विचार
बाहुबली 2: ब्लॉकबस्टर सफलता से सीखे जाने वाले महत्पूर्ण सबक़
Baahubali
बाहुबली 2: द कन्क्लूज़न के बारे में रिलीज़ के एक हफ़्ते के भीतर ही बहुत कुछ लिखा जा चुका था, हालाँकि फ़िल्म के पहले प्रकरण की ज़बर्दस्त लोकप्रियता और दूसरी फ़िल्म के लिए लोगों में जिस तरह की दिलचस्पी पैदा हुई, उसके बाद ये क़तई ताज्जुब की बात नहीं है। इस फ़िल्म का शायद ही कोई ऐसा पहलू हो, जो अछूता रह गया हो । फिर भी, मुझे कुछ कहना है, जैसे कि मैंने दो साल पहले, पहली फ़िल्म के बारे में कहा था।
इस लेख को लिखते समय तक, बाहुबली 2 ने थियेटर में अपना पहला सप्ताह पूरा करने से पहले ही 600 करोड़ रुपये से भी ज़्यादा कमा लिये थे। इस फ़िल्म की सफलता और फ़िल्म इंडस्ट्री पर इस दो भागों में आई महागाथा के समग्र प्रभाव पर बात करने के लिए विश्लेषकों के पास शब्दों की कमी हो गई है।
इसकी ख़ामियों के बावजूद, जो कि इस फ़िल्म में कई सारी हैं, फ़िल्म दर्शकों पर एक शक्तिशाली प्रभाव डालती है। मुझे लगता है, इस फ़िल्म के इतने बड़े प्रभाव का कारण है, इसकी कथावस्तु की सहजता। हालाँकि बहुत से लोगों ने इसके लिए फ़िल्म को बुरा-भला भी कहा है। कहानी की सरलता, एस.एस.राजमौलि का एक सोच समझकर उठाया गया क़दम था क्योंकि इससे उन्हें फ़िल्म के लगभग हर फ्रेम में अपने सोच के अभूतपूर्व साहस को दर्शाने का और अपनी कल्पना की निर्बाध उड़ान भरने का मौक़ा मिलता है। इस विशालकाय प्रोजेक्ट पर उनके जुनून और प्रतिबद्धता की अमिट छाप है, और अपनी टीम से अपनी दूरदर्शिता को साझा करने और उनका समर्पण हासिल करने के लिए उन्हें प्रेरित करने में ही इस फ़िल्म की सफलता निहित है।
तमन्ना की अवंतिका को छोड़कर, लगभग सभी मुख्य चरित्र, दूसरी फिल्म में कहीं बेहतर ढंग से गढ़े गये हैं। ज़्यादातर मापदंडों पर, और सम्भवतः चरित्र की बनावट की वजह से भी, अमरेंद्र बाहुबली का पात्र पुत्र की तुलना में ज़्यादा यादगार है। फिल्म पहले हिस्से में प्रभास के पात्र अमरेंद्र बाहुबली और सत्यराज के कटप्पा के बीच सौहार्द देखने लायक़ है (विशेषतः अगर आप तेलुगू फ़िल्मों के हास्य को समझते हैं)। यही कारण है कि इससे उस दृश्य को ख़ासी भावुक गहराई मिल जाती है जिसमें कटप्पा बाहुबली को मारता है।
बग़ैर किसी अपवाद के, मुख्य भूमिका निभाने वाले हर अभिनेता ने अपनी भूमिका से इंसाफ़ किया है। वास्तविक भारतीय नारीवाद को देवसेना के माध्यम से स्क्रीन पर लाने के लिए अनुष्का शेट्टी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
इसके अतिरिक्त, मेरा मानना है कि राजमौलि की दृष्टि को ये आभामण्डल और प्रतिष्ठा देने के लिए के.के. सेंथिल कुमार की जगमगाहट भरी सिनेमेटोग्राफी, विज़ुअल इफ़ेक्ट्स, साबू सिरिल का कला निर्देशन, और एम.एम.कीरवानी का विचारोत्तेजक बैकग्राउण्ड स्कोर, को भी पर्याप्त श्रेय जाता है, क्योंकि ये फ़िल्म की महागाथा की गरिमा को बहुत बढ़ा देते हैं।
ख़ासकर कीरवानी का संगीत, जिसका प्रभाव इतना गहरा है कि हॉल से निकलने के बाद भी ये लम्बे समय तक आपको अभिभूत रखता है।
