विचार
भगत सिंह को वामपंथी कहना अनुपयुक्त क्यों, उनके जीवन के महत्त्वपूर्ण प्रसंगों से समझें
तृषार - 19th July 2020

जब भी हम भारतीय क्रांतिकारियों के विषय में पढ़ते हैं तो एक बात हमारा ध्यान खींचती है कि भगत सिंह लेनिन से प्रभावित थे और अपने जीवन की अंतिम क्षणों में वे क्लारा झेत्किन लिखित लेनिन के संस्मरण पढ़ रहे थे।

लेकिन सिर्फ इन्हीं कारणों से शहीदे आज़म को वामपंथी विचारधारा के वृत्त में शामिल कर देना उपयुक्त नहीं है। किसी विचारधारा या किसी नेता के व्यक्तित्व से प्रभावित होने मात्र से भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी को वामपंथी घोषित कर देना इस महान बलिदानी के चरित्र से अन्याय ही होगा।

सुभाष चंद्र बोस, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल जैसे भारत के अग्रणी स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने जीवन के किसी कालखंड में लेनिन और रूसी क्रांति की सराहना की थी।

वीर विनायक दामोदर सावरकर भी 1909 में लेनिन से प्रत्यक्ष मुलाकात के पश्चात लेनिन के विचारों से प्रभावित हुए थे। वीर सावरकर नियमित रूप से लेनिन द्वारा लिखित लेख पढ़ते थे।

फिर भी इन महानुभावों का नाम वामपंथी विचारधारा से नहीं जोड़ा जाता लेकिन बलिदानी भगत सिंह को भारतीय वामपंथ के शुरुआती चेहरे के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। चलिए भगत सिंह की छोटी-सी किंतु साहसिक जीवन यात्रा के कुछ महत्वपूर्ण प्रसंगों से इस गुत्थी को सुलझाने का प्रयास करते हैं।

कार्ल मार्क्स ने ‘कैपिटल’ के रूप में मार्क्सवाद का विचार प्रस्तुत किया और जब सन 1919 में लेनिन ने इसी विचारधारा के बलबूते पर बोल्शेविक क्रांति का सफल नेतृत्व किया तब आर्य समाजी परिवार में जन्मे भगत सिंह महज़ 12 वर्ष के बालक थे। रूस जैसे बड़े देश को सूत के कच्चे धागे-सी विचारधारा से बांधे रखना आसान काम नहीं था।

अगले कुछ वर्षों में भगत सिंह के मानसपटल पर जलियांवाला बाग हत्याकांड (अप्रैल 1919), ननकाना साहिब (1921) और चौरी-चौरा (1922) जैसी घटनाओं ने गहरा प्रभाव छोड़ा। आर्य समाज के संस्कारों से सींचे गए भगत सिंह ब्रिटिश सरकार के इन जघन्य अत्याचार और चौरी-चौरा प्रकरण के पश्चात महात्मा गांधी के रवैए से हताश थे। उनका युवा रक्त उबालें मार रहा था। 

ऐसे समय में युवा भगत सिंह ने इटली के क्रांतिकारी मेत्सिनी के विचारों पर आधारित निबंध लिखा जिसने हिंदी साहित्य सम्मेलन का पुरस्कार प्राप्त किया। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि राष्ट्रवादी मेत्सिनी और वामपंथी मार्क्स एक-दूसरे के धुर विरोधी थे। मार्क्स के लिए मेत्सिनी की विचारधारा ‘दकियानूसी मध्यम वर्ग के गणतंत्र’ से ज्यादा नहीं थी और मेत्सिनी के लिए कार्ल मार्क्स ‘मानवजाति के प्रति घृणा और दंभ से भरा विनाशकारी था।’ 

भगतसिंह ने अपने जीवन के इसी दौर में ‘नौजवान भारत सभा’ की स्थापना की और हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) के सदस्य भी बने। उस समय एसोसिएशन का संचालन पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद और अशफाक़ जैसे क्रांतिवीर कर रहे थे।

जब भगतसिंह एचआरए से जुड़े तब भारत में कम्युनिस्ट पार्टी अस्तित्व में आ चुकी थी। रूस में एमएन रॉय के द्वारा 17 अक्टूबर 1920 में स्थापित होने के बाद 26 दिसंबर 1925 में कम्युनिस्ट पार्टी ने कानपुर से भारत में विधिवत प्रवेश किया।

यहाँ स्पष्ट है कि सन 1926-27 में भगतसिंह कम्युनिस्ट विचारधारा के समर्थक होते तो वे कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल होते, पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के संगठन से नहीं जुड़ते। एमएन रॉय ने स्पष्ट किया था कि कम्युनिस्टों का स्वतंत्रता संग्राम से कोई मतलब नहीं है।

एक तर्क यह भी दिया जाता है कि भगत सिंह ने कम्युनिस्ट विचार से प्रभावित होकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के नाम में ‘सोशलिस्ट’ शब्द जोड़ने का प्रस्ताव रखा। यह सच में हास्यास्पद तर्क है क्योंकि भगतसिंह ने संगठन के नाम में सोशलिस्ट शब्द का प्रस्ताव रखा था, कम्युनिस्ट शब्द का नहीं।

और एक बात यह भी है कि जब संगठन के नाम में सोशलिस्ट शब्द जोड़ा गया तब उसके कमांडर ‘पंडित’ चंद्रशेखर आज़ाद थे। यदि सोशलिस्ट शब्द का प्रयोग वामपंथी होने का प्रमाण है तो हिटलर भी वामपंथी हुआ क्योंकि उसकी नाज़ी पार्टी का नाम जर्मन सोशलिस्ट वर्कर्स पार्टी था।

