विचार
‘राष्ट्र के नाम’ समर्पित ‘रिपब्लिक भारत’ में ‘पूछता है भारत’ राष्ट्र का अनाहत नाद है

हिंदी में पश्‍चिम से आयातित वैचारिकी के बूते पर ‘खंडित’ विमर्शों का ख़ाका खींचने वाले और प्रसिद्धि की भूख से व्याकुल विमर्शकार, औसत दर्जे के लेखक, कवि तथा उनके अंधानुयायियों में एक तकिया-कलाम सरेआम प्रचलित है– वे मंचों से जब भी किसी थोड़ा-बहुत पढ़े-लिखे और हाथों-हाथ विविधा-रूपा पूँजी से पाले-पोसे व्यक्ति का परिचय देते हैं तो प्रायः कहते हैं, फलाँ-फलाँ साहब ‘किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं!’

महाविद्यालय और विश्‍वविद्यालयों के हिंदी विभागों (अन्य भी!) ने इस तकिया-कलाम को देखा-देखी हाथों-हाथ अपना लिया है। चूक-भूल माफ़, यह तकिया-कलाम किसने किससे लिया-उठाया, बहस का मुद्दा हो सकता है। उस बहस में उतरने की मंशा बिल्कुल नहीं है। और इच्छा भी नहीं है! परंतु सभा–संगोष्ठी में परिचय वाला यह ‘तकिया–कलाम’ बारंबार दिखाई-सुनाई देता है।

बहरहाल, इस लेख के केंद्र में सुपरिचित पत्रकार एवं संपादक अर्णब रंजन गोस्वामी और उनकी विशिष्ट शैली की पत्रकारिता/ एंकरिंग तथा राष्ट्र-हित में हर हद पार कर जाने की ललक का विश्‍लेषण है। अर्णब गोस्वामी वास्तव में जन-जन में और लगभग हर भारतीय मन में बसने वाले राष्ट्रवादी व्यक्ति हैं। अनेकानेक दृष्टि से प्रसिद्धि के बावजूद आज उनका विशेष रूप से परिचय आवश्यक है।

आप यह बात अवश्य जानेंगे-मानेंगे कि उनकी गणना ‘सहूलियत’ (अवसरवादी! सुविधाभोगी!) देखकर बोलने वाले पत्रकार तथा एंकरों में नहीं की जा सकती। जनता को लूट-खसोट कर बड़े (प्रसिद्ध?) बन चुके राजनेताओं को ऐसे फक्कड़-धाकड़ पत्रकार क़तई नहीं सुहाते। उन्हें ‘पालतू पत्रकार’ की तलाश और ज़रूरत होती है ताकि उनका धंधा (?) सुचारू रूप से चलता रहे।

हमारे यहाँ पालतू पत्रकारों की लंबी फेहरिस्त है। ऐसे पालतू पत्रकारों को भ्रष्ट एवं वंशवादी नेता ही नहीं पालते अपितु परदेसी विचार पोषण एवं हित वृद्धि के लिए परदेसी संगठन भी पालते हैं। ऐसे पत्रकार उनके यहाँ जाकर भारत के विरूद्ध अनाप-शनाप राग अलापते हैं, पुरस्कार पाते हैं, मुजरा करते हैं और मेमनों की भाँति मिमियाते हैं।

आप जानते हैं कि पत्रकारों को मिमियाने की आदत आपातकाल में हासिल हुई थी। तत्कालीन पत्रकारों ने सत्ता के सामने शीर्षासन, दंडवत करने से लेकर लोटने (लोटांगण) तक का उपक्रम किया था। पत्रकारों की ऐसी मानसिकता को बदलने हेतु अर्णब गोस्वामी हरसंभव प्रयास करते दिखाई देते हैं। इन प्रयासों में वे भारत के भ्रष्ट एवं वंशवादी राजनेताओं से सीधे भीड़ने का साहस करते दिखाई देते हैं। 

स्मरणीय है कि राजनीति में बाहुबलियों का प्रचलन आज भी है और वे अपने आलोचकों को येनकेनप्रकारेण मसलने-कुचलने की ‘सेटिंग’ कर डालते हैं। आप जान–समझ रहे हैं कि अर्णब गोस्वामी का बधियाकरण करने की पूरी ‘सेटिंग’ होती दिखाई दे रही है ताकि वे दहाड़ना बंद कर विविधा-रूपा पूँजी पर पलने वाले पत्रकारों की भाँति मिमियाना शुरू कर दें।

