विचार
विदिशा पर हमले से अलाउद्दीन को कैसे आया देवगिरि में लूट का विचार- भाग 15(अ)

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र दो शहरों में लूट के यह दृश्य फ्लैशबैक में हैं। जब जलालुद्दीन खिलजी मरा नहीं था (उसकी मौत की कहानी यहाँ पढ़िए) और उसने राजस्थान के मंडावर में हमला किया था। तब अलाउद्दीन खिलजी ने कड़ा से ही सीधे भिलसा यानी आज के विदिशा पर हमला बोला।

अब आप देखिए दिल्ली से जलालुद्दीन लगातार रणथम्बौर (यहाँ पढ़ें), मंडावर तक हमले बोल रहा है। इधर अलाउद्दीन ने भिलसा पर हमले के लिए लश्कर को निकाला है। दिल्ली में काबिज होने के बाद लगातार बिना रुके इन शिकारी हमलों के कारण क्या थे?

एक ही कारण था- पीढ़ियों से समृद्ध हिंदू राज्यों को लूटना और लूट से हासिल की गई ताकत के बूते पर और दूर-दूर तक जाकर हमले बोलना। खिलजियों ने अपने से पहले दिल्ली से लेकर लखनौती तक काबिज तुर्कों की राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल और ओडिशा में लगातार लूटपाट के न सिर्फ तजुर्बे सुने थे बल्कि मामूली हैसियत में रहते हुए इन हमलों और लूटपाट में हिस्सेदारी की थी। उनकी दाढ़ में जन्मजात खून लगा हुआ था।

आज के विदिशा और तब के भिलसा पर जियाउद्दीन बरनी की वह रिपोर्ट पढ़िए जहाँ हमला करने के कारण अलाउद्दीन खिलजी की पदोन्नति हुई थी। उसे कड़ा में मुक्ता बनाया गया था।

भिलसा से उसे बेहिसाब दौलत मिली। एक पीतल की मूर्ति भी थी, जो उस इलाके के हिंदुओं की देवी थी। यह सब लदवाकर उसने दिल्ली में सुलतान के पास भेज दिया। उस मूर्ति को दिल्ली में बंदायू दरवाजे पर लटकवा दिया गया, जिससे कि लोग सबक हासिल करें। भिलसा से अत्यधिक धन-संपदा लाने से खुश होकर सुलतान ने उसकी इज्जत अफजाई के लिए अर्जे-ममालिक का ओहदा भी दे दिया।

अपने जीते हुए इलाकों को तुर्क अक्ताओं (प्रांतों) में बांटकर अपने परिवार वालों, खास रिश्तेदारों, चमचों और गुलामों को सौंप देते थे। उनका पद मुक्ता कहलाता था। यह एक ऐसा पद था, जिसपर तबादले भी होते रहते थे। कोई एक साथ कई अक्ताओं का मुक्ता भी हाे सकता था।

जब दिल्ली की फौज कहीं हमले के लिए जाती तो इन अक्ताओं को भी अपने खर्चे पर पल रही फौज को भेजना अनिवार्य था। इस तरह हिंदुस्तान की ज़मीन पर कब्जे, हिंदुस्तान का ही संचित धन लूटना और यह सब हिंदुस्तान के ही दूसरे इलाकों को बरबाद करने के काम आया।

आप इस तरह एक देश को एक अजीब से चक्रव्यूह में लगातार घिरता और फँसता हुआ देख सकते हैं। जैसे दलदल में फँसे हुए किसी इंसान को मगरमच्छों ने अपने जबड़े में जकड़ लिया हो। मगरमच्छों का एक झुंड गया तो दूसरे झुंड ने लपक लिया हो। यह बिल्कुल ऐसी ही जानलेवा खींचातानी का खौफनाक नज़ारा है। इस लिहाज से इस देश का टूट-फूटकर बचे रहना संसार का एक बड़ा चमत्कार ही है।

अलाउद्दीन ने जब विदिशा से लूट का माल दिल्ली भेजा तो सुलतान ने खुश होकर उसे आरिजे-ममालिक या अर्जे-ममालिक बनाया। यह लुटेरों और हमलावरों की फौज में सबसे अहम ओहदा था। इसका काम था- हमलावरों की नई फौज बनाना, उनका मुआयना और हिसाब-किताब रखना। लेकिन अर्जे-ममालिक की सबसे खास ज़िम्मेदारी थी- कहीं भी हमले के बाद लूट के माल की देखरेख करना।

दिल्ली से बाहर लगातार इन हमलों का मकसद सिर्फ हिंदू राज्यों या बागी होने वाले तुर्क हाकिमों को सबक सिखाने के लिए होता था। कुलमिलाकर लूटपाट इन हमलों का एक बड़ा मकसद थी। इसलिए लूट का माल सबसे अहम था, जिसकी देखरेख किसी भरोसेमंद को ही सौंपी जा सकती थी।