मन्मथनाथ गुप्त ने लिखा है, “हम लोग गैरिबाल्डी, मेत्सिनी और लेनिन में कोई भेद नहीं देख पाते थे। हमारे लिए से सब वीर तथा देशभक्त थे। उन दिनों हम वर्गों के संबंध में कुछ नहीं समझते थे, इसलिए हम लेनिन और डि वेलरा में फर्क करते तो क्या करते। हमने मार्क्स का भी नाम एक स्पष्ट और दूर के व्यक्ति के रूप में सुन रखा था, किंतु मैं बहुत दिनों तक यह समझ नहीं पाया कि इस व्यक्ति को इन वीरों के साथ स्थान कैसे दिया जा सकता है।”

नवंबर 1928 में अंग्रेज़ों के बर्बरतापूर्ण लाठीचार्ज से पंजाब हिंदू सभा के स्थापक लाला लाजपतराय की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु हो गई और भगत सिंह समेत हिंदुस्तान ‘सोशलिस्ट’ रिपब्लिकन एसोसिएशन के क्रांतिकारों ने लाला लाजपतराय की हत्या का प्रतिशोध लेने का प्रण लिया।

कार्ल मार्क्स के अनुसार “धर्म जनता का अफीम है और राष्ट्रवाद की भावना कम्यूनिस्ट पार्टी की विचारधारा में निषिद्ध है।” इसका सीधा-सरल-सा अर्थ यही है कि कोई कम्युनिस्ट होते हुए राष्ट्रवादी देशभक्त नहीं हो सकता और एक कम्युनिस्ट कभी भी राष्ट्रवादी नेता की हत्या का प्रतिशोध लेने के अभियान में शामिल नहीं होगा। 

सरदार भगत सिंह के जीवन के घटनाक्रम का विश्लेषण किया जाए तो एक बात स्पष्ट होती है कि सन 1929 में गिरफ्तारी से पूर्व भगतसिंह वामपंथी विचारधारा के समर्थक नहीं थे। इसी वर्ष कारावास के दौरान भगतसिंह लिखित साहित्य में लेनिन और बोलशेविक क्रांति का प्रभाव दिखना शुरू हुआ और बलिदान से सिर्फ छह माह पूर्व लाहौर जेल में उन्होंने अपना बहुचर्चित निबंध ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ?’ लिखा।

इतिहासविद बिपिन चन्द्र के अनुसार भगत सिंह ने जेल में कई निबंध और पत्र लिखे थे, लेकिन इनका अधिकांश हिस्सा नष्ट हो गया और बाकी साहित्य भी उनकी मृत्यु के पश्चात ही प्रकाशित हो पाया। इस चर्चा में भगतसिंह ने अपने अंतिम दिनों में लिखे साहित्य का कौनसा हिस्सा किन परिस्थितियों में नष्ट हो गया (कर दिया गया) यह प्रश्न संशोधन का विषय है।

भारत माता की जय’ के अलावा भगतसिंह का अन्य पसंदीदा नारा ‘इन्किलाब ज़िंदाबाद’ था और इस नारे का प्रथम प्रयोग मैक्सिकन क्रांति के दौरान किया गया था, जिसे बाद में वामपंथियों ने अपना लिया।

यदि भगत सिंह के सिर्फ 24 वर्ष की जीवन यात्रा का विश्लेषण करें तो ज्ञात होता है कि भगत सिंह अपने क्रांतिकारी जीवन में राष्ट्रवादी मेत्सिनी और लाला लाजपतराय, गदर पार्टी के करतार सिंह सराभा और भाई परमानंद तथा कम्युनिस्ट लेनिन और ट्रौस्ट्की जैसे विविध प्रकार की विचारधाराओं से जुड़े नेताओं के विचारों से प्रभावित हुए।

एक और महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि यदि राष्ट्र के सौभाग्य से भगत सिंह की आयुष्यरेखा लंबी होती तो स्तालिन, मांओं जेडोंग, चे ग्वेरा और उत्तर कोरिया के किम वंश जैसे क्रूरतम शासक और तानाशाहों द्वारा विचारधारा के नाम पर किए गए दमन और जनसंहारों के बाद भगतसिंह के विचार क्या होते? स्तालिन के सत्ता में रहते भगतसिंह के पसंदीदा नेता ट्रौस्ट्की की हत्या के बाद भगतसिंह की प्रतिक्रिया क्या होती?

यह वह दौर था जब वामपंथी विचारधारा इतनी पतित नही हुई थी और इस विचारधारा के दूरगामी प्रभाव भी सामने नहीं आए थे। उस समय यही प्रतीत हो रहा था कि रूस में इसी विचारधारा ने जनता को शाही दमन और शोषण से मुक्त कराया था। भगत सिंह का द्रष्टिकोण समावेशी था और उनके लेखों में वैश्विक क्रांतियों और घटनाओं के परिणाम भारतीय क्रांति के परिप्रेक्ष्य में कैसे उपयोगी हो सकते हैं इसका विमर्श ज्यादा था।

क्या आपने कभी सोचा है कि भगत सिंह की फाँसी के पश्चात कितने वैश्विक वामपंथी नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी थी?

गंतव्यों के बारे में न सोचकर निरंतर चलते जाने वाले तृषार @wh0mi_ के माध्यम से ट्वीट करते हैं।