दृश्यों के आधार पर, संगीत कहीं प्रवाहमय, राजसी, उत्तेजक, मार्मिक, रोमानी, कामुक, शक्तिशाली और रणप्रिय हो जाता है। इससे इस संगीतकार की अपार श्रेणी और बहुमुखी प्रतिभा का प्रदर्शन होता है। मूल तेलुगू में और फिर हिंदी डब वर्ज़न को देखने पर, मैं कह सकता हूँ कि काश निर्माताओं ने हिंदी में गीतों पर और अधिक ध्यान दिया होता, जो पहले भाग के विपरीत, डबिंग के नुक़सान को बेनक़ाब करते हैं।
फ़िल्म के कुछ हिस्से ऐसे हैं जो या तो शौक़िया तौर पर बनाये गये लगते हैं और जिन्हें एडिटिंग की ज़रूरत थी, लेकिन इस बात से क़तई इनकार नहीं किया जा सकता कि बाहुबली-फ्रैंचाइज़ी राजमौलि के एक महान् फ़िल्ममेकर होने का सुबूत है, जो बग़ैर किसी भय के अपनी साहसी रचनात्मकता को आखिर तक समर्थन देते हैं। महत्त्वपूर्ण यह भी है कि फ़िल्म की अखिल भारतीय सफलता इस बात का प्रमाण है कि सारे देश के दर्शकों की नब्ज़ पकड़ने मेें भी वो सक्षम हैं।
यहाँ से हम मुख्य बिन्दु पर आते हैं।
राजकुमार हिरानी को बतौर फ़िल्ममेकर एक जादूगर माना जाता है, जो हिंदी फ़िल्मों के दर्शकों की नब्ज़ को किसी और की तुलना में कहीं बेहतर ढंग से समझते हैं। अगर ऐसी बात है, तो राजमौलि की पकड़ पूरे देश के फ़िल्म दर्शकों की नब्ज़ पर है, क्योंकि वह इस देश की विविधता में एकता देखते हैं।
हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि बाहुबली फ्रैंचाइज़ी शुरुआत से ही अखिल भारतीय उपभोग के लिए ही बनायी गयी थी। लेकिन इस तथ्य ने राजमौलि को अपनी फ़िल्म और इसके चरित्रों को भारतीय संस्कृति और परम्पराओं में गढ़ने से रोका नहीं और वो भी एक ऐसे समय में जबकि भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में होने के कारण अपनी हिंदु पहचान को अपनाना ग़लत माना जाता है और हमेशा ही विवाद का विषय बनता है।
हालाँकि भारतीय परम्पराओं का जश्न मनाने के लिए कथित गंगा-जमुनी तहज़ीब दिखाना क़तई सही माना जाता है। लेकिन वहीं उपमहाद्वीप के हिंदुत्व मूल का तनिक भी संकेत, भले ही वह कितना ही संयमित क्यों न हो, आपको साम्प्रदायिक या अंधविश्वासी या पुरातनपंथी आदि बना देगा।
ये तथ्य मीडिया और मनोरंजन उद्योगों पर कहीं ज़्यादा लागू होते हैं (मान लेते हैं कि दोनों अभी भी अलग-अलग पहचाने जा सकते हैं) विशेषतः बॉलीवुड, जहाँ अपने हिंदू होने को अपनाने पर पूर्णतया बहिष्कृत कर दिया जाता है। राजमौलि ने इसे बिल्कुल अपरिवर्तित रूप में अपना लिया, और इस प्रक्रिया में, जनप्रिय संस्कृति और चेतना में, पूर्णतया हिंदु चीज़ों को मुख्यधारा से जोड़ दिया है। इस तथ्य से कोई इंकार नहीं है, कि फ़िल्म हिंदू धर्म के नहीं बल्कि एक राजसी विवाद के बारे में है। लेकिन वामपंथ को जिस बात से झटका लगा है, वह है वह परिवेश जिसमें इस कथानक को गढ़ा गया है, और राजमौलि की हिंदू महाकाव्यों से ली गई प्रेरणा। इतनी परेशानी हुई है इन वामपंथियों को कि वो इस फ्रेंचाइज़ी को ‘हिन्दूवादी, आर्य, ब्राह्मणवादी, पितृसत्तात्मक षड्यंत्र’ के रूप में ही देख पा रहे हैं।
पहले भाग में रावण द्वारा रचित शिव तांडव स्त्रोत से आरम्भ करके, दूसरे भाग में अपनी मृत्यु के समय भी अपनी मातृभूमि के प्रति अमर भक्ति तक और आखिर में दूसरे भाग के अंत में शिवलिंग का शॉट लगाकर, फ़िल्म उन सभी बातों का समर्थन करती है जो वामपंथ के लिए कलंक के समान हैं।
