विचार
युद्ध क्षणिक नहीं- चीन पर नेहरू की अनदेखी के बाद अब हमें पैर जमाए रखना है

युद्ध एक क्षणिक घटना नहीं है। महाभारत का युद्ध 18 दिवस का नहीं था। महाभारत के 18 दिवस के युद्ध के पीछे पांडवों का कई वर्षों का वनवास एवं  अज्ञातवास था, पीढ़ियों पहले पैतृक राज्य व्यवस्था के आगे प्रतिभापरक व्यवस्था को पराजित होने देने का पाप था।

युद्ध कई वर्षों एवं युगों का घाव होता है जिसका मवाद एक समय सीमाओं पर सेना का रक्त बनकर बहता है। इसे यदि हम वास्तविक सीमाई संघर्ष से बांध लें तो यह उन बलिदानियों का भी अपमान हैं जिन्हें हम आँकड़ों की संवेदनहीन तथ्यपरकता में ढाँप देते हैं और साथ ही यह उस राष्ट्र का भी अपमान है जो अपनी बौद्धिक परिपक्वता को दरकिनार करके स्वयं को प्राचीन रोम के ग्लैडिएटर युद्ध को देखने वाली रक्तपिपासु भीड़ में बदल देता है।

दो राष्ट्रों के वर्तमान संघर्ष का जीव कहीं अतीत में छिपा होता है, उसे समझे और जाने बगैर युद्ध-लोलुपता न सिर्फ भविष्य की कठिनाइयों का कारण बनती हैं वरन एक निरंतर हिंसा का भय सीमाओं पर छोड़ देती हैं। इतिहास को समझकर ही वर्तमान की कठिनाइयों का उत्तर भविष्य में ढूंढा जा सकता है।

15 जून 2020 को भारत-चीन सीमा का रक्तिम संघर्ष जिसने बिहार राइफल्स के 20 सैनिकों के बलिदान की लालिमा माँ भारती के चरणों में आलते के सामान रंग दिया, वह भी कोई क्षणिक उद्वेग की घटना नहीं है।  इसका उत्तर भी क्षणिक उद्वेग से दिया नहीं जा सकता है। राष्ट्रों की सीमाएँ, राष्ट्रों का इतिहास दिनों और घंटों में नहीं बदलता।

सातवीं सदी में जब हर्ष की प्रभुता उत्तर भारत में तिब्बत की सीमाओं तक विस्तार ले चुकी थी, कश्मीर में करकोटा साम्राज्य जन्म ले रहा था, ल्हासा की नींव सॉन्गसेन गाम्पो रख रहे थे। यहाँ से तीन शताब्दियों तक तिब्बत और चीन के साम्राज्य के मध्य संप्रभुता के लिए कई युद्ध हुए।

इस्लामी आततायी भारत के सुदूर पश्चिम द्वार पर लगभग तीन शताब्दियों के संघर्ष के पश्चात दस्तक दे चुके थे। चीन की सेना 747 ईस्वी में बल्तिस्तान तक पहुँचती है परंतु 751 में बल्तिस्तान वापस तिब्बत के पास पहुँच जाता है। 783 ईस्वी में तिब्बत और चीन के बीच प्रथम संधि होती है।

798 में बग़दाद का ख़लीफ़ा चीन के सम्राट के साथ मिलकर तिब्बत पर आक्रमण की योजना बनाता है और तुर्किस्तान को मुस्लिम बनाना चाहता है। आक्रमण असफल होता है और 822 ईस्वी में एकऔर संधि होती है। भारत में जहाँ मुस्लिम सल्तनत का जन्म हो रहा था, 930 में एक सशक्त तिब्बती साम्राज्य का तीन उत्तराधिकारियों में विभाजन होता है।

13वीं सदी में कश्मीर स्वात से शरणार्थी बनकर आए शाह मीर के शासन में था। 1405 में शाह सिकंदर बल्तिस्तान पर आक्रमण करके उसे मुस्लिम राज्य बना देता है। कश्मीरी सुल्तान जैन-उल-अबिदीन लद्दाख पर कब्ज़ा कर लेता है। उसके निधन के बाद, 1470 में लद्दाख स्वतंत्र नामग्याल शासन के अधीन होता है।

उइगर सुल्तान 1532 में लद्दाख पर आक्रमण करता है, और मिर्ज़ा हैदर को 1533 में ल्हासा पर कब्ज़ा करने को भेजता है। उसे मार्ग में जुमला का हिंदू राजा रोक देता है। 1585 में कश्मीर मुग़ल शासन में आ जाता है। 1751 में तिब्बत अहमद शाह अब्दाली के अधीन होता है, चिंग सम्राट प्रतिनिधि दल 1718 एवं 1719 में भेजते हैं। लद्दाख स्वतंत्र रहता है।