अर्णब प्रसंग में महाराष्ट्र के महाआघाड़ी राज का खुलासा करने वाले जो ‘स्टिंग’ सामने आए हैं, उनसे अनायास ही यह स्पष्ट हो जाता है कि ऐसे नेताओं को भारत की क़तई चिंता नहीं है। यह भी स्पष्ट हो जाता है कि भ्रष्ट, सुविधाभोगी एवं वंशवादी राजनेताओं को राष्ट्रवादी भावधारा फूटी आँख नहीं सुहाती।

संभवतः इसी कारण वे विविधा-रूपा पूँजी के उपयोग से राष्ट्रवाद के धुर विरोधी खड़ा कर देते हैं और ऐसे विरोधी एजेंडा आधारित नैरेटिव के माध्यम से राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादियों को ध्वस्त कर अपने भरण-पोषण के मार्ग प्रशस्त करने में जुट जाते हैं। इधर घटित घटनाओं पर अर्णब गोस्वामी की निर्भीक, जन-संप्रेषणीय एवं जन-हितैषी पत्रकारिता ने राष्ट्रवाद की सान में बख़ूबी धार दिया है। अर्णब जैसे राष्ट्रवादी पत्रकारों के विरोधियों को डर किस बात का है? 

मोदी के सत्ता में आने से पूर्व ‘अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य’ धूर्त, टुटपुँजिया एवं पिछलग्गुओं के लिए सुरक्षित था और वे अपनी धौंस, षड्यंत्र एवं उखाड़-पछाड़ से अपने विरोधियों को चारों खाने चित करने की हिकमत-हिमाक़त करते थे। यद्यपि जनता द्वारा उपेक्षित होने के बावजूद वे संगठित हैं और अपने विरोधियों को येनकेनप्रकारेण चित करने का प्रयास कर ही रहे हैं।

बचपन से सुनते आ रहे हैं कि बुरे लोगों में गज़ब की एकता होती है। परंतु आज राष्ट्रवाद में विश्‍वास करने वाले राष्ट्र-हित कामना के जज़्बे से सराबोर हैं। दो राय नहीं कि राष्ट्रवादी भावधारा को अनुप्राणित करने में अर्णब गोस्वामी ने महती भूमिका निभाई है। उन्होंने राजनीतिक रिश्तों को बनाने-समझने के हुनर को तवज्जो नहीं दी। वे अपनी चाल में ठेठ, चुस्त-दुरुस्त हैं। बहुआयामी दृष्टि से पत्रकारों को राष्ट्र-हित में ऐसे हुनर से बचने आवश्यकता है।

एक हिंदीतर भाषी पत्रकार, जिसने अपने जीवन में सारा काम-धाम अंग्रेज़ी में किया; अंग्रेज़ी में ही समाचार चैनल आरंभ किया परंतु जब राष्ट्र लोक-मन से जुड़ने-जोड़ने की बात आई तो ‘माफ़ करना मेरी हिंदी कमज़ोर है’ कहकर हिंदी में एंकरिंग आरंभ कर दी। हिंदी के प्रति उसके प्रेम और आग्रह को देख कर कभी-कभी हिंदी विभागों के प्रोफेसरों की लचर-पचर हिंदी पर तरस आता है।

कई बार तो कई को मुफ़्त में राय देने की नौबत भी आई कि हिंदी की ही नौकरी है तो हिंदी सीखिए और बन पड़े तो अर्णब गोस्वामी को सुनिए। हिंदी की धार और धारा का सौंदर्य सहज ही दिखाई देगा। वैसे आज के समय में हिंदी के मामले में नरेंद्र मोदी को सुनिए कहना अधिक युक्तियुक्त है। उन्होंने हिंदी में सतत प्राण फूँकने का काम किया है। वे भी हिंदीतर भाषी हैं, परंतु जब वे हिंदी बोलते हैं तो लगता है कि मेरा राष्ट्र बोल रहा है। परंतु नरेंद्र मोदी के नाम से कुकुर-कर्ण खड़े हो जाते हैं। अस्तु, चिढ़ने-कुढ़ने वाले वैसा-वैसा सबकुछ करते रहेंगे। यह सच है और इस ‘साँच को आँच नहीं’! 

