विचार
भगवद्गीता में धृतराष्ट्र पर एकमात्र श्लोक से समझें- नैतिकता क्या सही और गलत में चुनाव है

जंगल में कहीं दूर एक धूर्त सियार रहता था। सियार को मांसाहार का शौक तो था ही, लेकिन अपनी क्षमता के हिसाब से वह छोटे-मोटे जीवों का शिकार ही कर सकता था। एक दिन उसे एक शेर का मांस खाने की सूझी! अब भला सियार किसी तरह शेर का शिकार तो कर नहीं सकता था इसलिए उसने इस काम में मदद लेने की सोची।

जब वह शेर के शिकार के लिए मित्रता बढ़ाने और मित्रों का सहयोग लेने निकला तो उसकी दोस्ती एक नेवले से हुई। नेवला मांसाहारी तो था, लेकिन शेर के शिकार में किसी काम का नहीं था। फिर सियार ने एक चूहे से भी दोस्ती की, लेकिन शेर के शिकार में वह भी किसी काम का नहीं था।

अंत में सियार ने एक बाघ से दोस्ती की। बाघ सामर्थ्य में शेर के जैसा था, अच्छा शिकारी भी था, लेकिन आमने-सामने की लड़ाई में शेर जीतेगा या बाघ, ये कुछ पक्का नहीं कहा जा सकता था। अपने मित्र बाघ की जीत सुनिश्चित करने के लिए सियार ने सलाह दी कि पहले ही चूहा जाकर शेर के पंजे कुतर दे, तो लड़ाई से पहले ही वह कमजोर हो जाएगा।

ऐसा ही किया गया और लड़ाई में बाघ ने शेर को मार गिराया। अब सियार ने कहा, “तुम सब नहा आओ, तबतक मैं शिकार की रखवाली करता हूँ।” बाघ जैसे ही नहाकर आया तो सियार ने बाघ से कहना शुरू किया, “चूहा कह रहा था कि शेर को उसने घायल किया था। शेर मारने का श्रेय तो असल में उसका है! अब चूहे का शिकार मुझसे तो खाया नहीं जा रहा।”

बाघ का अहंकार जागा, उसने सोचा भला एक चूहे का मारा शिकार मैं खाऊँ? वह शेर को छोड़कर अपने लिए दूसरा शिकार मारने चला गया। जब चूहा आया तो उसने कहा, “मेरा मित्र नेवला बताता है कि शेर का मांस विषैला होता है। मैंने कभी पहले किसी को शेर का मांस खाते देखा-सुना भी नहीं। नेवले का विचार है कि पहले चूहे को खिलाकर विष की जाँच कर ली जाए!”

अब जब चूहे ने यह सुना तो वह ऐसे ही डरकर भाग गया। नेवला बेचारा छोटा-सा था, और सियार उससे अकेले ही लड़कर निपट सकता था। जैसे ही नेवला वापस आया, सियार ने नेवले को डरा-धमकाकर भगा दिया। इस तरह पूरा शेर अकेले सियार को खाने को मिल गया।

इस साम, दाम, दंड, भेद वाली कहानी के ज़रिए कणिक अपने तौर-तरीकों को पुराने दौर में सही ठहराते हैं। आपने अगर ऐसे कणिक का नाम नहीं सुना, तो ये वह मंत्री थे जिनकी मदद से दुर्योधन ने लाक्षागृह में पांडवों को जलाकर मारने की योजना बनाई थी।

इस कहानी में आप कहीं धर्म ढूँढने बैठ गए हैं तो ऐसा मत कीजिए। इसमें कहीं धर्म है ही नहीं! और यही दुर्योधन की समस्या थी- जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति जानामि अधर्मं न च मे निवृत्ति।

दुर्योधन की समस्या थी कि उसे धर्म पता था, मगर उसे वह करने की इच्छा ही नहीं होती थी। अधर्म भी मालूम था, मगर उसे वह करना बंद ही नहीं करना चाहता है। ऐसा नहीं था कि भगवद्गीता शुरू होने के बाद उसकी ये समस्या शुरू होती है। ये समस्या उसकी बचपन से ही है।

कई बार टीवी देखकर ज्ञानी बने कुछ मासूम, भोले-भाले, भटके हुए, सही मतलब न समझ पाए लोग कहने लगते हैं कि महाभारत का युद्ध तो एक स्त्री के कारण हो गया! कभी अगर पुस्तकें उठाएँगे तो नज़र आएगा कि जैसे ही पांडू की मृत्यु के बाद कुंती अपने पांडव पुत्रों के साथ लौटी, तभी से दुर्योधन षडयंत्र करना आरंभ कर देता है। भीम को विष देकर नदी में फेंकने का काम तो वो बचपन में ही कर चुका था। उस समय कौन-सी द्रौपदी थी?