इसके अतिरिक्त, आज, जबकि हमारी सेना को केवल अपना कर्तव्य करने के लिए वामपंथियों और उनके साथियों द्वारा निशाने पर रखा जाता है, और निराशापूर्ण शांति को बढ़ावा देकर पूरे समाज से अपने दुश्मनों के प्रतिरोध में खड़े होने का अधिकार छीन लिया जाता है, राजमौलि क्षात्र धर्म की महत्ता पर ज़ोर देते हैं।
शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में और कई भाषाओं में बाहुबली फ्रैंचाइज़ी सफल रही है। इसके ऊपर, फिल्म का अचेतन भारतीयता का संदेश, भले ही वह वास्तविक हो या कथित, उसे स्वीकार करने वालों की कोई कमी नहीं है—इन दो तथ्यों ने वामपंथियों के घावों में नमक रगड़ने का काम किया है। यह स्पष्ट रूप से वामपंथियों के लिये ख़तरा है, क्योंकि एक सफल फ़िल्म, भले ही वह कल्पना पर आधारित हो, लेकिन जिसकी जड़ें भारतीयता में हैं, उनके राष्ट्रवाद और हिंदू धर्म के खिलाफ़ लगातार चलने वाले सनक भरे प्रचार के प्रति गम्भीर संकट पैदा करने में सक्षम है।
वामपंथ के संकट को और बढ़ाने के लिए, राजमौलि की सफलता से प्रेरित होकर दक्षिण भारत के फिल्मकार और अपनी जड़ों से उखड़े बॉलीवुड की मुख्यधारा के फ़िल्मकार भी हिंदू इतिहास और पुराणों को स्रोत बनाएंगे और उन्हें ऐसे ढंग से दिखायेंगे जो वामपंथ द्वारा अनुमोदित नहीं किया जाता।
जबकि वामपंथ अपनी आत्मा और घमंड पर लगी चोट के लिए रो रहा है, एक ऐसी कथित हिंदुत्ववादी फ़िल्म के लिए, जिसकी कहानी के मुख्य भाग में हिंदुत्व है ही नहीं। बाहुबली फ्रेंचाइज़ी की सफलता निश्चित रूप से भारतीय पक्ष के लिए महत्त्वपूर्ण सबक़ है।
अगर हम चाहें भी तो इस समय और काल में कोई भी फ़िल्म को सिर्फ़ एक फ़िल्म के रूप में नहीं देखा जा सकता, ख़ासकर बाहुबली को तो क़तई नहीं। चाहे हमें पसंद आये या नहीं, हम मानें या न मानें, एक लम्बे समय से स्वतंत्र भारत में, विचारधाराओं का एक युद्ध लगभग सभी स्तरों पर, और सभी मंचों पर मीडिया के सहारे लड़ा ही जा रहा है। हालाँकि ये हमेशा प्रत्यक्ष और स्पष्ट नहीं रहा। इसलिए, हर चीज़ को अपनी-अपनी विचारधारा के चश्मे से देखने की प्रवृत्ति भी काफ़ी बढ़ी है।
एक घायल विचारधारा, इस मामले में वामपंथ की, इस प्रवृत्ति से और भी ज़्यादा ग्रस्त है क्योंकि वो हमेशा से मानते रहे हैं कि हम सबकी क़िस्मत और विश्व के प्रति हमारा नज़रिया उनकी मैनिफ़ेस्ट डेस्टिनी की अवधारणा ही तय करेगी। ये आत्ममुग्धता से भरा विश्वास, एक प्रकार से सत्य की एकमात्र प्राप्ति का दावा: यही कारण है कि वामपंथ के लिए ये स्वीकार कर पाना बेहद कठिन हो गया है कि मतदाताओं ने उनके प्रतिनिधित्व को, हर रूप में नकार कर शून्य कर दिया है।
इसका अर्थ ये नहीं है कि ये राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक और अकादमिक रूप से समाप्त हो गया है, सत्य इससे कोसों दूर है। दशकों से विभिन्न संस्थानों में वामपंथ की मोरचाबंदी का अर्थ ये है कि अभी भी ये न्यूज़रूम, फ़िल्म स्टूडियो, विचारकों, विश्वविद्यालय परिसर और ग़ैर सरकारी संगठनों को संचालित करने में सक्षम है, जिसके ज़रिये यह सरलता से प्रभावित हो जाने वाले एक व्यापक प्रतिनिधित्व तक पहुँच रखता है।
