विचार
गोकाष्ठ का सफल भोपाल मॉडल- गाय के गोबर से बनी लकड़ी खप रही शवदाह गृहों में

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से सटे छोटे-से गाँव मुगलिया छाप में 30 वर्षीय अजय पाटीदार महामृत्युजंय गोशाला समिति के कार्यकर्ता ने गोकाष्ठ के एक नए प्रयोग को सफल भोपाल-मॉडल बना दिया है।

बूढ़ी और बीमार गायों की देखरेख के लिए वैसे तो यह गोशाला 1998 से यहाँ है, लेकिन एक साल से अचानक चर्चा में आई ऐसी 18 गोशालाओं में से एक है जहाँ गायों के गोबर से लकड़ी बनाई जा रही है।

गोशाला

यह लकड़ी राजधानी के तीन बड़े शवदाह गृहों में खप रही है और इसकी माँग लगातार बढ़ी है। भोपाल के छोला, सुभाषनगर और भदभदा विश्रामघाटों में पिछले डेढ़ सालों में 8,500 शवों के अंतिम संस्कार पूरी तरह इन्हीं गोशालाओं में तैयार गोकाष्ठ से हुए हैं।

इस प्रयोग ने सड़कों पर आवारा छोड़ दी गई बूढ़ी, बीमार और अनुपयोगी गायों की पूछपरख शुरू कर दी है। अब वे भोपाल की सड़कों से नदारद हैं। इनके गोबर से बनी लकड़ी गोशालाओं की कमाई का जरिया बन गई है। हर एक गोशाला में इस काम के लिए स्थानीय लोगों को रोजगार मिला है लेकिन सबसे बड़ा फायदा पर्यावरण को हुआ है।

अब यहाँ लकड़ी की खपत घट गई है। गणित ऐसे समझिए-एक शवदाह में साढ़े तीन से चार क्विंटल लकड़ी की खपत होती है। लेकिन गोबर से बनी लकड़ी की इससे कम अधिकतम तीन क्विंटल की काफी होती है। भोपाल के तीनों श्मशानघाटों में हर महीने करीब 1,000 शवों के अंतिम संस्कार होते हैं। यानी लगभग 4,000 क्विंटल लकड़ी की खपत थी, जो घटकर चौथाई से भी कम रह गई है।

भोपाल-मॉडल की सफलता के केंद्र में बहुत तेज़ी से सामने आए कई चेहरे हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वैज्ञानिक डॉ योगेंद्र कुमार सक्सेना उनमें से एक हैं, जिन्होंने इसे एक क्रांति की शक्ल दे दी है। वे बताते हैं कि हमने पिछले डेढ़ सालों में भोपाल में ही 25,000 क्विंटल लकड़ी को जलने से बचा लिया है। यह 20 हेक्टेयर जंगल की हरियाली के बराबर है और पर्यावरण की दिशा में यह सबसे बड़ा योगदान है, जिसे आप पैसों में नहीं आँक सकते।

तीनों विश्रामघाटों की संचालन समितियों ने मिलकर एक कमेटी बनाई है, जिसके कर्ताधर्ता हैं समाजसेवी अरुण चौधरी। चौधरी मूलत: भदभदा विश्रामघाट समिति के प्रमुख हैं। वे अपने लकड़ी के गोदाम दिखाते हैं, जो अब 18 गोशालाओं में बन रहे गोकाष्ठ से भरे हैं।

वे कहते हैं, “हमने शुरू में इसे एक विकल्प के रूप में लोगों के सामने रखा था। लकड़ियों से परंपरागत दाह संस्कार में यदि वे चाहें तो गाय के गोबर से बनी लकड़ी भी ले सकते हैं। थोड़ी हिचक के साथ लोगों ने इसे अपनाया। लेकिन अब हाल यह है कि लोगों की पहली प्राथमिकता ही यह बन गई है।

भदभदा विश्रामघाट में हर महीने 250 से ज्यादा शव दाह संस्कार के लिए आते हैं। हम इनके लिए बने शेड में पहले से गोकाष्ठ को व्यवस्थित जमा करके रखते हैं। उनका समय भी बचता है और इसे गाय की एक सेवा के रूप में समाज ने स्वीकार कर लिया है। अब हम दूसरी गोशालाओं के संचालकों से लगातार संपर्क कर रहे हैं कि वे भी गोबर को फिजूल जलाने या बरबाद करने की बजाए गोकाष्ठ उत्पादन में लगें। हम सबसे बड़े खरीददार हैं।”

