भारती / विचार
ईशनिंदा कानून यदि हिंदू प्रतीकों की रक्षा न करे तो लागू होने से पहले ही मृत हो जाएगा

कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि क्यों हमारे राजनेता नागरिकों और मतदाताओं को मूर्ख समझते हैं। उदाहरण है एक विधेयक जिसका उद्देश्य मोहम्मद (जिन्हें मुस्लिम अपना पैगंबर मानते हैं) को अपमान से बचाना है।

प्रकाश अंबेडकर के नेतृत्व में वंचित बहुजन अघाड़ी (वीबीए) और कई मुस्लिम समूह इस विधेयक का समर्थन कर रहे हैं, जिसका शीर्षक है- पैगंबर मोहम्मद और अन्य पंथ प्रमुख (अपयश निषेध) अधिनियम 2021। यह शीर्षक ही विधेयक का अवमूल्यन करने के लिए पर्याप्त है।

पहला तो यह कि यदि विचार सभी पंथ से जुड़े व्यक्तियों/देवी/देवताओं को अपमान और अपयश से बचाने का है तो क्यों मोहम्मद का नाम शीर्ष पर है? स्पष्ट रूप से यह प्रयास है अन्य पंथों से उन्हें सर्वोपरि दिखाना। यदि यह सर्वोच्चतावादी विचार नहीं है तो क्या है।

वास्तविकता यह है कि यदि कोई पंथ है जिसका अपमान करने से लोग डरते हैं, तो वह इस्लाम ही है। सलमान रशदी को मृत्यु दंड सुनाने से लेकर उत्तर प्रदेश में कमलेश तिवारी की हत्या तक हम सबने देखा है कि मोहम्मद के मान की रक्षा करने के लिए कुछ मजहबी उन्मादियों ने कानून को अपने हाथ में लेने से संकोच नहीं किया।

इससे अन्य संप्रदायों में भय फैला। ईशनिंदा के लिए शासन द्वारा उठाए गए कदम कानून के दायरे में ही होंगे लेकिन मोहम्मद के वास्तविक या मनगढ़ंत अपमान के विरुद्ध भड़काई जाने वाली बदले की भवना पर दृष्टि रखना या रोकना शासन के लिए कठिन हो जाता है।

यदि किसी संप्रदाय को ईशनिंदा-रोधी कानून चाहिए तो वह हिंदू धर्म है। कारण- द्रविड़, दलित और कम्युनिस्ट एक्टिविस्टों से लेकर इस्लाम और ईसाइयत के प्रचारकों तक, यहाँ तक कि आत्मघृणा करने वाले हिंदू भी हिंदू देवी-देवताओं और धर्मगुरुओं को निशाना साधना सरल समझते हैं।

अब्राह्मिक मूर्ति-भंजन और कम्युनिस्ट घृणा झेल चुके हिंदू समुदाय ने कभी ईशनिंदा कानून की माँग नहीं की लेकिन जिनके पक्ष में कथित “हिंदू बहुसंख्यावाद” से रक्षा के लिए विश्व शक्तियाँ खड़ी हैं, वे विशेष अधिकारों की माँग कर रहे हैं।

किसी भी ईशनिंदा-रोधी कानून या घृणा भाषण के लिए कानून की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसकी शर्तें परिभाषित करना बहुत कठिन हो जाता है। हम समझते हैं कि मोहम्मद का कार्टून बनाना या किसी भी मूर्त रूप में उनका चित्रण ईशनिंदा है।

लेकिन क्या अपने जीवनकाल में मोहम्मद ने जो-जो किया, जिसमें कुछ विवादास्पद घटनाएँ भी रहीं, उसकी आलोचना करना भी ईशनिंदा के दायरे में आएगा? यदि मुस्लिम हिंदुओं की मूर्ति-पूजा या ईश्वर में न मानने वाले मत की आलोचना कर सकते हैं तो इसका उलट स्वीकार्य क्यों नहीं है?

और घृणा भाषण क्या है? यदि मैं कहूँ कि इस्लाम का एक साम्राज्यवादी एजेंडा है तो क्या इसे घृणा भाषण या इस्लामोफोबिया कहा जाएगा? हम किसी मत और उसके प्रतीकों की वैध आलोचना और ईशनिंदा के बीच की सीमा कहाँ खींचेंगे?

शियाओं और अहमदियाओं के पवित्र प्रतीकों का सुन्नियों द्वारा किया जाने वाला अपमान किस श्रेणी में आएगा? निरीश्वरवादियों और अनीश्वरवादियों द्वारा किए जाने वाले अपमान का क्या? मूर्तियों और विग्रहों को मानने वाले धर्मों के प्रति “बुतपरस्ती” के नाम पर घृणा और अपमान का क्या?

और हम यह भी पूछ सकते हैं कि आखिर मूर्ति-पूजा से समस्या क्या है जब तक कि ऐसा करने के लिए कोई आपको विवश न कर रहा हो? इतना सब कहने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि भारत में एक सीमित ईशनिंदा-रोधी कानून की आवश्यकता है, मुख्य रूप से हिंदुओं की रक्षा के लिए।

यदि ऐसा कानून बनाया जाए जो भारतीय देवताओं, सिख गुरुओं, जैन एवं बौद्ध प्रतीकों एवं अन्य पंथों के पैगंबरों पर बिना सोचे-समझे अभद्र टिप्पणी करने के लिए दंडित करे, जिसमें पवित्र माने जाने वाले प्रतीक पहले से सूचीबद्ध हों जिसे सभी पंथों के सदस्य मिलकर बनाएँ, तो वह सही होगा।

हालाँकि फिर भी, इसके कई अर्थ निकाले जा सकेंगे। उसके बावजूद भी कुछ कट्टर पेरियारवादी और कुछ दलित नेता हिंदू प्रतीकों क निंदा की सीमाओं को मानने से मना कर सकते हैं। जिनकी राजनीति ही हिंदू धर्म का अपमान करके चल रही हो, वे इस प्रकार का ईशनिंदा कानून नहीं चाहेंगे।

अंततः, ईशनिंदा-रोधी कानून लागू होने से पहले ही मृत हो जाएगा। यह तभी लागू हो पाएगा जब हिंदू आत्म-गौरव और आत्म-सम्मान को भूलकर गांधी की तरह किसी एक समुदाय का विश्वास पाने के लिए एक-तरफा प्रयास करेंगे। तुष्टीकरण कभी काम नहीं आया है और यहाँ भी यह काम नहीं करेगा।

यदि उसके बावजूद हम एक-तरफा ईशनिंदा कानून के लिए तैयार हो जाएँ, तो सर्वोच्चतावादी विचारों की विजय होगी। यदि कोई कानून होगा तो उसे केंद्रीय होना चाहिए, क्षेत्रीय नहीं। इस तरह जो सिर्फ हिंदू प्रतीकों का अपमान किया जाता है, उसे अमान्य घोषित किया जा सकेगा।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।