विचार
भोपाल में सीएए समर्थन रैली में लोगों का प्रश्न- आपने यह कैसा इंडिया डिस्कवर किया है?

अब तक मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के रोशनपुरा चौराहे पर झंडे-बैनर हाथ में लिए जो भी आते थे, हारफूल चढ़ाने या ज्ञापन सौंपने के लिए ही आया करते थे। पहली बार ऐसा हुआ कि वे इस शानदार प्रतिमा के सामने से सिर्फ नारे लगाते हुए निकल गए।

यहाँ एक भव्य प्रतिमा में पंडित जवाहरलाल नेहरू स्थापित हैं। भारत के पहले प्रधानमंत्री। लेकिन यहाँ जुटे हज़ारों लोग चचाजी का जन्मदिन मनाने नहीं आए थे। न ही यह कोई गणतंत्र या स्वतंत्रता दिवस की कोई रस्म थी डिस्कवरी ऑफ इंडिया के रचयिता को ताजे फूलों की माला पहनाई जाए। हर किसी ने पंडितजी को एक तीखी नज़र से देखा। आपस में कुछ सवाल किए और नागरिकता संशोधन कानून के पक्ष में एक जोरदार नारा लगाया।

हर उम्र, जाति और धर्म के लोग एक छोटी सी सूचना पर ही इकट्‌ठा हुए और कतारें बनाकर खड़े हो गए थे। पूरी सड़क पर यह अनुशाासित कतारें 2 किलोमीटर लंबी थीं। वे अपने हाथों में तख्तियाँ लिए थे और नए कानून के प्रति अपना समर्थन जाहिर कर रहे थे। इनमें एक भी ऐसा नहीं था, जो गुस्से से उबल रहा हो, किसी को गालियां दे रहा हो, किसी को कोस रहा हो।

किसी ने नहीं कहा कि वे देश के मालिक हैं। हमारी कोई धार्मिक किताब ऐसी भी है, जो दूसरों से हिसाब बराबर करने की पैरवी करती है। हम लड़ेंगे। मरेंगे। मारेंगे। ऐसी किसी भाषा में यहां किसी ने एक शब्द नहीं कहा। वे जानते थे कि यह देश उनका है। इस देश के वे नागरिक हैं। मालिक होने का वहम उन्हें नहीं था। वे नेहरूजी के समक्ष यही जाहिर करते हुए गुजरे कि सभ्य नागरिक के नाते वे इस कानून को लाने के पक्ष में हैं।

कोई भी इस देश का मालिक कैसे हो सकता है? हम सिर्फ एक सभ्य नागरिक हो सकते है। भोपाल के लोग यही कहने के लिए सड़कों पर उतरे। वे सब तमीज और तहजीब से अपनी बात कहने आए। तीन घंटे के भीतर यात्रा मार्ग से गुुजरकर अपने घरों को चले गए। और अगर किसी भी समाज-समुदाय ने देश के लिए कुछ किया है तो यह अहसान नहीं है, जिसका जिक्र गला फाड़कर उन्मादी भीड़ के सामने किया जाए। इनकी ताजा हकीकत बताने के लिए ही लोग इस दूरदृष्टा पूर्व प्रधानमंत्री के सामने से होकर गुजरे।

भोपाल के रोशनपुरा चौराहे पर वे लोग पंडित नेहरू की प्रतिमा के सामने से गुज़रे। प्रतिमा ने दूर सामने भारत माता चौराहे तक इनकी प्रभावशाली कतार को देखा। कोई उनके श्रीचरणों में फूल चढ़ाने नहीं रुका। वे चलते-चलते आधुनिक भारत के निर्माता को देखकर यह ज़रूर चर्चा करते सुने गए कि पंडितजी यह कैसा इंडिया डिस्कवर करके आप हमें सौंपकर गए? आपके ही वंशधरों को आपकी ही प्रतिज्ञाएँ याद नहीं हैं। आप और आपके ही दलबल ने सरहद पार के पीड़ितों और प्रताड़ितों को पनाह देने की सौगंधें खाईं थीं। कानून बनाने के रास्ते तय किए थे। अब आपके ही बलहीन दल के सत्ता से खदेड़े जा चुके वंशज देश को आग में झोंक रहे हैं।

