिटेल हासिल करने में उनको 15 दिन लग गए लेकिन

वह अपहरण के सिर्फ चार दिन पहले तक की ही थी। कॉल डिटेल से कोई सुराग नहीं मिला।” सिंह एक निर्माण मजदूर के रूप में कार्य करते हैं और उनके दो पुत्र हैं।

दिन बीतते गए, जाँच अधिकारी का तबादला हो गया और उनकी जगह पर एक नए अधिकारी अमित कुमार आ गए।  कुमार ने पूरे मामले की जांच की और एक लंबी कॉल डिटेल से पता चला कि लड़की को नगीना तहसील के एक लड़के दानिश हुसैन ने अगवा कर लिया था।

सिंह ने स्वराज्य को बताया कि “मुझे तारीख भी याद है। उस दिन 18 जुलाई थी।”

सिंह के अनुसार, “कुमार ने उस समय “गलती” की, कुमार ने हुसैन को फोन किया तो उसने बताया कि वह उस समय देहरादून में था और स्वीकार किया कि लड़की उसके साथ थी। लेकिन पुलिस ने उसको धमकी दी कि अगर वह जल्द ही नगीना पुलिस स्टेशन नहीं लौटा तो नतीजा बहुत बुरा होगा।”

  1. अदालत में लड़की के पिता के खिलाफ आरोपी

धमकाने वाले फोन काल के तुरंत बाद, हुसैन ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लड़की, अब जिसका नाम निशा नाज़ है, को सह-याचिकाकर्ता बनाते हुए एक आपराधिक याचिका दायर की। याचिका (जिसकी एक प्रति स्वराज्य के पास है) में कहा गया है कि मामले में एफआईआर रद्द कर दी जानी चाहिए और निशा नाज़, जो कि उसके आधार कार्ड के मुताबिक बालिग है, हुसैन के साथ अपनी इच्छा से फरार हुई है। इसमें कहा गया है कि जोड़े के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू की गई थी क्योंकि लड़की का पिता इस शादी से खुश नहीं है।

1 अगस्त को अदालत ने अपने आदेश में, लड़की की उम्र का पता लगाने के लिए उसे 10 दिनों के भीतर हड्डी परीक्षण के लिए मुख्य चिकित्सा अधिकारी के सामने पेश होने का निर्देश दिया। अदालत ने लड़की के पिता द्वारा दर्ज मामले में आरोपी की गिरफ्तारी पर रोक लगाने का आदेश दिया। अदालत ने अगली सुनवाई की तारीख 23 अगस्त निर्धारित की थी।

नगीना क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता भूपेंद्र पाल सिंह, जो विश्व दलित परिषद नामक एक दलित संगठन के अध्यक्ष हैं, ने लड़की की उम्र को लेकर दुविधा के बारे में स्वराज्य से बात की। उन्होंने इलाहाबाद हाईस्कूल और इंटरमीडिएट एजुकेशन बोर्ड द्वारा जारी किए गए लड़की के कक्षा दस के प्रमाण पत्र की एक प्रति स्वराज्य को दी, जिसमें उसकी जन्मतिथि 9 जून 2001 है जिसका अर्थ है कि उसकी उम्र 17 वर्ष है जो कि बालिग होने में एक वर्ष कम है।

“जैसा कि स्कूल के दस्तावेजों के मुताबिक लड़की नाबालिग है। लेकिन बात यह है कि उसके आधार कार्ड में गलत तरीके से जन्म का वर्ष 1999 दर्ज है। आपको पता है कि यह कैसे हुआ, कैसे अधिकारियों को मतदाता पहचान पत्र और आधार कार्ड पर लगातार गलत जानकारियां प्राप्त होती हैं। परिवार इसे सही कराने के लिए कभी भी परेशान नहीं हुआ। लेकिन आरोपी बहुत अच्छी तरह जानता है कि लड़की नाबालिग है क्योंकि जब वह फरार हुई थी तो हाईस्कूल का असली प्रमाणपत्र अपने साथ ले गई थी। लेकिन इस पर ध्यान दीजिए, जोड़े ने इसे नजरअंदाज कर दिया और अदालत में याचिका दायर करने के लिए लड़की के गलत/जाली आधार कार्ड का इस्तेमाल किया। क्या आधार कार्ड हाईस्कूल के प्रमाणपत्र से अधिक प्रामाणिक है? हमें आश्चर्य है कि अदालत ने इस प्रमाण पर विचार क्यों नहीं किया।”