“You are the Republic. We are just your voice.” का नीति-वाक्य लेकर चलने वाले अर्णब गोस्वामी ने देखते-न-देखते हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार में अपनी गहरी पैठ बना ली है। हिंदी को अपनी बपौती मानने वाले हिंदी जगत को संभवतः अर्णब गोस्वामी से शिकायतें हो सकती हैं। वे उस बिहारी बाबू पत्रकार/ एंकर की तरह हिंदी में कसावट वाले तंज कसने वाले, स्वयं को श्रेष्ठ तथा औरों को नीचा दिखाने वाले पत्रकार/ एंकर नहीं हैं। उनमें हिंदी की इतनी सुध–बुध है कि वे लोक में प्रचलित मुहावरे-लोकोक्तियों को सही समय और सही जगह प्रयोग कर श्रोता–दर्शक के मन में उनमें निहित अर्थ एवं भावों को सहज ही अंतरित कर देते हैं।

कुछ समय पहले भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए गए साक्षात्कार का एक अंश आंधी-तूफान की तरह हर जगह न केवल पहुँच गया था अपितु हलचल मचा गया था– “मैंने खुद को कभी प्रधानमंत्री बनने के लायक इसलिए नहीं समझा क्योंकि मेरे पास लोगों से कम्यूनिकेट करने का कोई साधन नहीं था। पूरे देश में हिंदी बोलने और समझने वाले लोग ज्यादा हैं और मेरी हिंदी अच्छी नहीं थी। अगर हिंदी जानता तो प्रधानमंत्री होता।”

वैसे प्रणब मुखर्जी द्वारा प्रधानमंत्री न बन पाने (न बनाये जाने?) के मलाल को छिपाने का यह तरीक़ा अच्छा था। भूतपूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने प्रणब मुखर्जी की आत्मकथा के लोकार्पण के अवसर पर कहा था– “प्रधानमंत्री पद के लिए प्रणब मुखर्जी बेहतर थे।” वैसे मनमोहन सिंह के इस बयान के विश्‍लेषण की अधिक आवश्यकता नहीं है। नेहरू और इंदिरा कांग्रेस में बुद्धिवान एवं कर्मठ नेताओं के लिए विशेष स्थान नहीं (रहा) है।

हाल ही में कई गुलामों पर आज़ाद हो जाने के आरोप लगे थे और तमाम जनसंचार माध्यमों में उस ग़ुलामी तथा आज़ादी की रुदाली एवं जुगाली बहुत समय तक चलती रही। इसीलिए प्रसंगावधान से ऊपर नानाविध पहलुओं को दृष्टिगत रखते हुए ‘पालतू’ शब्द का प्रयोग करने की नौबत आई रही। बहरहाल, अनजाने ही सही प्रणब मुखर्जी यह सिद्ध कर गए कि हिंदी का फलक व्यापक है।

उन्हीं की तरह अर्णब गोस्वामी भी हिंदीतर भाषी हैं और उन्हीं की तरह इन्होंने भी हिंदी को राष्ट्र का स्वर माना और राष्ट्र का अनाहत नाद हिंदी में ही प्रस्तुत करना आरंभ किया और उसे जारी भी रखा। मोदी के भाषण और अर्णब की एंकरिंग से एक भावधारा सहज ही उभरती है– हिंदी में राष्ट्र अभिव्यक्त होता है! अंग्रेज़ीपरस्तों के लिए राष्ट्रवाद का स्वरूप भी खलने ही वाला होगा ना!

