विचार
अयोध्या- भारत के उदार लोकतंत्र का एकमात्र सबूत

भारत के उदार लोकतंत्र का इससे बड़ा कोई प्रमाण नहीं हो सकता कि राम के जन्मस्थान को लेकर एक मुकदमा आज़ाद भारत की तीन पीढ़ियों ने न्यायालय में चलता हुआ देखा और अब यह 133 साल पुराना मुकदमा फैसले की दहलीज पर है। मुकदमे में मुस्लिम पक्ष से एक हिंदू वकील ने राम के वजूद पर ही सवाल उठाए। उनके जन्मस्थान पर हिंदुओं के दावों की धज्जियाँ उड़ाईं। पुरातत्व के सबूतों को मानने से इंकार किया।

सबसे बड़ी न्यायालय के पाँच जजों ने 40 दिन लगातार इसकी बहस को सुना है। सितंबर 2010 में हाईकोर्ट के 8000 पेज़ के फैसले को चुनौती मिलने के बाद अब सर्वोच्च न्यायालय में शांति है। फैसले की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है।

भारत के संविधान और उससे भी पहले भारत के जनमानस में विचारों की उदारता ही वह एकमात्र गुण है, जिसकी बदौलत उसका वजूद कायम है और आधुनिक विश्व में भारत की परंपराओं को बहुत इज़्ज़त से देखा-सुना जा रहा है।

थोड़ी देर के लिए कल्पना कीजिए ऐसा ही कोई मुकदमा पाकिस्तान की अदालत में आया होता तो क्या होता। सबसे पहले तो धवन की जान के लाले पड़ गए होते। बहुत मुमकिन है कोई मजहबी सिरफिरा उनकी गर्दनें काटकर इस्लामाबाद की सड़कों पर दौड़ लगाता दुनिया को दिखाई देता। क्या वह मक्का-मदीना के नक्शे को फाड़ सकता था?

पाकिस्तान के एक नामी मंत्री सलमान तासीर को उनके ही पहरेदार ने ईशनिंदा के ही एक मामले में क़त्ल कर दिया था और बड़े ही फख्र से इस क़त्ल को कुबूल किया था। पाकिस्तानी अवाम ने भी उसके फैसले पर रजामंदी जाहिर की थी। सलमान के पक्ष में कोई खड़ा नहीं हुआ था। अगर धवन वहाँ होते तो सारे कानून भूल जाते।

आपकी क्या औकात कि अल्लाह और उनके रसूल पर सवाल खड़े करें? भारत में मुमकिन है कि आप राम और कृष्ण के अस्तित्व पर प्रश्न करें। अपने पौराणिक पात्रों की हंसी उड़ा लें। इसे आप अति-उदारता की श्रेणी में भी रख सकते हैं। दरअसल यही अटपटा और बेशर्म लचीलापन हमारी खूबी है।

बाबर के नाम से इतिहास में दर्ज अयोध्या के ढांचे को गिरा दिया गया था, लेकिन वह ऐसा अकेला ढाँचा नहीं है। दिल्ली पर तुर्कों के कब्जे के फौरन बाद सबसे पहले दिल्ली के ही महरौली इलाके में स्थित मंदिर समूह को ध्वस्त करके उसकी जगह पर मस्जिद का निर्माण किया गया। यह काम अगले कई दशकों तक होता रहा और इसके बारे में बहुत विस्तार से तत्कालीन लेखकों ने लिखा भी। इनमें जियाउद्दीन बरनी और मिनहाज सिराज सबसे ऊपर हैं, जिन्होंने गुलाम वंश के हमलावरों की करतूतों को बहुत विस्तार से लिखा है।

इन हमलावरों ने दिल्ली पर कब्जे के बाद पूरे भारत को अपनी शिकारगाह बनाया। 1235 में वे विदिशा और उज्जैन तक हमले बोल रहे थे। इल्तुतमिश नाम के हमलावर ने पहली बार उज्जैन के महाकाल मंदिर को तोड़ डाला था और यहां से कई मूर्तियां हाथी, घोड़ों पर लादकर दिल्ली ले गया था। इन मूर्तियों को महरौली में बन रही कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद की सीढ़ियों पर पत्थरों के बीच डाल दिया गया था, जिन पर चढ़कर मुसलमान नमाज के लिए जाते थे।

यह ब्यौरे कपोल-कल्पना नहीं हैं। इन्हें इब्नबतूता ने अपनी डायरी में लिखा है, जो दिल्ली में छह साल तक काजी के पद पर रहा था। उसने उज्जैन से लाई गई इन मूर्तियों को अपनी आंखों से देखा था। मुमकिन है कि वह भी इन पर चढ़कर मस्जिद में गया हो।

यह तो शुरुआती ब्यौरे हैं। इल्तुतमिश के इसी हमले में विदिशा का विजय मंदिर ध्वस्त किया गया था। यह पुराने विदिशा में बीजामंडल के नाम से मौजूद एक ऐसी जगह है, जिसे देखने के लिए मजबूत कलेजा चाहिए। यह तोड़ा इल्तुतमिश ने था, लेकिन इसके ऊपर बने एक मस्जिदनुमा ढांचे को आलमगीर का नाम मिला। आलमगीर तो औरंगजेब को कहते थे।

इल्तुतमिश और आलमगीर के बीच करीब 450 साल का फासला है। इसका मतलब यह है कि इस्लाम में हराम बुतखाने जब जिसके सामने आए उसने धूल में मिला दिए और जब जिसके सामने वह मलबा आया, उसने एक इबादतगाह खड़ी कर दी। इसलिए किसने तोड़ा और किसने उस पर क्या बनाया, यह ध्यान देने वाली बारीक बात है।