जम्मू पर 1808 में महाराजा रणजीत सिंह के अधीन महाराजा गुलाब  सिंह का डोगरा शासन स्थापित होता है। शौर्यवान डोगरा सेनापति ज़ोरावर सिंह के नेतृत्व में 1839 में लद्दाख कश्मीर राज्य का अंग होता है। बल्तिस्तान से अहमद शाह को हटाया जाता है, और 1841 में ज़ोरावर सिंह कैलाश की ओर चलते हैं।

गरतोक, रुडोक और तकलाकोट तक डोगरा सेना पहुँच जाती है। 14 नवंबर 1841 को ज़ोरावर सिंह की युद्ध में मृत्यु होती है, डोगरा सेना पीछे हटती है। दीवान हरिचंद और वज़ीर रतनु कश्मीर से डोगरा सेना लेकर लेह पहुँचते हैं। बाल्टी-तिब्बती-लद्दाखी सेना हारती है और चुशुल की संधि होती है। इसके बाद डोगरा पश्चिमी तिब्बत पर और तिब्बती लद्दाख पर अधिकार छोड़ते हैं।

1912 में चीनी प्रतिनिधि को तिब्बत से निष्कासित किया जाता है और दलाई लामा तिब्बत को स्वतंत्र घोषित करते हैं। चीन 1 जनवरी 1950 को तिब्बत मुक्त करने का संकल्प लेता है, और 7 अक्टूबर 1950 को तिब्बत पर आक्रमण कर देता है। 29 अप्रैल 1954 को भारत चीन के साथ पंचशील समझौता करता है।

मार्गरेट फिशर, लियो रोज़ और रॉबर्ट हुटेनबैक अपनी पुस्तक हिमालयन बैटल ग्राउंड में पंचशील समझौते से पहले ही तिब्बत के चीन में विलय के समर्थन की घोषणा को भारी भूल बताते हुए लिखते हैं- “यदि भारतीय इस बैठक-पूर्व स्वीकृति के द्वारा विपक्षियों में एक मैत्रीभाव उत्पन्न करना चाहते थे तो उन्हें अभी अपने प्रतिद्वंद्वियों के विषय में बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है।”

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा सीमा निर्धारण को इस समझौते से बाहर रखने की कड़ी निंदा हुई थी। चीन के अधिपत्य में छह पास थे- शिपकी पास, माना पास, नीति पास, खुंगरीबिंगरी पास, डर्मा पास और लिपुलेख पास। नेहरू का मानना था कि यह स्वतः सिद्ध है की पास के दक्षिण की भूमि भारत की है।

भूमि सीमा निर्धारण के संबंध में नेहरू का मानना था की चाऊ एनलाई का कहना है की सीमा पर कोई विवाद है ही नहीं, इसलिए चिंता की आवश्यकता ही नहीं है। नेहरू को यह समझने में कि भारत एक राष्ट्र है जमींदारी नहीं, अधिक समय नहीं लगा।

जून 1954 में चीन ने बाराहोती में भारतीय पोस्ट पर आपत्ति ली। चीन ने बाराहोती को त्रुटिवश निति पास के उत्तर में समझ लिया था। चीन ने त्रुटि स्वीकार की परंतु बाराहोती को चीन का भाग मानने पर अड़ा रहा। नेहरू के आश्वस्त होने का एक कारण संभवतः रूस से उनकी निकटता थी। नेहरू न सिर्फ प्रधानमंत्री थे, विदेश मंत्री भी थे।

यह अचंभित करने वाला पक्ष है कि 1950 में सरदार पटेल की अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में समझ, कम से कम चीन के परिप्रेक्ष्य में कहीं आगे थी। 9 जुलाई 1950 को पटेल नेहरू को पत्र लिखते हैं और लंदन टाइम्स की 28 और 19 जून की चीन संबंधी रिपोर्ट संलग्न करके लिखते हैं-

“मैंने चीन से आई रिपोर्ट को पढ़ते हुए चीन को और चीन में अपने राजदूत को, एक सकारात्मक परिप्रेक्ष्य से आँकने का प्रयास किया था, परंतु दोनों ही असंभव जान पड़ते हैं। चीन ने हमें तिब्बत के संबंध में धोखे में रखने का प्रयास किया और शांति की बात करते हुए तिब्बत पर आक्रमण की तैयारी की। दुःख यह है कि तिब्बत ने हम पर भरोसा किया।”

आगे उन्होंने नेहरू को लिखा, “मुझे नहीं लगता है कि तुम्हारे व्यक्तिगत संबंधों के बावजूद भले ही हम चीन को मित्र मानते हों, चीन हमें शत्रु ही मानता है। इसके पीछे कम्युनिस्ट विचारधारा है जो हर उस व्यक्ति को शत्रु मानती है जो उनकी विचारधारा को नहीं मानता। नेपाल का शासन लोकप्रिय नहीं है, नागालैंड मिशनरी के प्रभाव में भारत विरोधी है, चीन इस सब का लाभ उठाएगा।”

