विचार
पंजाब की कृषि पद्धति को भगवद्गीता की भाषा में ‘प्रेय’ कहा जाएगा यानी ‘राजस’ सुखदायक

आप कह सकते हैं कि आज के समय में धर्म का क्या मोल है? अगर भगवद्गीता नहीं ही पढ़ी तो कौन सा नुकसान हो गया? इसके जवाब में हम आपको पंजाब और हालिया आढ़तिया-ज़मींदारों का बॉर्डर पिकनिक दिखा देंगे। उसके बाद आपको भगवद्गीता के 18वें अध्याय का 37वाँ-38वाँ श्लोक देखना है–

यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्।।18.37

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्।।18.38

इसका अर्थ है जो सुख प्रथम (प्रारंभ में) विष के समान (भासता) है, परंतु परिणाम में अमृत के समान है, वह आत्मबुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न सुख सात्त्विक कहा गया है। जो सुख विषयों और इंद्रियों के संयोग से उत्पन्न होता है, वह प्रथम तो अमृत के समान, परंतु परिणाम में विष तुल्य होता है, वह सुख राजस कहा गया है।

इस सिद्धांत को श्रेय और प्रेय का सिद्धांत कहा जाता है जिसमें माना जाता है कि किसी कार्य को करने में कष्ट हो और परिणाम अच्छे हों तो वह श्रेय है और जिसे करने में मज़ा आए लेकिन नतीजे नुकसानदायक हों, तो वह प्रेय हुआ।

अब देखें तो पंजाब में जितना अनाज उपज ही नहीं सकता, पंजाब उतना अनाज एमएसपी पर बेच देता था! ज्यादा कमा लेना मज़ेदार था, प्रेय जैसा। ये अनोखी बात आम लोगों को तब पता चली जब आढ़तियों-ज़मींदारों ने दिल्ली बॉर्डर पर कृषि कानूनों में सुधार के खिलाफ पिकनिक मनाना शुरू कर दिया।

जैसे-जैसे ये आढ़तियों-ज़मींदारों के समर्थन में अर्बन नक्सलों का समूह उतरता गया, एक-एक करके खुलासे भी होते रहे। पूरा देश जब प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) के ज़रिए सीधे किसानों के अकाउंट में पैसे देने की ओर बढ़ रहा था, उस दौर में यहाँ बिचौलियों को बनाए रखने की कवायद चल रही थी।

मामला इतने पर ही रुक जाता तो कोई बात नहीं थी, पर्यावरण की दृष्टि से भी उनका काम नुकसानदेह था। पंजाब धान की खेती के लिए उपयुक्त नहीं। इसके वाबजूद पंजाब के 22 जिलों में धान की खेती होती है। जलस्तर 49 सेंटीमीटर प्रति वर्ष की गति से नीचे जा रहा है।

जितना पानी हर वर्ष प्राकृतिक तरीकों से आएगा, उसका करीब 165 प्रतिशत खर्च किया जा रहा था। लुधियाना के ही पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के मुताबिक पंजाब में एक किलो धान उगाने के लिए 5,000 लीटर पानी खर्च कर दिया जाता है। जिसे एनजीओ की भाषा में सस्टेनेबल ग्रोथ कहते हैं, ये वह तरीका तो बिल्कुल नहीं।

इस लिहाज़ से एनजीओ जमातों को पंजाब में धान की खेती के खिलाफ उतरना चाहिए था, लेकिन संभवतः विदेशी फंड का बोझ अधिक होता है। ऐसी कोई आवाज़ें उठी नहीं। इसके अलावा जब कृत्रिम उर्वरकों का प्रयोग देखेंगे तो नज़र आता है कि भारत भर में औसतन 88.2 किलो उर्वरक में प्रति हेक्टेयर खेती होती है।

पंजाब में इसके दोगुने से भी ज्यादा, औसतन 190.1 किलो प्रति हेक्टेयर इस्तेमाल किया जाता है। इसका नतीजा? एक ट्रेन का नाम ही “कैंसर एक्सप्रेस” पड़ गया है। भटिंडा, फरीदकोट, मंसा, संगरूर जैसे कुछ जिलों से लोग लगातार भटिंडा से बीकानेर जाने वाली एक ट्रेन से इलाज के लिए सफ़र करते हैं, और उसका नाम अब लोगों ने “कैंसर एक्सप्रेस” रखा हुआ है।

क्या हम चाहेंगे कि एमएसपी पर ऐसा अनाज खरीदकर उसे पूरे देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम पहुँचाया जाए

पुराने दौर में जब वैज्ञानिक ये बताते थे कि इतने खेत में 50 मिलीलीटर कीटनाशक लगेगा, उससे सुनकर आए किसान ने सोचा ये चार-पाँच चम्मच में क्या होगा भला? तो उसने 50-100 कर दिया लेकिन पंजाब का “किसान” खुद तो खेती करता नहीं, उसने अपने बिहारी मजदूर को कीटनाशक छिड़कने दिया।

मजदूर ने सोचा ये भी कम है, तो 100 बढ़कर 150 मिलीलीटर हो गया। इसके अलावा जिन कीटनाशकों का प्रयोग होता है उनमें से कपास पर प्रयोग किए जाने वाले कीटनाशकों को देखें तो जो 15 में से सात को कैंसर की वजह माना जाता है।

