विचार
नैतिक रूप से दिशाहीन चीन एक अब्राह्मिक शक्ति है, यह सफल नहीं हो सकता

आशुचित्र- नैतिक दिशा के बिना चीन सिद्धातहीन सत्ता का उपयोग करना चाहता है, इसे उसका स्थान दिखाना होगा।

चीन को संभवतः सबसे अधिक दो लोगों ने परेशान किया है। पहले निस्संदेह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जिन्होंने व्यापार युद्धों और कोविड-19 वैश्विक महामारी के लिए चीन को उत्तरदायी ठहराकर उसे रक्षात्मक होने पर विवश कर दिया है।

दूसरे हैं भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो दोहरी नीति अपनाकर एक ओर चीन के शीर्ष नेतृत्व से वार्ता भी कर रहे हैं और दूसरी ओर चीन के धौंस के आगे न झुककर अटल भी खड़े हैं। चीन की बेल्ट एंड रोड (बीआरआई) पहल का विरोध और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) में महामारी के उद्गम के निष्पक्ष जाँच की माँग का समर्थन इसी दोहरी नीति का भाग है।

इसी प्रकार भारतीय भूभाग पर चीनी अतिक्रमणों के प्रयासों, विशेषकर लद्दाख क्षेत्र में, को विफल करने के लिए भारत का आँख से आँमिलाने का साहस देखने को मिला है। 2017 में डोकलाम में जब दोनों देश आमने-सामने हुए थे, तब चीन को शांत होने के लिए विवश होना पड़ा था जिसने उसे चिंतित किया होगा।

आज विश्व में कुछ ही लोग हैं जो चीन के प्रयोजनों को अच्छा मानते हैं। जर्मनी और फ्रांस जैसी यूरोपीय शक्तियाँ भी चीन के व्यवहार और कुछ ही महीनों में विश्व अर्थव्यवस्था को नष्ट करने वाले वायरस का दायित्व न उठाने के रवैये से क्रोधित हैं। कुछ क्षतिपूर्ति की माँग भी कर रहे हैं।

विश्व के दूसरे हिस्सों में जहाँ कुछ देश चीन के सस्ते ऋणों और इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश के वादों से आकर्षित थे, वे भी समझौतों को रद्द कर रहे हैं। यहाँ तक कि छोटे देश जो चीन के धौंस और आर्थिक शक्ति के आगे टिक नहीं सकते हैं, वे भी उसके विरुद्ध खड़े हो रहे हैं।

अगली महशक्ति कैसे बनना है यदि इसपर चीन गहन पुनर्विचार न करे तो यह हार जाएगा- हिटलर और स्टैलिन की तरह। यह जान लें कि लौकिक हो या आध्यात्मिक, हर महाशक्ति का जीवनकाल होता है लेकिन चीन अपनी गतिविधियों से सुनिश्चित कर रहा है कि इसका जीवनकाल दशकों की बजाय कुछ वर्षों तक ही रहे।

विश्वास के क्षेत्र में महाशक्ति रही ईसाइयत अपने वर्तमान क्षेत्रों में अपना प्रभुत्व खो रही है जिसके कारण ईसाई मत अफ्रीका, भारत और चीन में विस्तार करना चाहता है। इस्लाम अभी भी सबसे तीव्रता से बढ़ने वाला मत है लेकिन यह इच्छा से हुए धर्मांतरणों की बजाय जनसांख्यिकी के कारण हो रहा है।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि ईसाइयत को मिला महाशक्ति का दर्जा कई शताब्दियों तक समेकित रहा था जो इसकी दीर्घायु का प्रमाण है। इस्लाम भी कई सदियों से मध्यम महाशक्ति रहा है लेकिन अब इसका शिखर पार होने को है क्योंकि इसका हिंसा-संबंधित कट्टरवादी मत इसके प्रसार को हतोत्साहित कर रहा है।

कई आम मुस्लिमों को उन्मादी आतंकवाद से हुई क्षति मन ही मन समझ आ गई है। इस्लाम को त्यागने वालों की संख्या बढ़ रही है लेकिन हिंसा के भय से वे अपना मत-त्याग सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करते हैं किंतु संभवतः वे इस्लामवाद को लेकर शंका में पड़े शांत बहुसंख्यकों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

प्रश्न है कि अब तक हमने जिन लौकिक और आध्यात्मिक महाशक्तियों (ब्रिटिश साम्राज्यवाद, अमेरिकी प्रभुत्व, ईसाइयत और इस्लाम) को देखा, उनमें और चीन में क्या अंतर है?