आपने मजहब के आधार पर देश को बाँटना कुछ सोचकर ही कुबूल किया होगा, अब देखिए इस बटवारे के बाद किसे क्या मिला? कौन कितने गर्त में गया और किसे मुँह मांगी सारी मुरादें मिलीं? कौन कहाँ पहुँचा और कौन कहाँ कितना बचा या बढ़ा? 70 साल से सरहद पार से लोग भाग-भाग कर आ रहे हैं। इनके बारे में कौन कब सोचता? उनका दलबल आज भी मजहब के आधार पर फैसले तय करने की उसी कालातीत मानसिकता में जकड़ा हुआ है और इस देश की बदकिस्मती को बढ़ाने में लगा हुआ है।

अगर पूरे देश में सीएए को लेकर कोहराम मचा हुआ है तो सभ्य नागरिकों का भी फर्ज है कि वे इसे राजनीतिक झरोखे से देखने की बजाए देश और देश के भविष्य के नजरिए से देखें और इस काननू पर अपनी राय दर्ज कराएँ। भोपाल वालों ने यही किया।

बंगाल से लेकर हैदराबाद तक इस कानून के विरोध में गुंडागर्दी की हद तक हल्ला मचाने वालों को यह करारा जवाब था, जो मंचों से हताश गुंडों की तरह चीख रहे हैं कि वे इस देश के मालिक हैं। कोई बाहर नहीं कर सकता। लेकिन यह नहीं बता रहे कि उन्हें बाहर कौन कर रहा है? इस कानून में कहां ऐसा लिखा है कि किसी की नागरिकता खत्म कर दी जाएगी? वे क्यों पगलाए हुए हैं? कौन उनके पीछे आग सुलगाकर हवा भी दे रहा है?

नेहरूजी आज होते तो पता नहीं क्या करते? इंडिया डिस्कवर तो वे तभी कर चुके थे और जैसा इंडिया डिस्कवर करके गए, उसमें फैलाई गई सत्तर साल की खरपतवार को साफ करना आज कितना दूभर हो रहा है। पता नहीं वे थोपे गए सेक्युलरिज्म की पोलपट्‌टी खुल चुकने के बाद अपनी राय बदलते या नहीं! पता नहीं आज वे अपने ही नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय जेएनयू के हाल पर कितना खुश होते। क्या ऐसा ही सेक्युलरिज्म उनकी कल्पना में था, जिसकी प्रयोगशाला यह संस्थान बनकर उभरा। पता नहीं पंडितजी इस पर शर्म करते या खुश होते।

उनके दलबल ने धर्म के आधार पर देश को बाँटा और जब देश बट गया तो और ज्यादा बांटने के लिए जातियों का जंगल मिल गया। जातियों का जहर भी खूब फैला चुकी इंडिया की मौजूदा सियासी तस्वीर चचा को कितना उद्वेलित करती, आज कहा नहीं जा सकता।

पहले फूट डालकर राज करने की तोहमत मढ़ने के लिए अंग्रेज थे, लेकिन इधर आज़ादी के बाद का हिसाब किस अंग्रेज से लिया जाएगा? बेटियों को अगवा करने के बाद ननकाना साहिब से निकाले जाने की हालत में घेरे जा रहे सिख दुनिया के किस कोने में जाएँगे, इसका जवाब बौद्धिक रूप से दिवालिया हो चुके उनके दलबल में किसी के पास नहीं है।

पंडितजी भोपाल की इस प्रतिमा में खामोश खड़े रहे। सत्तर साल की दुर्गंध मारती विरासत देश-दुनिया के सामने है। शेरवानी में लगे गुलाब की महक में यह दुर्गंध किसी को कैसे महसूस होगी? इस मूर्ति के सामने से अभी-अभी हज़ारों लोग एक ज़रूरी कानून के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद करके निकल गए हैं। लेकिन देश में घुमड़ते सारे सवाल वैसे ही हैं।