विदिशा ने 56 साल बाद ऐसे भीषण हमले का स्वाद चखा। अलाउद्दीन खिलजी से पहले 1235 में यहाँ पहली बार इल्तुतमिश के हमले का आँखों देखा हाल हम देख चुके हैं (यहाँ पढ़ें)। तब मिनहाज सिराज ने यहाँ एक भव्य मंदिर के तोड़े जाने की जानकारी हमें दी थी।

विदिशा लुटा तब भी होगा। मंदिर का सारा सोना-चांदी और जवाहरात के साथ शहर के मालदार लोगों को लूटने का कारनामा तब भी हुआ ही होगा। अब दौर बदल चुका था। किरदार बदल गए थे। कहानी वही थी। भुक्तभोगी भी वही विदिशा था। अलाउद्दीन के वक्त यह 1291 का साल था। विदिशा या भिलसा की इस मुहिम के दौरान बरनी एक चौंकाने वाली जानकारी दर्ज करता है। आप भी पढ़िए-

भिलसा की लूट के दौरान ही अलाउद्दीन को देवगिरि की अथाह धनसंपत्ति का पता चला। वहाँ के निवासियों से देवगिरि जाने के बारे में उसने पूछताछ की। तब उसने ठान लिया कि कड़ा पहुँचकर ही वह देवगिरि पर हमले की तैयारी शुरू कर देगा। सवार और प्यादों की एक बड़ी तादाद के साथ देवगिरि पर हमला करेगा और इसकी खबर जलालुद्दीन को भी नहीं दी जाएगी।

शातिर खिलजी विदिशा की लूट के माल के साथ दिल्ली पहुँचा। उसने कड़ा और अवध की अक्ता के राजस्व (फवाजिल) का वह हिस्सा भी माफ करा लिया, जो दिल्ली के खजाने में भेजा जाता था। उसकी आँखों में अब देवगिरि को बरबाद करने का ख्वाब चमक रहा था। इसके लिए उसे धन और साधन की ज़रूरत थी। साथ ही सुलतान के भरोसे की भी। उसने सुलतान को बरगलाया-

“मैंने सुना है कि चंदेरी और उसके आसपास के इलाके में रहने वालों को दिल्ली के लावलश्कर की कोई परवाह नहीं है। अगर आपका हुक्म हो तो मैं अपनी अक्ता की आमदनी से नए सवार और प्यादे भरती कर उस तरफ हमला बोलूँ और वहाँ से इतनी दौलत लूटकर लाऊँ कि जिसका अभी कोई अंदाजा भी नहीं हो सकता। तब अपनी अक्ता का फवाजिल एक साथ खजाने में जमा करूँ।”

दिल्ली में जलालुद्दीन को तो बैठे-ठाले ही लूट का माल मिल रहा था। लालची जलालुद्दीन ने अपने काबिल भतीजे को हमलों की हरी झंडी दे दी। कड़ा की अक्ता के बकाया भी फिलहाल टाल दिए। विदिशा की लूट ने अलाउद्दीन खिलजी की तरक्की का रास्ता खोल दिया। विदिशा वालों ने ही उसे बताया कि दौलत तो देवगिरि में है।

कड़ा पहुँचकर अलाउद्दीन अपने भरोसेमंद लोगों से कहता था कि अगर उससे बकाया न मांगा गया तो वह 3,000-4,000 सवार और 2,000 पायक उस धन से भरती करेगा और अब देवगिरि पर हमला होगा। लोगों में यह खबर रहेगी कि वह चंदेरी को तबाह करने निकला है। वह सबके सामने देवगिरि का नाम तक नहीं लेता था।

अब उस समय में इन अहम जानकारियाँ को जुटाने वाले हमारे दोस्त जियाउद्दीन बरनी का चचा मलिक अलाउलमुल्क तस्वीर में आता है। वह अलाउद्दीन खिलजी का खास आदमी है। उसका जिक्र यहाँ एक खास वजह से है। जब अलाउद्दीन ने लुटेरों की एक फौज बना ली तब वह देवगिरि पर हमले के लिए निकला और कड़ा में अपना नायब इसी अलाउलमुल्क को ही बनाया। यानी देवगिरि से हुई लूट के बारे में हमें सबसे विश्वसनीय जानकारियाँ मिलने वाली हैं।

अलाउलमुल्क उसकी गैर-मौजूदगी में दिल्ली में जलालुद्दीन को लिख-लिखकर भेजता रहा कि अलाउद्दीन विद्रोहियों के इलाके तबाह करने में लगा हुआ है। पहली सदी के इन दस्तावेजों में विद्रोहियों की अक्ल ठिकाने लगाने या उनके सूबों का विध्वंस करने का जिक्र हिंदू राज्यों के ही संदर्भ में अधिकतर हुआ है। यह उन इलाकों में हमले और लूट का एक कारण बताने के लिए था कि वे दिल्ली के आगे झुक नहीं रहे हैं। इसलिए उन्हें सबक सिखाना ज़रूरी है। भारतीयों ने बेवजह ऐसे नृशंस सबक इतिहास में कभी नहीं सीखे थे।

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