उत्तर है- चीन नैतिक रूप से दिशाहीन एक अब्राह्मिक महाशक्ति है। इसका एक मात्र उद्देश्य शक्ति प्राप्त करना और आधिपत्य स्थापित करना है।

अब्राहमवाद को परिभाषित करने वाला लक्षण है कि वह अपने मत या विचारधारा के विस्तार के लिए दूसरों पर सत्ता जमाना चाहता है, यह भारतीय धर्मों (विशेष रूप से हिंदू, बौद्ध और जैन) के विपरीत है जहाँ स्वयं पर, अभिमान पर और कामनाओं पर विजय प्राप्त करने पर ज़ोर दिया जाता है।

लेकिन चीन का कोई आधिकारिक धर्म नहीं है और आध्यात्मिक कमी को वह शक्ति से भरना चाहता है। अगर आप चीनी इतिहास पढ़ेंगे तो पाएँगे कि चीन ने एक ‘योग्य’ आधुनिक राज्य (फ्रांसिस फुकुयामा के शब्दों में) किन वंश के अधीन तीसरी शताब्दी ईसापूर्व में स्थापित किया था। शासक के हाथ में पूर्ण सत्ता थी।

तब से चीन एकता, एक-समानता और सत्ता स्थापित करने के लिए अपनी ही विविधताओं से युद्ध करता आ रहा है। आज चीन में जो भी है हान सत्ता है। तिब्बतियों तो हान के अधीन रखा गया है और वैसा ही ज़िनजांग के उइगर मुस्लिमों के साथ किया जा रहा है।

इंटरनेट के युग में जहाँ स्मार्टफोन के एक स्पर्श में जानकारी उपलब्ध है, वहाँ आधुनिक चीनी राज्य आज भी अधिनायकवादी ही है। चीन के इंटरनेट और निगरानी रखने वाले राज्य ने इंटरनेट के चारों ओर एक खाई खोद दी है जो उसे पूरी दुनिया से अलग करता है। चीनी इंटरनेट में प्रवेश करने वाले को राज्य की अनुमति और स्वीकृति चाहिए होती है।

चीन का राष्ट्र, राजनीतिक संप्रभुता और आधिपत्य का विचार टियांग्ज़िया विचार में निहित है जो भौगोलिक और आध्यात्मिक संसार को एक क्षेत्र में बांधता है। इस क्षेत्र में चीनी शासक का प्रभुत्व होता है। चीन के संसार दर्शन में चीन विश्व का केंद्र है और अन्य देशों को इसकी प्रधानता और सत्ता को स्वीकारना होगा।

चीन की दृष्टि में िसके बराबर कोई नहीं हो सकता। आप चीन के मित्र तब हो जब आप चीन की अधीनता या सहायक का दर्जा स्वीकार करते हों लेकिन इस पदानुक्रम में आपकी स्वतंत्रता बाधित हो जाती है। ये इस्लाम के खलीफा और धिम्मी लिचार से मेल खाता है।

खलीफा हर मुस्लिम देश का शासक नहीं होता लेकिन सब उसके प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं। धिम्मी यानी जिन लोगों पर सत्ता जमाई गई है, को इस्लामी कानून के अनुसार कुछ अधिकार मिलते हैं लेकिन उद्देश्य होता है कि उन्हें भय या जनसांख्यिकी से इस्लाम में मिला लिया जाए।

इस्लाम की तरह चीन मानता है कि लोकतांत्रिक रूप से तय किया हुआ कोई समान कानून नहीं हो सकता। या तो चीन का कानून होगा या कोई कानून नहीं होगा।