भोपाल में गोकाष्ठ की कीमत 700 रुपए क्विंटल है। महामृत्युंजय गोशाला समिति के पास 70 गाए हैं। वे 6-7 क्विंटल गोकाष्ठ हर दिन तैयार कर रहे हैं। इस हिसाब से करीब 5,000 रुपये रोज की कमाई उन गायों से हो रही है, जो सड़कों पर छोड़ दी गई थीं।

इस काम में पाँच लोगों को काम मिला है, जिनकी पूर्ति इसी पैसे से मुमकिन हुई है। लेकिन इस आमदनी पर अजय पाटीदार बहुत श्रद्धा से याद करते हैं, “गोकाष्ठ की पहली कमाई जब हमारे पास आई तो हमने अपनी गायों को खास दावत दी। हमने उन्हें हरी घास की नियमित खुराक में गुड़ खिलाया। गुड़ की खुराक गायों के लिए सेहत के लिहाज से बहुत ज़रूरी है। खासकर सर्दी के मौसम में।”

भोपाल के पास हलाली डेम पर रामकली गोशाला एक सबसे बड़ा और चर्चित प्रयोग है, जहाँ 1,800 गायों के गोबर ने गोकाष्ठ उत्पादन की सबसे बड़ी इकाई खड़ी कर दी है। यहाँ हर दिन 30-40 क्विंटल गोकाष्ठ बन रहा है।

डॉ. सक्सेना बताते हैं, “विश्रामघाटों पर इस मात्रा में हो रहे उत्पादन की खपत नियमित है और लगातार मांग बढ़ रही है। लेकिन अब सर्दी के मौसम में तापने के लिए इस्तेमाल होने वाली परंपरागत लकड़ी के भी आसान विकल्प के रूप में इसे स्वीकार किया जा रहा है। हाल ही में एक शैक्षणिक संस्थान की तरफ से इसी के लिए गोकाष्ठ की मांग आई।”

गोकाष्ठ बनाने के लिए 70,000 रुपए लागत की एक बिजली से चलने वाली बहुत साधारण मशीन है, जो आटा चक्की की तरह है। इसमें ऊपर से गेहूं की तरह गोबर भरते जाइए। कम्प्रेशर से यह गोबर गोल या चौकोर आकार की सघन लकड़ी की शक्ल में बाहर आती है। यह गीली होती है, जिसे सुखाने में एक सप्ताह लगता है। सूखने के बाद यह इस्तेमाल के लिए तैयार है।

गोकाष्ठ बनाने की प्रक्रिया बताते डॉ सक्सेना

डॉ. सक्सेना ने बताया कि हमने समाज के ऐसे सेवाभावी लोगों को तैयार किया जो यह मशीन गोशालाओं को दान स्वरूप देने के लिए आगे आए। भारतीय वन प्रबंधन संस्थान (आईआईएफएम) के प्रो एसपी सिंह ने एक मशीन मुगलिया छाप गांव की इसी गोशाला को दी थी।

जब इस प्रयोग के बारे में तत्कालीन कलेक्टर सुदाम खाड़े को बताया गया तो वे खुद गाँव आए और इस गोकाष्ठ यूनिट का शुभारंभ किया। इस प्रयोग ने स्थानीय प्रशासनिक अफसरों को भी मौका दिया कि वे इस काम में हाथ बँटाएँ। सरकार ने 1 लाख रुपये गोशालाओं को इस काम के लिए देने का फैसला ले लिया।

भोपाल-मॉडल पूरे प्रदेश में चर्चित हो गया है और अब सागर, देवास, ग्वालियर, नरसिंहपुर, राजगढ़, इंदौर और भिंड की कई गोशालाएँ इसे अपनाना शुरू कर चुकी हैं। अब गोशालाओं और विश्रामघाटों के बीच समन्वय का काम यही लोग कर रहे हैं।

इन दिनों एक नया लक्ष्य हाथ में लिया गया है। आगामी होली के मद्देनज़र स्कूल और कॉलेजों में सक्सेना और चौधरी की टीम सक्रिय है। उनकी कोशिश है कि भोपाल में प्रमुख स्थानों पर जलने वाली होली गोकाष्ठ से ही सजाई जाए।

पिछले साल प्रायोगिक रूप से ऐसा किया गया था और इस काम में भोपाल के किन्नर समाज को जोड़ा गया था। वे होली के नजराने के लिए शहर भर में जाते हैं। डॉ सक्सेना ने बताया, “हमने गोशाला में गोकाष्ठ यूनिट के शुभारंभ समारोहों में मंच पर किन्नर समाज के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया। उनसे अपील की गई कि वे होली के पहले जहाँ भी जाएँ, गोकाष्ठ के प्रचार-प्रसार में हमारे ब्रांड एंबेसडर बनें। शुभ समाचार यह है कि वे इसके लिए बहुत खुशी से राजी भी हो गए। अब हम सब मिलकर होली के दिन गोकाष्ठ के होलिका दहन पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।”

