विचार
राष्ट्र-विरोधी शक्तियाँ क्यों बढ़ रही हैं, अपसंस्कृति के प्रसार से देश को क्या खतरा है

जिस तरह से विगत कुछ वर्षों में भारत के अंदर एकाएक अपराधों की बाढ़ आ गई है जिसमें बालिकाओं-महिलाओं का शीहलहरण, मंदिर के पुजारियों की हत्याएँ तथा मंदिर की भूमि पर अवैध कब्ज़ा और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की हत्या आदि के साथ ही साथ जनता-जर्नादन में बढ़ती असहनशीलता एक सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय है।

वस्तुतः एक बहुत सोची-समझी योजना के अंर्तगत देश में सक्रिय राष्ट्र-विरोधी शक्तियाँ एक बार फिर से वर्ष 2019-20 में संपूर्ण भारत में करवाए गए सीएए-विरोधी दंगो की भाँति हिंसा एवं रक्तपात को पुनः भड़काकर पूरे समाज में भ्रम, अस्थिरता एवं भय पैदा करना चाहती हैं। इन राष्ट्र-विरोधी शक्तियों को ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का नाम दिया गया है तथा दुर्भाग्यवश इन्हें कुछ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)-विरोधी राजनीतिक दलों का वरदहस्त भी प्राप्त है।

ऐसे षड्यंत्र को सफल तरीके से क्रियान्वित करने के लिए यह ‘टुकड़े-टुकडे गैंग’ देश तथा विदेश में बैठे आकाओं के सहयोग से कई तैयारियाँ करता है जिसमें रातों-रात वेबसाइट तैयार कर अनेक लिंकों के माध्यम से तथा सोशल मीडिया के सभी साधनों का उपयोग करते हुए अधिक से अधिक संभावित दंगाईयों को एकजुट करना तथा देश के सभी प्रमुख स्थानों पर व्यापक दंगा, हिंसा तथा रक्तपात करवाना एवं इस कांड का अंर्तराष्ट्रीयकरण करके भारत को विश्व के मंच पर बदनाम करवाना इसका लक्ष्य होता है।

इसके अतिरिक्त जिस तरीके से ऐसे संकीर्ण मानसिकता वाले कुछ राजनीतिक दल तथा उनका समर्थन प्राप्त अनेक षड्यंत्रकारी संगठन एकजुट होकर केवल केंद्र सरकार तथा भाजपा शासित उत्तर प्रदेश सरकार या अन्य प्रदेश सरकारों को घेरने तथा अस्थिर करने के लिए रात-दिन एक किए हुए हैं, उसका उद्देश्य समाज में प्रतिदिन होने वाले जघन्य अपराधों को रोकना या किसी शीलहरण की दिवंगत पीड़िता या उसके परिवार को न्याय दिलाना नहीं बल्कि अपने अधर में लटके राजनीतिक भविष्य की रक्षा करने के लिए दीर्घकालीन आंदोलन चलाने का कुचक्र तैयार करके देश को विभाजित करना और समाज को संकीर्ण स्वार्थों के आधार पर बाॅंटना मात्र ही है।

इन असमाजिक और आपराधिक कार्यों को जान-बूझकर कराने के लिए न केवल गुप्त योजना बल्कि धन, अस्त्र-शस्त्र एवं अन्यान्य सहायता राष्ट्र-विरोधी शक्तियाँ के साथ ही साथ विदेशी ताकतों द्वारा उपलब्ध भी कराई जा रही है जैसा कि देश की गुप्तचर ऐजिंसियाँ निरंतर आगाह कर रहीं हैं। वस्तुतः ये सभी भारत-विरोधी षड्यंत्रकारी तथा विघटनकारी ताकतें देश की निरंतर विकसित हो रही न्यायपूर्ण छवि तथा एक शक्तिशाली प्रजातांत्रिक-उदारवादी और तेज़ी से विकासशील आर्थिक एवं सैनिक शक्ति से बेहत आहत हैं क्योंकि आज देश का यशस्वी एवं सफल नेतृत्व न केवल देश में बल्कि संपूर्ण वैश्विक व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। 

विशेषतया विगत कई दशकों से लंबित देश की कुछ जटिल समस्याएँ- तीन तलाक का मुद्दा, जम्मू एवं कश्मीर का विशेष दर्जा, तथा राम जन्म भूमि विवाद को जिस दृृढ़ इच्छाशक्ति एवं साहस का परिचय देते हुए देश के शासक-राजनीतिक दल तथा सर्वोच्च न्यायपालिका ने सुलझाया, उससे इन सभी देश-विरोधी शक्तियों के मुँह पर करारा तमाचा पड़ा है और उन्हें भरपूर जवाब भी मिल चुका है।

इसी के साथ गत वर्ष कोरोना महामारी के भीषण संकट का दौर तथा उन्हीं दिनों चीन द्वारा भारत-चीन सीमा पर जगह-जगह घुसपैठ के प्रयास की घोर चुनौती के बीच भी देश जिस तरह से बेहद शांतिपूर्ण तथा अदम्य साहस एवं धैर्य का परिचय देते हुए न केवल अडिग रूप से खड़ा है बल्कि तेज़ी से आगे भी बढ़ता जा रहा है, यह भी इन राष्ट्र-विरोधी शक्तियाँ से देखा नहीं जा रहा है।

