विचार
अयोध्या में मंदिर निर्माण के साथ ऐतिहासिक धरोहर को सहेजना भी आवश्यक
राम जन्मभूमि स्थल पर सिर्फ और सिर्फ मंदिर ही क्यों बनना चाहिए

तुष्टीकरण की राजनीति, बौद्धिकता में कपट और इतिहास लेखन में छल को भारत में यदि सबसे बड़ी और समग्र चोट किसी एक प्रसंग ने दी है तो वह है राम जन्मभूमि आंदोलन।

न सिर्फ बातचीत की मेज़ से बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमिटी के समर्थक वामपंथी इतिहासकारों को भागना पड़ा, इन भारी भरकम नामों की अदालतों में भी जमकर किरकिरी हुई। परंतु झूठ और मक्कारी के सहारे दशकों तक हिंदू संवेदनाओं से खिलवाड़ का पटाक्षेप निर्णायक रूप से जन्मस्थान क्षेत्र की पुरातत्व विभाग द्वारा की गई खुदाई में मिले अवशेषों द्वारा ही हुआ।

सन 2003 में हुई इस खुदाई के बाद अब मंदिर निर्माण के लिए भूमि समतल करते समय फिर एक बार पुरातन मंदिर या संभवतः मंदिरों के अवशेष मिलने लगे हैं। राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र के महामंत्री श्री चंपत राय ने बताया है कि खुदाई में सात ब्लैक टचस्टोन स्तंभ व छः रेड सैंडस्टोन स्तंभों के अलावा एक नक्काशीयुक्त शिवलिंग, आमलक, चौखट व खंडित मूर्तियाँ भी मिली हैं। इन खोजों से जहाँ पुरातत्वविदों और इतिहासकारों में उत्साह है, वहीं आम जनमानस में भी कौतूहल और बढ़ा है।

इन अवशेषों ने मुस्लिम पक्षकारों के दुराग्रह और मार्क्सवादी इतिहासकारों की दुष्टता को फिर एक बार सबके सामने बेनकाब किया है। धर्मनिर्पेक्षता के नाम पर वर्षों चली कुटिलता और व्यवस्था में संस्थागत भेदभाव को झेलते रहे हिंदू समाज में डर है कि यह खोज मंदिर निर्माण में पुनः किसी विलंब का कारण न बन जाए।

यह सही है कि लगभग पाँच सदियों से राम मंदिर के पुनर्निर्माण की बाट जोह रहे हिंदू समाज को राहत देने के लिए मंदिर निर्माण शीघ्रातिशीघ्र पूर्ण होना चाहिए परंतु जन्मस्थान से मिल रहे अवशेषों के सामाजिक व ऐतिहासिक महत्व को भी नकारा नहीं जा सकता।

एक समृद्ध सांस्कृतिक अतीत के वाहक और तमाम प्राचीन सभ्यताओं में एकमात्र जीवित व अनवरत सभ्यता होने के बावजूद यह समकालीन भारत के लिए शर्म की बात है कि पुरातत्व की दृष्टि से हमारा रिकॉर्ड लगभग नगण्य है। सरस्वती सिंधु सभ्यता के कुछ केंद्रों को छोड़ दें तो अन्य स्थानों पर सर्वेक्षण लगभग निषिद्ध ही रहा है। मुस्लिम आक्रांताओं और मध्ययुगीन मजहबी कट्टरपंथी शासकों द्वारा बड़े पैमाने पर मंदिर विध्वंस को छिपाने की कवायद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को अनेक स्थानों पर पुरातात्विक जाँच से रोका गया है।

सन 1983 में सिद्धपुर के रूद्रमहालय में चार वर्षों से चल रहे अन्वेषण कार्य को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की शिकायत के बाद बंद करा दिया गया था। सिद्धपुर से विधायक बेगम आयशा व गुजरात राज्यपाल के तत्कालीन सलाहकार के टी सतारवाला समेत अनेक मुस्लिम नेताओं को भय था कि भवन-समूह में स्थित एकादश, यानि 11, रूद्रों में से सात, सटी हुई दाऊदी मस्जिद के भीतर से निकलेंगे।

इसी प्रकार सन 1991 में भारी वर्षा के चलते विदिशा की बीजमंडल मस्जिद का अग्रभाग ढहने से पूर्ववर्ती विजय मंदिर कि इतनी मूर्तियाँ प्रकट हुईं कि पुरातत्व विभाग के पास उत्खनन के अलावा दूसरा कोई चारा न था। परंतु यहाँ भी कुछ ही समय बाद तत्कालीन केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह के दबाव में पुरातत्व विभाग को उत्खनन से रोक दिया गया और क्षतिग्रस्त हुई दीवार की पुनः मरम्मत करा दी गई।

