भारती / विचार
आधुनिक चिकित्सा प्रणाली को नकारना नहीं, बल्कि एकाधिकार समाप्त करना आवश्यक

बाबा रामदेव की अक्सर घनघोर आलोचना की जाती रही है। हमने भी की है, कई बार की है। आलोचना नकारात्मकता नहीं, बल्कि बेहतर की परिकल्पना है। और लोकतंत्र की आत्मा भी। इस बार “बाबा” ने चिकित्सा प्रणाली के बारे में जो कुछ कहा है, उसकी भाषा “अमर्यादित” या आक्रामक मानी जा सकती है, लेकिन वह इसकी आंतरिक विसंगतियों को उजागर करती है।

रामदेव का भारतीय मेडिकल एसोसिएशन को पत्र

मेडिकल एसोसिएशन उनपर लगातार लिखित रूप में क्षमा याचना करने के लिए दबाव बना रहा है। शायद उन्हें झुकना भी पड़े, लेकिन उनके झुकने या न झुकने से इस सत्य को अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि आधुनिक चिकित्सा प्रणाली की गंभीर पड़ताल सत्ता और समाज द्वारा किए जाने की आवश्यकता है।

हर तंत्र की आलोचना होती रही है; शिक्षा व्यवस्था हो, या नौकरशाही या संसदीय प्रणाली, लेकिन इस तरह का दबाव बनाने का उदाहरण बहुत ही कम देखने को मिलता है। हाँ, अगर धार्मिक मुद्दा होता तो समझ में आता कि “भावनाएँ” “आहत” हो गई हैं, लेकिन यह तो विकास के एक इकाई पर पुनर्विचार का प्रयास है।

यह तो मनुष्य कैसे बेहतर से बेहतर तरीके से जीवित रहे- इसका प्रश्न है। ऐसे में मेडिकल एसोसिएशन की आपत्ति उचित प्रतीत नहीं होती। यूरोपीय विमर्शो में खासकर उत्तर-आधुनिक विमर्शों के अंतर्गत इस आधुनिक चिकित्सा प्रणाली की कमियों और सीमाओं पर कई दशक पहले से व्यापक विचार किया जाता रहा है।

वैकल्पिक पारंपरिक चिकित्सा शास्त्रों को विकसित करने और संरक्षित करने की बात भी कई वैश्विक मंचों से लगातार की जाती रही है। पर्यावरण आंदोलन और पर्यावरणीय नारीवाद से जुड़े विचारकों और वैज्ञानिकों ने भी इसकी नकारात्मकताओं और अंतर्निहित हिंसा पर बहुत कुछ लिखा-कहा है।

यहाँ तक कि अनगिनत फिल्में बन चुकी हैं जो बताती हैं कि दवाई बनाने के लिए और उसके परीक्षण के लिए जिन तकनीकों और रसायनों का प्रयोग किया जाता है उसके कितने दुष्परिणाम हुए हैं या हो सकते हैं। दावे के साथ तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन इस बात की भी संभावना है कि आज जो विश्व कोविड का संकट झेल रहा है वह मुख्यतः ऐसे ही अनुसंधानों का परिणाम है।

दवाइयों के निर्माण में जानवरों पर कितनी क्रूरता की जाती है और उसके क्या भयावह परिणाम सामने आ सकते हैं, इसपर एक अच्छी फिल्म भी है जिसे देखा जाना चाहिए- ‘राइज ऑफ द प्लेनेट ऑफ द एप्स’।

फिल्म रिलीज़

इस चिकित्सा तंत्र ने निस्संदेह लंबे समय तक दुनिया की सेवा की है। इसके अवदानों को भी नकारा नहीं जा सकता। लेकिन 18वीं सदी में यूरोप में जन्मे इस चिकित्सा तंत्र ने किन शर्तों पर और किन परिस्थितियों में संपूर्ण संसार में अपनी जगह बनाई है यह भी एक महत्वपूर्ण पहलू है।

इस दौरान इन्होंने कैसे चिकित्सा के अन्य पारंपरिक और आदिम तरीकों को मिटा दिया उसे भी नहीं भुलाया जा सकता। यूरोपीय आधुनिकता के गर्भ से पनपे इस चिकित्सा तंत्र ने चिकित्सा के पुरातन ज्ञान-विज्ञान के साथ वही किया जो उपनिवेशवादियों ने किया था।

इन्होंने भी चिकित्सा के सदियों पुराने चले आ रहे ज्ञान-विज्ञान को झाड़-फूँक और ओझा-पुरोहित का लेबल लगाकर बाहर कर दिया, यानी इसकी वैधता पर ही प्रश्न लगा दिया। यह ठीक वैसे ही किया गया जैसे उपनिवेशवादियों ने पहले भारत को साँप-सपेरे, संन्यासियों और ठगों का देश घोषित किया और फिर इसे सभ्य बंनाने की परियोजना बनाकर दो ,दियों तक लूट-पाट मचाई।

औपनिवेशिक दासता में हम आज भी ऐसे जकड़े हुए हैं कि हमने यह मान लिया है कि 18वीं सदी के पहले दुनिया के पास चिकित्सा का कोई वैज्ञानिक ज्ञान ही नहीं था। यह एक बड़ी वैश्विक बौद्धिक दुर्घटना थी कि हमने भारत सहित दुनिया के अन्य तमाम देशों में इस आधुनिक चिकित्सा प्रणाली से पहले प्रचलित चिकित्सा प्रणालियों को या तो भूला दिया या फिर अवैज्ञानिक घोषित कर दिया।