दीर्घकालिक शाहीन बाग धरना, हाथरस बालिका हत्या कांड, बलरामपुर शीलहरण कांड, राजस्थान के करौली में पुजारी की हत्या आदि के बाद पिछले लगभग तीन माह से चल रहे किसान आंदोलन के प्रसंग में बहुचर्चित टूलकिट रूपी षड्यंत्र जिसमें देश की दिशा रवि नामक पर्यावरण कार्यकर्ता तथा इंजीनियर शांतनु मुलुक और स्वीडन की एक अन्य पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थर्नबर्ग के साथ पाॅर्न स्टार मिया खलीफा तथा खलिस्तान समर्थक आतंकवादी आदि शामिल दिखाई पड़ रहे हैं, इससे साफ परिलक्षित हो रहा है कि भारत के खिलाफ विघटनकारी शक्तियाँ काफी गहराई से अपनी पैठ बना चुकी हैं।      

पिछले कुछ वर्षों से यह साफ दिखाई दे रहा है कि ऐसी षड्यंत्रकारी तत्वों को अपने संकीर्ण स्वार्थों के लिए समर्थन देने वाले देश के कुछ विपक्षी राजनीतिक दलों का एकमात्र लक्ष्य भाजपा सरकारों का केवल विरोध करना मात्र ही रहता है, भले ही सरकारें चाहे कितना ही अच्छा काम क्यों न कर रही हो। निस्संदेह यह शासन का दायित्व है कि वह अपराध पर कठोरतापूर्वक नकेल कसे तथा प्रत्येक व्यक्ति के जानमाल तथा संपत्ति की सुरक्षा अवश्य सुनिश्चित करे।

परंतु भारत जैसे विशाल जनसंख्या एवं क्षेत्रफल वाले देश तथा उत्तर प्रदेश या राजस्थान जैसे बडे़ प्रदेशों में केवल सरकार, चाहे वह जिस राजनीतिक दल की हो, इस कार्य को अकेले नहीं कर सकती। तथापि ऐसे महत्वपूर्ण कार्य के क्रियान्वयन में सरकारों का ईमानदारी भरा प्रयास अवश्य दिखना भी चाहिए जो आजकल विभिन्न राज्यों में समान रूप से नहीं दिखता है। इस अत्यंत महत्वपूर्ण एवं अतिआवश्यक कार्य में सभी राजनीतिक दलों के साथ देश के प्रत्येक नागरिक का पूर्ण सहयोग एवं निष्ठा अपेक्षित है जिसका आज भी अभाव है, अन्यथा इस प्रकार से अपराधों की बाढ़ न आ जाती।

आज संपूर्ण भारत यह जानता है कि लगभग सभी राजनीतिक दल अपराधियों को न केवल संरक्षण देते हैं बल्कि निर्वाचन आदि में अपनी विजय सुनिश्चित करने हेतु उनका खुलेआम प्रयोग भी करते हैं। अतः राजनीति का अपराधीकरण, अपराधियों का राजनीतिकरण तथा संगठित अपराध आज देश तथा प्रदेश की राजनीति में एक दुखद सच्चाई बन चुका है।

परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहा है कि देश की संसद तथा राज्य की विधानसभाओं में अनेक माननीय सांसद तथा विधानसभा सदस्य दागी हैं और उनके ऊपर संगीन आपराधिक मुकदमे भी कायम हैं। ऐसी दशा में राजनीतिक दलों के दोहरे चरित्र के कारण ही इस प्रकार की जघन्य आपराधिक घटनाओं की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है और समाज में अशांति और असुरक्षा बढ़ती जा रही है। 

अतः ऐसे भयावह एवं अपसंस्कृति को बढ़ाने वाले परिदृश्य में देश के समस्त विवेकवान एवं कर्तव्य परायण जनता को ऐसी राष्ट्र-विरोधी शक्तियों तथा राजनीतिक दलों के राष्ट्र-विरोधी कुकृत्यों को समझना चाहिये तथा उनका पुरजोर विरोध करना चाहिये क्योंकि ऐसे तत्वों का लक्ष्य देश या समाज का हित नहीं है बल्कि भारत का विघटन एवं विभाजन करना तथा समाजिक समरसता और सौहार्द को छिन्न-भिन्न करते हुये अपने निहित तुच्छ स्वार्थों का पोषण करना मात्र ही है।

अतः देश की जनता अर्थात् हम भारत के लोग को जाति, धर्म, भाषा, समुदाय, क्षेत्र आदि जैसे संकीर्ण विचारों से ऊपर उठना चाहिए तथा देश एवं समाज के हित में पूरी ईमानदारी एवं लगन के साथ काम करते हुए ऐसे दोहरे चरित्र वाले राजनीतिक दलों को और ऐसे दागी नेताओं को अलग-थलग अवश्य करना चाहिए जिससे देश तथा राष्ट्र की सुरक्षा और मानव संस्कृति की रक्षा हो सके तथा सामाज में शांति एवं समरसता की स्थापना भी की जा सके। विशेष रूप से नारी जाति के सम्मान की रक्षा अवश्य होनी चाहिए, जैसा प्राचीन भारतीय शास्त्रों में उल्लिखित है –

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्र नार्यस्तु पीड्यन्ते तत्र सर्वाऽफलाः क्रियाः ।।

ऐसा हो सकता है क्योंकि मानव उद्यम से परे कुछ नहीं होता है ।                 

सुधांशु त्रिपाठी उत्तर प्रदेश राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज में आचार्य हैं।