ऐसे ही कणिक की सलाह से हत्या के लिए पहले उसने एक लाक्षागृह तैयार करवाया था। पांडवों और कुंती को लाक्षागृह भेजने के लिए तैयार करने के लिए ही धृतराष्ट्र को यह कहानी सुनाई जा रही होती है।

अब आप सोचेंगे कि भगवद्गीता पर चर्चा करते समय हम ऐसी धूर्ततापूर्ण कथाएँ, ऐसे कपट की चर्चा क्यों कर रहे होंगे? इसका कारण बहुत साधारण-सा है। ऐसा फिल्मों में होता आपने अक्सर देखा है। उसमें नायक नकली दाढ़ी और मस्सा लगाकर खलनायक के अड्डे में जा घुसता है। दर्शकों में बैठा बच्चा भी पहचान लेगा कि खलनायक से गलती हो रही है, इसे घुसने नहीं देना था। बस खलनायक ही नहीं पहचान पाता।

इसका उल्टा तब होता है जब खलनायक किसी सहनायिका-से किरदार को लिफ्ट या मदद देता है। दर्शक पहचान रहे होते हैं कि ये बलात्कारी है, लेकिन जैसे गोवा की अदालत को बड़े संपादकों के मामले में सबूत नहीं दिखते, वैसे ही बस वो सहनायिका नहीं पहचान पाती कि इससे लिफ्ट नहीं लेनी!

जब किसी और के साथ घटित हो रहा हो तो देखना, सलाह देना आसान होता है। कुछ वैसे जैसे क्रिकेट का शौक करीब पूरे भारत को है और अधिकांश ये सलाह दे सकते हैं कि सचिन तेंदुलकर को बल्ला कैसे घुमाना चाहिए था। अफ़सोस वे खुद मैदान में हों, तो उससे कहीं साधारण स्तर के गेंदबाज का सामना करते हिट विकेट करके लौट आते हैं।

धृतराष्ट्र और दुर्योधन बाहर के हैं। उनमें वे चीज़ें देख लेना बहुत आसान है, जिन्हें ऐसे आप पहचानने में भूल कर सकते हैं। सत्य, न्याय, अहिंसा जैसी बड़ी-बड़ी बातें करना बहुत अच्छी बात है, लेकिन किसके सामने? क्या यह नियम धृतराष्ट्र पर लागू होना चाहिए? तो भगवद्गीता में उनके हिस्से आया एकमात्र श्लोक देखिए –

धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।। 1.1

मोटे तौर पर इसका अर्थ है कि कुरुक्षेत्र में युद्ध के लिए इकठ्ठा हुए, मेरे और पांडू के पुत्रों ने क्या किया? अर्थ का थोड़ा विस्तार करने पर “मामकाः पाण्डवाश्चैव” नज़र आ जाता है। धृतराष्ट्र की आज्ञा से जो आराम से लाक्षागृह में चले गए थे, अलग इंद्रप्रस्थ बसा दिया, वनवास में भी चले गए, उन्हें “मामकाः” यानी मेरे के बाद अलग से “पाण्डवाः” से संबोधित करने की क्या ज़रूरत पड़ गई?

यह व्यक्ति मेरे और दूसरे में अभी भी भेद कर रहा है। सारा जीवन उसके आदेश मानते रहने का कोई मोल नहीं, अब भी परिवार के बाहर का ही मान रहा है! अब जब आप नैतिकता के प्रश्नों के बारे में सोचेंगे तो सोचिएगा कि नैतिकता क्या ऐसे व्यक्ति पर भी लागू होगी?

