विचार
आखिरकार क्या वे गाय को हिंदुओं से अलग करने मे कामयाब रहे?

प्रसंग
  • रात के अंधेरे में गोमांस का व्यापार प्रगति पर है। इनके साथ ही गौसंरक्षक और गौरक्षक भी हैं जो कसाईयों के लिए दरिंदे बने हुए हैं
  • सारा ध्यान मौब लिंचिंग की तरफ खिच जाता है, इसलिए गौरक्षकों पर युद्ध ज्यों का त्यों बना हुआ है
  • यह गौरक्षकों के लिए कोई आसान काम नहीं है। लेकिन फिर भी वे इसके लिए सीना ताने खड़े हैं

हिन्दुओं से गायों को अलग करना सदियों से इस्लाम को मानने वालों का सपना रहा है। महान सूफी संत ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती के समय हिन्दुओं को अपमानित करने के लिए एक हथियार के रूप में किस तरह से गाय की हत्या की जाती थी और फिर गाय के मांस का सेवन किया जाता था, उसे इतिहासकारों में अपनी लेखनी से बखूबी बताया है। इसीलिए यह स्वाभाविक था कि “गोरक्षा” इस्लामी साम्राज्य के खिलाफ प्रतिरोध का एक प्रतीक बन गया।

इतिहास को देखने के बाद भी गोरक्षा को भारतीय संविधान में उपयुक्त ठिकाना नहीं मिल पाया। अधिकार की बात तो दूर रही, राज्य का एक कर्तव्य समझकर निर्देशित सिद्धान्तों से साथ गोकशी की गई थी। इससे विभिन्न राज्यों में गोकशी को प्रतिबंधित करने वाले कानूनों का पतन हो गया।

देश के बंटवारे के कुछ समय बाद गाय फिर से हिन्दुओं के लिए मुद्दा बनाने का एक जरिया बन गई, खैर श्वेत क्रान्ति को और हाल ही में लागू की गई गुलाबी क्रान्ति को बहुत-बहुत धन्यवाद। मवेशियों की संख्या बढ़ने के साथ ही गोकशी उद्योग और इससे जुड़े कारोबार (क्षेत्र) भी पनपे। जब माँग आपूर्ति से अधिक हो गई तो मवेशियों की चोरी होने लगी। चूंकि राज्य सरकारें मांस माफियाओं पर लगाम कसने में नाकाम रहीं तो इस खतरे को भाँपते हुए स्थानीय हिन्दू समुदाय एकजुट होकर खुद गोरक्षा के लिए मैदान में उतर आया। वे धर्म रक्षा का बड़ा लक्ष्य और गोरक्षा के इतिहास को भूले नहीं थे। इन सभी बात को मद्देनजर रखते हुए हमें मिले-जुले आधुनिक गोरक्षकों के उद्भव को समझना चाहिए।

इसे किस्मत कही जाए या बदकिस्मती, लेकिन यह युद्ध का ही एक रूप हैः अंत में आप अपने दुश्मन की तरह ही बन जाते हो, खासकर अगर आपका दुश्मन कुछ ज्यादा ही घातक है तो।

यह बात बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि सतर्कता घटते-घटते अति सतर्कता का रूप लेती जा रही है। जिस काम को राज्यों ने छोड़ दिया था उसको गैरकानूनी रूप से अन्य लोगों द्वारा अंजाम दिया जा रहा है।

हालांकि, जो कुछ भी कहा गया और किया गया, वह सब अंग्रेजी मीडिया की मुख्यधारा के बुद्धिजावियों द्वारा लिंचिंग के मामले में तथ्य पड़तालकर्ताओं की बातों और असल सच्चाई को नजरअंदाज करके जनता की आँखों में धूल झोंकते हुए कहा गया। उनको अपनी चुनिंदा घटनाओं पर मनगढ़ंत कहानियों से अवगत कराने का यह महज एक प्रयास है।

यह बात बताना भी काफी अहम रहेगा कि ये सभी कार्यकर्ता साजिश रचकर और एकजुट होकर काम कर रहे हैं। इस्लाम के मामने वालों के लिए हिन्दुओं की हर पवित्र चीज अपवित्र होनी चाहिए। अन्य लोग वे हैं जो अपना इतिहास भी नहीं जानते हैं और उनको यह भी पता नहीं होता है कि वे कहाँ जा रहे हैं। लेकिन मुसलमानों और उपयोगी बेवकूफों की दिलचस्पियों या हितों को कुछ इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि वे बहुसंख्यक समुदाय के हितों के लिए नुकसानदेह हैं।

