विचार
कोविड महामारी की दूसरी लहर और एक-दूसरे पर दोष मढ़ने का चलन

आज विश्व एक घातक महामारी के बीच है और वह इसका सामना करने का  हर-संभव प्रयास कर रहा है। इस बात पर कोई संदेह नहीं है कि हम भारतवासी भी एक अभूतपूर्व संकट के बीच में हैं, क्योंकि हमने अतीत में कभी भी इस स्तर का स्वास्थ्य संकट नहीं देखा।

लोकतंत्र में जब भी कोई संकट आता है, या जब भी लोग वास्तव में निराश या भयभीत होते हैं, तो सत्ता में सरकार को दोष देना स्वाभाविक है। इसे शक्ति का बोझ कहा जाता है और यह उत्तरदायित्व के साथ आता है। सरकारें इसे जानती हैं और गिरती बनती रहती हैं।

यह कोई नई बात नहीं है। ऐसे वक़्त में लोग अपनी भावनाओं को दृढ़ता से व्यक्त करते हैं, और उन्हें करना भी चाहिए। परंतु, मीडिया जिस रूप में इस संकट को उजागर कर रही है, वह ना केवल गैर-ज़िम्मेदाराना है, बल्कि, अपने आप में चिंताजनक है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि मीडिया को संकट का विस्तार दिखाना चाहिए, लेकिन बहुत ही ध्यान, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ। सच कहें तो हमारे देश में पत्रकारिता मर चुकी है। पत्रकारिता के नाम पर हमारे पास केवल प्रचार और जनसंपर्क एजेंसियाँ हैं।

भारतीय मीडिया की भूमिका, सच्चाई से तथ्यों को रिपोर्ट करने के बजाय सिर्फ़ तथ्यों को तोड़ना, मरोड़ना और गलत बयानी द्वारा सनसनी पैदा करने तक सीमित है। और अगर कहीं त्रासदी है, तो वे उसपर आनंद-यात्रा से भी बाज नहीं आते हैं। आश्चर्य इस बात पर होता है कि उन्हें अपनी विभत्स्ता का आभास भी नहीं है।

इस बात पर ज़रूर रिपोर्ट करें कि दूसरी लहर की सीमा का अंदाज़ा लगाने में कहाँ और किससे चूक हुई। हर तरह से केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों पर रिपोर्ट करें। जहाँ भी आप कमियाँ देखते हैं, तो उन सारी विसंगतियों के साथ सरकारों की उदासीनता पर भी रिपोर्ट करें।

लेकिन क्या साधारण दुःखी लोगों को, आपकी रिपोर्ट और कहानी का हिस्सा होना ज़रूरी है? पश्चिमी मीडिया ने शवों और दाह-संस्कार पर कहानियाँ बनाई हैं, परंतु आप तो कम से कम जलती हुई चिता को छोड़ दें।

बेशक पीड़ित परिवारों को बोलना चाहिए, और सभी को सुनना भी चाहिए। लेकिन तब नहीं जब वे दाह संस्कार या ऑक्सीजन या दवा की व्यवस्था कर रहे हों। यह उनके चेहरे में माइक घुसेड़ देने का समय नहीं है। यह कैसी पत्रकारिता है?

दूसरी खिन्न कर देने वाली बात है लोगों के पक्षपाती प्रवचन! दोनों ही पक्षों के लोग बिना किसी तथ्य के अपनी बात को लोगों पर थोपने में लगे हैं। कोई कहता है कि “आँकड़ों की अंडर-रिपोर्टिंग नहीं है” तो कोई कहता है “बड़े पैमाने पर अंडर-रिपोर्टिंग है।” हालाँकि सब जानते हैं सच्चाई कहीं बीच में है और उसकी उनको जानकारी नहीं है।

वहीं टीकों के बारे में चर्चा भी सरल और स्पष्ट होनी चाहिए थी, कि सभी टीके सुरक्षित और प्रभावी हैं। मुख्यधारा और सोशल मीडिया दोनों में अभियान यह होना चाहिए था कि आप जहाँ हैं, उसके आधार पर, जितनी जल्द संभव हो, बेझिझक कोविड का टीका लें।

लेकिन हमारे देश में एक ऐसे काबिलों का वर्ग है, जिन्होंने सिर्फ़ और सिर्फ़ वैक्सीन के प्रति हिचकिचाहट को प्रेरित करने के लिए एक अभियान चलाया। यदि बेटूक बात कही जाए तो देश में हर 45 साल से अधिक उम्र के व्यक्ति की कोरोना से मौत के लिए यह वर्ग सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं।

