विचार
भारतीय मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने जल्द सुनवाई की मांग के लिए हाई-प्रोफाइल वकीलों को प्रतिबंधित करके सही शुरुआत की

प्रसंग
  • उल्लेख को खत्म करने का सीजेआई गोगोई का फैसला, महंगे वकीलों द्वारा विशेष पक्ष की मांग पर रोक लगाने जैसा हैI
  • यह कानून के समक्ष समानता पर आघात करता है।

भारत के नए मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) रंजन गोगोई ने अपने 13 महीने के कार्यकाल की अच्छी शुरूआत की है, उन्होंने फांसी या घर से बेदखल किये जाने वाले विशेष मामलों को छोड़कर सामान्य मामलों की जल्द सुनवाई के लिए विशेष मांग को खत्म करने का एक साहसिक कदम उठाया है।

‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने 3 अक्टूबर को उनके शपथ ग्रहण के बाद उनके लिए कहा कि उन्होंने एक ऐसी प्रणाली को खत्म कर दिया गया है जो वर्षों से चली आ रही थी। “आज से कोई और उल्लेख नहीं होगा। हम केवल उन उल्लेखों की याचिकाओं की सुनवाई करेंगे जिनमें किसी व्यक्ति को फांसी दी जा रही हो, या घर से बेदखल किया जा रहा हो।” मुख्य न्यायाधीश की मौजूदगी में अपने निजी मामलों की जल्दी कार्यवाही की मांग उन प्रभावशाली वकीलों की कतारों के पास आने वाले “उल्लेखों” पर सुनवाई को दर्शाता है। ‘उल्लेख’ का मतलब वकीलों की उन लम्बी कतारों से है जो मुख्य न्यायाधीश की उपस्थिति में भी उनके निजी मामलों की जल्दी कार्यवाही के लिए अनुरोध करते थे I

कोई इन अपवादों की भी आलोचना कर सकता है (मृत्युदंड प्राप्त कई आरोपियों को इससे बचने के कई मौके मिलते हैं, इसलिए जब तक कि नए सबूत न हों, फांसी पर लटकने से पहले रात में कार्यवाही के समय मुख्य न्यायाधीश या अदालत का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना बहुत ही जरूरी होता है) लेकिन कोई भी इस लागू नियम की सरहाना नहीं करेगा जो उन्होंने परोक्ष रूप से लागू किया है।

जितना अधिक “उल्लेख” करने पर विचार किया जाता है, उतना अधिक अदालत का भारतीयों के लिए समान रूप से सुलभ होने के मूल कार्य से भटकने की संभावना होती है। यह किसी से छिपा नहीं है कि केवल हाई-प्रोफाइल वरिष्ठ वकीलों के उल्लेखों की सुनवाई होती है और काफी हद तक वह कतार में आगे बढ़ जाते हैं यह समानता के कानून को आघात पहुँचाता है।

भारत के एक लचीले कानून तंत्र में पक्षकार वकील मुख्य न्यायाधीश की अदालत में जा सकते हैं और मांग कर सकतें हैं कि तीस्ता सेटलवाड की जमानत आवेदन पर तत्काल सुनवाई की जाए, या जैसे कि प्रशांत भूषण ने मुख्य न्यायाधीश गोगोई के उल्लेख पर के  फैसले के बाद भी ऐसा करने की कोशिश की – अवैध रोहिंग्या आप्रवासियों को निर्वासित करने के लिए शीघ्र सुनवाई की जाए।

कपिल सिब्बल, प्रशांत भूषण, या इंदिरा जयसिंग जैसे हाई-प्रोफाइल वरिष्ठ वकीलों और इनके जैसे ही अन्य वकीलों को भी विभिन्न बेंचों द्वारा प्राथमिकता दी जाती है, फिर चाहे बात तत्काल सुनवाई करने की हो, या अपने पसंदीदा ग्राहकों के लिए स्टे आर्डर प्राप्त करना हो। इस प्रक्रिया में यह यकीन कर पाना मुश्किल है कि न्याय आपकी जरूरत के लिए है या पैसे के लिए।

कुछ वकील जो दैनिक शुल्क के रूप में 1 करोड़ रूपये तक लेते हैं, वे केवल अपनी नौकरी करके इतने पैसे नहीं कमा सकते हैं। इतने पैसों से किसी भी तरह की सलाह नहीं दी जा सकती, जब तक इस पैसे का इस्तेमाल मामले में हस्तक्षेप करने या मामले को जल्दी या देर से निपटाने या न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए न किया जाए।

इस वर्ष की शुरुआत में ‘इकोनॉमिक टाइम्स’ के एक साक्षात्कार में जस्टिस जे चेलामेश्वर, जिन्होंने पिछले मुख्य न्यायाधीश द्वारा की गयी कथित बेंच फिक्सिंग के आधार पर पदभार ग्रहण किया था, ने संकेत दिया कि वरिष्ठ वकील न्यायिक भ्रष्टाचार के बारे में विशेष रूप से चिंतित नहीं थे। यह वही था जो साक्षात्कार से उद्धरणों का उपयोग करते हुए ‘स्वराज्य’ ने उस समय लिखा था।

“न्यायमूर्ति चेलामेश्वर से न्यायिक भ्रष्टाचार की स्थिति के बारे में पूछा गया था। उनका जवाब था: ‘न्यायमूर्ति (जेएस) वर्मा ने एक बयान दिया, न्यायमूर्ति (पीएस) भरूचा (दोनों पूर्व मुख्य न्यायाधीश) ने एक बयान दिया, लेकिन क्या इस देश में कुछ भी हुआ? इन 1 करोड़ रुपये प्रतिदिन कमाने वाले वकीलों में से किसी ने भी इस पर बात नहीं की। वे उन सभी न्यायाधीशों के सामने उपस्थित हुए, बाद में उन्होंने जिनकी निंदा की थी। तो इसके बारे में बात करने का क्या मतलब है? ”

“क्या न्यायमूर्ति चेलामेश्वर संकेत दे रहे थे कि भ्रष्टाचार इन 1 करोड़ रुपये लेने वाले वकीलों के अनुरूप है?

“एक अन्य प्रश्न, क्या न्यायपालिका न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए चयन-सह-साक्षात्कार प्रक्रिया होनी चाहिए, के जवाब में उन्होंने कहा: ‘मैं पूरी तरह से ऐसे सिस्टम के लिए हूँ जहाँ संवैधानिक अदालतों के न्यायाधीशों को सार्वजनिक निकाय द्वारा जाँच के अधीन किया जाता है। लेकिन इसके लिए कितने लोग सहमत होंगे? आप इन 1 करोड़ रुपये के वकीलों से पूछिए कि क्या वे इसके लिए सहमत होंगे।’

“1 करोड़ रुपये के वकीलों का यह दूसरा संदर्भ हमें बताता है कि न्यायाधीश महंगे वरिष्ठ वकील, जो सर्वोच्च न्यायालय के गलियारों में इतनी शक्ति का उपयोग करता है, के बारे में अत्यधिक नहीं सोचते हैं।”

सीजेआई गोगोई का फैसला, जिसमें उल्लेख को खत्म करने का फैसला लिया गया है, महंगे वकीलों के जल्दी सुनवाई की मांग को खत्म करने का एक दांव है। यह समानता के कानून पर आघात करता है।

जगन्नाथन ‘स्वराज्य’ के संपादकीय निदेशक हैं। वह @TheJaggi पर ट्वीट करते हैं।