दिल्ली पर तुर्कों के कब्जे के तुरंत बाद जिन इलाकों में गुलाम तुर्क तैनात किए गए थे, उनमें दिल्ली के आसपास के इलाके सबसे पहले थे। इन पर लगातार हमले और कब्जे इतिहास में दर्ज हैं। अवध भी इनमें से ही एक है। कुतबुद्दीन एबक के बाद ही बंदायू, बयाना और अवध की अक्ता (जागीरें, जहां पहले पृथ्वीराज चौहान के सामंतों का राज था।)

हमलावर तुर्कों के हवाले की गई थीं। यह राजस्व प्रणाली पर कब्जा था, जिस पर इन तुर्कों की फौजें पलती-पनपती थीं और यहाँ से हासिल ताकत से हिंदुस्तान के दूरदराज इलाकों में लूटपाट और कत्लेआम मचाती थीं। यह सिलसिला अंग्रेजों के आने तक जारी रहा है।

नालंदा विश्वविद्यालय को जलाकर राख करने वाला बख्तियार खिलजी भी अवध में रहा है। फटेहाली हालत में उसे शुरुआती नौकरी यहीं मिली थी। यहीं से उसने बिहार पर हमले शुरू किए थे। इसलिए कहना कठिन है कि अयोध्या की हजारों साल पुरानी विरासत को उन्होंने साबुत रहने दिया होगा। मुझे लगता है कि अयोध्या में रामजन्म भूमि स्थान पर कन्नौज के गहड़वाल वंश के राजा गोविंदचंद्र का विष्णु हरि का मंदिर तो उसी समय ध्वस्त हो गया होगा, जिसका एक शिलालेख छह दिसंबर को टूटे ढाँचे में पाया गया था।

वह इकलौता सबूत है कि उस जगह पर एक भव्य मंदिर था। पुरातत्व विभाग की खुदाइयों में और बाबरी नाम के उस ढांचे में इस्तेमाल की गई निर्माण सामग्री में उसी मंदिर के अवशेषों को इस्तेमाल कर लिया गया था। जैसे इल्तुतमिश के हाथों टूटे विदिशा के विजय मंदिर के खंडहरों पर बाद की किसी सदी में उसी के मलबे से एक मस्जिद का ढांचा खड़ा कर दिया गया।

इतिहास के ब्यौरे नींद हराम करने वाले हैं। लेकिन वे एक सच की तरफ भी इशारा करते हैं। सुप्रीम कोर्ट के जिन पाँच जजों ने 40 दिन तक दाेनों पक्षों को सुना, दस्तावेजों को देखा, वे जज चंद्रमा या मंगल ग्रह से नहीं आए हैं। वे यहीं पैदा हुए हैं। उनकी पढ़ाई-लिखाई और परवरिश यहीं हुई है। वे सब एक ही इलाके के नहीं हैं। वे भारत के अलग-अलग इलाकों की नुमाइंदगी करते हैं।

जिन हमलावरों ने भारत के दूरदराज इलाकों को सदियों तक रौंदा, उनकी दर्दनाक कहानियाँ हरेक जज के अपने जन्मस्थान के आसपास दर्ज हैं। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई काे ही ले लीजिए। उन्होंने जरुर इतिहास की किताबों में पढ़ा होगा कि विक्रमशिला और नालंदा विश्वविद्यालय को जलाकर राख करने वाले बख्तियार खिलजी की मौत असम के ही एक राजा के कारण हुई थी। वह जगह आज बांग्लादेश में है, जहाँ बख्तियार मरा।

प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं। भारत का भोगा-भुगता सच इतना जीवंत और स्पष्ट है कि जिसे दस्तावेजों पर किसी सबूत की ज़रूरत ही नहीं। आप किसी भी राज्य में रहते हों, वहाँ इन इस्लामी हमलावरों की नृशंसता के सबूत अपनी आंखों से देख सकते हैं, स्थानीय इतिहास के ब्यौरों में पढ़ सकते हैं या किंवदंतियों में सुन सकते हैं।

मैं बीस सालों से इनमें भटक रहा हूँ और देश भर में लगातार बाबरी ढांचों जैसे स्थानों पर लगातार घूमा हूँ। मैं मानता हूँ कि अदालत की सारी सुनवाई एक उदार औपचारिकता भर है। सब कुछ एक जरूरी रस्म की तरह है। क्योंकि हम एक उदार लोकतंत्र हैं, जहाँ सबको अपना पक्ष रखने की आजादी है।

यहाँ डेमोक्रेसी ओवरफ्लो है। आज़ादी एकबत्ती कनेक्शन की तरह मिली है। इसलिए धवन को पूरी आज़ादी है कि वे राम के वजूद पर सवाल करते हुए अदालत में प्रकट होते रहेें। दशहरे और दिवाली की छुटि्टयों में जज साहेबान भी मजे करें। किस बात की छुट्‌टी?

दशहरे की छुट्‌टी मतलब जिस दिन राम ने रावण पर विजय पाई और दीपावली की छुट्‌टी का मतलब जिस दिन राम अयोध्या लौटे। और इन छुटि्टयों को एंजॉय करने के बाद फिर उसी मामले की सुनवाई कि राम थे कि नहीं, उनकी कोई जन्मभूमि है कि नहीं, है तो वह अयोध्या ही है कि नहीं, अयोध्या में भी वही जगह है कि नहीं, जहाँ वह बाबरी नाम का एक बदशक्ल ढाँचा 1992 के दिसंबर तक खड़ा रहा।