यह कहना गलत नहीं होगा कि किसी अन्य समय की अपेक्षा पिछले कुछ वर्षों में इस्लाम-वामपंथियों ने गाय को हिंदुओं से अलग करने में अधिक कामयाबी हासिल की है। इस पर विचार कीजिए। आज आधारभूत वास्तविकता क्या है? हजारों लोग अवैध गोमांस व्यापार में काम कर रहे हैं, उनमें से अधिकतर मुसलमान हैं। वे मवेशी चोरी और उनको लाने ले जाने में प्रयोग होने वाले वाहनों की चोरी सहित सभी प्रकार की गैरकानूनी गतिविधि अपनाते हैं। वे सभी नियम कानूनों को जानते हैं और इस अभियान के दौरान वे नियमों का उल्लंघन करते हैं। जब पुलिस या स्थानीय लोग इनका विरोध करते हैं तो ये जवाबी हमला करते हैं।

देश में गोमांस माफिया के खिलाफ हजारों मामले दर्ज हैं। अलवर के पुलिस अधीक्षक राजेंद्र सिंह ने स्वराज को बताया कि “हम 2016 से आरबीए [राजस्थान गोवंशीय पशु (वध का प्रतिषेध और अस्थायी प्रवर्जन या निर्यात का विनिमयन) अधिनियम, 1995] के तहत लगभग 800 लोगों को गिरफ्तार कर चुके हैं। यह बहुत ही खतरनाक स्थिति है।

लेकिन देश के लिए क्या कल्पना की जा सकती है? गौरक्षकों द्वारा मुसलमानों की हत्या एक महामारी के समान है। यह सुनिश्चित किया जाए कि हत्या का कोई भी कृत्य निन्दनीय है इसको पूरी कानून शक्ति के साथ सुलझाया जाना चाहिए। लेकिन एजेंडा की तलाश में समानता की भावना समाप्त हो गई है। लिंचिंग पर इंडियास्पेंड, जिनकी सक्रियता लोकप्रिय है, की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले आठ वर्षों में हुई 93 घटनाएं केवल गाय से संबंधित हैं और लिंचिंग से पीड़ित लोगों में से लगभग 55 प्रतिशत मुसलमान हैं। जब उन्होंने केवल अंग्रेजी मीडिया से जानकारी प्राप्त की तो उन्हें पता चला कि गाय से संबंधित हिंसाओं में अगर पीड़ित एक मुसलमान पाया गया तो ये घटनाएं ज्यादा संगीन हो गईं (इस ट्विटर थ्रेड को पढ़ें)। इसके साथ ही इस रिपोर्ट में बल्लभगढ़ ट्रेन दंगा जैसी घटना भी है, जो कि ट्रेन की एक सीट के लिए हुई थी लेकिन बाद में उत्पातपूर्वक मांस और बढ़ते-बढ़ते गोमांस पर पहुँच गई थी।

इस प्रकार स्पष्ट है, हमारी उपस्थिति में हमारी आंखों के सामने ही इतिहास के साथ खिलवाड़ हो रहा है जबकि हम अतीत की विकृति के बारे में बात करते हैं। यह इस विकृति के कारण है कि राज्य गौ-तस्करी या गौवध पर कानून बनाने के बजाय मॉब-लिंचिंग पर एक राष्ट्रीय कानून पारित करने के अधिक करीब है।

औरैया और अलवर के हालातों ने हमारी आंखें खोल दी हैं कि किस प्रकार का माहौल तैयार किया जा रहा है?

इस साल अगस्त के महीने में सिलसिलेवार हमलों में मंदिर के कम से कम तीन पुजारी मारे जा चुके थे, गाय-तस्करी से संबंधित गतिविधियों के बारे में पुलिस को जानकारी देने के अपराध के लिए उनकी जुबान काट दी गई थी। दिल्ली में बैठे लोग गौराक्षकों के बारे में जो भी बताते हों, लेकिन ग्रामीण इलाकों में लोगों के लिए गौरक्षक होना एक गर्व की बात है। उनके लिए यह किसी भी मौद्रिक मुआवजे से अधिक कीमती है। औरय्या के एक स्थानीय किसान नेता सहदेव सिंह यादव ने स्वराज को बताया, “गायों की रक्षा के लिए उन्हें मारा गया था। हम चाहते हैं कि उन्हें गौराक्षक घोषित किया जाए और मंदिर में उनकी प्रतिमाएं स्थापित करवाई जाएं।” उन्होंने यह भी कहा कि वह निर्भयता से किए गए इस हमले से सख्ते में हैं, क्योंकि यह इलाका यादव बाहुल्य क्षेत्र है।

खैर, उन्हें आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए। देखें अलवर में क्या हो रहा है।

अलवर “दिन दहाड़े चोरी, लूटपाट, गोली मारकर हत्या और हत्या” जैसे सैकड़ों मामलों वाले अपराधियों के साथ खतरनाक गाय तस्करों का एक गढ़ है, लेकिन धारणा यह फैलाई जा रही है कि अलवर, कुछ घटनाओं के आधार पर, जिनमें ग्रामीणों ने गाय तस्करी के संदेह पर मुस्लिमों पर हमला किया, मॉब लिंचर्स के लिए स्वर्ग है।