जब तक इन सभी मोर्चों पर इसका सामना नहीं किया जाता है, वामपंथी अपनी लज्जास्पद हार के बावजूद, विभिन्न बहसों, चर्चा और आपसी बातचीत के नियमों और लक्ष्यों को तय करना जारी रखेंगे।
फ़िल्मों का उत्कट शौक़ीन होने के कारण, मैं सिनमा की उस ताक़त को समझता हूँ, जो लोकप्रिय कल्पना को प्रभावित कल्पना करने में पूर्णतया सक्षम है। मुझे यक़ीन है कि मैं निश्चय ही पहला व्यक्ति नहीं हूँ जो विज़ुअल मीडियम की ताक़त और प्रभाव को पहचानता है, विशेषतया फ़िल्में किसी भी सामाजिक कथानक को और जनचेतना को आकार देने में समर्थ हैं।
‘पराशक्ति’ से ‘हैदर’ और ‘पी.के’ तक, बहुत सी ऐसी फ़िल्मों के बहुत से उदाहरण हैं जिनका इस्तेमाल किसी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए किया गया। इसलिए, इस वैचारिक संघर्ष में, अगर कोई विचारधारा या पारिस्थितिक तंत्र, विज़ुअल मीडियम के रूप में सिनमा को लगातार बेअक़्ल फ़िल्में बनाने वाला माध्यम समझकर इसका तिरस्कार करती है, या इसके प्रति बेख़बर रहती है, तो ऐसा करके वो अपने आपको संकट में डालती है।
इसे समझने की ज़रूरत है, क्योंकि तथ्यों और सच्चाई की शक्ति से इंकार नहीं किया जा सकता। दुर्भाग्यवश, यह भी सच है कि एक ऐसे समय में जबकि अवधारणा ही सब कुछ है (क्या कभी ऐसा नहीं भी था?), तथ्य, बिना पक्षपात का शिकार हुए, बेहतर मेधा वाले व्यक्तियों तक भी नहीं पहुँच पाते।
अन्यथा शिक्षित, अभिजात वर्गों की अब नष्ट हो चुकी बाबरी मस्जिद के नीचे राम मंदिर के अस्तित्व को इतने सारे अचूक तथ्यों के बावजूद, स्वीकार करने की अनिच्छा को और कैसे सही कहा जा सकता है ? इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले का आधार कोर्ट के सामने पेश किये गये सुबूतों और देश के क़ानून के होने के बावजूद, वामपंथी, शिक्षित भारतीयों के एक बड़े वर्ग को यह समझाने में कामयाब रहे हैं कि ये फ़ैसला अंधविश्वास पर आधारित है और इसका कोई आधार नहीं।
काँग्रेस के संरक्षण के तरत देश में बौद्धिक सामग्रियों पर वामपंथी नियंत्रण की वजह से यह सम्भव था, जिस वजह से वामपंथ धारणाओं के इस युद्ध में आगे है। इसलिए, जबकि भारतीय पक्ष को विद्वता का दृढ़ता से प्रयोग करते हुए तथ्यों की गहराई तक जाकर प्रस्तुत करना जारी रखना चाहिए, वहीं यह ध्यान रखना भी ज़रूरी है, कि जबकि कोई भी 5 मिनट से ज़्यादा कुछ भी नहीं पढ़ना चाहता, प्रथम प्रभाव और अवधारणाओं का मूल्य पहले से कहीं ज़्यादा हो गया है।
संक्षेप में कहा जाए तो भारतीय पक्ष को सच्ची विद्वता और शक्तिशाली विज़ुअल मीडिया की सामूहिक अपील को ध्यान में रखते हुए एक संतुलन बनाना सीखना होगा, जैसेकि अपने तथ्यों को प्रस्तुत करने के लिए सिनमा का इस्तेमाल, ताकि इन तथ्यों की ग्राह्यता बढ़ सके। बाहुबली की सफलता से पता चलता है कि न केवल इस विचार के समर्थक हैं, बल्कि इसे ग्रहण करने वाले भी बहुत हैं। यह समय है कि रफ़्तार बढ़ाई जाये और मौक़े का फ़ायदा उठाया जाये।