इस बात से इनकार नहीं है कि जनवरी 2021 तक कोविड संक्रमण की संख्या वास्तव में नीचे चली गई थी। लोग उदासीन हो गए थे। इसमें कोई संदेह नहीं है कि राज्य सरकारें भी सुस्त हो गईं और केंद्र सरकार का ध्यान भी विचलित हो गया, जिससे स्थिति और खराब हो गई।

अब चाहे चुनावी रैलियाँ हों, या कुंभ का आयोजन, ईद का बाज़ार हो या कृषि कानून-विरोधी आंदोलन… कोई भी बहाना सरकार को इस कुप्रबंधन की ज़िम्मेदारी से नहीं बचा सकता। हालाँकि, सच यह भी है कि कोई भी दूसरी लहर को रोक नहीं सकता था।

इसलिए इस बात पर कि “दूसरी लहर क्यों हुई” किसी पर भी दोष मढ़ना सही नहीं है। बात उसके समय से जूझने की तैयारी की है। हर कोई जानता था कि एक महामारी में दूसरी लहर अपरिहार्य है। लेकिन हम इसे कागज़ पर जानते थे, वास्तविक जीवन में हर किसी का मानना था कि हम इससे बच गए। हर कोई निश्चित रूप से गलत था।

लोकतंत्र में ऐसे संकट और दुख के समय सरकार को दोष देना सामान्य है। लेकिन क्या हमने उन सावधानियों का पालन किया जिनपर सरकारें लगातार ज़ोर दे रही थीं? नहीं। हम में से अधिकांश लोगों ने जब प्रतिबंध हटा दिए गए तो अपनी मनमानी की, पार्टियाँ की, मौज मस्ती किए।

सच पूछें तो उसमें भी लोगों को ही सिर्फ़ ग़लत नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि कोविड से लोगों मे भी एक थकान-सा हो गया था। लेकिन यह भी सही नहीं कि आप स्वास्थ्य अधिकारियों की चेतावनी के बावजूद बड़ी सभा करें और जब बीमार लोगों की संख्या बढ़ने लगे तो सरकार को दोषी ठहराएँ।

हम आज एक महामारी का सामना कर रहे हैं, और जब रोगियों की संख्या अचानक 20-30 गुना बढ़ जाए, तो कोई भी स्वास्थ्य बुनियादी ढाँचा इस परिस्थिति को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं होता है। ऐसी बात होती तो विश्व के सबसे विकसित देश इस महामारी को थामने और लोगों की जान बचाने में सक्षम होते।

स्वास्थ्य के बुनियादी ढाँचा के स्तर को बढ़ाने में समय लगता है। लेकिन सरकार के उपर, ख़ास कर राज्य सरकारों पर इसकी सीधी ज़िम्मेदारी है। सच यह भी है कि स्वतंत्रता के बाद जिस देश के बुनियादी ढाँचे को विकसित करने पर काम नहीं हुआ। यह कोई बहाना नहीं बल्कि क्रूर सत्य है।

जहाँ एक ओर ऐसे अनगिनत लोग हैं जो अथक रूप से ज़मीन पर काम कर रहे हैं और ज़रूरतमंद लोगों की लगातार मदद करने में जुटे हैं। तो कुछ लोग इस प्रलय में अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने में भी लगे हैं।

एक तरफ स्वास्थ्य प्रणाली को चालू रखने के लिए कई फ्रंटलाइन कर्मचारी अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं, तो दूसरी ओर कुछ लोग तो अपनी बेवकूफी में सोशल मीडिया पर सारी अभद्रता की सीमा को लाँघ जलती लाशों की तस्वीरें सिर्फ़ इसलिए पोस्ट कर रहे हैं कि लोगों मे आक्रोश बढ़े।

इसके साथ-साथ हमारे देश में हर बात पर राजनीतिक राय रखने वाले अनगिनत क्रांतिकारी लोग भी हैं। राजनीति में उनकी यह दिलचस्पी स्मार्टफोन, सस्ते इंटरनेट कनेक्शन और एक सोशल मीडिया अकाउंट के आगमन के साथ आई।

ये वही लोग हैं, जो सातवीं कक्षा में अपने ‘सिविक स्टडीज़’ की कक्षाओं से भाग सिनेमा देखने जाया करते थे। इनकी शासन और प्रशासन के बारे में जानकारी नगण्य है। उन्हें “राज्य बनाम केंद्रीय विषयों” की अवधारणा का कोई मतलब नहीं है।