आप ध्यान देंगे कि अर्णब गोस्वामी की पत्रकारिता/ एंकरिंग में ‘राष्ट्र’ संज्ञा विशेष रूप में प्रयुक्त होता है और वह अनायास ही भारतीय जनमानस को झंकृत कर जाता है। मानो या ना मानो हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार ही नहीं अपितु पत्रकारिता एवं जनसंचार में राष्ट्रवाद को जीवंत करने का पूरा श्रेय अर्णब रंजन गोस्वामी को जाता है।

‘मानो ना या मानो’ लिखना इसलिए आवश्यक है क्योंकि हिंदी बुद्धिजीवी जगत में एक बड़ी भारी समस्या है, यहाँ तहरीर और तक़रीर से ज़्यादा तकरार होते हैं। और मेरा मानना है कि तकरार से जितना बचा जाए, उतना बेहतर है। इस बात को अर्णब गोस्वामी भी भलीभाँति जानते हैं। इसीलिए वे अपने ‘डिबेट शो’ में दो टूक प्रश्‍न करते हैं और मुद्दे पर ‘टू द प्वाइंट’ बात रखने की ज़िद करते हैं।

भटकाने-बहकाने-भड़काने वाले ‘पैनलिस्ट’ को उनका यह अंदाज़ अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य पर हमला प्रतीत होता है। हमारे ‘पालतू’ मीडिया ने ऐसे पेनलिस्टों को भटकाने-बहकाने-भड़काने की खुली छूट दे रखी थी। अर्णब गोस्वामी ने उस ‘पैटर्न’ को केवल ख़ारिज ही नहीं किया बल्कि पूरी तरह तोड़ा है। वे पैनलिस्टों को ‘ऊलजलूल’ बातों पर दो टूक टोकते हैं और समय खोटा न करने की हिदायत देते हुए ‘टू द प्वाइंट’ बात करने का पैटर्न स्थापित करते हैं। अच्छा भी है श्रोता-दर्शक ‘फटाफट’ ‘डिबेट’ सुनें और काम-धाम में लग जाएँ। राष्ट्रोद्धार के लिए सामयिक घटना के साथ-साथ तत्संबंधी ज्ञानार्जन भी आवश्यक है और राष्ट्र तथा अपने जीवन को गतिशील बनाए रखने के लिए काम-धाम की भी उतनी ही आवश्यकता है। 

विचारणीय है कि अर्णब गोस्वामी का राष्ट्र के नाम समर्पित ‘पूछता है भारत’ राष्ट्र का अनाहत नाद सबके गले नहीं उतरता। बहुतों के लिए तो आज भी भारत ‘एक राष्ट्र’ नहीं है। वे ‘राष्ट्र संघ’ और ‘राष्ट्र राज्य’ के तर्ज़ पर भारतीय ‘राज्य राष्ट्र’ को एक ही रूप में परिभाषित एवं व्याख्यायित करते हैं। ‘एकात्मक शासन’ (संविधान की सर्वोच्चता, इकहरी नागरिकता, एकीकृत न्याय–व्यवस्था, मूलभूत विषयों में एकरूपता) पर उनकी दृष्टि गांधारी-दोष से ग्रस्त है।

‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ की विचारधारा से आप परिचित हैं ही। अतः उस संबंध में अपने शब्दों का व्यर्थ व्यय क्यों करना? आज के समय में राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद की बात करना ‘आग का दरिया’ से कम नहीं है। जिगर मुरादाबादी ने अपने एक शेर में लिखा ह – “ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे / इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।” भारत में राष्ट्रवाद की बात करना ‘आसाँ’ नहीं है बल्कि वह ‘आग का दरिया’ से कम नहीं है।

ऐसे में जब हमारे स्थापित राष्ट्रवादी भावधारा के संगठन इस ‘आग का दरिया’ (राष्ट्रवाद!) से बचने का सतत प्रयास कर रहे हैं, अर्णब गोस्वामी अपनी आवाज़ बुलंद करते हुए उसमें ‘डूब के जाने’ का सतत उपक्रम कर रहे हैं। ‘पूछता है भारत’ में वे भारत के कण से कोण तक पहुँचते हैं और भारत भी उन तक उसी रूप में पहुँचता है।

सारे रोध, अवरोध, निरोध, विरोध, प्रतिरोध एवं षड़यंत्रों के बावजूद अर्णब गोस्वामी भारतवासियों तक न केवल पहुँच रहे हैं अपितु उनमें राष्ट्रवाद का अलख जगाने में सफल भी हो रहे हैं। इधर उनके विरुद्ध हो रहे षड़यंत्रों को दृष्टिगत रखते हुए यह विचार भी आता है कि उन्होंने ओखली में सिर दे दिया है परंतु ध्यान दें कि वे मूसलों से डर भी नहीं रहे हैं। उनका यह जज़्बा राष्ट्र-मन को ज़्यादा ‘कनेक्ट’ कर रहा है।

