विचार
किसान कानूनों का विरोध राजनीतिक होने के साथ-साथ किसान-विरोधी कैसे है

पिछले दो हफ्तों से, पंजाब के किसान ‘तीन कृषि अधिनियमों’ पर दिल्ली की सीमाओं पर ठंडी रातों में आंदोलन कर रहे हैं। तब से, इन कानूनों के बारे में बहुत ग़लतफ़हमियाँ फैलाई जा रही हैं कि उनका भारतीय किसानों के ऊपर कैसा असर होगा। हम इस लेख के मध्यम से इन अधिनियमों के प्रावधानों को स्पष्ट रूप से जानने का प्रयास और यदि कोई वैध आलोचना है तो उसे भी संबोधित करने का प्रयास करेंगे।

1. किसान उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश, 2020

इस नए कानून के साथ, किसानों को अपनी उपज को किसी को भी बेचने और अपनी इच्छानुसार किसी भी बाजार में बेचने की स्वतंत्रता होगी। यह वर्तमान प्रणाली के “के अलावा” है, जो जारी रहेगी।

इससे पहले, किसानों को केवल स्थानीय मंडियों में बेचने के लिए प्रतिबंधित किया गया था। यह अधिनियम सभी विनियमों को हटा देता है और किसानों को फार्म गेट, कोल्ड स्टोरेज, प्रसंस्करण इकाइयों आदि में व्यापार करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।

यह राज्य एपीएमसी विधानों के तहत अधिसूचित बाजारों (स्थानीय मंडियों) के भौतिक परिसरों के बाहर अवरोध मुक्त अंतर-राज्य और अंतः-राज्य वाणिज्य की भी अनुमति देगा। मंडियाँ किसानों को उनकी उपज की बिक्री के लिए किसी भी का कोई शुल्क (से, लेवी) नहीं लेगी, जिससे उनकी परिवहन लागत कम होगी। साथ ही ई-नाम व्यापार प्रणाली भी जारी रहेगी।

इसलिए अब, जो किसान केवल राज्य एपीएमसी (कृषि उपज बाजार समिति या कहें, सरकार के रूप में बिचौलिए) के माध्यम से अपनी उपज बेच सकते थे, अगर वे चाहें तो एपीएमसी सहित किसी को भी बेच सकते हैं। इससे पुरानी ज़मींदारी प्रथा जिसके अनुसार किसान अपनी उपज जिस कीमत पर जिसे वह चाहे नहीं बेच सकता था, समाप्त होगी। आधुनिक दुनिया में कहीं भी किसान सरकार के हुक्म पर आश्रित नहीं रहते कि वे अपनी फसल कहाँ बेचें।

आज़ादपुर मंडी का एक दृष्य

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि दुर्भावनापूर्ण झूठ- सरकार एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) के को हटा रही है- फैला कर गंभीर चिंता जताई जा रही है। तथ्य यह है कि एमएसपी सिर्फ अपना एकाधिकार खोएगा पर उसके अधीन भी खरीद जारी रहेगी। अधिनियम केवल अनावश्यक नियमों और बाधाओं को दूर करता है जो किसानों पर गलत तरीके से लगाया जाता रहा है। क्या यह अच्छी बात नहीं है?

2. मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तीकरण और संरक्षण) समझौता अध्यादेश, 2020

यह कानून मुख्य रूप से अनुबंधित कृषि से संबंधित है, जिससे किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिल सके। इस अधिनियम का उद्देश्य थोक व्यापारी क्रेता, बड़े खुदरा विक्रेताओं, खाद्य प्रसंस्करण कंपनियों, या निर्यातकों, आदि के साथ अनुबंध में प्रवेश करने वाले किसानों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करना है। यहाँ प्रयास शक्तिशाली कॉरपोरेट संस्थाओं द्वारा किसानों का फायदा, उनके जोखिम को कम करना तथा उन्हें उचित मूल्य सुनिश्चित करने का है।