वे नहीं जानते कि संघ सरकार क्या कर सकती है या नहीं कर सकती है। वे कानून की बाधाओं को समझे बिना, लापरवाही से राष्ट्रपति शासन की मांग करते हैं। इन्हें हर विषय पर सिर्फ़ क्रांति चाहिए! आप मानें या ना मानें, इन क्रांतिकारियों की संख्या अपरंपार है और इनको समझाना असंभव।

हाँ, हम एक महामारी के बीच में हैं और सिस्टम संक्रमित लोगों की संख्या से अभिभूत है। लॉजिस्टिक की समस्या है। परंतु, देश की राजधानी में ऑक्सीजन का संकट इतने लंबे समय तक रहा, जो लगातार राष्ट्रीय टीवी पर दिखाया गया, समझ के परे था। अब, धीरे-धीरे होर्डिंग और कालाबाज़ारी की एक बदसूरत कहानी का पर्दाफाश हो रहा है।

जहाँ लोग अपने प्रियजनों को बचाने के लिए एक सिलेंडर के लिए चिल्ला रहे थे, आप मंत्री इमरान हुसैन के कार्यालय से 630 सिलेंडर पाए गए! और फिर उनकी पार्टी के नेता की बेशर्मी देखिए जो मीडिया पर छाती पीटने और ऑक्सीजन की कमी के बारे में दहशत फैलाने में लगे थे।

अब बिल्कुल आश्चर्य नहीं होता कि क्यों इन लोगों ने कोर्ट में, दिल्ली में ऑक्सीजन ऑडिट का भरपूर विरोध किया। परसों ही ऑक्सीजन सिलेंडर की कालाबाज़ारी के आरोप में फरीदाबाद में एक कांग्रेस नेता को गिरफ्तार किया गया है।

कल्पना कीजिए कि कैसे लोग साँस लेने के लिए हाँफ रहे हैं और अपनी जान गँवा रहे हैं और ये राक्षस ज़रूरत में अन्य स्थानों से संसाधनों को हटा रहे थे। ये कैसे वीभत्स लोग हैं? दिल्ली पुलिस ने दिल्ली के टीन शीर्ष बार और एक फार्महाउस से 524 ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर्स बरामद किए।

इनके मालिक नवनीत कालरा काफ़ी संपन्न व्यक्ति हैं, जिन्होंने पैसे के लिए ऐसा नहीं किया होगा। फिर उसने ऐसा क्यों किया? किसके निर्देश पर? अब समझ में आ रहा है इन राक्षसों ने कौन-सा शैतानी खेल खेला है, और मीडिया प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप क्यों लगा रहा था।

फिर भी, मैं आज के समय लोगों से राजनीतिक वर्गों में बटने से बचने का ही अनुरोध करूँगा। दोष किसका था, दोषी कौन था, इन सबका समय से देश को और देशकासियों को पता चलेगा। राजनेता प्रतीक्षा कर सकते हैं। यदि हम और आप जीवित रहते हैं, तो वर्तमान सरकार को गिराने के लिए पूरा जीवनकाल शेष है।

अभी, वास्तव में मुद्दा यह होना चाहिए कि इस लहर को कैसे थामा जाए और चिकित्सा के बुनियादी ढाँचे को कैसे जल्द प्रभावी बनाकर इस प्रलय का सामना किया जाए। सरकारें वे सब करेंगी जो उन्हें करना चाहिए, लेकिन लोगों को भी अपना काम करना चाहिए।

छोटे शहरों और गाँवों में बड़ी संख्या में लोग अभी भी इनकार में हैं और मानते हैं कि कोरोना एक धोखा है या सिर्फ एक शहर की घटना है। उन्हें इस भ्रम से दूर करना भी हमारा ही कर्तव्य है।

यदि आप ऐसे लोगों के बीच आते हैं, उनसे मिलते हैं या उनसे फोन पर बात करते हैं, तो उनसे निवेदन कीजिए, समझाइए, मनाइए की बड़े पैमाने पर शादी-ब्याह जैसे कार्यक्रम का अभी समय नहीं है।

धार्मिक अनुष्ठान का समय फिर आएगा। ईद और कुंभ का समय फिर मिलेगा। अभी टीका ही धर्म है जो इस समय मानवता की रक्षा करेगा। यह भयावह समय भी ख़त्म होगा। हम सब मिलेंगे तो भारत इस प्रलय को भी मात देगा।