विचार
अयोध्या बेंच- रंजन गोगोई द्वारा जजों का चयन प्रेरित या संकटमय?

आशुचित्र- अपने अलावा चार भविष्य के मुख्य न्यायाधीशों को चुनकर न्यायाधीश गोगोई ने यह सुनिश्चित किया है कि उन्हें इस निर्णय का नैतिक दायित्व लेना होगा, भले ही यह एक विभाजित निर्णय हो।

अयोध्या मामले में 10 जनवरी से होने वाली सुनवाई के लिए मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) रंजन गोगोई द्वारा पाँच नए जजों की बेंच बनाई जाना न केवल अप्रत्याशित था बल्कि इसमें बहुत खतरा भी है। उनके साथ चार भावी मुख्य न्यायाधीश- एसए बोबदे, एनवी रमना, यूयू ललित और डीवाई चंद्रचूड़ इस बेंच में होंगे।

पिछले वर्ष चार वरिष्ठ जजों ने एक प्रेस सम्मेलन में यह शिकायत सामने रखी थी कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा अपने अनुसार जजों को केस की ज़िम्मेदारी सौंप रहे हैं जबकि उन्हें वरिष्ठता को भी महत्त्व देना चाहिए। इन चार जजों में स्वयं रंजन गोगोई के अलावा न्यायाधीश जे चमलेश्वर, मदन लोकुर व कुरियन जोसेफ थे। वे चाहते थे कि बेंचों को केस आवंटित करने की ज़िम्मेदारी वरिष्ठ न्यायाधीशों के एक पैनल को दी जानी चाहिए।

हम नहीं जानते कि सीजेआई गोगोई ने अयोध्या बेंच का निर्णय लेने से पहले अनौपचारिक तरह से वरिष्ठ जजों से सलाह ली या नहीं। इसके अलावा जो अभूतपूर्व है, वह यह है कि नई बेंच में पिछली बेंच के तीन जजों में से कोई भी नहीं है, जो इस मामले को एक भूमि विवाद की तरह देख रहे थे और पाँच या सात जजों की बड़ी बेंच की मांग को नकार रहे थे।

सीधे शब्दों में कहा जाए तो सीजेआई ने पूर्व अयोध्या बेंच को पूरी तरह दरकिनार कर अपने अनुसार चीज़ें करने का निर्णय ले लिया है।

यह कोई समस्या नहीं है लेकिन अपने अलावा चार भविष्य के मुख्य न्यायाधीशों को चुनकर न्यायाधीश गोगोई ने यह सुनिश्चित कर लिया है कि उन्हें इसका नैतिक दायित्व लेना होगा, भले ही यह एक विभाजित निर्णय हो। भारतीय न्यायपालिका के सबसे महत्त्वपूर्ण मामलों में से एक, अयोध्या निर्णय राजनीतिक एकता और धार्मिक मेल-जोल को प्रभावित करेगा और इन पाँच जजों का निर्णय उनके आगे के कार्यकाल को परिभाषित करेगा।

अगर सीजेआई वरिष्ठता के अनुसार चलते तो न्यायाधीश अर्जन सिकरी और अरुण मिश्रा यूयू ललित और चंद्रचूड़ के स्थान पर होते जो वरिष्ठता में क्रमशः नौवें और ग्यारहवें स्थान पर हैं। गोगोई की चयन प्रक्रिया में निम्नलिखित समस्याएँ भी हैं-

पहली, पूर्व अयोध्या बेंच के दो न्यायाधीश- अशोक भूषण और एस अब्दुल नज़ीर को सम्मिलित न करके गोगोई ने यह सुनिश्चित किया है कि नई बेंच में कोई पुराना जज नहीं होगा जिसने शुरुआती तर्कों को सुना है। यह एक अच्छी चीज़ हो सकती है लेकिन इससे पुनः सभी तर्कों को सुनने में अधिक समय व्यतीत होगा।

दूसरा, यह तथ्य कि इस बेंच में कोई मुस्लिम सदस्य नहीं है, यहाँ तक कि अल्पसंख्यक समुदाय में से भी कोई नहीं है (न्यायाधीश रोहिनटन नरीमन और केएम जोसेफ विकल्प थे), एक समस्या है और मुस्लिम समुदाय इसे एक गंभीर चूक मानने लगा है।

हालाँकि इसकी चिंता हिंदू समूहों को करनी चाहिए। गैर-हिंदू जज का न होना पाँच हिंदू जजों पर निष्पक्षता साबित करने का अधिक भार डालेगा और कोई संदेह कर सकता है कि उन्होंने अपनी पहचान से ऊपर उठकर कानून को सर्वोपरि मानकर निर्णय सुनाया है या नहीं। सबरीमाला मामले में हमने देखा कि कैसे चार पुरुष जजों ने लैंगिक समानता देने की उपाधि पाने के लिए प्रजनन आयुवर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी थी, वहीं महिला जज, जिनका निर्णय इसके विपरीत था, को यह सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं थी।

यदि पाँच हिंदू जज भी यही भार महसूस करेंगे, तो यह गलत होगा। यह वैसा ही हुआ जैसे सबरीमाला निर्णय में पाँचों जज महिलाएँ होतीं। यह नहीं कहना चाहिए कि बेंच कानून के अलावा भी किसी और चीज़ पर विचार करेगी लेकिन दृष्टिकोण का प्रभाव अवश्य पड़ता है। अगर निर्णय मुस्लिमों के विरुद्ध गया तो लोग इसे पक्षपात के दृष्टिकोण से देखा जाएगा। सीजेआई गोगोई को इस वास्तविकता पर विचार करना चाहिए था।

अंतिम निर्णय के आधार पर, जिसे इस वर्ष नवंबर मध्य तक आना होगा क्योंकि गोगोई सेवानिवृत्त हो जाएँगे, जजों का चयन अत्यंत प्रेरणादायक भी सिद्ध हो सकता है या एक स्मरणार्थ भूल भी।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।