जब कोई खरीदार फसल पैदा करने के लिए एक किसान से संपर्क करता है, तो उन्हें एक अनुबंधित मूल्य के साथ कानूनी अनुबंध में प्रवेश करना होगा। फसलों की बुआई से पहले ही इस कीमत का आश्वासन होगा।

मूल्य आश्वासन के सिद्धांत के आधार पर, अगर बिक्री के समय में बाज़ार मूल्य शुरू में बातचीत की गई कीमत से अधिक है, तो किसान बातचीत की गई कीमत से और अधिक कीमत का हकदार है। मान लीजिए कि फसल का बिक्री के समय बाजार मूल्य पहले की तुलना में कम हो गया, तो उस मामले में, किसान तय कीमत के हकदार हैं। इसलिए अगर बाज़ार में अचानक गिरावट आती है, तो उससे किसान को नुकसान नहीं होगा।

कृषि समझौते से किसानों को तकनीकी सहायता

इस नए कानून के अनुसार, किसानों को तीन दिनों के भीतर मूल्य का भुगतान होगा। अधिनियम स्थानीय विवाद निवारण तंत्र भी प्रदान करता है जो किसानों की कानूनी फीस के बिना विवादों का त्वरित समाधान प्रदान करता है।

नया कानून किसानों को खरीददारों के साथ कानूनी साझेदार बनाता है, जहाँ दोनों पक्ष उपज में वृद्धि से लाभान्वित होते हैं। आधुनिक तकनीक, बेहतर बीज, किफायती भंडारण, कुशल परिवहन प्रदान करना और किसानों को उनकी उत्पादकता में सुधार करने में मदद करना बड़े खरीददारों के हित में है।

कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं और एक अकुशल आपूर्ति श्रृंखला की कमी के कारण वर्तमान में लगभग 35-40 प्रतिशत फसल बर्बाद होती है। इन कृत्रिम अड़चनों को हटाने के साथ, लेन-देन का पैमाना कॉरपोरेट संस्थाओं को बहुत कम लागत पर भंडारण और रसद सुविधाओं में निवेश करने के लिए मजबूर करेगा।

संक्षेप में, यह अधिनियम छोटे ग्रामीण किसानों की दक्षता और समृद्धि में सुधार लाने पर ध्यान केंद्रित करते हुए कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है।

  1. आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020

यह संशोधन अधिनियम पुरानी, ​​युद्धकालीन कानूनों, जो यह सुनिश्चित करने के लिए बनाए गये थे की सरकार के पास “आवश्यक वस्तुओं” का भंडार हो, और उस कारण बाज़ार में कितनी फसल खरीदी/बेची जा सकती है, इस पर प्रतिबंध/सीमा को हटाने का इरादा रखता है।

यह युद्ध, अकाल, असाधारण मूल्य वृद्धि, प्राकृतिक आपदा, आदि के युग से एक अधिनियम था, जब सरकार ने एक निश्चित मात्रा में इन फसलों के कब्ज़े को आपराधिक बना दिया था। इससे लोगों को दशकों तक राशन के लिए लाइन में लगना पड़ा।

आज, हमारे किसान इन सभी फसलों का भरपूर उत्पादन करते हैं। इसलिए अब अनाज, दाल, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू को आवश्यक वस्तुओं के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जाएगा। यह उन फसलों में पैमाने के प्रतिबंध को हटा देगा जो किसान, उपभोक्ता और सभी के बीच में चोट पहुँचाते हैं।

न्यूनतम समर्थन मूल्य तंत्र की वास्तविकता

भारत सरकार साल में दो बार कुछ वस्तुओं के लिए एमएसपी निर्धारित करती है। यह भारत सरकार द्वारा किसानों से सीधे खरीदने के लिए एक मूल्य निर्धारित किया गया है जो यह सुनिश्चित हो सके कि वे मूल्य पर नुकसान नहीं झेलते।