दुनिया के विभिन्न हिस्सों में सहस्रों वर्षों से जो चिकित्सीय ज्ञान की धारा बही आ रही थी, उसे मात्र 200-300 वर्षों में नेस्तनाबूद कर दिया गया। समाज और सत्ता के मुख्य विमर्श में आकर आधुनिक चिकित्सा प्रणाली अन्य पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों की तबाही पर मंद-मंद मुस्कराता रहा। यह वस्तुतः औपनिवेशिक विजय का चिकित्सीय स्वरूप माना जा सकता है।

दुनिया में जहाँ कहीं भी पारंपरिक चिकित्सीय ज्ञान अगर झाड़-फूँक बनकर रह गया है तो उसके पीछे सबसे बड़ी वजह रही है सरकार और सत्ता की इसके प्रति उदासीनता या उपेक्षा का भाव। अफ्रीका के प्रसिद्ध लेखक न्गुगी वा थ्योंगो ने अफ्रीकी भाषाओं के संदर्भ में अपनी पुस्तक डी-कोलोनाइज़िंग द माइंड में लिखा कि कोई भी भाषा अपने स्वरूप और संरचना के कारण विल्पुत नहीं होती, सत्ता की उपेक्षा और तिरस्कार उसे मिटने को बाध्य करती है।

यही बात भारतीय पारंपरिक चिकित्सीय प्रणाली पर भी लागू होती है। भारत में जो सरकारें बनती रही, उन्होंने अपने चिकित्सीय धरोहरों पर समुचित ध्यान ही नहीं दिया। सरकारी बजट की जो भी राशि आवंटित की जा रही थी या की जा रही है उसका विशाल हिस्सा आधुनिक चिकित्सा प्रणाली के लिए ही रहा है।

देशी, घरेलु, जनजातीय, आयुर्वेद या यूनानी आदि चिकित्सा प्रणालियों के ऊपर जब कभी खर्च किया भी गया तो उसकी राशि इतनी कम थी कि उस राशि में नए शोध और अनुसंधान संभव ही नहीं थे। धीरे-धीरे यह जड़वत होता गया और फिर बाद में अवैज्ञानिक करार दे दिया गया।

यह तो पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली की आंतरिक शक्ति थी जिसने आधुनिक चिकित्सा प्रणाली के सामने घुटने टेकने से मना कर दिया और लोक-जीवन के माध्यम से किसी न किसी रूप में स्वयं को जीवित रखा। कल्पना कीजिए जितनी राशि मॉडर्न मेडिकल सिस्टम पर खर्च की गई उसकी आधी राशि भी अगर इनपर खर्च की गई होती तो इनका स्वरूप क्या होता और इसकी सामाजिक वैधता कितनी होती!

किसी भी चिकित्सीय तंत्र की दीर्घजीविता और अस्तित्व के लिए सबसे मूलभूत इकाई होती है शोध और अनुसंधान, तथा सत्ता द्वारा प्राप्त वैधता। लेकिन दुर्भाग्य से दुनिया के लगभग तमाम “विकासशील” देशों ने अपनी सहस्रों वर्षों से आ रही चिकित्सीय परंपरा का त्याग ऐसे कर दिया मानों उनके पूर्वज मूर्खतापूर्ण और अवैज्ञानिक जीवनशैली के आविष्कारक थे।

इस संदर्भ में चीन और जापान जैसे कुछ अपवाद देश भी हैं जिहोंने नए ज्ञान के साथ-साथ अपनी प्राचीनता को भी संरक्षित रखा। मलेशिया के प्रसिद्ध समाजविज्ञानी सैयद हुसैन अलातास विकासात्मक अध्ययन में ऐसे ही समाज के लिए ‘कैप्टिव माइंड’ यानी ‘गुलाम मष्तिष्क’ शब्द का प्रयोग करते हैं जो यहाँ अक्षरशः दिखाई देता है। अपनी विरासत का उत्साहपूर्ण तरीके से त्याग और दूसरे की विरासत का अवैज्ञानिक और अव्यवहारिक अनुकरण।

मुद्दा आधुनिक चिकित्सा प्रणाली को खारिज करने का नहीं है, क्योंकि प्रत्येक नई वस्तु बुरी नहीं होती, और हर पुराना अच्छा नहीं होता। नए और पुराने ज्ञान को साथ-साथ लेकर चलने की आवश्यकता है। किसी भी एक प्रणाली का वर्चस्व अपने परिणाम में हितकारी नहीं हो सकता। उसका एकाधिकार अंततः उत्पीड़क और दमनकारी ही सिद्ध होता है।

ऐसा ही हमने आधुनिक चिकित्सा प्रणाली को अंतिम प्रणाली बनाकर किया। इसने पेटेंट जैसे बौद्धिक साम्राज्यवाद से लेकर अन्य अनगिनत चिकित्सीय दुश्चक्र में आदमी को फँसा डाला, और इस तरह दुनिया की एक बड़ी आबादी के पास न तो अपना पारंपरिक चिकित्सीय ज्ञान रहा और न ही नए आधुनिक चिकित्सीय सुविधा को प्राप्त करने की आर्थिक शक्ति।

दुनिया की बड़ी आबादी आज गंभीर रूप से बीमार है। भारत को भी आवश्यकता है प्राचीन देशी, जनजातीय, आयुर्वेदिक, यूनानी आदि चिकित्सीय पद्धतियों पर विशेष तरीके से अनुसंधान और प्रयोग को प्रोत्साहित करने की। इन प्रविधियों के पुनर्जीवित होने से आधुनिक चिकित्सा प्रणाली का एकाधिकार भी टूटेगा और प्रकृति-अनुकूल सस्ती चिकित्सा का लाभ भी बृहद समाज को मिलेगा।

केयूर पाठक लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में सहायक प्राध्यापक हैं। चित्तरंजन सुबुद्धि केंद्रीय विश्वविद्यालय तमिलनाडु में सहायक प्राध्यापक हैं।