नेहरू ने 18 नवंबर 1950 के पत्र में अपने अभिजात्य अभिमान के साथ सरदार पटेल के जिस पत्र को सिरे से नकारा, वही पत्र आने वाले समय में प्रत्येक बिंदु पर असत्य सिद्ध होने वाला था। नेहरू लिखते हैं, बिना सोचे हुए और बिना संकोच के चीनी आक्रमण एवं भारतीय सीमा में अतिक्रमण की बातें नहीं करनी चाहिए। चीन के आक्रमण की आशंका निराधार है। चीन के आक्रमण की कोई भी संभावना नहीं है। यह मानना कि कम्युनिस्ट और विशेषकर कम्युनिस्ट चीन भारत का अतिक्रमण करना चाहता है, अनुभवहीन मूढ़ता है।

नेहरू ने तिब्बत के मामले को संयुक्त राष्ट्र में उठाने को सिरे से नकार दिया। इतना सब होने के बाद 6 नवंबर 1958 मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में नेहरू कहते हैं कि हमने पुनः चीन की संयुक्त राष्ट्र में सदस्यता के लिए प्रयास किया किंतु समर्थन नहीं मिला।

ज्ञात रहे कि 1957 में लद्दाख के बकुला लामा ने तिब्बत-सिंकियंग सड़क निर्माण के विषय में भारत सरकार को सूचित किया था। एक वर्ष बाद 1958 में नेहरू सरकार ने दो जाँच दल अक्साई चिन भेजे। एक दल चीनियों द्वारा बंदी बना लिया गया, दूसरा वापस आया और उसने खबर की पुष्टि की।

अक्टूबर 1958 में भारत ने विरोध दर्ज किया, 3 नवंबर 1958 को चीन ने अक्साई चिन पर भारत का अधिकार मानने से माना कर दिया। आज जो राजनीतिक दल क्लिष्ट कूटनीतिक अंतर्राष्ट्रीय विषय पर नरेंद्र मोदी सरकार की सर्वदलीय बैठक में 15 जून 2020 की घटना से एक सप्ताह की देरी पर आक्रोशित हैं उन्हें यह समय-रेखा देखनी चाहिए जब भारतीय लोकतंत्र के देवपुरुष नेहरू ने 1957 में हुए अतिक्रमण पर पहली बार 7 सितंबर 1959 को चर्चा की।

चीन के अख़बार में पहली बार इस सड़क की खबर 6 अक्टूबर 1957 को छपी। सड़क बनने के पाँच माह पश्चात् फरवरी 1958 में विदेश सचिव सुबिमल दत्त ने नेहरू को इस सड़क के विषय में सूचित किया।

आज जो नेता अपने राजनीतिक लाभ के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सर्वदलीय बैठक में दिए बयान को घुमा फिरा रहे हैं वे ध्यान दें कि सरकारी सूचना प्राप्त होने के एक वर्ष पश्चात 22 अप्रैल 1959  को संसद में चीन के मानचित्र में अक्साई चिन दिखाए जाने पर नेहरू कहते हैं कि चीन के साथ सीमा के संबंध में छुटपुट विवाद हैं लगभग एक मील इधर या उधर सीमा को ले कर।

सदस्यों के प्रश्न पर लोकसभा अध्यक्ष ने नेहरू से विस्तृत बहस की अनुमति माँगी जिसे नेहरू ने अस्वीकार कर दिया। ब्रजराज सिंह द्वारा सीधे 30,000 वर्ग किलोमीटर कब्ज़े के प्रश्न पर नेहरू ने उन्हें अफवाहों पर विश्वास न करने कहकर चुप करा दिया।

चीन ने पहले चुशुल के संधि को 8 सितंबर को मानने से इनकार किया, कि वह तिब्बत और लद्दाख के मध्य थी और चीन का उस से कोई सरोकार नहीं था। बाद में उसी संधि को चीन ने स्वीकारा क्योंकि उसे न मानने का अर्थ चीन के तिब्बत पर स्वामित्व पर स्वयं प्रश्न उठाना था। संसद में नेहरू के अक्साई चिन के 38,000 वर्ग किलोमीटर पर चीनी कब्ज़े पर अलग बहस का विषय है।

सीमा परिभाषित करने को लेकर यही संकोच आगे भी चलता रहा। चीन की ओर सड़क इत्यादि का निर्माण 1954 से आरंभ हुई समस्या थी जो निरंतर चलती रही और एक के बाद सरकारें आँखें बंद किए रहीं।

लद्दाख में पैंगोंग की समस्या भी इसी अपरिभाषित सीमा का परिणाम है जहाँ भारत फिंगर 8 तक अपना अधिकार मानता रहा और चीन फिंगर 2 तक। भारतीय चौकी फिंगर 4 पर ही रही और चीन 1999 में यहाँ तक पहुँच गया।