संक्षेप में, एमएसपी में किसानों द्वारा कृषि गतिविधियों पर खर्च किए गए धन के लिए, साथ ही अवसर लागत (किसी अन्य काम पर कमाई खोना), पूंजी खर्च पर अतिरिक्त ब्याज, और कृषि भूमि के किराए खोने की लागत (भूमि की अवसर लागत) भी शामिल है।

यह महसूस करना स्वाभाविक है कि एमएसपी कृषि क्षेत्र की भलाई के लिए महत्त्वपूर्ण है। हालांकि, सच्चाई यह है कि एमएसपी ज्यादातर अप्रासंगिक है। 2015 में, शांता कुमार समिति ने पाया कि केवल 14 प्रतिशत किसान ही अपनी उपज सरकारी खरीद एजेंसियों को बेच सकते हैं।

यह मुख्य रूप से कुछ राज्यों तक ही सीमित है। पंजाब और हरियाणा जैसे उत्तर भारतीय राज्यों में सिर्फ धनी किसानों तक एमएसपी की अच्छी पहुँच है। अधिकांश छोटे किसानों को यह भी पता नहीं है कि एमएसपी मौजूद है और यह तंत्र क्या है। उन्हें बिचौलियों की पूरी दया पर छोड़ दिया जाता है। यह जमींदारी व्यवस्था की निरंतरता के अलावा और कुछ नहीं है जिसमें छोटे किसानों को नियम अपना गुलाम बनाए हुए थे।

यहाँ यह बात बहुत ध्यान में रखना महत्त्वपूर्ण है कि इतिहास में किसी भी सरकार ने मोदी सरकार की तुलना में बेहतर एमएसपी प्रदान नहीं किया है। न केवल बेहतर एमएसपी, बल्कि खरीदादरी की अतुलनीय राशि। अगर यूपीए सरकार के तहत दालों की खरीद 1.5 लाख मीट्रिक टन थी, तो मोदी सरकार ने उसी अवधि में 76 लाख मीट्रिक टन दालों की खरीद की। तिलहन के लिए, मोदी सरकार ने यूपीए के 3.6 लाख मीट्रिक टन की तुलना में 30 लाख मीट्रिक टन खरीदा।

तो यहाँ सीधा सवाल यह है कि आख़िर विरोध क्या है, और यह आंदोलन केवल पंजाब और आंशिक रूप से हरियाणा तक ही क्यों सीमित है?

पंजाब और हरियाणा दोनों गेहूँ और चावल के अधिशेष का उत्पादन करते हैं, जिसे राष्ट्रीय बफर स्टॉक के लिए भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) द्वारा खरीदा जाता है। दोनों राज्यों ने अपने मंडी संचालन पर भारी कर लगाए हैं।

पंजाब ने वित्तीय वर्ष 2020 में मंडी शुल्क में 1,750 करोड़ रुपये कमाए, और ग्रामीण विकास उप-कर में भी समान राशि मंडियों में बिक्री पर लगाई, जबकि आढ़तियों ने एफसीआई द्वारा भुगतान किए गए कमीशन के रूप में लगभग 1,500 करोड़ रुपये कमाए थे।

सितंबर 2020 में, जब इन तीन विधेयकों को भारतीय संसद द्वारा पारित किया गया था, बहुत चतुराई से, पंजाब में कांग्रेस सरकार ने एमएसपी को अनिवार्य बनाया (गेहूँ और धान के लिए), और एमएसपी के नीचे गेहूँ और धान की बिक्री/खरीद को दंडनीय अपराध।

पंजाब देश के चावल और गेहूँ की फसल का 13 प्रतिशत हिस्सा उपजाता है, लेकिन उदार एफसीआई ने पंजाब से वित्तीय वर्ष 2019-20 में गेहूँ की कुल खरीद का 39 प्रतिशत और चावल की कुल खरीद को 21 प्रतिशत भाग खरीदा। इस वर्ष की धान खरीद का 65 प्रतिशत भाग पंजाब से गया।

