विचार
चीन को मिर्ची लगना स्वाभाविक लेकिन यूएस नौसेना की स्वीकरोक्ति से भारत भी रहे सचेत

चीन भारत का इतना बड़ा “हितैषी” है कि कोविड महामारी के बीच भी एक वर्ष से सीमा पर तनातनी जारी रखी है। गलवान घटना के बाद जब भारत ने तत्परता दिखाते हुए कैलाश पर्वत शृंखला की कई चोटियों पर कब्ज़ा कर लिया तो चीन ने पैंगोंग सो से पीछे हटने की बात पर समझौता कर लिया।

हालाँकि गोगरा, हॉट स्प्रिंग्स और देपसांग से पीछे हटने में चीन को अधिक लाभ नहीं दिखा इसलिए 9 अप्रैल को हुई 11वें दौर की वार्ता विफल रही। चीन भारत का इतना बड़ा “हितैषी” है कि पिछले कुछ महीनों में भारत चीन-प्रायोजित कई सायबर हमलों का साक्षी भी बना है।

हर मोर्चे पर भारत को परेशान करने के बावजूद चीन को लगता है कि अपना हितैषी समझकर भारत यूएस के साथ संबंधों पर उसकी सलाह मानेगा? या जिस तरह का प्रोपगैंडा चीनी राज्य द्वारा प्रायोजित मीडिया चलाती है, वैसा ही प्रयास हाल में ग्लोबल टाइम्स में छपे लेखों द्वारा हो रहा है?

7 अप्रैल को यूएसएस जॉन पॉल जोन्स ने भारत के अनन्य आर्थिक क्षेत्र (ईईज़ेड) में भारत के लक्षद्वीप से 130 समुद्री मील दूर से गश्त लगाई थी। यूएस नौसेना के सातवें बेड़े ने बयान जारी कर कहा कि भारत की पूर्व अनुमति के बिना फ्रीडम ऑफ नेविगेशन ने गश्त लगाकर नौवहन अधिकारों और स्वतंत्रता का प्रदर्शन किया।

“अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार इस नौवहन स्वतंत्रता ऑपरेशन ने समुद्री अधिकारों, स्वतंत्रताओं और वैधानिक उपयोग का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए भारत के अत्यधिक समुद्री दावों को चुनौती दी है।”, बयान में कहा गया। यह उस समय आया है जब भारत और यूएस के बीच रक्षा समन्वय बढ़ रहा है।

इस बात पर चीन के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने निशाना साधते “भारत यूएस के उद्देश्यों पर भ्रम में न रहे” शीर्षक से लेख प्रकाशित किया। चीन के अनुसार यूएस संदेश देना चाहता था कि भले ही भारत से उसके संबंध बेहतर हुए हैं लेकिन फिर भी भारत यूएस की नौवहन स्वतंत्रता को चुनौती नहीं दे सकता है।

जॉन पॉल जोन्स

हालाँकि, स्वयं चीन भी मानता है कि इस प्रकार की गश्ती यूएस के लिए नई बात नहीं है। न सिर्फ भारत बल्कि अपने सहयोगी देश फिलीपीन्स समेत कई देशों के अनन्य आर्थिक क्षेत्र में यूएस इस प्रकार की गश्त लगाता है। और इस गश्त के पीछे की वास्तविक प्रेरणा समुद्री अधिकार के मुद्दे पर मतभेद है।

भारत के अनन्य आर्थिक क्षेत्र में सैन्य अभ्यास करने के लिए पहले से अनुमति लेनी होती है। इसकी पुष्टि भारत समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र के जून 1995 के कन्वेन्शन से करता है जिसके अनुसार सैन्य नौवहन विशेषकर हथियारों या विस्फोटकों के साथ गश्त के लिए तटवर्ती राज्य से पूर्व अनुमति लेनी होगी।

वहीं, यूएस का मानना है कि भारत का यह दावा अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुरूप नहीं है और इसलिए यह अपने मन से नौवहन करके ऐसे दावों को चुनौती देता रहता है। यूएस की हालिया गश्त के दो दिन बाद भारत के विदेशी मंत्रालय ने अपनी मुद्रा स्पष्ट करते हुए बताया कि इसने यूएस सरकार के समक्ष कूटनीतिक माध्यमों से चिंता व्यक्त कर दी है।

रोचक है कि भारत की आपत्ति को घरेलू चर्चा में “नर्म” माना जा रहा है, यह दावा करते हुए चीनी मुखपत्र सुब्रमण्यम स्वामी का ट्वीट उद्धृत करता है, “जो दब जाते हैं वे ‘चिंता’ जैसे शब्द का उपयोग करते हैं। चीन और यूएस के बीच भारत अयोग्य हो रहा है और जापान की तरह वह एक कनिष्ठ साझेदार बनकर रह जाएगा।”