भारतीय पत्रकारिता के इतिहास पर दृष्टिपात करने से ज्ञात होगा कि भारत को औपनिवेशिक दासता से मुक्ति दिलाने में पत्रकारिता और साहित्य का योगदान अविस्मरणीय रहा है। उन दिनों पत्रकारिता में राष्ट्र का अनाहत नाद गुंजायमान हुआ था। आज लगभग वही काम अर्णब गोस्वामी तथा उन जैसे राष्ट्रवादी पत्रकार कर रहे हैं।

स्वतंत्रता-पूर्व पत्रकारिता के समक्ष केवल औपनिवेशिक शत्रु थे परंतु आज के राष्ट्रवादी पत्रकारों के समक्ष भारत को खंड-खंड करने वाले आंतरिक विखंडनवादियों की नित-नवीन खुराफ़ातें हैं। हाल-हाल तक मीडिया में हिंदू पक्ष (सनातन) रखना ‘आग का दरिया’ ही हुआ करता था परंतु अर्णब गोस्वामी जैसे पत्रकार/ मीडियाकर्मियों ने वह जोखिम बेहिचक उठाई है।

लगभग हर मुद्दे को अर्णब गोस्वामी ने कसकर पकड़ा, छानबीन की और डंके की चोट पर अपनी प्रस्तुतियाँ दी हैं। मामला जो भी रहा हो– एयर स्ट्राइक, अनुच्छेद 370 रद्दीकरण, नागरिक संशोधन अधिनियम, पालघर में संतों की हत्या, सुशांत ‘आत्महत्या’ (?)– अर्णब गोस्वामी ने हर बार राष्ट्र-हित में ‘फ्रंटफूट’ पर खेलने का काम किया है।  

‘पालतू’ डिज़ाइनर पत्रकारों ने मोदी सरकार की योजनाओं के सर्मथन में पक्ष रखने वाले मीडिया का नया नामकरण किया– ‘गोदी मीडिया’। वास्तव में भारत को पूछना ही चाहिए कि जब अंधाधूंध लूट-खसोट हो रही थी और सारा मीडिया मौन धारण कर ‘सोनी’ सूरत बना कर ‘मोहनी’ मूरत बन बैठा था। तब कौन किस-किस की गोद में बैठे हुए थे?

अर्णब गोस्वामी ने ‘पूछता है भारत’ में भारतवासियों की भावनाओं को हर तरह से प्रस्तुत करने का जिम्मा उठाया है। वे सही मायने में पब्लिक एवं रिपब्लिक की आवाज़ बन गए हैं। इस देश का हर नागरिक यदि अपने-अपने स्थान साफ-स्वच्छ कर-रख लें तो हमारा देश दुनिया का सबसे सुंदर देश (इन्क्रेडबल) बन सकता है।

प्रधानमंत्री मोदी की इस सोच को जन-जन तक पहुँचाने में भी अर्णब गोस्वामी तथा उन जैसे राष्ट्र-हित चिंतक पत्रकारों ने महती भूमिका निभाई है। सरकार के साथ-साथ इन पत्रकारों ने हिंदी भाषा को राष्ट्रवाद का वाहक-पोषक बनाया, स्वच्छता को राष्ट्रवाद का वाहक-पोषक बनाया, योग साधना को राष्ट्रवाद का वाहक-पोषक बनाया और बताया-चेताया कि केवल राष्ट्रवादी सरकार के होने से राष्ट्र-हित नहीं सधता अपितु हर जन-मन को राष्ट्रवादी बनने की आवश्यकता है।

हमारे यहाँ आनन-फानन में, लेख के आरंभ में उल्लिखित तकिया-कलामों को देखा-देखी सुना-सुनी अपनाने का अनुकरण शिद्दत से होता है। कितना अच्छा होता यदि राष्ट्र-हित में कही गई बातों को सकारात्मक दृष्टि से देखते-अपनाते? अपनी प्रसिद्धि से अधिक तवज्जो राष्ट्र की प्रसिद्धि को देने का जज़्बा सबमें होना आवश्यक है।