जब हम-आप तम्बाखू में किस्म-किस्म के कैंसर की वजह ढूंढ रहे थे, उस वक्त कपड़ों के ज़रिए कैंसर हमारे बदन से चिपक रहा था। जब पंजाब यूनिवर्सिटी ने कीटनाशकों से कैंसर के संबंध पर शोध किया तो पता चला कि लगातार कीटनाशकों के संपर्क में आने वाले खेती से जुड़े मजदूरों को इसका भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है।

जिन कृषि से जुड़े श्रमिकों के खून के नमूने की जाँच हुई उनमें से 36 फीसदी में “जेनेटिक म्युटेशन” यानि अनुवांशिक बदलाव पाए गए। सवाल ये है कि अगर इसे डरावना ना माना जाए तो डरावना कहते किसे हैं? गौरतलब है कि ये शोध 2003-06 के बीच लिए गए नमूनों के आधार पर हुए थे, यानी आज करीब डेढ़ दशक बीतने के बाद ये आँकड़े और भी ज्यादा होंगे।

अगर आप ये सोच रहे हैं कि रातों-रात पंजाब के किसानों की आदतें बदल जाएँगी, तो आप बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी में हैं। जेन वाले नमूने में जैसे भरे हुए गिलास में और पानी नहीं डाला जा सकता, बिलकुल वैसे ही किसान भी ये मानकर बैठा होता है कि वो कृषि के बारे में सब कुछ अभ्यास के ज़रिए जानता है।

कोई कृषि वैज्ञानिक उसे साल भर मेहनत करके भी कुछ सिखा पाएगा इसमें संदेह है। किसान मान लेगा कि वर्षों का उसका अभ्यास है और किसी कॉलेज-यूनिवर्सिटी के लोग उसकी जानकारी का पासंग भर भी नहीं जानते।

वह सारी बातें सुन लेगा, और पूरी संभावना है कि वह एक भी सलाह नहीं मानेगा। फिर जब कैंसर जैसी बीमारी के इलाज का खर्च सर पर आएगा तो वह केजरीवाल हो जाएगा और कहेगा कि ‘सरकार तो हम गरीबों के लिए कुछ करती ही नहीं जी!’

अब दोबारा अगर श्रेय-प्रेय के सिद्धांत पर चलें तो श्रेय के दर्जनों उदाहरण दिखेंगे। कुछ बच्चे स्कूल नहीं जाना चाहते, क्योंकि वह उन्हें जेल जैसी जगह लगती है। माँ-बाप बहलाकर और कभी कभी तो डाँट-पीटकर भी स्कूल पहुचा आते हैं।

उन्हें पता है कि आज जो शिक्षा प्राप्त करना मुश्किल लग रहा है वह श्रेय है। अभी मुश्किल होगा लेकिन उसके नतीजे कहीं ज्यादा फायदेमंद हैं। ऐसा आगे भी जीवन के कई क्षेत्रों में दिखता है।

प्रेय के मामले में “उड़ता पंजाब” फिल्म की याद आ जाती है। नशे का त्वरित प्रभाव मज़ेदार होता है। थोड़े ही समय में इसके नुकसान भी नशे के रोगी को मालूम होते हैं और वह खुद भी यथासंभव इससे छूटना चाहता है।

अब जैसा कि भगवद्गीता कहती है, अभ्यास और वैराग्य के ज़रिए मन पर नियंत्रण संभव है (भगवद्गीता 6.35), वैसा ही इस समस्या के लिए भी किया जा सकता है। पहले तो जो कीटनाशक छोटी पैकिंग (आधा लीटर, 100-200 मिलीलीटर) में आते हैं उनपर प्रतिबंध लगाना होगा।

अगर पहले ही ये “डाईल्युट” यानी किसी और रसायन या पानी के घोल में एक लीटर या बड़ी पैकिंग में आएँ तो “इतने कम में क्या होगा” की मानसिकता बदली जा सकती है।

इसके अलावा सरकारी तंत्र अगर लगातार स्वयं भी और एनजीओ इत्यादि के ज़रिए ग्रामीण क्षेत्रों में बैठकें आयोजित कर उचित मात्रा और ज्यादा मात्रा से होने वाले नुकसानों पर बात करना शुरू करे तो संभव है कि चार-पाँच वर्षों में मानसिकता बदले।

इनके लिए केवल स्थानीय सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति ज़रूरी है। बड़े उर्वरक और कीटनाशक बनाने वालों के दबाव से स्थानीय सरकार उबर पाएगी, ऐसी आशा की जा सकती है। एक व्यक्ति कितना उर्वरक और कीटनाशक खरीद सकता है (क्योंकि व्यक्ति कितनी ज़मीन रख सकता है, यह पहले ही तय है), इसपर नियंत्रण अभ्यास से ही आएगा।

पंजाब के वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल को स्कूल न जाने के लिए ज़िद मचा रहे बच्चे की तरह ही मंत्री पीयूष गोयल ने डीबीटी के लिए राज़ी कर लिया है। अब पंजाब में भी बिचौलियों-आढ़तियों के बिना, सीधे किसान से खरीद होगी। 

जो अभ्यास पहले से किया जाना था, वह देर से सही लेकिन शुरू तो हो रहा है। बाकि श्रेय और प्रेय के बारे में सीखना न सीखना तो खैर सीखने वालों की ही ज़िम्मेदारी है!