इसके ठीक बाद का “किम्” शब्द भी देखने लायक होता है। इसे समझने के लिए विदेशी फिल्मों से पूरी बेशर्मी से बिना श्रेय दिए नकल कर ली गई ,जानी-पहचानी फिल्म “शोले” का शुरूआती दृश्य सोच सकते हैं।

यहाँ के दृश्य में जय-वीरू दोनों कैदियों को मालगाड़ी से लेकर लौट रहे ठाकुर की ट्रेन पर डाकू हमला करते हैं। सब मिलकर ट्रेन को डाकुओं से तो बचा लेते हैं मगर तब तक ठाकुर को गोली लग चुकी होती है। यहाँ बेहोश पड़े ठाकुर को देखकर जय-वीरू पूछते हैं, “क्या”? “किम्” का शाब्दिक अर्थ क्या ही होता है, और ये तीन भावों में आता है।

क्या का पहला भाव विकल्प का है। जय-वीरू वहाँ से भाग भी सकते हैं, ठाकुर को बचाने की कोशिश भी कर सकते हैं। उनके पास दो विकल्प हैं। एक भाव में “क्या” निंदा होती है। क्या पीठ दिखाकर भाग जाओगे? क्या ज़मीन पर गिरा हुआ चोकलेट उठाकर खा जाओगे?

ऐसे सवालों में आप क्या के ज़रिए कोई विकल्प नहीं देते, कोई प्रश्न नहीं पूछते। असल में आप निंदा कर रहे होते हैं। उस दृश्य में भी इंस्पेक्टर को छोड़ा तो मर जाएगा कहकर दोनों ऐसा ही करते हैं। तीसरे भाव में “किम्” या “क्या” एक प्रश्न है। अब क्या करें? ये सोचते हुए वे सिक्का उछालते हैं कि जो भी जवाब आए वही मान लिया जाएगा।

जब भगवद्गीता सुनाई जा रही है, उस समय युद्ध को शुरू हुए 10 दिन बीत चुके हैं। संजय तो भीष्म के शर-शैय्या पर गिरने का समाचार लेकर आए थे। इसलिए युद्ध के लिए इकठ्ठा हुए मेरे और पांडू के पुर्त्रों ने युद्ध किया, या नहीं किया का विकल्प तो धृतराष्ट्र का “किम्” नहीं है।

मेरे वाले तो थे ही नालायक, क्या पांडू के पुत्र भी लड़ पड़े? ऐसा कुछ कहकर धृतराष्ट्र निंदा भी नहीं कर रहे क्योंकि उन्हें अच्छी तरह पता था कि पांडव सारे प्रयास कर चुके हैं। ये “किम्” प्रश्न का ही है और इसलिए संजय आगे के कई श्लोकों तक इस “किम्” का उत्तर देते रहते हैं।

“मेरे पुत्रों ने क्या किया”– “मामकाः” पहले पूछा गया है, इसलिए दूसरे से 13वें श्लोक तक संजय दुर्योधन के बारे में बताते हैं। वे कहते हैं कि कैसे दुर्योधन सीधा द्रोणाचार्य के पास जाकर उन्हें उकसा रहा है। “पाण्डवाः” बाद में आया है इसलिए उनकी चर्चा 14वें से 19वें श्लोक तक है।

ये संवाद का सीधा-सा नियम है जो अक्सर नौकरी के लिए साक्षात्कार देने जा रहे लोगों को भी बताया जाता है। पहले सवाल आराम से सुन लीजिए, फिर जो पहले पूछा गया, वह पहले बताइए, और जो बाद में पूछा गया, उसे बाद में। अगर ध्यान से सवाल नहीं सुनेंगे तो “किम्” यानि “क्या” प्रश्न था, विकल्प या आक्षेप, ये समझ नहीं आएगा।

बाकी उस समय राजा होने के बाद भी ज्यादा मेरा-तेरा करने पर धृतराष्ट्र को इतने महत्वपूर्ण ग्रंथ में एक ही श्लोक मिला। ऐसा कपट मन में रखने वालों को समाज-परिवार के लोग भी देर-सवेर पहचानने ही लगते हैं ऐसा व्यक्तिगत अनुभव से भी पता होगा।

ऐसा करके धर्म को छोड़ना है, या ऐसा करने वाले लोगों के बीच नैतिकता को पकड़े रखकर अपना गला कटवाना है, यह निर्णय आपका है। नैतिकता अक्सर एक सही और दूसरे गलत के बीच चुनाव का प्रश्न नहीं होता। नैतिकता एक सही और दूसरे अधिक सही में से चुनने का सवाल है।

फिलहाल यह पहला श्लोक था और नर्सरी के स्तर का ही था क्योंकि पूर्वार्ध को छोड़कर केवल अंतिम आधे हिस्से की चर्चा की है। पीएचडी के लिए खुद पढ़ना होगा, यह तो याद ही होगा।