समस्या यह रही कि नेहरू के देर से सही, परंतु स्वीकार करने के बावजूद कि जहाँ चीन ने सीमा तक संचार, सड़क का प्रबंध कर लिया है, 2013 में रक्षा मंत्री एके अंटोनी ने स्वीकार किया कि हमारी नीति सीमा को अविकसित रखने की रही। ऍफ़-4 तक पोस्ट बनाने के बाद भी हमने उसे विकसित करने का बहुत प्रयास नहीं किया।

चीन वाहनों से ऍफ़-2 तक गश्त लगाता रहा तो हम पैदल ऍफ़-8 तक। यह व्यवस्था उन सम्मानित सेवानिवृत सैनिकों के कार्यकाल में भी रही जो बाद में राजनीति में उतर गए और आज अत्यधिक उद्वेग का प्रदर्शन कर रहे हैं।

अमरीकी पूर्व राष्ट्रपति हर्बर्ट हूवर का कथन याद हो आता है कि युद्ध की घोषणा वृद्ध करते हैं, प्राण विसर्जन युवा करते हैं। भारत सरकार का मेरी समझ में प्रयास है कि वही स्थिति पुनर्स्थापित हो जो अप्रेल 2020 के पहले थी और पूर्व कमान या पूर्ववर्ती सरकारों के काल में थी। यदि अधिक भूमि अधिग्रहण संभव रहा होता तो उन्होंने अपने समय में कर लिया होता।

वर्तमान स्थिति तरल है, परंतु नियंत्रण पूर्ववत स्थिति में है। यदि प्रधानमंत्री एवं सेनाध्यक्ष ऐसा कह रहे हैं तो विश्वास रखना चाहिए। भले ही नेहरू ने और 2004-2014 तक की कांग्रेस सरकार ने इस विश्वास को बनाने में बहुत मदद नहीं की जब चीन द्वारा लगभग 600 वर्ग किलोमीटर भारतीय भूमि के अधिग्रहण को छुपा कर वह पार्टी के स्तर पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से मैत्री करने पहुँच गई। परंतु सरकार नई है, एक-एक वर्ग किलोमीटर के लिए शायद पहली बार लड़ रही है।

जहाँ हर जगह अनुमति एवं साथ में जुड़े भ्रष्टाचार का मार था, वहाँ 2014 के बाद व्यापक आदेश से वास्तविक नियंत्रण रेखा के 100 किलोमीटर (किमी) तक सड़क निर्माण का आदेश दिया गया। 66 सड़कों को बनाने का मुक्त अधिकार सीमा सड़क संगठन को दिया गया।

उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार जहाँ सड़क के लिए पहाड़ काटने का कार्य 2008-2014 में प्रतिवर्ष 230 किमी था, 2014 के बाद वह 470 किमी हो गया। 2008-14 के मध्य सड़क समतलीकरण जहाँ 170 किमी प्रतिवर्ष था अब 380 किमी प्रतिवर्ष हो गया है।

2008-14 के मध्य बनी एक सुरंग के सामने 2014-2020 के मध्य छह सुरंगें बनीं हैं। सेतुओं का निर्माण भी लगभग 7,000 किमी से बढ़ कर दोगुना हो गया है। इससे दो बातें होती हैं- एक, सीमा पर पहले के वर्षों की भाँति भूमि छोड़ने की स्थिति नहीं है, दूसरे चीनी पक्ष में अचानक कड़ी हुई भारत की महान दीवार के प्रति उत्तेजना स्वाभाविक है।

हमें पाँव जमाकर खड़े रहना है। मेक इन इंडिया का मखौल बंद करके तेज़ी से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ना होगा। रोष, दुःख और उन्माद के उतरने के बाद स्वार्थी तंत्र व्यवस्था पर चीनी व्यापार के लिए दबाव डालेगा। हमें अपने क्रोध को दीर्घायु देनी होगी। हमें एक राष्ट्र, एक जीव बनकर भविष्य की ओर बढ़ना होगा।

हमें इतिहास के प्रति जागरूक रहना होगा। हमें ऐसे लोगों के प्रति सावधान रहना होगा तो सैनिकों की आत्माहुति को चलता है कहकर राजनीति के लिए बुलेटप्रूफ से लेकर राफेल तक रोककर बैठे थे और प्रशंसा या स्वार्थ के लोभ में सियाचिन तक उपहार स्वरूप देने को तैयार थे। यह 18 दिनों की महाभारत नहीं है, राजनयिक, आर्थिक एवं अन्य कई स्तरों पर इस युद्ध को लड़ना होगा। और इसी में एक युद्ध दुष्प्रचार का है, उससे भी लड़ना होगा।