इतिहास को दबाने की जैसी कठोर चेष्टा भारत के छद्म धर्मनिरपेक्षों ने की है उस तरह की अन्य मिसाल कम ही मिलेंगी। कुचेष्टा के इस लंबे क्रम में सन 2000 में फतेहपुर सीकरी में चल रही खुदाई को भी उस समय यकायक रोक दिया गया जब वहाँ आठवीं से लेकर दशवीं शताब्दी की कई खंडित जैन प्रतिमाएँ निकलने लगीं।

इस उत्खनन से पूर्व एक अन्य उत्खनन में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के साथ सहयोगी रहे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविधालय के पुरातत्व विभाग को फतेहपुर सीकरी का इतिहास मुगलकाल से पीछे जाना गवारा नहीं हुआ। इस्लामी आक्रांताओं की मूर्तिभंजना के स्पष्ट संकेत देख पुरातत्वविद डीवी शर्मा पर फतेहपुर सीकरी को एक और अयोध्या बनाने के आरोप लगने लगे। विभिन्न मंचों द्वारा दबाव बना कर फतेहपुर सीकरी में भविष्य में किसी भी प्रकार के उत्खनन पर रोक की माँग की गई।

स्वयं अयोध्या में 2003 में उच्च न्यायालय के उत्खनन के आदेश के बावजूद जिस प्रकार मार्क्सवादी इतिहासकारों ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) के प्रयासों में बाधाएँ डालीं और संस्था की विश्वस्नीयता पर लगातार प्रश्नचिह्न लगाए वह किसी से छिपा नहीं है।

ऐसे में अब मंदिर निर्माण से पहले भूमि समतल होने की प्रक्रिया, उत्खनन द्वारा अयोध्या की ऐतिहासिक धरोहर को सहेजना का एक सुनहरा अवसर है। अयोध्या में उत्खनन से संबद्ध रहे जानेमाने पुरातत्वविद के के मोहम्मद ने अवशेषों के चित्रावलोकन के बाद संभावना जताई है कि यह आठवीं शताब्दी के मंदिरों का हिस्सा हो सकते हैं। यह संभावना अयोध्या के इतिहास और मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से भी बहुत महत्त्व रखती है।

प्रख्यात इतिहासकार मीनाक्षी जैन ने अपनी पुस्तक “राम एंड अयोध्या” में उद्घाटन किया है कि अन्य महत्वपूर्ण मंदिरों की ही तरह राम जन्मभूमि पर मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा मंदिरों को तोड़ने व हिंदू समाज द्वारा उनके प्रत्यावर्तन और पुनर्निर्माण का एक लंबा सिलसिला रहा है।

अपनी नवीनतम पुस्तक “दी फ्लाइट ऑफ डेटीज़” में ऐसे अनेकों उदाहरण देने वाली जैन ने अयोध्या के संदर्भ में लिखा है कि 11वीं शताब्दी में महमूद गजनी के आने से लेकर सोलहवीं शताब्दी में मीर बकी द्वारा ध्वंस के बीच अयोध्या में कई बार मंदिर तोड़े गए। इसी प्रकार गुप्तकाल, प्रतिहार व गहदवलों के शासन में मंदिरों का पुनर्निर्माण होता रहा।

अयोध्या में समय-समय पर पुरातत्व विभाग द्वारा हुए उत्खनन और अब मिल रही कलाकृतियाँ इस सारिणी की पुष्टि करती हैं। इसी प्रकार अयोध्या में आठवीं शताब्दी में पंचायतन शैली के मंदिर होने की संभावना स्थापत्य कला की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़े और विस्तृत संरचनात्मक मंदिर निर्माण का यही शुरुआती काल है। इससे पहले पाँचवीं शताब्दी तक संरचनात्मक मंदिरों का वास्तु विन्यास एक-कक्षीय भवनों तक ही सीमित था।

सन 1975 में बीबी लाल के नेतृत्व में हुए उत्खनन में अयोध्या में ऐन जन्मस्थान पर नॉर्दन ब्लैक पॉलिश्ड वेयर यानि ईसा से 700 वर्ष पूर्व तक सभ्यता के पुख्ता सबूत मिल चुके हैं। इस प्रकार अयोध्या ऐतिहासिक महत्व का ऐसा स्थान बन जाता है जो भारतीय सभ्यता के चरमोत्कर्ष, उस पर हुए बर्बर आक्रमणों व हिंदुओं द्वारा उन आक्रमणों के साहसिक प्रतिकार का साक्षी है।

घटनाओं के क्रम ने अयोध्या में उत्खनन का वह अवसर दिया है जो अन्य जगहों पर राजनीतिक दुराग्रहों की वजह से निषिद्ध ही रहा है। ऐसे में यह आवश्यक है कि मंदिर निर्माण से पहले सघन उत्खनन करा अवशेषों को अयोध्या में ही संग्रहालय बना कर रखा जाए। ताकि अयोध्या तीर्थ क्षेत्र के अलावा सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व का ऐसा केंद्र बने जिसमें आने वाली पीढ़ियों को इतिहास से हुई छेड़छाड़ को जानने का मौका भी मिले।