राज्यवार खरीद का एफसीआई डाटा

इसकी तुलना यूपी से करें, जो पंजाब से दोगुना गेहूँ पैदा करता है, तो एफसीआई लगभग 10 प्रतिशत गेहूँ की ही खरीद करता है। पंजाब और हरियाणा के किसान किसी भी बाज़ार-जोखिम से लगभग पूरी तरह से अछूते हैं। यह सब इसलिए क्योंकि यूपी और बिहार में कोई संगठित मंडी व्यवस्था नहीं है (बिहार में एपीएमसी को तो 2006 में ही समाप्त कर दिया गया था)।

क्या आप जानते हैं कि एमएसपी को सीधा लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) के माध्यम से स्थानांतरित किया जाता है? केवल पंजाब में छोड़कर, जहाँ यह बिचौलियों के माध्यम से जाता है।

आदर्श रूप से, एफसीआई अपनी खरीद पर जो भी खर्च करता है, उसे सभी राज्यों में समान रूप से विभाजित किया जाना चाहिए, या तो उनकी आबादी के आधार पर या तो उनकी उपज के आधार पर। चूंकि मोदी सरकार ने ऐसा कुछ भी प्रस्तावित नहीं किया है, तार्किक रूप से, यह यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के किसानों का आंदोलन होना चाहिए, न कि पंजाब के किसानों का।

राजनीतिक विरोध

किसान आंदोलन के इर्द-गिर्द फैला एक और झूठ यह है कि मोदी सरकार ने बिना किसी चर्चा के कानून पारित कर दिया। तथ्य यह है कि एपीएमसी सुधारों पर दशकों से चर्चा की गई है, और वास्तव में, इन सुधारों का न केवल कांग्रेस द्वारा वादा और वकालत की गई थी, वे इनके 2019 के चुनाव घोषणापत्र का भी हिस्सा थे।

विडंबना यह है कि मोदी सरकार गरीब किसानों को बिचौलियों से मुक्त करने और उन्हें विकल्प मुहैया कराने के वादों को पूरा करती नज़र आ रही है लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और उनके द्वारा की गई हर एक योजना के प्रति नफरत की वजह से कांग्रेस और उसके पालतू बुद्धिजीवियों ने मिलकर किसानों को जानबूझकर भ्रमित करने के लिए दिल्ली के चारों ओर एक उच्चस्तरीय आंदोलन की योजना को तैयार किया है।

यह मोदी सरकार को किनारे करने का स्पष्ट प्रयास है जो कि साथ ही यह भी कोशिश करता है कि कांग्रेस पार्टी की बढ़ती शिथिलता को कम करे। तभी आप अचानक देखते हैं की अतीत में इन सुधारों का वादा करने वाले सभी लोगों ने इसके खिलाफ हाथ मिला लिया है।

“अन्नदाता” होने का दावा करने वाले इन पेशेवर प्रदर्शनकारियों की माँगों को देखें-

हमारे “अन्नदाता” दंगाइयों और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के आरोपियों के बारे में इतने चिंतित क्यों हैं? इतना ही नहीं, ये “अन्नदाता” ज़हरीली गैस के मध्यम से हमारी ही हत्या के विशेषाधिकार के लिए कानूनी संरक्षण भी माँग रहे हैं। आखिर ‘किसान’ की आड़ में ये लोग कौन हैं?

निष्कर्ष

कृषि-विधेयकों का विरोध विशुद्ध रूप से किसानों का विरोध है। जिस देश में हर घंटे एक गरीब किसान आत्महत्या करता है, वहाँ गलतफहमियाँ और झूठ फैलाकर ये लोग सबसे गरीब लोगों के जीवन के साथ गंदी राजनीति कर रहे हैं। ये सुधार अधिनियम केवल एक लंबे समय से अपेक्षित आवश्यकता ही नहीं है, बल्कि एक नैतिक अनिवार्यता है।