  1. राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का हस्तक्षेप

भूपेंद्र सिंह ने लड़की के परिवार की ‘अनुसूचित जाति के लिए राष्ट्रिय आयोग’ से मिलने में मदद की। 6 अगस्त को अपने आदेश में – अदालत द्वारा आरोपी की गिरफ्तारी पर रोक लगाए जाने के एक हफ्ते बाद – एनसीएससी ने कहा कि आधार कार्ड को उम्र के प्रामाणिक दस्तावेज के रूप में नहीं माना जा सकता है। उन्होंने यह कहा है कि लड़की के पिता द्वारा प्रदान किए गए कक्षा 10 के प्रमाण पत्र के आधार पर, पुलिस को उसके धर्मपरिवर्तन और निकाहनामा के तैयारी में शामिल लोगों के खिलाफ कार्यवाही शुरू करनी चाहिए। उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि लड़की का जल्द ही हड्डी परीक्षण किया जाना चाहिए।

स्वराज्य के पास लड़की के धर्मपरिवर्तन प्रमाण पत्र और उसके निकाहनामे की एक प्रति है। लड़की के धर्मपरिवर्तन प्रमाण पत्र में लिखे होने के अनुसार उसकी उम्र 19 वर्ष है, जो अल-जमीयतुल-इस्लामिया-फलाह-ए-दारन (दिल्ली के शास्त्री पार्क क्षेत्र में स्थित) के मौलाना मुहम्मद आबिद कासमी द्वारा 1 जून 2018 को जारी किया गया था। निकाहनामा 6 जून की तारीख में हुआ है जो गवाह का पता दिल्ली दर्शाता है।

  1. वर्तमान स्थिति

भूपेंद्र पाल सिंह ने कहा कि एनसीएससी के निर्देशों के बावजूद, पुलिस ने अभी तक लड़की के धर्मपरिवर्तन और निकाहनामे की तैयारी में शामिल लोगों को गिरफ्तार नहीं किया है। इस महीने में अदालत के द्वारा की गई दूसरी सुनवाई में फिर से आरोपी की गिरफ्तारी पर रोक लगी रहने का आदेश दिया। उन्होंने कहा कि हमें अभी तक लड़की का बोन टेस्ट नहीं मिला है, जिससे इस मामले में देरी हो रही है। एनसीएससी की अगली सुनवाई 24 सितंबर के लिए निर्धारित है। एनसीएससी की अगली सुनवाई 24 सितंबर के लिए निर्धारित है।

स्वराज्य ने जांच अधिकारी परवीन कुमार सिंह, जो नगीना के मंडल अधिकारी हैं, से कई बार संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने कई बार हमारे फोन को डिस्कनेक्ट कर दिया। जब वह जवाब देंगे तो हम रिपोर्ट अपडेट करेंगे।

  1. एक पिता का अपनी बेटी को बचाने के लिए प्रयास

दयानंद सिंह अगस्त के पहले सप्ताह में उस दिन को याद करते हैं जब उन्हें नगीना पुलिस स्टेशन से फोन आया कि उन्हें अपनी बेटी द्वारा दायर एक आपराधिक लिखित याचिका में जवाबदेह बनाया गया है। उन्होंने स्वराज्य से बताया, “यह सोंच से परे था। मैं एकदम चौंक गया। पुलिस अधिकारी ने मुझे 21 अगस्त को इलाहाबाद अदालत में उपस्थित होने के लिए कहा और मेरे लिए एक वकील पहले से ही नियुक्त किया गया था।”

“उस दिन, मैंने अपनी बेटी को चार महीने बाद पहली बार देखा। मैंने उससे पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया, जिस पर उसने जवाब दिया कि अब जो होना था वो हो चुका और अब दोनो परिवारों को शांति से रहना चाहिए।”

सिंह ने स्वराज से बताया, “मैं इसे कभी नहीं स्वीकार सकता। अगर वह बालिग होती, तो मैं उसे बस मरा मान लेता। लेकिन क्योंकि कानूनन उसके नाबालिग होने तक मैं उसका संरक्षक हूँ, तो इसलिए मैं उसे वापस पाने के लिए हर संभव प्रयास करूंगा।”

उन्होंने बताया कि अदालत के चक्कर लगाने में और वकीलों पर उन्होंने हजारों रुपये खर्च कर दिए हैं, जो उनके जैसे गरीब व्यक्ति के लिए वहन कर पाना बहुत ही मुश्किल होता है।

उन्होंने कहा कि जब उन्होंने अदालत की बैठक के बाद हुसैन को बुलाकर उससे अपनी बेटी को वापस करने का अनुरोध किया, तो उसने कहा: लड़की मैंने ले ली है, तुझसे वापस ली जाए तो ले ले।”

स्वाती गोयल शर्मा स्वराज की एक वरिष्ठ संपादक हैं। इनका ट्विटर हैंडल @swati_gs है।