विचार
एक पूर्व इख्वान, कश्मीरी सैनिक को अशोक चक्र क्यों विशिष्ट है

आशुचित्र- क्यों कश्मीरियों को यह समझाना आवश्यक है कि लांस नायक नज़ीर अहमद वानी हमारे लिए भी उतने ही बड़े नायक हैं, जितने उनके लिए।

कश्मीर में रहने और काम करने वाले लोगों में यह आम कथानक है कि वहाँ इतने सकारात्मक रोल मॉडल नहीं हैं, जिनसे प्रेरणा ली जा सके, घाटी पर करीब से नज़र रखने वाले लोगों की भी यही राय है। क्या जम्मू-कश्मीर लाइट इन्फैंट्री के एक कश्मीरी सैनिक को सर्वोच्च सम्मान देकर कश्मीरी लोगों की सोच को बदला जा सकता है?

कुलगाम के लांस नायक नज़ीर अहमद वानी को 70वें गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में राष्ट्रपति द्वारा अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। उनकी पत्नी मेहजबीन और माँ को परेड से पहले पुरस्कृत किया गया और इसके साक्षी राजपथ के समारोह को देखने वाले करोड़ों दर्शक बने। शहीद लांस नायक नज़ीर अहमद वानी को दो बार सेना मेडल भी मिल चुका है।

25 नवंबर 2018 को 34 राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात वानी आतंकवादियों से हुए मुठभेड़ में शामिल थे और इस मुठभेड़ के दौरान उन्होंने दो आतंकवादियों को खात्मा किया और एक को घायल किया तथा एक घायल सैनिक की जान भी बचाई। मुठभेड़ के दौरान वानी बुरी तरह आहत हुए और उन्होंने अस्पताल में अपनी आखरी साँसें लीं। उनके इस अदम्य साहस के लिए ही उन्हें अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। मीडिया में वानी के बारे में यह भी बताया जा रहा है कि वे पहले एक इख्वान थे और 2004 में उन्हें 162 इन्फेंट्री बटालियन में भर्ती  किया गया था।

काफ़ी लोगों को वानी के इकाई के नामकरण की भी कुछ खास जानकारी नहीं है इसलिए उनके चुनौतीपूर्ण कार्यों को समझने में लोग अक्षम होंगे। इख्वान शब्द के मायने को समझना सेना एवं आम जनों के लिए आवश्यक है। इसके साथ यह जानना भी ज़रूरी है कि वानी, जो कि स्थानीय सेना के सिपाही थे, राष्ट्रीय राइफल्स के साथ क्या काम कर रहे थे ताकि वानी की बेमिसाल सफलताओं को समझने में आसानी हो।

यह कहानी 1989-1990 की है जब पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) ने उग्रवाद को बढ़ावा देना शुरू किया ताकि हिंदुस्तान को हज़ारों आघात दे सके। इस दौरान काफ़ी सारे कश्मीरी युवाओं को पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर जाने के लिए मज़बूर किया गया और उन्हें भारतीय सेना के खिलाफ़ खड़े करने हेतु प्रशिक्षण भी दिया गया। जब वे वापस लौटे, तो उन्होंने भारतीय सेना के खिलाफ लड़ाई लड़ी क्योंकि उन्हें आईएसआई द्वारा आदेश दिया गया था, लेकिन कुछ समय उपरांत उनका मोह-भंग हुआ क्योंकि पाकिस्तानी संचालक उनके साथ बुरा बर्ताव करते थे और कश्मीर की लिए भी कभी कुछ अच्छा नहीं सोचते थे, साथ ही ये संचालक विदेश से आए हुए भाड़े की सैनिकों से ज़्यादा आसक्त थे।

90 के दशक की शुरुआत में जब वे अनिच्छा से लड़े, तब और अधिक मोहभंग हुआ और सेना ने उन्हें बड़ी संख्या में विदेशी आतंकवादियों को निशाना बनाने के लिए आत्मसमर्पण करने और मदद करने के लिए राज़ी कर लिया। इन भाड़े के सैनिकों की सेवाएँ अफगानिस्तान में सोवियत-अफगान युद्ध की समाप्ति के बाद आईएसआई द्वारा ली गई थी।

वर्ष 1994 तक वे तीन समूहों में विभाजित किए गए। समूहों को उत्तरी कश्मीर के बांदीपोरा क्षेत्र और दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग और कुलगाम में तैनात किया गया था, साथ ही एक समूह जम्मू और कश्मीर पुलिस के विशेष संचालन समूह में दाखिल किया गया था। उनके लिए कोई भौगोलिक प्रतिबंध नहीं था और ये समूह राष्ट्रीय राइफल्स और स्थानीय सेना की साथ मिलकर काम करने लगे। उन्हें सेना और जम्मू-कश्मीर पुलिस के साथ छोटे समूहों में काम करना था और उनके पास काफ़ी जानकारियाँ थीं जो कि आतंकवादियों पर हमला करने हेतु आवश्यक थीं जैसे, ज़मीन की स्थिति, जनसांख्यिकी, विचारधारा और संस्कृति की स्थानीय परिस्थितियाँ एवं हथियारों को संभालने के तरीके।