विपक्षियों की बातें प्रायः विदेशी मीडिया में सरकार पर निशाना साधने के लिए उद्धृत की जाती हैं लेकिन मोदी-विरोध में संभवतः स्वामी भी विपक्ष की ही भूमिका निभाने लगे हैं। विडंबना यह है कि यूएस ने तो गश्त लगाकर इस बात को सार्वजनिक कर दिया लेकिन चीन जो पिछले कुछ वर्षों से ऐसी कई गश्त चोरी-चुपके लगा चुका है, वह अब भारत का “हितैषी” बन रहा है।

इस लेख के तीन दिन बाद ही चीन ने एक दूसरा लेख (“भारत के ईईज़ेड में यूएस युद्धपोत की ‘घुसपैठ’ क्वाड की दुविधा को रेखांकित करती“) प्रकाशित कर दिया जिससे स्पष्ट हो गया कि वास्तव में इन टिप्पणियों के पीछे चीन की क्या मंशा है। क्वाड समूह चीन के विरोध में ही खड़ा हुआ है और यही चीन की समस्या है।

2017 में भारत, यूएस, जापान और ऑस्ट्रेलिया के इस समूह को पुनर्जीवित किया गया जब दक्षिण चीन सागर में चीन ने अपना प्रभाव बनाना शुरू किया। साथ ही बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव, ऋण के बदले भूमि जैसी चीन की विस्तारवादी नीतियों ने देशों को साथ आने के लिए और प्रोत्साहित किया।

वहीं, चीन के विदेश मंत्री क्वाड को इंडो-पैसिफिक नेटो कह चुके हैं और रूस जो हाल में यूएस-विरोध के कारण चीन के काफी निकट आ गया है, उसके विदेश मंत्री ने भी क्वाड को एशियाई नेटो कह दिया था। हालाँकि जयशंकर ने इन टिप्पणियों को “माइंड गेम” कहकर दरकिनार कर दिया है।

क्वाड देशों में से यूएस इस समूह को सैन्य समूह का रूप देना चाहता है जबकि भारत, जिसके रूस से भी सैन्य संबंध रहे हैं, वह यूएस के साथ प्रतिबद्ध होने के लिए तैयार नहीं है। हालाँकि, क्वाड देशों ने कई संयुक्त सैन्य अभ्यास किए हैं लेकिन भारत इस समूह को रणनीतिक साझेदारी तक ही सीमित रखना चाहता है।

यूएस के दबाव के बावजूद रूस से एस-400 रक्षा प्रणाली की खरीद को जारी रखकर भारत ने संदेश दिया है कि अपने हितों के लिए वह यूएस के आगे नहीं झुकेगा, ऐसे में अपने आप को वैश्विक शक्ति मानने वाले यूएस की ओर से प्रतिक्रिया के रूप में नौवहन गश्त का संदेश बड़ी बात नहीं लगती।

लेकिन एक बात जिसे नकारा नहीं जा सकता, वह यह कि यूएस भारत कोएक वैश्विक शक्ति के रूप में उभरता हुआ नहीं देख सकता। इसी कारण पाकिस्तान के माध्यम से यूएस भारत की प्रगति में बाधा डाल चुका है और बाइडन प्रशासन द्वारा पाकिस्तान संबंधों पर पुनर्विचार इस दिशा में फिर से जा सकता है।

ग्लोबल टाइम्स का कहना है कि चीन की चुनौती का सामना करने के लिए भारत यूएस के प्रति अधिक सहिष्णु हो गया है। इसमें कोई मतभेद नहीं कि पिछले कुछ दशकों में भारत की यूएस से निकटता बढ़ी है लेकिन भारत यूएस से एक समान स्तर पर वार्ता करना चाहता है, कमतर रहकर नहीं।

वहीं, यूएस की मीडिया, प्रशासन और जनमानस में वैश्विक शक्ति होने का जो अहं है, उसे पोषित करने के लिए वह कुछ देशों पर कभी सैन्य कार्रवाई करता है तो कभी अनावश्यक मध्यस्थता का प्रस्ताव देता है। हाल में भारत के ईईज़ेड नियमों को चुनौती देना भी इसी अहं की पुष्टि का एक भाग लगता है।

चीन को भारत-यूएस की निकटता खटकना स्वाभाविक है। क्वाड समूह चीन के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है इसलिए अपने प्रोपगैंडा माध्यमों से चीन इसे हतोत्साहित करने का प्रयास भी करता रहेगा लेकिन एक बात जो स्पष्ट है कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में कोई स्थाई मित्र नहीं होता और यूएस को उसके दायरे भारत को दिखाने होंगे।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।