राष्ट्र-हित में जो झंडा अर्णब गोस्वामी लेकर निकल पड़े हैं, उससे निस्संदेह भारत को तोड़ने वाली सत्तालोभी शक्तियों की मुसीबतें बढ़ी हैं। अतः वे ‘रिपब्लिक भारत’ को बंद करने की वक़ालत और षड्यंत्र कर रहे हैं। जब-जब स्वार्थ और अपनी राजनीति पर खंतरा मंडराया है, तब-तब इस देश में सच्चे राष्ट्रवादी पत्रकार-साहित्यकारों को उठाकर जेल में ठूँस दिया गया है। मैं केवल ‘आपातकाल’ की बात नहीं कर रहा!

औपनिवेशिक दासत्व से भिड़ंत के समय में प्रेस पर लगाई गई पाबंदी के दस्तावेज़ शोध एवं अध्ययन के दौरान प्राप्त होते हैं। यहाँ तक कि पुस्तकों पर लगे प्रतिबंध भी स्मरणीय हैं– वीर सावरकर की ऐतिहासिक पुस्तक ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ (जिसे पढ़कर भगत सिंह जैसे युवा क्रांतिकारी बने) से लेकर प्रेमचंद की साहित्यिक रचना ‘सोज़े वतन’ तक।

ध्यान रहे कि ‘अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य’ के ‘छद्म झंडाबरदार’ भारत विखंडन के पक्षधर हैं, यह अनेकानेक अवसरों पर सिद्ध हो चुका है। ऐसे में अर्णब गोस्वामी जैसे भारतीय राष्ट्रवादी पत्रकार का साथ सबको देने की आवश्यकता है। पद-पैसा-प्रतिष्ठा के लालच ने भारतीय विश्‍वविद्यालयों के प्रोफेसरों को ही नहीं अपितु लेखक एवं पत्रकारों को भी अपनी ज़द में ले लिया है। पुरस्कार से लेकर तिरस्कार तक का खेल इसी लालच के इर्द-गिर्द खेला जाता (रहा) है। शैक्षिक जगत में प्रोफेसरों के लिजलिजेपन समझा जा सकता है, परंतु लेखक-पत्रकारों का ऐसा रवैया समझ से परे है।

आत्मवृद्धि, समृद्धि तथा पुरस्कार की कामना को दृष्टिगत रखते हुए यदि लेखक-पत्रकार राष्ट्र-हित का पक्ष लेना छोड़ देंगे तो राष्ट्र पतनोन्मुख हो सकता है। आचार्य चाणक्य और संघ का ‘अखंड भारत’ कई बार टूट चुका है, उसे वैचारिक मतभेद के चलते पुनः खंड-खंड नहीं होने देना चाहिए। और यह दायित्व वास्तव में लेखक-पत्रकार का अधिक बनता है। ना भूलें कि लेखक-पत्रकारों की हिक़मत और क्रांतिकारियों की हिमाकत ने भारत को स्वतंत्र किया था। आज राष्ट्र-हित को दृष्टिगत रखते हुए राष्ट्रवादी भावधारा को विकसित करने की आवश्यकता की पूर्ति हम ही से संभव है। 

कहना प्रसंगोचित ही होगा कि जिस देश में सेक्यूलरिज़्म के नाम पर ‘वंदे मातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ बोलना लगभग मुश्किल से नामुमकीन होता जा रहा है, ऐसे में अर्णब गोस्वामी प्रतिदिन ‘पूछता है भारत’ कहकर अखिल भारतीय जनमानस को जाग्रत करने का प्रयास कर रहे हैं। राष्ट्र-हित चिंतन के विविध आयामों का विस्तार देखकर सबको स्वयमेव उस मुहिम में जुट जाना चाहिए।

परंतु ‘रिपब्लिक’ का गला घोंटने की तैयारी करने वालों के बुलंद इरादों को देख-सुन और बुद्धिवादियों के ओढ़े हुए मौन को देख कर कभी-कभार लगता है कि देखने-सुनने वाले सभी गूँगे-बहरे और अंधे हो गए हैं। ‘क्रांतिवीर’ में नाना पाटेकर उचित ही कहते हैं–

आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने? अब मुझे लटका देंगे। ज़ुबान ऐसे बाहर आएगी। आँखे बाहर आएँगी। थोड़ी देर लटकता रहूँगा। फिर ये मेरा भाई मुझे नीचे उतारेगा। फिर आप चर्चा करते हुए घर चले जाओगे। खाना खाओगे। सो जाओगे। तुम्हारी ये ना मर्दानगी, बुज़दिली एक दिन इस देश की मौत का तमाशा इसी ख़ामोशी से देखेगी। कुछ नहीं कहना मुझे तुम्हें! कुछ नहीं! तुम्हारी ज़िंदगी में कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं! अँधेरे में रहने की आदत पड़ी है तुमको! ग़ुलामी करने की आदत पड़ी है। पहले राजा-महाराजाओ की ग़ुलामी की। फिर अंग्रेज़ों की। अब चंद गद्दार नेताओं और गुंडों की!…

मानो न मानो राष्ट्रवाद की सान पर राष्ट्र के धारहीनों को धार, निराधारों को आधार और निराश्रयों को आश्रय देने का जो कार्य अर्णब गोस्वामी ने आरंभ कर दिया है, उसे और धारदार बनाने का कार्य सभी राष्ट्रवादियों को करना होगा। रजनीश ने कभी कहा था– “भारतीय समाज कछुए की तरह ऊपर से सख़्त और भीतर से नरम है।” उसे ठीक (सुधार) करने के लिए भीतर तक घुसने की ज़रूरत है।

समस्या विपरीत है कि भारत-द्रोही (टुकड़े-टुकड़े गैंग) भीतर तक घुस चुके हैं और कछुएनुमा भारत राष्ट्र को कुरेद-कुरेदकर लहुलुहान करने में जुटे (डटे) हुए हैं।  राष्ट्रवादियों को स्थितियों की गंभीरता देख-जानकर यथाशीघ्र सक्रिय होना चाहिए। जो अच्छा काम कर रहा है, उसकी प्रशंसा करना और उसका साथ देना हर दृष्टि से युक्तियुक्त होता है। मराठी संत कवि तुकाराम ने कहा था– “एक मेका सहाय्य करू, अवघे धरू सुपंथ।” (भावानुवाद एक-दूसरे की सहायता कर सन्मार्ग ‘सुपंथ’ पर चलते हैं।

एक जीवन-प्रसंग एवं अनुभव है– जीवन में पद की दृष्टि से एक बड़े अधिकारी प्रायः हर काम में मिनमेख निकाला करते थे। उन्हें हर अच्छे नवोन्मेषी कार्य में त्रुटियाँ दिखाई देती थीं। प्रायः नकारात्मक अंदाज़ में कहते थे– “Don’t expect appreciation for the works you’ve done.” कई प्रसंगों में तिरस्कार झेलने के बाद एक दिन कार्य-निष्पादक अधिकारी ने कहने की हिम्मत जुटाई और बोला– “If so, I don’t expect abuses too and I won’t accept too.”

जीवन के लिए यह दार्शनिक सीख है। यदि आप किसी के अच्छे कार्य की प्रशंसा नहीं कर सकते हैं तो कम-से-कम उसकी निंदा-भर्त्सना तो ना करें। यह दर्शन केवल अर्णब के राष्ट्र-हित चिंतन की दृष्टि से नहीं अपितु हम सबके जीवन के लिए सबक है। अंत में कहना बस इतना ही कि भाषा, भाव, हाव-भाव, आचार-विचार, कर्म-व्यवहार में राष्ट्र-हित दिखना चाहिए। इन सबमें एक सामाजिक एवं राष्ट्र सापेक्षिकता है। हमें अब भी सदियों की ग़ुलामी से सबक सीखने की आवश्यकता है। यदि राष्ट्र ही शेष नहीं रहेगा तो आपका अपना क्या होगा? एक मित्र ने कहा– जितना कहो-चिल्लाओ इनके कान पर जूं नहीं रेंगने वाली! वाक़ई में ऐसा है क्या? मैं नहीं मानता!

डॉ आनंद पाटील तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं। वे @AnandPatilCU के माध्यम से ट्वीट करते हैं।