ये समूह आतंकवादियों का विनाश करने के लिए जाने जाते हैं और वर्ष 1994 और 1996 में इन्होंने काफ़ी सारे विदेशी आतंकवादियों को मार गिराने में भारतीय सेना की मदद की। इनके समूह को इख्वान-उल-मुसलमीन के नाम से जाना गया और समूह के सदस्यों को इख्वान के नाम से जाना जाने लगा।

इस समूह के दो प्रमुख नेता थे- मोहम्मद युसूफ पार्रे जो कि बांदीपोरा क्षेत्र के लोक गायक थे और उत्तर कश्मीर के समूह का नेतृत्व करते थे और दूसरे लियाक़त खान अनंतनाग में दक्षिण कश्मीर के समूह का नेतृत्व करते थे।

1996 के चुनावों के बाद जिसमें इख़्वानों ने सुरक्षा बलों की सहायता की थी, उन्होंने अपना सहयोग जारी रखा परंतु उन्हें राजनीति में उतारने का विचार फलीभूत नहीं हो पाया क्योंकि लोग उनपर विश्वास नहीं करते थे। कूका पार्रे ने चुनावों में एक सीट जीती और उस्मान मजीद ने भी जीत दर्ज की थी लेकिन इस राजनीतिक अभियान के रूप में आगे बढ़ाने के लिए कोई निरंतर प्रयास नहीं किया गया।

सितंबर 2003 में पार्रे की मौत से आंदोलन अव्यवस्थित हो गया था। लियाकत खान ने दक्षिण कश्मीर में इख्वान का नेतृत्व किया लेकिन उनका राजनीतिक रूपांतरण भी सफल नहीं हुआ। बेशक, इख्वान ने उग्रवाद को नियंत्रित करने में सुरक्षा बलों की सहायता अवश्य की मगर कश्मीरी जनों ने कभी उनकी सराहना नहीं की और वे उनसे विमुख ही रहे।

लांस नायक नज़ीर अहमद वानी कुलगाम से होने के नाते दक्षिण कश्मीर इख्वान का हिस्सा थे। 2003-2004 में भारत सरकार द्वारा स्थानीय सेना की आठ इकाइयों को बढ़ाने का एक बड़ा निर्णय लिया गया था। इसका मतलब यह था कि ये इकाइयाँ केवल स्थानीय लोगों द्वारा संचालित की जाएँगी, जो छोटे समूहों में आरआर और अन्य इकाइयों की सहायता करेंगे। उनका कार्य सिर्फ सीटी ऑपरेशन नहीं था बल्कि ऑपरेशन सद्भावना के तहत स्थानीय आबादी की सहायता के लिए सैन्य नागरिक कार्रवाई भी थी।

स्थानीय ज़रूरतों और भावनाओं के लिए एक बेहतर अभिविन्यास होने के कारण, उन्होंने लोगों तक पहुँचने हेतु आरआर और अन्य इकाइयों को निर्देशित किया। यह किसी भी सीटी अभियान का एक अनिवार्य हिस्सा है जहाँ लोगों का विशेष रूप से ध्यान रखा जाता है। वानी ने भी इसलिए ही 162 बटालियन में हिस्सा लिया और राष्ट्रीय राइफल्स के साथ मिलकर उन्होंने काफ़ी काम किया।

एक सफल स्थानीय सेना के सैनिक के तौर पर ये अपनी जान हथेली पर रखकर लोगों की जान बचाने हेतु राष्ट्रीय राइफल्स की मदद करते हैं और उन्हें निर्देशित करते हुए यह भी बताते हैं कि लोगों के लिए सबसे सुरक्षित जगह कौनसी होगी और लोगों को कहाँ कैद किया जा सकता है।

वानी अपने पीछे परिवार में पत्नी और दो बच्चे छोड़ गए। वानी के परिवार के लिए कुलगाम में रहना असुरक्षित होगा क्योंकि आतंकवादी कभी भी जवानों और पुलिस अफसरों पर हमला कर देते हैं।

एक ऐसे व्यक्ति होने के नाते जिसे कश्मीर और कश्मीरियों से प्यार है, मैं यह जानकर खुश हुआ कि अब भारतीय कश्मीरी नायकों के बारे में भी जानेंगे। कई कश्मीरी ऐसे हैं जिनको शेष राष्ट्र से विमुख रखा गया है लेकिन फिर भी वे अपनी जान न्यौच्छावर करने के लिए तैयार हैं। इस विरोधाभास के बीच कश्मीर फिर भी विद्यमान है।

यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम वानी की शहादत को किस प्रकार देखते हैं और उन्हें राष्ट्र के नायक के रूप में कैसे स्थापित करते हैं। हमें कश्मीरियों को यह समझाना आवश्यक है कि लांस नायक नज़ीर अहमद वानी हमारे लिए भी उतने ही बड़े नायक हैं, जितने उनके लिए।