मॉब लिंचिग की घटनाओं ने गौरक्षकों को एक समुदाय के रूप में दोषी ठहराया है। हालांकि हकीकत यह है कि ये गौरक्षक मांस माफिया के खिलाफ सतर्कता रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अलवर के एसपी, सिंह ने स्वराज्य के एक साक्षात्कार में गौरक्षकों द्वारा पुलिस की अपराधियों को पकड़ने में मदद करने को स्वीकार किया है। उन्होंने कहा “गौरक्षक हमारी सहायता करते हैं।”

लेकिन आज उनकी स्थिति क्या है? गौरक्षक इस बात से निराश हैं कि किस प्रकार से मीडिया उनकी गलत छवि दिखा रहा है और गाय-तस्करों को भोले-भाले किसानों के रूप में दर्शा रहा है। अलवर के सबसे मशहूर गौरक्षक नवल किशोर शर्मा ने ‘स्वराज’ को बताया कि रकबर खान, जो अलवर में कथित तौर पर मॉब लिंचिंग का शिकार हुआ था, के लिए मचे हगामे के पीछे तथ्य यह कि ग्रामीणों ने आधी रात एक बजे के समय रकबर को पकड़ था। उन्होंने स्वराज को बताया, “उन्होंने अपने आप को एक डेयरी किसान दर्शाने के लिए घर के बाहर सिर्फ एक गाय को बांध रखा था। लेकिन ऐसा कौन सा डेयरी किसान है जो आधी रात को बिना दूध वाली गाय लेकर चलता है।”

वह नाराजगी जाहिर करते हुए कहते  हैं कि तस्करों को मोटा मुआवजे दिया गया। हरियाणा सरकार ने रखबर के परिवार को 8 लाख रुपए का मुआवजा दिया। किसी भी गौरक्षक या फिर तस्करों के साथ संघर्ष के दौरान मारे गए गौरक्षक पर ऐसी कृपा नहीं बरसाई गयी।

उन्हें आश्चर्य होता है कि इतने बड़े मुआवजे को सौंपने से पहले राज्य ने जाँच क्यों नहीं की।

सिर्फ गौरक्षा दल (संघ) ही नहीं बल्कि स्वतंत्र डेयरी किसान भी गायों की तस्करी के बजाए मॉब लिंचिंग को लेकर हंगामा करने की भावना नहीं बना सकते हैं।

अलवर निवासी एक किसान रमेश शर्मा ने ‘स्वराज्य’ को बताया कि कुछ ही वर्षों में तस्कर  उनकी नौ गायों को उनके घर से चुरा ले गये। गौरक्षकों पर मीडिया द्वारा छेड़े गये युद्ध के प्रभाव को समझाते हुए उनके बेटे ने कहा कि किसान सोच रहे हैं कि अगर गाय चोर अगली बार हमला करता है तो क्या करना है। आंसुओं को रोकने की कोशिश करते हुए उन्होंने कहा, “हमें हाथों में हाथ डालकर खड़े हो जाना चाहिए और उन्हें हमें लूटने देना चाहिए। अगर हम विरोध करते हैं, तो वे कहेंगे कि मॉब लिंचिंग हुई है।”

औरय्या में साधु की हत्या और अलवर जैसे क्षेत्रों में गौरक्षकों की भावना को मारने का प्रयास गौरक्षक समूहों से छुटकारा पाने के लिए दो आयामी रणनीति प्रकट करता है ताकि समय के साथ-साथ गोवध को सामान्य किया जा सके। पहली रणनीति है भयानक हिंसा के माध्यम से अत्यंत भावुक गुप्तचरों के समूह को धमकाना, हमला करना और मारना; और दूसरी है सॉफ्ट मीडिया प्रचार द्वारा एवं सतर्कता के ब्रश से पूरे गाय-निगरानी आंदोलन को चित्रित करके आक्रामक गौरक्षकों की कठोर परत का विरोध करना।

जहाँ इस्लामवादी और उनके समर्थक अपनी पूरी कोशिश कर रहे हैं और वे गाय को हिंदू से अलग करने के अपने एजेंडे में सफल भी हुए हैं, गौरक्षकों के लिए यह आसान नहीं होगा। फिर भी, वे दृढ़ एवं निर्भीक होकर खड़े हैं।

नवल किशोर शर्मा आश्वासन देते हैं, “जब हम बाहर निकलते हैं, तो हमें पता नहीं होता है कि हम जीवित वापस आ पाएंगे। लेकिन हम धर्म के पक्ष में लड़ रहे हैं। गौमाता हमारी रक्षा करती हैं। जमीन का एक इंच का टुकड़ा भी छोड़ने का कोई सवाल नहीं है।”

अरिहंत स्वराज्य के डिजिटल कंटेंट मैनेजर हैं