अमेरिकी आधिपत्य से हम प्रभावित नहीं हैं, न ही इस्लाम और ईसाइयत की स्वघोषित श्रेष्ठता को मानते हैं लेकिन अंततः उनके भी कुछ नैतिक सिद्धांत हैं। उनके परोपकार की सीमा केवल मत मानने वालों तक सीमित है और वे काफिरों के तिरस्कार और उनसे भेदभाव में विश्वास रखते हैं लेकिन इसका भी उनकी दृष्टि में एक नैतिक आधार है।

अमेरिकी खुद को लोकतंत्र और स्वतंत्रता के प्रचारक मानते हैं, अंग्रेज़ी साम्राज्यवादी दुनिया को ‘सभ्यता’ सिखाने चले थे, ईसाई मानते हैं कि ईसामसीह लोगों के पाप के लिए मरे थे, ऐसे में उनका कर्तव्य बनता है विश्व में अच्छाई फैलाने के लिए ईसा के ब्रांड को बढ़ाना।

इस्लाम में भाईचारे का विचार केवल मत मानने वालों तक सीमित हो सकता है लेकिन धर्मांतरण के बाद भेदभाव का अदिक कारण नहीं बचता। सार्वभौमिकता के नाम पर यह संकुचित मानसिकता है लेकिन इन सत्ता-उन्मुखी विचारधाराओं में निहित नैतिक विचार को नकारा नहीं जा सकता।

लेकिन चीन के साथ ऐसा है, इसे विश्वास से नहीं कहा जा सकता क्योंकि वे औपचारिक दृष्टि से धार्मिक नहीं हैं। नैतिक विचार के अभाव में इसकी शक्ति निरंकुश हो गई है जिससे इस राष्ट्र का उद्देश्य मात्र दूसरों पर सत्ता स्थापित करना रह गया है। कोविड-19 के लिए उत्तरदायी ठहराए जाने पर चीन की बौखलाहट से अब विश्व भी यह समझ रहा है।

एक समय पर इस नैतिक अभाव को भरना होगा और ईसाइयत इसके लिए तत्पर है। चीन में ईसाइयत सबसे तेज़ी से बढ़ता हुआ मत है जिस कारण से कम्युनिस्टों को भी इसकी वृद्धि पर नियंत्रण कसने के लिए पोप से समझौता करना पड़ा।

चीन को अपेक्षा है कि पोप से ये मनवाकर कि बिशॉप सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएँगे, वह पार्टी की सत्ता बरकरार रखेंगे लेकिन पोप मूर्ख नहीं हैं। वे भी लंबा खेल खेल रहे हैं इस आशा में कि ईसाइयत ज़मीनी स्तर से उठकर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी पर हावी हो जाएगा, जैसा कि यूरोप में पहली शताब्दी में हुआ था।

चीन के पास अपने धार्मिक विकल्प हैं- दाओवाद, कन्फुशियनवाद या बौद्ध धर्म लेकिन अब तक यह आधिकारिक रूप से किसी भी मत को प्रोत्साहित करने से बचता आया है ताकी लोगों की पूरी निष्ठा कम्युनिस्ट पार्टी और हान राज्य में ही हो।

सुन ज़ु की आर्ट ऑफ वार (युद्ध की कला), चीन को परामर्श दिया गया है, “सभी को अक्षुण्ण रखते हुए उन्हें अपने अधीन करना तुम्हारा उद्देश्य है। इस प्रकार तुम्हारी सेना हतातहत न ही होगी और तुम जो प्राप्त करोगे, वह पूर्ण होगा। आक्रामक रणनीति की यह कला है।”

चीनी रणनीति का मूल यही है- प्रभुत्व स्थापित करने के लिए वह सब करो जो वास्तविक युद्ध से कम भी न हो। विश्व को इसे नकारना चाहिए। सिद्धांतहीन सत्ता की विफलता निश्चित है। चीन कोई स्वर्ग नहीं है और उसकी इच्छानुसार सब क्यों समर्पण करें।

चीन सिद्धांतहीन शक्ति का उपयोग कर रहा है। इसे उसका स्थान दिखाना होगा।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।