गोकाष्ठ की लगातार बढ़ी मांग ने ऐसे लोगों को भी इस काम के लिए प्रेरित किया है, जिनके कारोबार दूसरे हैं और एक गाय भी जिनके पास नहीं है। किशोर परिहार को ही लीजिए। वे पेशे से प्रापर्टी की खरीद-फरोख्त का काम करते थे। लेकिन किराए के एक बड़े प्लॉट पर उन्होंने यह मशीन लगाई और एक सरकारी डेयरी से गोबर खरीदना शुरू किया।

एक दिन में एक ट्राली गोबर की आवक है और इससे 20 क्विंटल गोकाष्ठ बन जाती है। इसे सुखाने के लिए एक और प्लॉट तैयार किया। इस होली पर उनके पास 600 क्विंटल गोकाष्ठ बाजार में जाने के लिए तैयार है। इस यूनिट में 12 लोगों को काम मिला है।

सरकारी डेयरी से जब गोबर की आपूर्ति कम होती है तो विकल्प के लिए आसपास के चार-पाँच गाँवों से गोबर मंगाते हैं ताकि आपूर्ति रुके नहीं और मशीन चलती रहे। गाँवों से 1,600 रुपये में एक ट्राली गोबर आता है। इससे गाँवों में गाय के गोबर के प्रति एक जागरूकता पैदा हुई है।

पहले यहाँ-वहाँ खप जाता था या कूड़े में पड़ा रह जाता था। अब गांवों के लोग भी इसे अच्छे से सहेज रहे हैं। सबसे खास बात यह है कि यह प्रयोग इतना चर्चित हो चुका है कि हर दिन ही कहीं न कहीं से लोग पूछताछ करने आने लगे हैं। परिहार ने बताया कि उन्हें अपनी माँ के देहांत के बाद दाह संस्कार के समय पहली बार पता चला कि गोमाता के गोबर से बने गोकाष्ठ का उपयोग हो रहा है। उसके बाद ही उन्हें लगा कि इस काम से जुड़ना चाहिए।

डॉ सक्सेना ने गोकाष्ठ के प्रचार-प्रसार में कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी है। वे गोशालाओं में भटके हैं। गांवों में लगातार जा रहे हैं। विश्रामघाटों के प्रबंधकों को बता रहे हैं। स्कूल-कॉलेज और किन्नर भी नहीं छोड़े। अफसरों और नेताओं को ले-लेकर आए। इन सब कोशिशों का मिलाजुला नतीजा सिर्फ डेढ़ साल के अंतराल में सबके सामने है।

विश्रामघाटों के लकड़ियों के गोदामों में गोकाष्ठ के भंडार बढ़ गए हैं। लकड़ी की खपत घटकर 30 फीसदी से कम हो गई है। वे कहते हैं-“हमारी परंपरा में गाय को पूजनीय जिन तत्वों के कारण माना गया है, उनमें गोमूत्र और गोबर की उपयोगिता अनंत हैं। यह सबने पढ़ी हैं। सुनी हैं। लेकिन किसी मृत देह की अंतिम संस्कार विधि में यदि गोकाष्ठ का विकल्प है तो इससे अच्छा और क्या हो सकता है।”

गोदाम में डॉ सक्सेना

दिल्ली आईआईटी के विद्यार्थी हर्षवर्द्धन पाटनी और यश मोडवाडिया उन जिज्ञासुओं में शामिल हैं, जिन्होंने इस प्रयोग के बारे में सुना और दूर-दूर से देखने भोपाल चले आए। दोनों इन दिनों भोपाल में गोशालाओं में गोकाष्ठ का उत्पादन देख रहे हैं। विश्रामघाटों में इनकी तेज़ी से बढ़ी खपत को आंक रहे हैं। अनुपयोगी गायों के बूते एक आर्थिक गतिविधि कैसे तेज़ी से आगे बढ़ी है, इसे देखकर वे हैरान हैं।

वे कहते हैं- “भारत जैसे देश के लिए यह एक बहुत कामयाब मॉडल हो सकता है, जिस पर सरकारों को नीति बनाने की ज़रूरत है। मध्यप्रदेश में प्रशासनिक स्तर पर जागरूकता उत्साहजनक है। यह प्रयोग गांवों की तस्वीर बदलने में मददगार साबित हो सकता है। इसमें रोजगार है, पर्यावरण की रक्षा है और सबसे बड़ी बात गायों की सेवा है। उन गायों की जिन्हें बेसहारा सड़कों पर छोड़ दिया गया था।”